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  सुरक्षित मातृत्व
केवल शहरी और अमीर महिलाओं के लिए ?
 
     
 

राजनीतिक एजेंडे में सुरक्षित मातृत्व प्राथमिकता में होने के बावजूद मध्यप्रदेश के ग्रामीण व आदिवासी क्षेत्रों में सुरक्षित प्रसव अभी भी एक सपना ही है। एनएफएचएस-3 की ताजा रिपोर्ट में मध्यप्रदेश में मातृत्व स्वास्थ्य देखभाल की बेहद दर्दनाक तस्वीर उभरकर सामने आती है। हालांकि मध्यप्रदेश सरकार यह दावा करती है कि वह प्रदेश में 79 फीसदी संस्थागत प्रसव करवा पाने में सफल रही है, लेकिन कड़वी सच्चाई यही है कि आज भी महज 8 फीसदी आदिवासी महिलाएं ही अपने शिशुओं को विभिन्न सुविधाओं से लैस स्वास्थ्य केंद्रों में जन्म देती हैं।

सुरक्षित मातृत्व का अर्थ यह है कि किसी भी महिला या शिशु की मृत्यु प्रसव के दौरान न हो, या फिर गर्भपात के 42 दिनों बाद तक महिला की मौत न हो। सुरक्षित मातृत्व दरअसल मातृत्व व नवजात शिशुओं की मृत्यु दर को कम करने का प्रयास है। लेकिन यह दुर्भाग्यजनक है कि मध्यप्रदेश प्रति एक लाख प्रसव में 379 मौतों के साथ देश में तीसरे स्थान पर है।

गर्भावस्था तथा प्रसव के दौरान होने वाले जानलेवा खतरे को टाला जा सकता है बशर्ते महिला स्वस्थ्य हो और गर्भधारण करने से पहले उसे अच्छा पोषाहार मिलता रहा हो। अपनी गर्भावस्था के दौरान महिला को कम से कम तीन बार प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ता से नियमित स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए। साथ ही, अगर प्रसव के दौरान महिला को प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ता, डॉक्टर या नर्स की मदद मिले तो भी प्रसव के दौरान होने वाली मौतों की दर घटाई जा सकती है। प्रसव के 12 घंटे बाद महिला की नियमित जांच भी उसकी जान बचाने में अक्सर उपयोगी होती है। लेकिन मध्यप्रदेश के ग्रामीण व आदिवासी क्षेत्रों की महिलाएं इतनी भाग्यशाली नहीं है कि असुरक्षित प्रसव का कुचक्र तोड़कर सुरक्षित मातृत्व हासिल कर सकें।

एनएफएचएस-3 के मध्यप्रदेश से संबंधित स्वास्थ्य सूचकांकों पर नजर डालें तो पता चलता है कि सुरक्षित प्रसव का अधिकार केवल शहरी तथा अमीर तबके की महिलाओं तक ही सीमित रह गया है। शहरी क्षेत्र के 59.9 प्रतिशत प्रसव संस्थागत सुविधाओं के साथ होते हैं वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में महज 20.2 प्रतिशत महिलाओं को ही संस्थागत प्रसव की सुविधा नसीब हो पा रही है।

निवास आंगनबाड़ी केंद्रों के कम से कम 3 भ्रमण स्वास्थ्य सुविधा केंद्र में प्रसव का प्रतिशत प्रसव के दो दिनों के भीतर नवप्रसूता की देखभाल
भारत 52 38.7 37.3
मध्यप्रदेश 40.7 29.7 28.5
शहरी 60.7 59.9 51.8
ग्रामीण 32.5 20.2 21.1

मध्यप्रदेश की 56 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी या एनीमिया की शिकार हैं और उन्हें गर्भावस्था के दौरान विषेश देखभाल की जरूरत होती है। खासकर आदिवासी महिलाओं को जिनमें एनीमिया 74 प्रतिशत महिलाओं को है, इनमें 1.2 प्रतिशत को यह गंभीर रूप से है। लेकिन महज 32.5 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं को ही गर्भावस्था की प्रारंभिक अवस्था में तीन बार डाक्टर या स्वास्थ्य केंद्र जाकर जांच कराने का मौका मिल पाता है, जबकि यह जांच गर्भ संबंधी शुरुआती जटिलताओं का पता लगाने के लिए बेहद जरूरी है। वहीं गर्भावस्था के शुरुआती दौर में जांच करवाने वाली शहरी महिलाओं की संख्या ग्रामीण महिलाओं की तुलना में दुगनी से भी ज्यादा है। ग्रामीण क्षेत्र की 10 फीसदी से कम महिलाएं गर्भावस्था के दौरान आईएफए या आयरन फॉलिक एसिड टेबलेट का सेवन 90 दिनों तक कर पाती हैं जो इस दौरान उनके रक्त में हीमोग्लोबिन के स्तर पर बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी माना जाता है। इन्हें या तो इन गोलियों की आपूर्ति ही नहीं की जाती या फिर गर्भावस्था के दौरान रखी जाने वाली सावधानियों व विषेश पोषण संबंधी जानकारियां इन तक नहीं पहुंच पातीं।

यूं तो ग्रामीण महिलाएं मातृत्व देखभाल के मामले में पहले से ही उपेक्षित हैं, लेकिन अगर वे आदिवासी क्षेत्र से हों, फिर तो मातृत्व एक तरह से अपनी जिंदगी के साथ जुआ खेलने के ही बराबर हो जाता है। उसे अपनी गर्भावस्था के दौरान किसी तरह की देखभाल हासिल करने का कोई अधिकार नहीं होता। तथ्य यही है कि महज 25.9 प्रतिशत महिलाओं को ही ेशुरुआती गर्भावस्था के दौरान कम से कम तीन बार नियमित जांच करवाने की सुविधा मिल पाती है, वहीं ऐसी महिलाओं की संख्या महज 8 प्रतिशत से भी कम है जिन्हें गर्भावस्था के दौरान 90 दिनों तक आईएफए टेबलेट का सेवन करने की सुविधा मिलती है। आदिवासी महिलाओं में करीब 92 प्रतिशत प्रसव या तो घरों में ही होते हैं कि या फिर किसी दाई की मदद से सड़क किनारे बिना किसी स्वास्थ्य सुविधा के अंजाम दिए जाते हैं।

संस्थागत प्रसव के लिए किसी भी स्वास्थ्य केंद्र में सबसे बुनियादी जरूरत यह है कि वहां पर्याप्त संख्या में बेड मुहैया होने चाहिए। लेकिन यह बेहद दुर्भाग्यजनक तथ्य है कि मध्यप्रदेश के सरकारी अस्पतालों में वर्तमान में महज 26000 बेड ही हैं, इनमें ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद बेड की संख्या महज 9300 ही है। इसका सीधा अर्थ यह है कि प्रदेश के 5.95 गांवों के लिए केवल एक ही बेड मुहैया कराया गया है। मध्यप्रदेश में 55,392 गांव हैं, ऐसे में चिंता का विषय यह है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में ऐसी चिंताजनक हालत को देखते हुए क्या हम प्रदेश में सुरक्षित व स्वस्थ्य मातृत्व की कल्पना कर सकते हैं।

हकीकत तो यह है कि स्वास्थ्य संबंधी इन कमियों व असुविधाओं के चलते मातृत्व मौत, गर्भपात या गर्भ में ही भ्रूण की मौत सरीखे दुष्‍परिणाम देखने को मिलते हैं। इसके चलते आदिवासी गर्भवती महिलाओं में 18.5 प्रतिशत गर्भपात के मामले देखे गए हैं वहीं 6.6 प्रतिशत में गर्भ में भ्रूण की मौत या प्रसव के दौरान शिशु की मौत सरीखे दुष्‍परिणाम देखे गए हैं। इन सबका नतीजा जाहिर तौर पर आदिवासी महिला के बिगड़ते स्वास्थ्य के तौर पर ही सामने आता है। उन्हें ऐसी हालत में भी प्रसव के बाद मिलने वाली जांच या स्वास्थ्य संबंधी देखभाल नहीं मिल पाती जिसकी वजह से कई बार उनकी जान तक चली जाती है।

 
     
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