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  सब्सिडी या रियायत की रोटी  
     
 

जब सरकार बाजार मूल्य से कम दाम पर समाज के एक निश्चित तबके को अनाज या राशन उपलब्ध करवाती है तो वास्तविक लागत मूल्य और रियायती दर के बीच के अन्तर का भार सहन करती है। यही खाद्य सब्सिडी या रियायत कहलाती है।

वास्तव मे देश और समाज में लोग भुखमरी के शिकार किसी भी परिस्थिति में न हों और उन्हें पोषण युक्त पर्याप्त भोजन मिले, यह सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है। अपने आप में खाद्यान्न सामग्री पर दी जाने वाली रियायत राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक राजनीति का अहम् विषय है। 1960 के दशक में जब रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, बदले हुये चरित्र के बीजों, कृषि व्यवस्था के मशीनीकरण के कारण जब हरित क्रांति हुई थी तब देश में उत्पादन की मात्रा तेजी से बढ़ी थी। महत्वपूर्ण यह है कि इस क्रांति के हितग्राही बड़े और सम्पन्न किसान थे। कीटनाशक का उपयोग करने की क्षमता सम्पन्न और बड़े रकबे वाले किसानों के पास ही थी। जब यह उत्पादन बढ़ा तो स्पष्ट नजर आने लगा कि इतने उत्पादन के लिये बाजार तो उपलब्ध है नहीं। लोग गरीब हैं और भण्डारण क्षमता कम होने से सरकार को उनके हितो के संरक्षण के लिये आगे आना पड़ा जो कृषि व्यवस्था का उद्योग की तरह इस्तेमाल करते हैं। तब सरकार ने अनाज खरीदने का कार्यक्रम शुरू किया। यह तय हुआ कि सरकार किसानाें को लाभ पहुचाने के लिये खुले बाजार के भावों के आसपास ही खरीद करेगी। इस व्यवस्था का लाभ भी बड़े किसान ही उठा पाये और छोटे किसानों को अपनी फसल औने-पौने दामों पर बड़े किसानों या आड़तियों को बेचना पड़ी। सरकार ने जमकर खाद्यान्न खरीदा। उसी माहौल में विश्व बैंक के निर्देशों के अनुरूप सरकार ने भारतीय खाद्य निगम की स्थापना की। वास्तव में तब संकट यह था कि इतनी मात्रा में खरीकर रखे गये अनाज का भण्डारण कैसे किया जायेगा? और ऐसे में यह तय हुआ कि ज्यादा दामों पर खरीदे गये गये अनाज का सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये उपयोग किया जायेगा और फिर गरीबों को कम कीमत पर राशन उपलब्ध कराया जाने लगा। यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि कई दशकों तक सरकारी खरीद पर पंजाब- हरियाणा के किसानों का एक छत्र राज रहा। देश के किसी और हिस्से से खाद्य निगम के भण्डारण भरे ही नहीं जाते थे।

सरकारी खरीद और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये उसके उपयोग के बीच लागत मूल्य में जो अंतर आता है उसे सरकार वहन करती है। रियायत की इस व्यवस्था को इस समीकरण से समझा जा सकता है।

सरकारी समर्थन मूल्य + भारतीय खाद्य निगम की आज भण्डारण लागत + संचालन लागत + नुकसान - सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये बिक्री मूल्य = खाद्य सब्सिडी

सरकारी समर्थन मूल्य - हर वर्ष सरकार फसल आने के बाद यह तय करती है कि वह किस न्यूनतम मूल्य पर अनाज खरीदी करेगी। आमतौर पर समर्थन मूल्य का निर्धारण राजनैतिक व्यवस्था से प्रभावित होता है। तर्क होता है बाजार भावों की उठा-पटक से किसानों को बचाने का।

भारतीय खाद्य निगम की अनाज भण्डारण की लागत - किसानों से समर्थन मूल्य पर अनाज की खरीदी करके सरकार खाद्य निगम के गोदामों में अनाज का भण्डारण करती है। अब ज्यादातर जिलों में खाद्य निगम के गोदाम है। यहां अनाज के रख रखाव पर मण्डी से गोदाम तक आज लाने का परिवहन व्यय को सरकार वहन करती है।

संचालन लागत - खाद्य निगम पर रिकार्ड, देख-रेख वितरण का संचालन करने की व्यवस्था पर आने वाला व्यय।

नुकसान - सरकार के इन गोदामों की खराब हालत एवं चूहों की भरमार के कारण हर साल 10 से 20 फीसदी अनाज बर्बाद होता है। इतना ही नहीं जितनी मात्रा में सरकार ने अनाज खरीद कर रख लिया है उतनी भण्डारण क्षमता के गोदाम उसके पास नहीं है इसलिये भारी मात्रा में आज खुले आसमान के नीचे रखा जाता है, जिसकी बर्बादी निश्चित होती है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये बिक्री का मूल्य - सरकार इस प्रणाली के जरिये समाज में गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को कम मूल्य पर राशन उपलब्ध करवाती है,इसबिक्रीसेप्राप्तहोनेवालीराशि।

क्या और कितनी रियायत?

यह सवाल तो महत्वपूर्ण है ही कि सरकार वास्तव में रियायत किसानों को देती है या फिर गरीबों को। एक नजर से देखा जाये तो खाद्य सबसिडी का लाभ किसानों के हित में आता है क्योंकि जो घाटा सरकार वहन करती है वह उसके नाकारापन के कारण होता है। वहीं दूसरी ओर किसानों को सरकारी खरीद के कारण भण्डारण और बाजार की उतार-चढ़ाव भरी कीमतों से कुछ हद तक निजात मिलती है।

किस योजना को

कितने प्रतिशत

कितने करोड़ रियायत

अन्त्योदय अन्न योजना

5.5 प्रतिशत

1146

गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोग

25.7 प्रतिशत

5392

गरीबी की रेखा के ऊपर रहने वाले लोग

2.3 प्रतिशत

488

सार्वजनिक वितरण प्रणाली

33.6 प्रतिशत

7028

परिवहन एवं भण्डारण

66.4 प्रतिशत

13915

आंकड़ों से स्पष्ट है कि सरकार की रियायत का दो तिहाई हिस्सा तो उसकी अपनी अव्यवस्था की भेंट चढ़ रहा है। और इस रियायत का भार सरकार बजट में दूसरे वर्गों पर करों के रूप में डालती है। व्यवस्था में आये परिवर्तनों को बड़े ही सकारात्मक अंदाज में पेश किया जाता है। भारतीय खाद्य निगम आज वर्ष में 8000 केन्द्रों के जरिये गेहूं और 4000 केन्द्रों के जरिये धान की खरीद करता है। जहां एक ओर 1950 भारत 5 करोड़ टन अनाज का उत्पादन करता था आज वहीं देश में 20 करोड़ टन का उत्पादन होता है। बहरहाल इस तथ्य को पूरी तरह से नजर अंदाज किया जाता हैं कि जहां एक ओर अनाज का उत्पादन पांच दशकों में चार गुना बढ़ा है तो वहीं दूसरी ओर जनसंख्या भी साढ़े तीन गुना बढ़ गई है।

विगत 2 दशकों में सरकारी संस्थाओं में अनाज की उपलब्धता 40 लाख टन से बढ़कर ढ़ाई करोड़ टन हो गई है और खाद्य निगम हर वर्ष कुल गेहूं उत्पादन का 15 से 20 फीसदी और चावल का 12 से 15 फीसदी हिस्सा खरीदता है इस सम्बन्ध में यह साफ कर देना उचित है कि सैध्दान्तिक रूप से खाद्य निगम की स्थापना केवल गेहूं और चावल खरीदने के लिये नहीं की गई है। बल्कि इसका दायित्व अन्य मोटे अनाजों, ज्वार, बाजरा खरीदने का भी है और वास्तविकता यह है कि चूंकि ये समाज की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली कम लाभ वाली फसलें हैं इसलिये सरकार इनका समर्थन मूल्य तो तय करती है परन्तु खरीदती नहीं है। यही कारण है कि इन फसलों का उत्पादन करने वाले किसानों को सरकार ने मदद न करके उन्हें बाजार के हवाल कर दिया, जहां अब वे मृतप्राय: अवस्था में हैं। ज्वार-बाजरा, कोदो-कुटकी ऐसी फसलें हैं जिनके भरोसे गरीब तबका और छोटे किसान अकाल जैसी विपदाओं से जूझकर अपना अस्तित्व बचा जाते थे। जबसे इन फसलों का विनाश होना शुरू हुआ है तब से समाज में खाद्य असुरक्षा का संगीन वातावरण बनने लगा है और लोग भुखमरी के शिकार होने लगे हैं। यह जानना महत्वपूर्ण है कि मोटे अनाजों की उत्पादन वृध्दि दर अब शून्य के चिंतनीय स्तर पर पहुंच चुकी है।

क्या खरीदती है सरकार?

भारत की विशेषता है कि यहां पर कदम-कदम पर लोगों का रहन-सहन, संस्कृति और खानपान बदल जाता है। और फिर एक प्रदेश का खान-पान सम्बन्धी व्यवहार तो दूसरे शहर से बिल्कुल ही भिन्न होता है। परन्तु सरकार के लिए समुदाय की पारम्परिक विशेषतायें कोई मायने नही रखती हैं। यही कारण है कि वह देश के सभी कोनों में बसे लोगों को केवल गेहूं और चावल ही खिलाना चाहती है।

केन्द्रीय समूह खाते में अनाज की उपलब्धता

वर्ष

गेंहूं

धान

चावल

मोटा अनाज

कुल

1994 -95

11.9

8.2

13.4

नकारात्मक

25.3

1995 -96

12.3

6.3

9.9

-

22.2

1996 - 97

8.2

5.5

12.2

नकारात्मक

20.4

1997 - 98

9.3

7.9

14.3

नकारात्मक

23.6

1998 - 99

12.6

6.3

11.8

नकारात्मक

24.4

1999 - 2000

14.1

9.2

17.3

-

31.4

2000 - 01

16.3

11.8

19.1

नकारात्मक

35.4

2001 - 02

20.6

14.7

21.2

0.3

42.1

2002 - 03

19.0

14.3

15.8

0.6

35.4

2003 - 04

15.8

16.3

22.6

0.3

39.0

इन आंकड़ो से यह तस्वीर जरूर उभरकर आती है कि सरकार ने समाज को मदद करने वाली, खासतौर पर छोटे किसानों और वंचित तबकों की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने वाली फसलों को मदद करना पूरी तरह से बंद कर दिया है। पिछले दस सालों में मोटे अनाजों के परिप्रेक्ष्य में सरकार ने नकारत्मक रवैया दिखाया है पिछले तीन वर्षों में संगठनों के दबाव के फलस्वरूप नाम मात्र की खरीदी की है जो उसकी कुल खरीदी के एक फीसदी हिस्से के लगभग है।

अब से 5 साल पहले उड़ीसा राज्य ने महाविनाशकारी समुद्री चक्रवात का सामना किया। इस चक्रवात ने उड़ीसा के बड़े हिस्से में समाज और अधोसंरचना को न केवल जड़ों से हिला दिया बल्कि तहस-नहस भी कर दिया। उस दौर में सरकार ने वहां के तटवर्तीय इलाकों में राहत के रूप में अपने खाद्य भण्डार से भारी मात्रा में वहां गेहूं भेजा था गेहूं उड़ीसा के तटवर्ती इलाकों में परम्परागत खाद्य पदार्थ नहीं है पर लोगों की मजबूरी थी।

संविधान के नीति निर्देशक तत्वों के अन्तर्गत अनुच्छेद 47 में भी यह स्पष्ट किया गया है कि लोगों के पोषाहार के स्तर पर और जीवन स्तर को ऊंचा करने तथा लोगों के स्वास्थ्य का सुधार करने का कर्तव्य राज्य का है और राज्य इसे अपना प्राथमिक कर्तव्य मानेगा।

हालांकि नीति निर्देशक तत्व न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं है, जबकि मूल (बुनियादी) अधिकार न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय है। ये निदेश न्यायालय द्वारा प्रवर्तित नहीं कराये जा सकते हैं और यदि तत्कालीन सरकार इन्हें क्रियान्वित करने में असफल रहती है तो कोई न्यायालय सरकार को बाध्य नहीं कर सकता कि वह इन्हें क्रियान्वित करे। किन्तु यह घोषित किया जा चुका है कि ये सभी तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और जो सरकार जनता के मत पर टिकी है वह राज्य व्यवस्था को आकार देने में इनकी उपेक्षा नहीं कर सकती (डॉ. भीमराव अम्बेडकर)। मूलत: संविधान के निदेशक तत्व देश के सामाजिक-आर्थिक विकास की दिशा को तय करने वाले सिध्दान्त हैं। भले ही इस आधार पर सरकार को न्यायालय में चुनौती न दी जा सके परन्तु जब बुनियादी अधिकारों का हनन होता है और जीवन के अधिकार पर प्रश्न चिन्ह लगा है तब संविधन के चौथे भाग में दर्ज इन सिध्दान्तों को पूर्नपरिभाषित किया जा सकता है। जैसे कि पीपुल्सयूनियनफॉरसिविललिबर्टीजविरूध्दभारतीयसंघएवंअन्यके मामले में सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल जनहित याचिका के सन्दर्भ में हुआ है।

सूखे और अकाल के दौर में गोदाम भरे होने के बावजूद देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग भुखमरी के शिकार हो रहे थे, सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं हो रहा था तब लोगों के संगठन ने न्यायालय की शरण ली थी। न्यायालय ने माना कि यह बुनियादी अधिकारों के हनन की स्थिति है। इसे परिभाषित करने के लिए न्यायालय के अंतरिम आदेश का अवलोकन सार्थक होगा। 20 अगस्त 2001 को सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ''अदालत की चिंता यह देखना है कि गरीब लोग, दरिद्रजन, और समाज के वंचित-कमजोर वर्ग भूख और भुखमरी से पीड़ित न हों। इसे रोकना सरकार का एक प्रमुख दायित्व है, चाहे वह केन्द्र हो या राज्य। इसे सुनिश्चित करना नीति का विषय है, जिसे सरकार पर छोड़ दिया जाये तो बेहतर है। अदालत को बस इससे संतुष्ट होना चाहिए और इसे सुनिश्चित भी करना पड़ सकता है कि जो अन्न भडारों में, खास कर भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में भरा पड़ा है, वह समुद्र मे डुबोकर या चूहों द्वारा खाया जाकर बर्बाद न किया जाय'' और फिर इसके बाद तो सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारों को एक-एक जनकल्याणकारी योजना के बारे में आदेश देने शुरू कर दिये। स्पष्ट है कि लोगों की खाद्य सुरक्षा का सवाल केवल एक सिध्दान्त नहीं बल्कि बुनियादी अधिकार है।

तथ्य यह है कि 1999 से देश के विभिन्न हिस्से गंभीर सूखे और अकाल के संकट से जूझ रहे थे। राजस्थान, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, झारखण्ड, बिहार और आंध्रप्रदेश के ऐसे कई उपेक्षित और आदिवासी गांव थो जहां लोग खाद्यान्न के अभाव में जंगली वनस्पतियां, जंगली फल, घांस, बीज और यहां तक की चूहे मारकर अपने भोजन की व्यवस्था कर रहे थे। योजनाओं और राहत कार्यक्रम भ्रष्ट सरकारी तंत्र में उलझ कर दम तोड़ रहे थे। ऐसे में राजस्थान के जन संगठनों ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के बैनर के तले सर्वोच्च न्यायालय में लोगों को भुखमरी से बचाने के लिये निर्देश लेने का प्रयास किया।

सरकारी रियायत का सवाल इस सवाल के कई हिस्से हैं, मसलन -

  1. इस रियायत की सियासत में अनाज का समर्थन मूल्य कौन तय करता है ?
  2. क्या इस रियायत का लाभ सरकार और भारतीय खाद्य निगम लोगों तक पहुंचा पाता है ?

यह एक अहम सवाल है कि देश में होने वाले उत्पादन की खरीद किस समर्थन मूल्य पर की जायेगी यह आखिर कौन तय करता है? उल्लेखनीय है कि अलग-अलग परिस्थितियों में देश में खाद्य सुरक्षा की स्थिति बनाये रखने के लिये सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि भारतीय खाद्य निगम के भण्डारण में बफर स्टाक के रूप में 1.54 करोड़ (या 154 लाख) टन अनाज हर समय मौजूद रहेगा। विपरीत समय जैसे अकाल या युध्द के समय इसका उपयोग किया जाता है। इसके साथ ही सरकार अपने केन्द्रीय भण्डार खाते में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों से सीधे अनाज खरीद कर भण्डारण करती है। वर्ष 2001-2002 मे इस भण्डारण का स्तर 4.21 करोड़ टन तक पहुंच गया था, यानी उस वक्त सरकार के गोदामों में छह करोड़ टन अनाज मौजूद था। बफर स्टाक के अन्तर्गत निगम ने यह मापदण्ड तय किया हुआ है कि किस समय कितना नयूनतम भण्डारण होना चाहिए

अनाज

1 जुलाई

1 अक्टूबर

1 जनवरी

1 अप्रैल

चावल

1.0 करोड़ टन

0.65 करोड़ टन

0.84 करोड़ टन

1.16 करोड़ टन

गेहूं

1.43 करोड़ टन

1.16 करोड़ टन

0.84 करोड़ टन

0.40 करोड़ टन

कुल

2.43 करोड़ टन

1.81 करोड़ टन

1.68 करोड़ टन

1.508 करोड़ टन

रियायत का हश्र सैध्दान्तिक रूप से देखा जाये तो सरकार की खाद्य भण्डारण नीति तीन पहलुओं पर आधारित है:

  1. अनाज के बाजार भावों के उतार-चढ़ाव पर नियंत्रण रखते हुये किसानों को उनकी लागत के अनुरूप न्यूनतम किन्तु बेहतर दाम उपलब्ध कराना।
  2. संकट के समय देश में खाद्य सुरक्षा की स्थिति सुनिश्चित करना।
  3. जनकल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से गरीब और वंचित तबकों को भोजन उपलब्ध कराना।

और स्वाभाविक है कि यह तीनों उद्देश्य रियायत और अतिरिक्त सरकारी निवेश की भूमि पर ही फल-फूल सकते हैं। भारत सरकार अनाज के भण्डारण और समग्र व्यवस्था के लिये भारतीय खाद्य निगम को अनुदान देती है। इस अनुदान के जरिये ही निगम के प्रबन्धन, भण्डार कक्ष, रेल्वे परिवहन और अन्य जरूरतें पूरी की जाती हैं। सरकार ने खाद्य निगम को अधिकृत पूंजी के रूप में 2500 करोड़ रूपये और शोधित पूंजी के रूप में 2392.72 करोड़ रूपये दिये हैं। खाद्यान्न की खरीदी के वित्तीय पक्ष का समन्वय भारत सरकार के सहयोग से किया जाता है जबकि निगम को कार्यशील पूंजी भारत के 44 बैंकों के संघ द्वारा उपलब्ध कराई जाती है।

भारतीय खाद्य निगम केन्द्रीय भण्डारण खाते के लिये अधिप्राप्ति मूल्य (Procurement price) पर किसानों से अनाज खरीदता है और वही अनाज भारत सरकार द्वारा तय किये गये केन्द्रीय वस्तु मूल्य (Central Issue Price) पर उपयोग के लिये जारी करता है। भारत सरकार द्वारा तय केन्द्रीय वस्तु मूल्य निगम द्वारा अनाज के क्रय करने से लेकर उसके प्रबन्धन, भण्डारण और वितरण में आई लागत को पूरा नहीं करता है और अधिप्राप्ति मूल्य एवं केन्द्रीय वस्तु मूल्य के बीच के इसी अन्तर को सरकार रियायत (Subsidy) देकर पूरी करती है। इस अनाज का उपयोग जन वितरण प्रणाली एवं अन्य योजनाओं में किया जाता है।

सरकार द्वारा निगम को दी गई सबसिडी

वर्ष

करोड़ रूपये

1995-96

5325.75 करोड़

1996-97

6016.73 करोड़

1997-98

7900.00 करोड़

1998-99

9049.34 करोड़

1999-2000

9002.31 करोड़

2000-2001

11652.00 करोड़

2001-2002

16724.00 करोड़

2002-2003

22678.72 करोड़

2003-2004

23874.04 करोड़

अपने आप में यह एक बड़ा आंकड़ा है कि हर साल 35 हजार करोड़ रूपये अलग-अलग खाद्य योजनाओं में लोगों की खाद्य सम्बन्धी जरूरतों को पूरा करने के लिये खर्च किये जाते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि इस सबसिडी में से 66.4 फीसदी राशि केवल अनाज के परिवहन और भण्डारण में ही खर्च हो जाती है।

विश्व बैंक (जून 2000) की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय खाद्य निगम के भण्डारण में 50 फीसदी अनाज दो वर्ष पुराना, 30 फीसदी अनाज 2 से चार वर्ष पुराना और एक बड़ा हिस्सा 16 वर्ष पुराना है। भण्डारण में 10 से 30 प्रतिशत अनाज अन्तराष्ट्रीय गुणवत्ताा मानकों के अनुरूप नहीं है। अलग-अलग अध्ययन बताते हैं कि -

  1. खाद्य निगम में भण्डारण बढ़ा है किन्तु भण्डारण तकनीक का आधुनिकीकरण नहीं किया गया है।
  2. भ्रष्टाचार के जरिये रियायत का दुरूपयोग होता है और अनाज मिलों को बेच दिया जाता है।
  3. लोगों को तय सरकारी दाम से 10 से 14 प्रतिशत ज्यादा मूल्य देना पड़ता है।
  4. प्रति वर्ष 10 से 25 फीसदी अनाज निगम की भण्डारण क्षमता के अभाव के कारण खुले आसमान के नीचे रखा जाता है।
  5. आंकड़ों के मुताबिक राज्य अपने हिस्से के 54 से 70 फीसदी अनाज का ही उठाव करते हैं।
  6. लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अन्तर्गत रियायती मूल्य का 36 फीसदी गेहूं और 31 फीसदी चावल वास्तविक हितग्राहियों तक नहीं पहुंचता है।

इस बिन्दु में ज्यादातर पक्ष व्यवस्था से जुड़े हुये हैं। भारतीय खाद्य निगम की कुल भण्डारण क्षमता 2.85 करोड़ टन है। इसमें से भी 1.50 करोड़ टन अनाज का भण्डारण निगम के अपने भण्डारों में होता है जबकि 1.18 करोड़ टन अनाज रखने के लिये किराये के ठिकानों का उपयोग किया जाता है। इसी क्षमता में निगम द्वारा प्लास्टिक के कवर से ढंक कर रखे जाने वाला अनाज भी शामिल है।

निगम की भण्डारण क्षमता (1 जुलाई 2004 को)

स्थाई भण्डारण क्षमता

स्वयं के

1.285 करोड़ टन

किराये के

1.590 करोड़ टन

कुल

2.340 करोड़ टन

 

 

अस्थाई भण्डारण क्षमता

स्वयं के

0.219 करोड़ टन

किराये के

0.122 करोड़ टन

कुल

0.341 करोड़ टन

इसके स्पष्ट मायने यह हैं कि भण्डारण की उपयुक्त व्यवस्था के अभाव में 12 से 20 फीसदी अनाज पूरी तरह से बेकार चला जाता है। यह पुन: उल्लेखनीय है कि रियायत का एक बड़ा हिस्सा अनियोजित और राजनीति से प्रेरित व्यवस्था के स्वार्थ के कारण परिवहन में खर्च हो जाता है। निगम अपने विज्ञापनों में दर्ज करता है कि वह अतिरिक्त उत्पादन करने वाले राज्यों से आज उठाकर कम उत्पादन करने वाले राज्योें को भेजता है। परन्तु वास्तविकता यह है कि किन राज्यों से आज खरीदा जायेगा यह पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित निर्णय होता है। जिस राज्य की किसान लाबी का सरकार पर दबाव होता है, सरकार अनाज की खरीद भी वहीं से करती है। यह आंकड़ा इस बिन्दु को भी स्पष्ट कर सकता है :-

राज्य

अनाज की मात्रा (खरीद)

प्रतिशत

पंजाब

14619000 टन

47 प्रतिशत

हरियाण

4856000 टन

15 प्रतिशत

आंध्रप्रदेश

5498000 टन

18 प्रतिशत

अन्य राज्य

6414000 टन

20 प्रतिशत

कुल

31387000 टन

100 प्रतिशत

पंजाब और हरियाणा के कृषि उद्योगपति (उन्हें किसान कहना अब वाजिब नहीं है) हमेशा से भारत सरकार पर हावी रहे हैं, जबकि आंध्रप्रदेश की सरकार 1998 के बाद बड़े दबाव समूह के रूप में उभरी है। इतना ही सरकार ने पंजाब के किसानों को गेहूं-चावल की उपलब्धता के लिए 8400 करोड़ और आंध्रप्रदेश के किसानों को 4500 करोड़ रूपये की विशेष मदद का भुगतान किया। अब यदि हम यह मानते हैं कि भारत में केवल पंजाब, हरियाण्ा और आंध्रप्रदेश ही ज्यादा उत्पादन करने वाले राज्य हैं और बाकी सब अनुग्रह के आकांक्षी है तो यह धारणा समय रहते दुरूस्त कर ली जानी चाहिए।

जब इस तरह भारतीय खाद्य निगम केन्द्रीकृत खरीद करता है तो स्वाभाविक है कि उसे परिवहन की मद में बहुत ज्यादा व्यय करना पड़ेगा। भारतीय खाद्य निगम हर साल लगभग 2.2 करोड़ टन अनाज औसतन 1500 किलोमीटर परिवहन करता हे। केवल गेहूं और चावल की खरीद करने की नीति के कारण निगम को उत्तरी भारत के राज्यों से ज्यादा खरीद करना पड़ती है। निगम हर रोज औसतन 4 लाख अनाज बैग का रेल, सड़क और जलमार्ग से परिवहन करता है। जिस पर साल में 14 से 16 हजार करोड़ रूपये की रियायत का व्यय होता है। परिवहन पर व्यय का पक्ष नकारात्मक इसलिये हो जाता है क्योंकि सरकार अभी भी विकेन्द्रीकृत खरीद की व्यवस्था को नहीं अपना रही है और एक राज्य में दूसरे राज्य का अनाज भेजा जाता है जिससे लागत बढ़ती है।

कितना परिवहन

वर्ष

कुल अनाज

1996-97

2.48 करोड़ टन

1997-98

2.02 करोड़ टन

1998-99

2.02 करोड़ टन

1999-2000

2.28 करोड़ टन

2000-2001

1.65 करोड़ टन

2001-2002

2.08 करोड़ टन

2002-2003

2.50 करोड़ टन

2003-2004

2.99 करोड़ टन

मूल्य की राजनीति

बाजार से सरकार किस मूल्य पर खाद्यान्न खरीदेगी इस मूल्य के निर्धारण की प्रक्रिया भी समग्र रूप से राजनैतिक अर्थशास्त्र से प्रेरित है। भारत में अनाज का मूल्य निर्धारित करने का दायित्व कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (एग्रीकल्चर कास्ट्स एण्ड प्राईसेस कमीषन) को सौंपा गया है। यह दायित्व निभाते समय आयोग व्यवस्था के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं को नैतिक आधार बनाता है।

  1. यह सुनिश्चित करना कि उत्पादकों को उनकी फसल का गुणवत्ताा के अनुरूप उचित मूल्य मिले।
  2. उत्पादन की लागत कितनी है?
  3. उपभोक्ताओं की स्थिति और अपेक्षाएं।

परन्तु सच्चाई यह है कि खाद्यान्न के मूल्य का निर्धारण मूलत: सरकार द्वारा किया जाता है। यह मूल्य आयोग द्वारा निर्धारित किये गये मूल्य से कहीं ज्यादा होता है, क्योंकि सरकार कोई अमूर्त संरचना नहीं है वह एक राजनैतिक दल, राजनैतिक हित और विचारधारा के अधीन सत्ताा चलाने वाली व्यवस्था है। हमें यह ध्यान देना होगा कि पिछले वर्षों में खाद्यान्न के घरेलू उपभोग के औसत में काफी कमी आई है। वास्तव में देख में खाद्यान्न उपयोग की जो स्थिति उभर रही है वह सरकार की असमान नीतियों के प्रभाव का परिणाम है।

देश में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता (कि.ग्रा)

वर्ष

अनाज

दलहन

कुल खाद्यान्न

1989 -92

159.3

14.2

173.5

1982 -95

156.5

13.6

170.1

1985 -98

156.6

12.7

169.3

1998 -2001

148.1

11.8

159.9

खाद्यान्न के प्रति व्यक्ति उपभोग की मात्रा में गिरावट के रहस्य का उद्धाटन नेशनल सैम्पल सर्वे के आंकड़ों से होता है। उन आंकड़ों से पता चलता है कि 1970 एवं 1980 के दशकों में जब प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही थी उस समय 0.5 प्रतिशत की दर से खाद्यान्न उपभोग में कमी आ रही थी। 1980 के दशक में ही देश के अधिकांश हिस्सों में खाद्यान्न की उपलब्धता के स्तर पर भी आंकड़ों के उतार-चढ़ाव को समझने की जरूरत है। स्वतंत्रता के बाद जब हम यह बार-बार दावा करते हैं कि देश में अनाज का उत्पादन कई गुना बढ़ गया है तो फिर प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता और उपभोग कम क्यों हो रहा है, यह खोजबीन करने की हमारी जिम्मेदारी बढ़ जाती है।

लोगों तक खाद्यान्न न पहुंचने के छह कारण हैं -

  • मोटे अनाज की पैदावार में कमी
  • लाभ वाली नकद फसलों को बढ़ावा
  • दलहन की पैदावार में नकारात्मक रूख
  • जनसंख्या
  • मोटे अनाज का उपयोग बढ़ना
  • भारतीय खाद्य निगम के भण्डारों में अनाज का जमा होते जाना और क्रय क्षमता के बढ़ते अभाव में गरीबों द्वारा उसे न खरीद पाना।

पिछले 25 वर्षों में सरकार ने अनाज के समर्थन मूल्य में लगातार वृद्वि की है। हालांकि इस वृध्दि करके सरकार अपना घाटा कम करने की कोशिश करती है, तो वही दूसरी और बड़े उद्योगपतियों द्वारा हजम किये गये डेढ़ लाख करोड़ रूपये के डूबत खाते में डाल रही हैं पिछले दो-ढाई दशकों में समर्थनमूल्य में लगभग साढ़े पांच गुना बढ़ोत्तारी हुई है और जिसका भार सीधे-सीधे गरीब और वंचित वर्गों पर पउा है जिन्हें मिलने वाली रियायत को सरकार ने कम किया है। इस दौरान धान का समर्थन मूल्य 105 रूपये प्रति क्विंटल से बढ़कर 580 रूपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया, वहीं दूसरी ओर गेहूं का मूल्य भी 117 रूपये से बढ़कर 630 रूपये प्रति क्विंटल हो गया। इस वृध्दि को राजनैतिक नजरिये से देखा जाना चाहिए। हालांकि सरकार का यह दावा रहा है कि कृषि के बीच के अंतर को उचित बनाये रखने की कोशिश कर रही है। आंकड़ों का विश्लेषण करने से यह जरूर पता चलता है कि सरकार ने हमेशा किसानों को (बड़े और संपन्न किसानों) को समर्थन मूल्य के रूप में खुले बाजार से कहीं अधिक फायदा दिया है और समर्थन मूल्य बाजार मूल्य से ज्यादा तय किये जाते रहे हैं।

वर्ष

समर्थन मूल्य सूचकांक (धान एवं गेहूं का)

बाजार मूल्य सूचकांक (धान एवं गेहूं के बाजार मूल्य से सम्बध्द)

सामान्य मूल्य सूचकांक (उपभोक्ता वस्तुओं का औसत )

1980 -81

100

100

100

1990 -91

193

179

185

1991 -92

225

216

218

1992 -93

161

242

235

1993 -94

296

261

251

1994 -95

314

293

283

1995 -96

333

313

304

1996 -97

375

354

379

1997 -98

406

363

340

1998 -99

455

384

379

समर्थन मूल्य में वृध्दि के विरोध को इस नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए कि यह किसानों के विरोध की बात है। बल्कि इस राजनीति को भली-भांति समझ लेना होगा कि रियायत (सबसिडी) के नाम पर वास्तव में छोटे और सीमांत किसानों को छला जा रहा है। इन किसानों के पास इतने संसाधन और सुविधायें ही नहीं हैं कि वे अपनी फसल को ऐसे स्थान और समय पर बेंच सकें जहां उन्हेे समर्थन मूल्य का लाभ मिले। भारत में 83 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसान हैं जिन्हें फसल के बाद तत्काल आर्थिक सहयोग की जरूरत होती है, ऐसे में उन्हें मजबूरी में अपने खेत में ही फसल गांव या क्षेत्र के सम्पन्न किसानों को बेच देना पड़ती है। अगर वास्तव में सरकार किसानों का हित सोच रही है तो आंध्रप्रदेश में पिछले पांच सालों से किसान लगातार आत्महत्या क्यों कर रहे हैं और पंजाब में किसान अपनी जमीने क्यों बेच रहे हैं इसका जवाब ढूंढा जाना चाहिए। इस मुद्दे पर चर्चा करते समय हमेें उस समीकरण पर भी नजर डालना होगी जिससे यह पता चलता है कि समर्थन मूल्य और सबसिडी की राजनीति से समाज में खाद्य असुरक्षा और असमान आपूर्ति का दुष्चक्र तेजी से अपना दायरा फैलाता जा रहा है। 

खाद्य व्यवस्था का दुष्चक्र

दुष्चक्र का पहला चरण

वैष्विक उपनिवेषवाद और पूंजीवाद से समाज में असंतुलन पैदा होता है। ताकतवर समाज कमजोर समाज पर अपनी सत्ताा स्थापित करता है और फिर राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक व्यवस्था पर नियंत्रण कर लेता है। सम्पन्न भारत पर अंग्रेजी हुकूमत ने राज करके उसे खोखला कर दिया। संघर्ष से स्वतंत्रता तो मिल जाती है परनतु गुलामी की मानसिकता से मुक्ति नहीं मिलती है। उपनिवेषवाद या परतंत्रता से खोला हो चुका समाज एक बार फिर विकास और पुनर्निर्माण के लिये फिर पूंजीवादी और साम्राज्यवादी राष्ट्रों की ओर सहायता के लिये हाथ बढ़ाता है। उनसे मिले मार्गदर्षन और नीतियों के आधार पर भारत अपनी विकास की रूपरेखा तय करता है।

दुष्चक्र का दूसरा चरण

उत्पादन तो बढ़ता है पर वंचित और भोजन चाहतने वाले उसे खरीद नहीं पाते हैं। क्योंकि संकट केवल भूख का नहीं है बल्कि गरीबी का भी है। सरकार देश की खाद्य सुरक्षा और कृषि क्षेत्र को मदद देने के लिए समर्थन मूल्य पर खाद्यान्न खरीदती है। इस खाद्यान्न का उपयोग सार्वजनिक वितरण और जनकल्याणकारी योजनाओं के जरिये 35 करोड़ गरीब एवं वंचितों तक खाद्यान्न का लाभ पहुंचने के लिये किया जाता है। गरीबों को यह राशन रियायती मूल्य पर मिलता है।

दुष्चक्र का तीसरा चरण

देश में उत्पादन बढ़ता तो अनाज की खरीद भी बढ़ती है और भारतीय खाद्य निगम के भण्डारों में वृध्दि होती है।

दुष्चक्र का चौथा चरण

भण्डारण में वृध्दि होने के कारण खाद्य निगम की भण्डारण एवं प्रबन्धन लागत में भी वृध्दि होती है। सरकार को इस पर रोज 30 से 45 करोड़ रूपये खर्च करना पड़ते है।

दुष्चक्र का पांचवा चरण

इस बढ़ती लागत का भार सरकार पर पड़ता है और खर्च में वृध्दि होती है।

दुष्चक्र का छठवां चरण

सरकार पर सबसिडी कम करने का अन्तर्राष्ट्रीय और स्थानीय बाजार का दबाव रहता है। तब सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली है राशन का बिक्री मूल्य बढ़ाती है। अब तक सरकार ने एक बार भी इस मूल्य में कमी नहीं की है। सरकार अब बाजार को महत्व देती है क्योंकि उसे सबसिडी खत्म करना है।

दुष्चक्र का सातवां चरण

सरकार तो दाम बढा देती है पर गरीबों की क्रय क्षमता कम होने के कारण सार्वजनिक वितरण प्रणाली की बिक्री कम होती पाती है। स्वाभाविक है कि गरीबी का स्तर समान्तर रूप से बढ़ता जाता है।

दुष्चक्र का आठवां चरण

जनकल्याणकारी योजनओं के जरिये निगम से अनाज का उठाव तो कम होता जाता है परन्तु सरकार अपनी खरीद को जारी रखती है और समर्थन मूल्य साल-दर-साल बढ़ता रहता है। यह व्यवस्था गरीबों और जनकल्याण की अवधारण्ाा के बीच की खाई को इतना बढ़ा रही है जिसे पाटना असंभव हो जायेगा और इसके बाद दूसरे चरण से यह प्रक्रिया फिर शुरू हो जाती है और निरन्तर चलती रहती है। वास्ततविकता यह है कि भ्रष्ट और कमजोर व्यवस्था के कारण सरकारी रियायत का जरूरत मंदों को फायदा ही नहीं मिल पाता है और बाजार कहता है कि गरीबों को रियायत की जरूरत नहीं है।

सचिन कुमार जैन

 
     
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