मध्यप्रदेश के समाज में कन्या शिशु सर्वाधिक असुरक्षित और उपेक्षित सदस्य है। अगर कन्या शिशु की जिंदगी के तमाम दुखद पहलुओं का चार्ट बनाया जाए तो हम देखेंगे कि उसे अपनी उम्र के हर चरण में गहरे भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। यह बात एनएफएचएस-3 के मध्यप्रदेश संबंधी आंकड़ों से साफ तौर पर महसूस की जा सकती है। इसमें प्रदेश की कन्या शिशु की दुर्दशा का विस्तार से जिक्र किया गया है।
| पुरुष |
नवजात मृत्य दर |
शिशु मृत्यु दर |
5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु |
| एनएफएचएस- 2 |
67.3 |
97.2 |
141.7 |
| एनएफएचएस- 3 |
52.7 |
80.9 |
103.6 |
| गिरावट(प्रतिशत) |
14.6 |
16.3 |
38.1 |
| महिला |
नवजात मृत्य दर |
शिशु मृत्यु दर |
5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु |
| एनएफएचएस- 2 |
51.7 |
87.5 |
148.0 |
| एनएफएचएस- 3 |
50.1 |
82.8 |
112.7 |
| गिरावट (प्रतिशत) |
1.6 |
4.7 |
35.3 |
प्रदेश में शिशु कन्या की उपेक्षा इस तथ्य के बावजूद हो रही है कि राज्य सरकार को राज्य के हर नागरिक के अधिकार की बिना किसी भेदभाव के रक्षा करने के लिए जिम्मेदार माना जाता है। इससे सरकारी योजनाओं में भी लैंगिक भेदभाव का पता चलता है। अगर हम एनएफएचएस-2 तथा एनएफएचएस-3 की मध्यप्रदेश संबंधी रिपोर्टों में बालमृत्यु दर के आंकड़ों पर नजर डालें तो हमें लैंगिक भेदभाव का पता चलता है। वर्ष 1998-99 में एनएफएचएस-2 तथा वर्ष 2005-06 में एनएफएचएस-3 सर्वेक्षण रिपोर्ट में शिशु बालक मृत्यु दर में तेजी से हुई गिरावट से स्वास्थ्य संबंधी सूचकांकों में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलते हैं। वहीं दूसरी ओर शिशु कन्या मृत्यु दर में गिरावट की दर चिंताजनक रूप से बेहद धीमी गति से कम हुई है। एनएफएचएस-2 से एनएफएचएस-3 के बीच नवजात शिशु मृत्यु दर में 14.6 प्रतिशत की कमी की तुलना में इसी दौरान नवजात कन्या शिशु मृत्यु दर में महज 1.6 प्रतिशत की ही कमी दर्ज की गई। इसी तरह इस दौरान शिशु बालक व शिशु कन्या की मृत्यु दर में 11.6 प्रतिशत का अंतर दर्ज किया गया है।
अगर इस अंतर के कारणों की पड़ताल की जाए तो हम देखते हैं कि लड़कियां लड़कों की तुलना में ज्यादा एनीमिक (खून की कमी) तथा कुपोषण की शिकार होती हैं। एनएफएचएस-3 के सर्वेक्षण के मुताबिक लडकों के 72.4 फीसदी एनीमिया के मुकाबले लड़कियों में 76 प्रतिशत एनीमिया तथा लड़कों के 59.5 फीसदी कुपोषण के मुकाबले लड़कियों में 60.6 फीसदी कुपोषण के मामले दर्ज किए गए हैं। अगर वर्ष 1998-99 तथा 2005-06 के दौरान लड़कों के एनीमिया में 1.9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई तो वहीं इसी अवधि में लड़कियों के मामले यह गिरावट महज 0.1 फीसदी ही दर्ज हुई है।
हमारे यहां कानूनन परिवार के अंदर लैंगिक भेदभाव को खत्म करने के प्रावधान नहीं हैं, जब तक ये किसी बड़ी हिंसा के तौर पर नजर न आएं। शिशु कन्या को जन्म लेते ही जिस पहले लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है, वह है स्तनपान। मध्यप्रदेश में जहां 16.3 प्रतिशत शिशु बालकों को जन्म के पहले घंटे में स्तनपान करने को मिलता है वहीं यह मौका पाने वाली शिशु कन्याएं महज 15.3 प्रतिशत ही हैं। यह भेदभाव टीकाकरण के मामले में भी साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है। दो वर्ष से कम आयुवर्ग की 6.3 प्रतिशत बालिकाओं को किसी भी तरह के टीकाकरण की सुविधा नहीं मिली है, वहीं इसी आयुवर्ग के बालकों में टीकाकरण की सुविधा न हासिल कर पाने वाले बालक 3.8 प्रतिशत ही हैं। इसी तरह अगर दो वर्ष से कम आयुवर्ग के ऐसे बच्चों की तुलना की जाए जिन्हें पूर्ण टीकाकरण की सुविधा मिल चुकी है तो, यहां भी कम यह लैंगिक भेदभाव साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है। बालकों में यह प्रतिशत 44.3 है। वहीं महज 35.5 प्रतिशत बालिकाओं को ही इस उम्र में पूर्ण टीकाकरण की सुविधा मिल पाई है।
शिशु कन्याओं को समय पर और पर्याप्त तथा स्वास्थ्य संबंधी अन्य जरूरी योगदान न मिलने के चलते उन्हें कम वजन, कुपोषण, जरूरी पोषक तत्वों की कमी, धीमी गति से वृध्दि जैसी कई गंभीर परेशानियों व बीमारियों से जूझना पड़ता है। इसके बावजूद जब कभी वे बीमार पड़ती हैं तो उन्हें समय पर तथा पर्याप्त देखभाल पाने का अधिकार भी नसीब नहीं होता। बुखार जैसी स्थिति में बीमार पड़ने पर जहां 72.2 प्रतिशत बालकों को इलाज के लिए स्वास्थ्य केंद्र ले जाया जाता है वहीं बालिकाओं के मामले में यह आंकड़ा 30 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। इसी तरह अगर हैजा का मामला हो तो 50.4 प्रतिशत मामलों में बालिकाओं को किसी भी तरह की चिकित्सकीय मदद नहीं मिल पाती वहीं 63.9 प्रतिशत बालकों को ऐसी हालत में स्वास्थ्य केंद्र ले जाया जाता हैं।
यह सच है कि शिशु कन्याओं के लिए कई कानून बने हुए हैं लेकिन इन तक या तो पहुंच नहीं बन पा रही है या फिर इनमें मौजूद खामियों के चलते इनका सही इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। अगर हम शिशु कन्याओं के असुरक्षित होने के संदर्भ में शिशु कन्याओं संबंधी योजनाओं व कार्यक्रमों को देखें तो साफ तौर पर यह कहा जा सकता है कि इन्हें शिशु कन्याओं की पोषण जरूरतों को देखते हुए एकीकृत ढंग से बनाने और लागू करने की जरूरत है। |