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  सार्वजनिक वितरण प्रणाली एक व्यापक नजरिया  
     
 

देश 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी सत्ता से तो राजनैतिक रूप से आजाद हो गया किन्तु गुलामी की मानसिकता से मुक्ति की शायद अब भी जरूरत है। स्वतंत्रता के समय से हमें दो बड़ी चुनौतियां - गरीबी और खाद्य असुरक्षा, विरासत में मिली। एक नजर से देखा जाये तो इन समस्याओं को हल करना विकास का पहला लक्ष्य भी बना।

इतिहास - 17 मई 1498 को जब पुर्तगाल का वास्को डिगामा भारत के कालीकट बंदरगाह पर पहुचा था तब से उपनिवेशवाद या कहें कि गुलामी की एक प्रक्रिया शुरू हुई। शुरूआत में विदेषियों ने भारत के भीतर की सत्ता को समझना शुरू किया और उनके आपसी झगड़ों का फायदा उठाते हुये अपने व्यापार को स्थापित किया। 1612 के वर्ष में सूरत में अंग्रेजों की पहली कोठी सूरत में स्थापित हुई। और यहीं से भारत के व्यापार पर अंग्रेजी ग्रहण पूरी तरह से लग गया। और यह ग्रहण 1813 तक लगा रहा। ब्रिटिश भारत में पैदा होने वाले मसाले, सूती और रेशमी कपड़े और सजावटी समान ब्रिटेन और यूरोपीय देशो में ले जाकर बेंचते थे। वे केवल मुनाफा कमाना चाहते थो। मुनाफा कमाने की यह ललक उनमें इतनी ज्यादा थी कि वे इसके लिये लूट-पाट भी करते रहे। शुरूआती दौर में भारत को तो फायदा मिलता था क्योंकि भारत से निर्यात होने वाला सामान ज्यादा होता था और आयात की जरूरत नहीं थी इसीलिये विदेषी सरकार को ज्यादा खर्च करना पड़ता था। यही वजह थी कि उन्होंने भारत की राजनैतिक सत्ता पर भी कब्जा जमाया ताकि ऐसी नीतियां बनाई जा सकें जिससे विदेषी सामान भारत ज्यादा आयात करे और निर्यात होने वाले सामान पर से तमाम शुल्क-कर हटाई जा सके। 1757 में पलासी का युध्द जीतने के बाद अंगरेजों को भारत में जहां-तहां मनमानी लूट करने की ताकत मिल गई। पहले तो श्रम पर दबाव बनाया जाता था। फिर कारीगरों और किसानों पर भी उनका षिकंजा कसना शुरू हुआ। बुनकरों से जबरदस्ती कोरे कागज पर दस्तखत करा कर उनका माल बहुत कम दाम या फिर बिना दाम चुकाये ही अंग्रेजी व्यापारी उठा ले जाने लगे। पहले तो बुनकर स्वतंत्र रूप से काम करते थे परन्तु अब उन्हें गुलाम बनाकर काम कराया जाने लगा। 1764-67 में अंग्रेजों ने मालगुजारी तेजी से बढ़ाना शुरू की। इस वर्ष अंग्रेजों ने बंगाल में 8.17 लाख पौण्ड की मालगुजारी भारतीय शासक से वसूल की थी जो 1793 में बढ़कर 34 लाख पौण्ड तक पहुंच गई। 1764 से 1770 के बीच भारत के विभिन्न इलाकों जैसे- बंगाल, बिहार, उड़ीसा में भयंकर अकाल पड़ा, एक करोड़ लोग मारे गये पर अंग्रेजों ने माल गुजारी वसूल करने में कोई रियायत नहीं बरती। रजनीपाम दत्ता ने (1970) में एक संदर्भ दिया है। इस संदर्भ के अनुसार 1987 में ब्रिटिश संसद के सदस्य विलियम पुलार्टन ने लिखा कि '' पुराने जमाने में बंगाल के देहात राष्ट्रों के अन्न भण्डार थे। पूरब में यह प्रदेश तैयार माल, व्यापार और दौलत का खजाना था। लेकिन हमारे बुरे शासन इस जोर-षोर से काम किया कि 20 साल के थोड़े से अरसे में ही देहात के बहुत से इलाके वीरान हो गये। खेत जोते-बोये नहीं जाते। बहुत सी जमीन पर जंगली झाड़ियां उग आई हैं। किसानों को लूटा जाता है, लोगों को बार-बार अकाल का सामना करना पड़ता है और आबादी का मिटना आरम्भ हो गया है।''

मसला यह है कि भारत की सम्पन्नता अंग्रेजी जहाजों पर लाद-लाद कर ब्रिटेन ले जाई जा रही थी। इसके बाद पश्चिमी औद्योगिकीकरण नाम के गिध्द ने भारत पर नजर डालना शुरू किया। पहले चल रही इजारेदारी की व्यवस्था को 1813 में सरकार ने खत्म कर दिया। यहीं से भारत के उद्योग धंधे भी नष्ट होना शुरू हुये क्योंकि अंग्रजों ने बाहर से आने वाले सामान पर लगने वाली चुंगी इतनी कम करा दी कि भारत में भारत का बना सामान ही मंहगा पड़ने लगा। कपड़े, चमड़े, चीनी का उद्योग नष्ट हुआ और लाखों लोग बेकार हुये। 1814 से 1835 की अवधि में भारत में विदेषी कपड़े की खपत 10 लाख गज से बढ़कर 5.10 करोड़ गज हो गई। देश के उद्योग की बर्बादी की कहानी के लिये यह आंकड़ा ही पर्याप्त है। रजनीपाम दत्त ने एल एच जैक्स (द माईग्रेशन आफ ब्रिटिश कैपिटल) के हवाले से लिखा है कि ''ब्रिटिश पूंजीपतियों के इस शोशण से हिंदुस्तान में बार-बार अकाल पड़ने लगे। 19वीं सदी के पूर्वार्ध्द में सात बार अकाल पड़ा, जिसमें कुल पंद्रह लाख आदमी मरे। लेकिन इसी सदी के उत्तरार्ध्द में 24 बार अकाल पड़ा, जिसमें खुद सरकारी आंकड़ों के अनुसार दो करोड़ आदमी मरे।'' लगभग डेढ़ सौ सालों तक भारत की पूंजी और सम्पन्नता के बल पर ब्रिटेन ने न केवल अपना साम्राज्य बढ़ाया बल्कि तनख्वाह, सत्ता के खर्च और युध्द के खर्च भी भारत से ही उठाये। इसके बावजूद पहले ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कम्पनी और बाद में ब्रिटिश हुकूमत भारत को कर्जदार बनाती गई। 1858 में भारत ब्रिटेन का 7 करोड़ पौण्ड का कर्जदार था जो 1938-39 तक बढ़कर 88.48 करोड़ पौण्ड (लगभग 1180 करोड़ रूपये) हो गया।

15 अगस्त 1947 यानी स्वतंत्रता के समय न तो भारत में खेती-किसानी स्वस्थ थी न ही उद्योग धंधे। देश कर्जदार था और लोग कमजोर, यानी विरासत में भारत को यदि कुछ मिला था तो एक अनिष्चित भविष्य।

इन परिस्थितियों में स्वतंत्रत भारत की सरकार के सामने खाद्य असुरक्षा के संकट से निबटकर गरीबी कम करने की एक बड़ी चुनौती थी। यह स्पष्ट रूप से नजर आता है कि स्थाई रूप से इस संकट का समाधान निकालने के लिये एक पूरे तंत्र-एक पूरी व्यवस्था की जरूरत थी। और यह तंत्र भारत में पूरी तरह से चरमरा चुका था। स्वतंत्रता के बाद बनी पहली पंचवर्षीय योजना बनी; इस पंचवर्षीय योजना में कृषि के साथ-साथ देश की व्यवस्था के औद्योगिकीकरण्ा की भी वकालत की गई। विकास का जो सपना देखा जा रहा था उस पर गांधी और नेहरू के बीच वैचारिक मतभेद था परन्तु गरीबी और भूख के संकट का स्थाई समाधान इस मतभेद में कहीं खो गया। विडम्बना यह भी है कि स्वतंत्र होने के बाद भी भारत यह तय नहीं कर पाया कि उसकी गरीबी की परिभाषा क्या होगी? आज भी यह परिभाषा गरीबों की वास्तविक स्थिति से कहीं दूर खड़ी होती है।

स्वतंत्र भारत की सरकार विकास की योजनाओं और विचार के मामले में विकसित देषों पर निर्भर होने लगी। व्यापार और उत्पादन की अमेरिकी-यूरोपीय सोच ने भारत को यह विष्वास दिलाया कि भारत में कृषि के लिये जितने प्राकृतिक मानव संसाधन का उपयोग होता है उतना उत्पादन देश में होता नहीं है। भारत संसाधनों का समुचित दोहन नहीं कर पा रहा है क्योंकि उसके पास तकनीक नहीं है। यानी कृषि क्षेत्र में उद्योगों की तकनीक के उपयोग की संभावनायें अमेरिका और यूरोप ने पैदा की।

स्वाभाविक रूप से सरकार यह मान रही थी कि उत्पादन में जबरदस्त वृध्दि किये बिना भूख और गरीबी की समस्या का हल संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में 1960 के दशक में भारत में हरित क्रांति की रूपरेखा बनी। मकसद यही था कि संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो और तकनीक का उपयोग करके उत्पादन बढ़ाया जाये। हरित क्रांति से भारत की कृषि में बहुत से बदलाव आये और कुछ खास हिस्सों जैसे पंजाब-हरियाणा ने हरित क्रांति का भरपूर फायदा उठाया। वर्ष 1955-56 में खाद्यान्न उत्पादन 23 लाख टन था जो 1965-66 में बढ़कर 51 लाख टन हो गया। ऐसी ही स्थिति में जब उत्पादन बढ़ रहा था और खेतों से खूब सारा अनाज मण्डियों में आ रहा था तब यह देखा गया कि इसकी खपत नहीं हो रही है। यह बड़ी ही विरोधाभासी स्थिति थी क्योंकि लोग भूखे थे पर अनाज नहीं ले रहे थे। शायद उस स्थिति में हम यह भूल गये थे कि लोग भूखे होने के साथ-साथ गरीब भी थे। अब अमेरिकी सलाहकारों को डर था कि कहीं इस गरीबी के कारण हरित क्रांति की प्रक्रिया न चौपट हो जाये। यह लग रहा था कि यदि किसानों को उनकी फसल का दाम नहीं मिला तो वे नहीं तकनीकों का इस्तेमाल बंद कर देंगे, इससे उन तकनीकों का बाजार भी गिर जायेगा।

वहीं दूसरी ओर सरकार के पास भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी कि वह बाजार की मंदी-तेजी को नियंत्रित कर सके और आपात्कालीन स्थितियों में सामने आने वाली जरूरतों को पूरा कर सके। ऐसे में भारतीय खाद्य निगम की स्थापना की भूमिका बनी। इस निगम की जरूरत को भी विष्लेषित करने की जरूरत है। यह बात तो रही है कि हरित क्रांति से देश में उत्पादन बढ़ा पर यह भी सही है कि देश के कुछ खास इलाकों में यह उत्पादन ज्यादा बढ़ा था। (जैसे- पंजाब और हरियाणा)। पर देश के दूसरे हिस्सों जेसे उड़ीसा, असम, आंध्रप्रदेश या तमिलनाडु में वैसा परिवर्तन नजर नहीं आया। यानी यह एक किस्म से असंतुलित वृध्दि थी। इन बिन्दुओं के आधार पर ही एक खाद्य भण्डारण नीति बनी। सैध्दान्तिक रूप से देखा जाये तो यह नीति चार बिन्दुओं पर आधारित है –

  1. अनाज के बाजार भावों के उतार-चढ़ाव पर नियंत्रण रखते हुये किसानों को उनकी लागत के अनुरूप न्यूनतम किन्तु बेहतर छाम उपलब्ध करवाना।
  2. संकट के समय देश में खाद्य सुरक्षा की स्थिति सुनिष्चित करना।
  3. जनकल्याणकारी योजनाओं के जरिये विभिन्न तबकों की खाद्यान्न सम्बन्धी न्यूनतम जरूरतों को पूरा करना। पहले गरीब-अमीर का सरकारी भेदभाव नहीं था।

हमें इन बिन्दुओं में यह देखना होगा कि सरकार अनाज की खरीद और वितरण करके व्यवस्था को संतुलित बनाये रखने का प्रयास करती है। हमारे देश में बहुत से दुर्गम और पहुंचहीन इलाके हैं जहां एक अलग किस्म का वंचितपन होता है, तो वहां तक अनाज पहुंचाने का काम करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है। इसी खाद्यान्न भण्डारण की नीति को क्रियान्वित करने के लिये एक व्यवस्था का जन्म हुआ जिसे हम सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहते हैं। परतंत्रता के दौर में पैदा हुये संकट से निपटने का यह भी एक रास्ता है।

शुरूआती रूप - सन् 1964 में जब सार्वजनिक वितरण प्रणाली की स्थापना हुई थी तब इसका लाभ समाज के हर तबके हर व्यक्ति को मिलता था। ऐसा कोई निर्धारित भेद नहीं था केवल गरीबों को ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लाभ मिलेगा। पूरे देश में अनाज और अन्य सामग्रियों का वितरण करने के लिये सरकारी उचित मूल्य की दुकानों का जाल बिछाया गया। इन सरकारी दुकानों से लगभग 30 सालों तक गेहूं, चावल, शक्कर, मिट्टी का तेल, सूती कपड़े, बच्चों की स्कूली सामग्री, तेल, साबुन जैसी सामग्री मिला करती थी। इस व्यवस्था का मकसद लोगों की नयूनतम जरूरतों को उचित मूल्य पर पूरा करना था। सरकार इस व्यवस्था को रियायत देती रही है। रियायत के मायने यह है कि सरकार जदा मूल्य पर बाजार से खरीदकर कम मूल्य पर यह सामान लोगों को उपलब्ध कराती है। इसके साथ ही दुकाने चलाने, अनाज-सामान का परिवहन करने और व्यवस्था का रखरखाव का व्यय भी सरकार ही वहन करती हैं एक तरह से सार्वजनिक वितरण्ा प्रणाली केवल एक योजना नहीं है बल्कि यह एक संवैधानिक प्रतिबध्दता भी है। जवाहरलाल नेहरू विष्व विद्यालय की प्रोफेसर उत्सा पटनायक ने बहुचर्चित पत्र 'द रिपब्लिक ऑफ हंगर' में स्पष्ट किया है कि 2400 कैलोरी एक व्यक्ति की न्यूनतम जरूरत है तो इसका मतलब है कि भारत की 70 फीसदी गरीबी की रेखा के नीचे हो क्योंकि जिस आय को हम गरीबी रेखा मानते हैं उससे केवल 1800 कैलारी भोजन ही मिल सकता है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर हमला

सन् 1991 में जब भारत ने औपचारिक रूप से उदारवाद की नीतियां अपनाई, तब खुले बाजार का सीधा हमला सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर हुआ। जैसे कि हम जानते हैं कि अंग्रेज केवल मुनाफा कमाना जानते थे; यही उनका लक्ष्य भी था और धर्म भी। जिसके लिये उन्होंने हर तरह का अमानवीय व्यवहार भी किया। वे भी खुले बाजार के हिमायती थे। यह हमें जरूर जान लेना चाहिये कि परतंत्रता हमेषा अर्थव्यवस्था के रास्ते देश में प्रवेश करती है। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी भी भारत में व्यापार करने आई थी और 1947 में जब यहां से गई तब देश में 80 फीसदी लोग गरीब थे, प्रति व्यक्ति खाद्यान्न की उपलब्धता केवल 150 किलोग्राम थी, रोजगार नहीं था, खेती चौपट हो चुकी थी और उद्योगधंधों के तो अवषेश भी नहीं मिलते थे। और यदि खाद्यान्न उत्पादन नहीं बढ़ाया जाता तो देश में भुखमरी का आपातकाल आ जाता क्योंकि गुलामी के कारण जर्जर हो चुकी व्यवस्था में तेजी से बढ़ रही आबादी का भरण-पोशण संभव नहीं था।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर हमला क्यों ?

सार्वजनिक वितरण प्रणाली को खत्म करने के पीछे खुले बाजार और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ-साथ विकसित देषों के भी स्वार्थ निहित हैं।

  1. यदि सार्वजनिक वितरण प्रणाली खत्म हो जाती है तो देश के 30 करोड़ यानी लगभग 30 फीसदी आबादी के सीधे-सीधे खुले बाजार में जाना पड़ेगा खाद्यान्न खरीदने के लिये। इसका मतलब यह है कि बाजार को नये उपभोक्ता मिलेंगे। वे भले ही गरीब हों, पर बाजार उन्हें आमंत्रित कर रहा है क्योंकि वह उनका मनमाफिक शोशण कर पायेगा।
  2. यदि सार्वजनिक वितरण प्रणाली बंद हो जाती है तो फसल के हर मौसम में सरकार जो 1.4 करोड़ टन अनाज खरीदती है वह खरीद भी बंद हो जायेगी। और खुले बाजार में बहुराष्ट्रीय कम्पनी उनका उपयोग कर सकेगी।
  3. सार्वजनिक वितरण प्रणाली के बंद होने से न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था पर भी सीधे प्रभाव पड़ेगा और अभी एक हद तक किसानों को मिलने वाला सरकारी संरक्षण खत्म हो जायेगा।
  4. सार्वजनिक वितरण प्रणाली के बंद होने से खाद्यान्न के उतार-चढ़ाव पर राज्य का नियंत्रण नहीं रहेगा और काला बाजारी के कारण दाम बढ़ेंगे जिससे व्यापक समाज पर आर्थिक बोझ आयेगा।
  5. जरूरत पड़ने पर सरकार को विदेषों से आयात करना पड़ेगा। इतिहास बताता है कि खाद्यान्न के आयात के साथ भारी शर्तें भी आती रही हैं और बाजार का राजनैतिक सत्ता पर नियंत्रण बढ़ता जाता है।

हमले की प्रक्रिया क्या रही है?

बहुत स्पष्ट रूप से 1991 के बाद सार्वजनिक वितरण प्रणाली को ध्वस्त करने की प्रक्रिया शुरू हुई। सार्वजनिक वितरण प्रणाली अपने आप में गरीब और वंचित परिवारों के लिये जीवन रेखा साबित हुई है। 1973-74 में हुये अध्ययन के आधार पर 1979 में भारत के योजना आयोग ने पहली बार गरीबी की परिभाषा तय की। इस परिभाषा के अनुसार 49 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिमाह से कम खर्च करने वाले परिवार गरीब माने गये। योजना आयोग का मानना था कि जिन्दा रहने के लिये 2400 कैलोरी भोजन की जरूरत होती है जिसे 1.66 रूपये प्रतिदिन खर्च करके हासिल किया जा सकता है। इसके बाद कभी भी इस परिभाषा में बदलाव नहीं हुआ; आयोग ने मंहगाई के अनुपात में इस व्यय को बढ़ाया और अब 327 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिमाह से कम खर्च करने वाले परिवार को गरीब माना जाता है। जब गरीबी का जाल इतना महीन हो तो स्वाभाविक है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के बिना व्यक्ति का जी पाना संभव नहीं है। इसके बावजूद 1991 में सरकार ने इस प्रणाली को खत्म करने का काम शुरू कर दिया। 1991 से 1994 के बीच उचित मूल्य की दुकान से मिलने वाले राशन की कीमतें दुगनी कर दी गई। इसके बाद 1980 से 2001 के बीच गरीबी की रेखा के चीने रहने वाले परिवारों के लिये अनाज की कीमतों में 66 फीसदी बढ़ोत्तरी हुई। परिणाम यह हुआ कि गरीब की पहुंच से राशन की दुकान दूर होती गई। 1991 में जहां दो करोड़ टन अनाज सार्वजनिक वितरण प्रण्ााली से बेचा जाता था वहीं सन् 2000 में घटकर 1 करोड़ टन पर आ गया। इसके बाद वर्ष 2006 में केन्द्र सरकार ने हर तरह की संवेदनषीलता को ताक पर रखते हुये हर राशन कार्ड पर अनाज की पात्रता 35 किलो से घटाकर 30 किलो करने के साथ-साथ फिर राशन के दाम बढ़ाने की घोशणा कर दी। सरकार का मकसद था 4524 करोड़ रूपये की सबसिडी कम करना।

इसके अलावा 1997 में सरकाद ने समाज को घोषित रूप से अमीर वर्ग और गरीब वर्ग में बांट दिया। सरकार ने तय किया कि अब सभी को एक ही दाम पर सस्ते राशन का फायदा नहीं मिलेगा। यहीं से गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों के लिये सस्ते राशन और गरीबी की रेखा के ऊपर रहने वाले परिवारों के लिये मंहगे राशन की व्यवस्था शुरू हुई। इसे लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहा गया।

एक तरफ तो सरकार इस योजना का फायदा और पहुंच सीमित करती जा रही थी परन्तु वहीं दूसरी ओर इस योजना पर सबसिडी (रियायत) बढ़ती जा रही थी। वर्ष 1995-96 में सरकार भारतीय खाद्यान्न निगम को 5325.75 करोड़ रूपये की सबिसडी देती थी जो वर्ष 2003-04 में बढ़कर 23874.04 करोड़ रूपये हो गई परन्तु इसका लाभ गरीबों और जरूरतमंद को नहीं मिल रहा था। क्योंकि भारतीय खाद्य निगम केवल पंजाब, हरियाणा और आंध्रप्रदेश से अनाज की 80 प्रतिशत खरीद करता था और फिर देश के दूसरे प्रदेषों को भेजता रहा है।

इसके कारण इस सबसिडी का 60 प्रतिशत हिस्सा केवल अनाज परिवहन में ही खर्च होता रहा। राशन की दुकानों का भी सरकार ने निजीकरण करना शुरू कर दिया इससे रियायती आज रिसकर खुले बाजार में आने लगा। आज की स्थिति में 30 प्रतिशत चावल और 44 प्रतिशत गेहूं का भ्रष्टाचार हो रहा है।

कैसे हो रही है चौपट यह प्रणाली ?

मध्यप्रदेश में योजना आयोग के सर्वेक्षण के मुताबिक 42.43 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी की रेखा के नीचे रह रही है। इसके अनुसार प्रदेश में गरीब परिवारों की संख्या 4770699 है। इतने परिवार तो प्रत्यक्ष रूप से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के हितग्राही तो हैं ही। साथ ही विभिन्न योजनाओं के अन्तर्गत भी रियायती राशन हितग्राहियों को दिया जाता है। प्रदेश में 55634 निराश्रित व्यक्तियों, 92428 छात्रावास के छात्रों और 577590 परिवार अन्त्योदय अन्न योजना के हितग्राही हैं। इसको जोड़ने पर पता चलता है कि मध्यप्रदेश में 60.495 लाख परिवारों के मान से भारत सरकार से लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अन्तर्गत राशन आवंटित होना चाहिये। वर्तमान में 35 किलो राशन एक कार्ड पर परिवार को जारी होना है यानी कुल आवंटन 25.40 लाख टन होना चाहिये परन्तु वास्तविकता यह है कि मध्यप्रदेश को भारत सरकार केवल 27.97 लाख गरीब परिवारों के मान से ही राशन जारी कर रही है इसके मायने यह हैं कि 60 फीसदी हितग्रहियों के लिये तो राशन ही आवंटित नहीं हो रहा है और जो आवंटित हो रहा है उसमें से 40 फीसदी का भ्रष्टाचार हो रहा है। हाल (मई,2006) ही में योजना आयोग और शोध संस्था ओआरजी - मार्ग ने अपनी रिपोर्ट में भी यही कहा है कि प्रदेश में गरीबी की रेखा के कार्ड तो 48.74 लाख हैं परन्तु राशन जारी होता है 27.97 लाख कार्ड धारकों के लिये। इस अध्ययन से योजना आयोग ने यह सिध्द करने की कोषिश की है कि प्रदेश में बाकी के गरीब बोगस हैं और उन्हें लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली की जरूरत नहीं है। उल्लेखनीय है कि पहले भी समय-समय पर विष्वबैंक अपने अध्ययनों से यह सिध्द करने की कोषिश करता रहा है कि अब सार्वजनिक वितरण प्रणाली चलाते रहना उपयोगी और फायदेमंद नहीं है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली के सामने चुनौतियां

मध्यप्रदेश में सम्पर्क एवं सोपान नामक संस्थाओं के संयुक्त प्रयासों से भोजन का अधिकार अभियान मध्यप्रदेश समूह ने हाल ही में एक अध्ययन किया। इस अध्ययन से पता चला कि आदिवासी समुदाय की कुल जरूरत का 35 फीसदी हिस्सा सार्वजनिक वितरण प्रणाली से पूरा होता है। यह व्यवस्था उनकी ज्यादा जरूरत पूरी कर सकती है यदि इसका संचालन पूरी प्रतिबध्दता के साथ किया जाये तो। यह एक आष्चर्यजनक निष्कर्ष निकलकर आया कि 91 फीसदी वास्तविक हितग्राहियों को यह जानकारी ही नहीं मिल पाई है कि वास्तव में उन्हें सार्वजनिक वितरण प्रणाली से 35 किलो राशन मिलना चाहिये। उन्हें यह भी पता नीं चलता है कि राशन की दुकान किस दिन या तारीख को खुलती है।

  • मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में राशन की दुकान माह में औसतन तीन दिन ही खुलती है और यह तीन दिन कौन से होंगे यह तय नहीं होता है।
  • हर रोज दुकान न खुलने का सबसे बड़ा कारण यह है कि एक समिति 6 से 8 राशन की दुकान का संचालन करती है और एक ही प्रबंधक यह काम करता है। मध्यप्रदेश में उचित मूल्य की दुकानों की सामग्री पर बहुत ही कम कमीशन दिया जाता है। इस कमीशन पर किसी भी स्थिति में खर्च वहन कर पाना संभव नहीं है। यहां चावल पर 11 रूपये प्रति क्विंटल, गेहूं पर 8 रूपये प्रति क्विंटल, केरोसिन पर 24 पैसे प्रति लीटर और शकर पर 5.23 रूपये प्रति क्विंटल सरकार द्वारा कमीशन दिया जाता है और इसमें जब तक तीन गुना वृध्दि नहीं होगी तब तक ईमानदारी से लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली का उचित संचालन संभव नहीं है।
  • मध्यप्रदेश में गांवों की संख्या 55,393 है किन्तु 18688 राशन की दुकानें हैं। इसका मतलब है कि अभी केवल 34 फीसदी गांव ही राशन दुकानों से सीधे लाभ पा रहे हैं।
  • आमतौर पर यह माना जाता है कि राशन की दुकान पर से वितरित होने अनाज की गुणवत्ता दोयम दर्जे की होती है। संभवत: शायद इसलिए कि यह गरीबों की योजना है।
  • जिस तरह से सस्ते राशन के दाम बढ़ाये जा रहे हैं उससे लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली हितग्राहियों की पहुंच से बाहर होती जा रही है।
  • लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लोकव्यापीकरण करने की जरूरत है। इसका कारण यह है कि अभी सस्ते राशन का लाभ केवल गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को मिलता है और ऐसे परिवारों के पहचान की प्रक्रिया गंभीर रूप से विसंगतिपूर्ण है। इसके फलस्वरूप जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा इस योजना के दायरे से बार है। अत: जरूरी है कि हर परिवार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दायरे में आये।
  • केन्द्रीयकृत व्यवस्था से लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। अत: इस व्यवस्था के संचालन का दायित्व ग्रामसभा, पंचायत महिलामण्डल एवं स्वयं सहायता समूहों को सौंपा जाना चाहिये।
  • सरकार किसी भी तरह की कार्यषील पूंजी इस प्रणाली के अन्तर्गत राशन दुकान संचालकों को उपलब्ध नहीं करवाती है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली और उससे जुड़े सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश

भारत के संविधान के अनुच्छेद 47 में यह कहा गया है कि राज्य का यह प्राथमिक कर्तव्य होगा कि वह लोगों के स्वास्थ्य, पोशण और जीवन स्तर को उठाने के लिए प्रयास करे। हमारा संविधान यह स्पष्ट करता है कि लोगों की खाद्य सुरक्षा सुनिष्चित करने, उनका पोशण स्तर उठाने के लिए सरकार हर जरूरी कदम उठायेगी। इसी के मद्देनजर भारत सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (राशन की उचित मूल्य की दुकानों की व्यवस्था) के जरिए यह सुनिष्चित करने का प्रयास किया कि लोगों को उनकी स्थिति और आय के अनुरूप न्यूनतम मूल्य पर खाद्यान्न की जरूरी मात्रा की उपलब्धता सुनिष्चित हो सके। इसे गरीबी उन्मूलन की एक रणनीति के रूप में भी पहचाना गया। आरम्भ से यह तय किया गया था कि समाज के सभी वर्गों को राशन की दुकान से उचित मूल्य में राशन की उपलब्धता सुनिष्चित हो, परन्तु जून 1997 में भारत सरकार ने इस खुली हुई व्यवस्था को लक्षित जन वितरण प्रणाली में बदल दिया। जिसके अन्तर्गत यह तय किया गया कि सरकारी रियायत (कम मूल्य का अनाज) का लाभ गरीबों और अति गरीब परिवारों को ही मिल सकेगा।

  • भारत में लक्षित जन वितरण प्रणाली की शुरूआत जून 1997 में हुई
  • मध्यप्रदेश में 1 जून 1997 को सरकार ने इस व्यवस्था का क्रियान्वयन शुरू किया।
  • गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को इसका मुख्य हितग्राही माना गया।
  • मध्यप्रदेश में हितग्राहियों की संख्या - 31.12.2003 की स्थिति में 60 लाख बी.पी.एल. कार्डधारी (इसमें 4.43 लाख निराश्रित और 0.65 लाख छात्र शामिल हैं)।
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले गरीब और अति गरीब परिवारों के लिए बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • इस व्यवस्था के अन्तर्गत गरीब परिवारों को (जिनके नाम गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों की सूची में दर्ज होते हैं) रियायती दर पर अनाज उपलब्ध कराया जाता है।
  • गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों में से लगभग एक चौथाई परिवारों को अति गरीब परिवार माना गया है, जिन्हें अन्त्योदय अन्न योजना का हितग्राही माना गया है। इन परिवारों को 2 रूपये प्रति किलो की दर से गेहूं और 3 रूपये प्रति किलो की दर से चावल उपलब्ध कराया जाता है। अन्त्योदय अन्न योजना के अन्तर्गत एक राशनकार्ड पर 35 किलो अनाज दिये जाने का प्रावधान है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2 मई 2003 के आदेश में निम्न समूहों से जुड़े व्यक्तियों/ परिवारों को भी अन्त्योदय अन्न योजना का लाभ दिये जाने के निर्देश दिये हैं -

1. बूढ़े, लाचार, विकलांग, बेसहारा पुरूश व महिलाएं, गर्भवती महिलाएँ व बच्चों को दूध पिलाने वाली माताएं।
2. विधवा व वे एकल महिलाएं जिनका कोई सहारा नहीं हैं।
3. 60 साल व उससे ऊपर के व्यक्ति जो बेसहारा हैं व जिनके पास आजीविका का कोई नियमित जरिया नहीं है।
4. वे परिवारा जिनमें कोई विकलांग व्यक्ति है।
5. ऐसा परिवार जहां वृध्दावस्था, शारीरिक व मानसिक बीमारी, सामाजिक रीति-रिवाजों, विकलांग व्यक्ति की देखभाल तथा अन्य किन्हीं वजहों से कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो घर के बाहर कमाई के लिए जा सके।
6. आदिम जनजातियां।

प्रति किलो अनाज प्रति किलो मूल्य क्या है

ए.पी.एल. बी.पी.एल.- 35 किलो अन्त्योदय योजना - 35 किलो
गेहूं चावल गेहूं चावल गेहूं चावल
रू. 7.00 रू. 9.20 रू. 5.00 रू. 6.50 रू. 2.00 रू. 3.00

रिट याचिका (सी) नं. 2001 की 196
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज

बनाम

भारतीय संघ एवं अन्य

सार्वजनिक वितरण प्रणाली के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश

सर्वोच्च न्यायालय आदेश दिनांक 23.7.2001

वादी के वकील को अन्तरिम राहत के लिए नया आवेदन दाखिल करने की अनुमति दी जाती है। इसकी एक प्रति भारत सरकार के वकील, राज्यों के वकील और भारतीय खाद्य निगम के वकील को दी जाये। विद्वान महाधिवक्ता कहते हैं कि इस मुकदमे को प्रतिद्वन्दात्मक न माना जाये और यह सबकी चिन्ता का विशय है। हमारी राय में बुजुर्गों, अशक्तों, विकलांगों, भुखमरी की षिकार, दरिद्र महिलाओं और दरिद्र पुरूषों, गर्भवती और दूध पिलाती महिलाओं तथा दरिद्र बच्चों, खासकर उन मामलों में जिनमें वे या उनके परिवार के सदस्य उन्हें पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने की आर्थिक स्थिति में न हों, को भोजन उपलब्ध कराना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। अकाल की हालत में भोजन की कमी हो सकती है लेकिन यहां तो प्रचुरता के बीच अभाव है। प्रचुर भोजन उपलब्ध है, लेकिन बह बहुत गरीब लोगों तथा दरिद्रों तक वितरित नहीं हो पाता। इससे कुपोशण, भुखमरी और अन्य सम्बन्धित समस्याएं पैदा हो जाती हैं। राज्यों, भारत सरकार तथा भारतीय खाद्य निगम को दो सप्ताह के अंदर जवाबी शपथ दाखिल कर देने चाहिए।
अदालत की चिन्ता यह देखना है कि गरीब लोग, दरिद्रजन तथा समाज के कमजोर वर्ग भूख और भुखमरी से पीड़ित न हों। इसे रोकना सरकार का एक प्रमुख दायित्व है, चाहे वह केन्द्र हो या राज्य। इसे सुनिष्चित करना नीति का विशय है, जिसे सरकार पर छोड़ दिया जाये तो बेहतर। अदालत को बस इससे सन्तुष्ट होना चाहिए और इसे सुनिष्चित करना पड़ सकता है कि जो अन्न भण्डारों में, खासकर भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में, भरा पड़ा है, यह समुद्र में डुबोकर या चूहों द्वारा खाया जाकर बर्बाद न किया जाये।

सर्वोच्च न्यायालय आदेश दिनांक 28.11.2001

1. लक्ष्य आधारित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टी.पी.डी.एस.)

i. भारतीय संघ का कहना है कि टी.पी.डी.एस. के संदर्भ में खाद्यान्न के आवंटन के मामले में पूर्ण अनुपालन हुआ है। फिर भी यदि कोई राज्य पूर्ण अनुपालन न होने की किसी विषेश घटना को प्रकाश में लाता है तो इस कार्यक्रम के दायरे में भारतीय संघ आवष्यक कार्रवाई करेगा।

ii. राज्यों को निर्देश दिया जाता है कि वे 1 जनवरी, 2002 तक गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की षिनाख्त पूरी कर लें, राशन कार्ड जारी कर दें और प्रति माह प्रति परिवार 25 किलो खाद्याान्न का वितरण आरम्भ कर दें।

iii. दिल्ली सरकार यह सुनिष्चित करेगी कि टी.पी.डी.एस. के आवेदन फार्म आसानी से उपलब्ध हैं तथा उन्हें प्राप्त करने और जमा करने के लिए कोई शुल्क नहीं लगेगा। दिल्ली सरकार षिकायतों के त्वरित और प्रभावी निवारण के लिए एक प्रभावी व्यवस्था भी सुनिष्चित करेगी।

2. अन्त्योदय अन्न योजना

i. भारतीय संघ का कहना है कि अन्त्योदय अन्न योजना के लिए खाद्यान्न के आवंटन के मामले में पूर्ण अनुपालन हुआ है। परन्तु यदि कोई राज्य पूर्ण अनुपालन न होने की स्थिति में कोई विषेश घटना प्रकाश में लाता है तो इस स्कीम के दायरे में भारतीय संघ आवष्यक कार्रवाई करेगा।

ii. हम राज्यों और संघ शासित क्षेत्रों को निर्देश देते हैं कि वे 1 जनवरी 2002 तक इस स्कीम के तहत लाभार्थियों की षिनाख्त, कार्ड जारी करने और अनाज के वितरण का काम पूरा कर दें।

iii. यह प्रतीत होता है कि अन्त्योदय लाभार्थी अति निर्धनता के कारण अनाज उठाने में असमर्थ हो सकते हैं। ऐसे मामलों में केन्द्र, राज्यों और संघ शासित क्षेत्रों से अनुरोध है कि वे अपनी पूर्ण सन्तुष्टि के बाद अनाज का कोटा नि:षुल्क देने पर विचार करें।

सर्वोच्च न्यायालय आदेश दिनांक : 8 मई, 2002

प्रतिवादीगण सुनिष्चित करेंगे कि राशन दुकानें पूरे महीने निष्चित घंटे में खुली रहेंगी, इसका ब्यौरा सूचना पट्ट पर प्रदर्ष्ाित किया जायेगा।

सर्वोच्च न्यायालय आदेश दिनांक : 29.10. 2002

अगर अब न्यायालय के आदेषों को मनवाने में हीला-हवाली की गयी तो इसके लिए राज्यों के मुख्य सचिव और केन्द्र शासित प्रदेषों के प्रषासक जिम्मेदार होंगे।

मुख्य सचिवों या प्रषासकों को यह आखिरी मौका है कि वे न्यायालय के 28 नवम्बर 2001 तथा 8 मई 2002 के आदेषों को अनुवादित कराकर प्रमुखता के साथ उनका सभी ग्राम पंचायतों, स्कूलों, भवनों तथा राशन की दुकानों पर स्थायी तरीके से प्रदर्षन करें। रेडियों और दूरदर्षन से भी उनका खूब प्रचार कराया जाए। यह काम आठ सप्ताह के भीतर हो जाना चाहिए।

प्रत्येक राज्य सरकार और केन्द्र सरकार की डयूटी है कि वे भूख, कुपोशण से होने वाली मौतों की रोकथाम करें। अगर कमिष्नर ऐसी कोई रिपोर्ट देता है और न्यायालय को भी लगता है कि वाकई में कोई भूख से मरा है तो माना जायेगा कि आदेषों का पालन नहीं हो रहा है तथा इसके लिए राज्यों के मुख्य सचिव तथा केन्द्र शासित प्रदेषों के प्रषासन को जिम्मेदार माना जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय आदेश दिनांक : 2 मई, 2003

इस कोर्ट (भारत का सर्वोच्च न्यायालय) ने पिछले दो वषों में भी अपने विभिन्न आदेषों में इस मामले पर गहरी चिन्ता जाहिर की है। एक आदेश में कोर्ट ने यह कहा है कि बूढ़े लाचार व्यक्तियों, विकलांगो, बेसहारा महिलाओं व बूढे पुरूषों जो कि भुखमरी के कगार पर हों, गर्भवती महिलाओं व बच्चों को दूध पिलाने वाली मताओं तथा बेसहारा बच्चों को भोजन उपलब हो यह सुनिष्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। खासकर उन मामलों में जहां उनके पास या उनके परिवार के पास इतना भोजना उपलब्ब्ध नहीं है कि उन्हें पर्याप्त भोजन मिल सके। अकाल के समय में खाने की कमी हो सकती है, लेकिन यहां वास्तविक स्थिति यह है कि काफी मात्रा में भोजन है परन्तु उसका वितरण बहुत गरीब व बेसहारा लोगों के मामलों मे या तो बहुत कम है या बिल्कुल ना के बराबर है, जिसकी वजह से कुपोशण, गरीबी व इनसे जुड़ी दूसरी समस्याएं पैदा हो रही है। कोर्ट की मुख्य चिंता यह है कि समाज का कमजोर तबका भूख या भुखमरी से त्रस्त न हों। लोगों को भूख से बचाना केन्द्र व राज्य सरकार दोनों की मुख्य जिम्मेदारी है। केवल योजनाएं बना देना जिनका क्रियान्वयन न हो किसी काम का नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि भोजना भूखे तक पहुंचे।

संविधान के 21 वें अनुच्छेद में हर नागरिक को ''मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार'' दिया गया है क्या वे परिवार जो गरीबी रेखा के नीचे जी रहे हैं, अपने जीने के लिए सही किस्म की योजनाओं और उनके क्रियान्वयन के अभाव में संविधान में दिये गए इस अधिकार से वंचित नहीं है? क्या ये सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि इन्हें जरूरी मदद दी जाए ताकि ये जी सकें। इसी संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 47 का हवाला भी दिया जा सकता है जिसमें यह कहा गया है कि अपने नागरिकों के पोशण स्तर को ऊंचा उठाना, उनके जीवन स्तर को बढ़ाना और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार सरकार की प्राथमिक जिम्मेवारी होगी।

हम याद दिलाना चाहेंगे कि पिछले साल मई में यह आदेश दिया गया था कि राशन की दुकानें पूरे महीने कुछ निर्धारित घंटों के दौरान खुलें व इसकी सूचना नोटिस बोर्ड पर जन सामान्य को दी जाए। अनाज के वितरण के लिए हम (सर्वोच्च न्यायालय) निम्न निर्देंश दें रहे हैं -

1. राशन की दुकानों के वे संचालनकर्ता

a) जो अपनी दुकानें पूरे माह निर्धारित समय तक न खोलते हों,
b) गरीबी रेखा के नीचे आने वाले परिवारों को उनके लिए निर्धारित दरों पर अनाज उपलब्ध न करवाते हों,
c) बी.पी.एल. परिवारों के कार्ड अपने पास रखते हों,
d) बीपीएल. कार्ड में गलत सूचनाएं भरते हों,
e) राशन के अनाज को खुले बाजार में बेंचते हों या उन व्यक्तियों को बेच देते हों जो बी.पी.एल. सूची के बाहर हाें और राशन की दुकानें दूसरे व्यक्तियों/ संस्थाओं को चलाने के लिए देते हों, उनका लाइसेंस तुरंत प्रभाव से रद्द कर दिया जाना चाहिए। सम्बन्धित अधिकारी इस सम्बन्घ में कोई ढिलाई नहीं देंगे।

2. गरीबी रेखा से नीचे आने वाले परिवारों को अपने हिस्से का अनाज किष्तों में खरीदने की अनुमति होगी।

3. इस आदेश को बड़े स्तर पर प्रसारित किया जाए ताकि बी.पी.एल. परिवार 'अनाज' के अपने अधिकार के बारे में जान सकें।

23 जुलाई, 2001 के आदेश में गरीब, लाचार व विकलांग व्यक्तियों के लिए भोजन उपलब्ध करवाने के बारे में जो कहा गया था उसे भी यहां लिखा जा रहा है। याचिकाकर्ता के अनुसार लगभग 1.5 करोड़ व्यक्ति अन्त्योदय अन्न योजना कार्ड के हकदार हैं भारत सरकार को निर्देषित किया जाता है कि वे निम्न श्रेणियों के व्यक्तियों को भी अन्त्योदय अन्न योजना में शामिल करें-

1. बूढ़े, लाचार, विकलांग, बेसहारा पुरूश व महिलाएं, गर्भवती महिलाएँ व बच्चों को दूध पिलाने वाली माताएं।
2. विधवा व वे एकल महिलाएं जिनका कोई सहारा नहीं हैं।
3. 60 साल व उससे ऊपर के व्यक्ति जो बेसहारा हैं व जिनके पास आजीविका का कोई नियमित जरिया नहीं है।
4. वे परिवारा जिनमें कोई विकलांग व्यक्ति है।
5. ऐसा परिवार जहां वृध्दावस्था, शारीरिक व मानसिक बीमारी, सामाजिक रीति-रिवाजों, विकलांग व्यक्ति की देखभाल तथा अन्य किन्हीं वजहों से कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो घर के बाहर कमाई के लिए जा सके।
6. आदिम जनजातियां।

इनके अलावा ऊपर हमने बी.पी.एल. कार्ड धारकों को अनाज की प्रभावी वितरण के संदर्भ में जो बाते कहीं वे सभी उन पर लागू होंगी जो अन्त्योदय अन्न योजना में शामिल हैं।

सचिन कुमार जैन

 
     
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