मूल बात क्या है?
मौजूदा मामला यह है कि भारत सरकार भुखमरी की समस्या से निपटने के लिये एक कानून बनाने की पहल कर रही है, जिसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून कहा जायेगा। सरकार और सरकार के विशेषज्ञ यह तय करना चाहते हैं कि एक परिवार को 35 किलो गेहूँ-चावल देकर देश में खाद्य सुरक्षा की स्थिति हासिल कर ली जायेगी। संकट यह है कि यह सूखा अनाज भी सबको नहीं, बल्कि केवल गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले केवल एक तिहाई से थोड़ी ज्यादा जनसंख्या को मिलेगा। सरकार यह मानने को तैयार नहीं है कि तीन चैथाई लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिलता है इसलिये उन सबको इस कानून के तहत हक दिये जायें। सरकार इसे उत्पादन और भण्डारण के पहलू से भी जोड़कर नहीं देखना चाहती है। मतलब यह है कि हमारी खेती और किसानी संकट में फंसती जाये तो भी उसे कोई संरक्षण नहीं मिल पायेगा।
हम कहना चाहते हैं कि अनाज, खासतौर पर बारीक और पौष्टिक अनाज का उत्पादन बढ़ाईये, किसान को अच्छा दाम दीजिये, उनसे अनाज खरीदिये, तब कहीं इस कानून का कोई मतलब होगा; नहीं तो कानून की बात करना बेकार है। खाद्य सुरक्षा कानून की जरूरत इसलिये है क्योंकि हमारे देश के आधे बच्चे कमजोर, कुपोषित और खून की कमी के शिकार हैं। उन्हें पोषण का अधिकार चाहिये। उन्हें ऐसा भोजन मिलना चाहिये जिसमें सब्जियाँ हों, तेल हो, पौष्टिक अनाज हो, उन्हें दूध, केले, फल, अण्डे और कंदमूल मिलें। जो मांसाहार करते हैं, उन्हें उसका भी हक मिले। जब तक हमें पोषण की सुरक्षा नहीं मिलेगी तब तक कुपोषण और भुखमरी खत्म नहीं होगी। बीमारियाँ बनी रहेंगी और बच्चों की पोषण की सुरक्षा देने को तैयार नहीं है।
हम कहते हैं कि पौष्टिक अनाज, गेहूं-चावल के साथ ही लोगों को कम से कम दालें और खाने का तेल तो मिलना ही चाहिये। भारत में पिछले 40 सालों से खाद्यान्न बांटने वाली योजनायें चल रही हैं परन्तु कुपोषण-भुखमरी नहीं मिटी; क्योंकि केवल गेहूं-चावल से भुखमरी नहीं मिट सकती हैं। अतः जरूरी है कि खाद्य सुरक्षा कानून को पोषण की सुरक्षा के कानून के साथ जोड़कर देखा जाये। कुपोषण से व्यक्ति को होता है अपनी आजीविका कमाने की क्षमता में 10 प्रतिशत का नुकसान क्योंकि भुखमरी व्यक्ति की क्षमताओं को विकसित नही होने देती है। जीडीपी को 2-3 फीसदी का नुकसान होता है। शिशुओं की ऊंचाई में 4.6 सेमी की कमी होती है। बच्चों को स्कूल शुरू करने में 7 माह की देरी होती है और स्कूलों में मिलने वाले ग्रेड में 0.7 का नुकसान होता है। विभिन्न सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी मांसपेशियों में कई तरह की विकलांगता आती है, साथ ही चीजों को सीखने, समझने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है, यानी डिस्लेक्सिया और डिस्कैल्कूलिया आदि। कैल्षियम की कमी से हड्डियां कमजोर होती हैं वहीं विटामिन-ए की कमी नजर कमजोर कर देती है, इसी तरह अन्य पोषक तत्वों की कमी से कई तरह की बीमारियां या कमियां आती हैं।
परिस्थितियां
भारत में सात प्रतिशत जनसंख्या किसी न किसी विकलांगता से ग्रसित है, जिन्हें सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। उन्हें पोषण की सुरक्षा की जरूरत है परन्तु विडम्बना यह है कि इस वर्ग को कोई संरक्षण नहीं है। इसी तरह महिलाओं, बच्चों, दलितों को भी अलग-अलग स्तर पर खाद्य सुरक्षा के कानूनी हक की दरकार है।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार वंचित तबकों के लिये संरक्षण की बात कही। न्यायालय ने खाद्य सुरक्षा को जीवन और समानता के मौलिक अधिकार के साथ जोड़कर परिभाषित करते हुये कहा - ‘‘अदालत की चिंता यह है कि गरीब लोग, दरिद्रजन और समाज के कमजोर वर्ग भूख और भुखमरी से पीडि़त न हों। इसे रोकना सरकार का एक प्रमुख दायित्व है। इसे सुनिश्चित करना नीति का विषय है जिसे सरकार पर छोड़ दिया जाये तो बेहतर है। अदालत को बस इससे संतुष्ट हो जाना चाहिये और इसे सुनिश्चित भी करना पड़ सकता है कि जो अन्न भण्डारों में खासकर भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में भरा पड़ा है, वह समुद्र में डुबोकर या चूहों द्वारा खाया जाकर बर्बाद न किया जाये।“
न्यायालय ने कहा कि ‘‘भुखमरी की शिकार दरिद्र महिलाओं और पुरूषों, गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माताओं तथा दरिद्र बच्चों, खासकर उन मामलों में, जिनमें वे या उनके परिवार के सदस्य उन्हें पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने की स्थिति में न हों, को भोजन उपलब्ध करवाना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।“ सरकार को न्याय के इस मंतव्य का सम्मान करना चाहिये।
गरीबी की रेखा की सूची ही राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में पात्रता का आधार बनेगी। यह वही गरीबी की रेखा है जिसे 6.52 करोड़ परिवार पकड़ पाये है पर 7.5 करोड़ परिवार इस सूची से बाहर कर दिये गये हैं। इस पर भी सही तरह से गरीबों का चयन नही होता है। पहले योजना आयोग ने दावा किया था कि 28.3 प्रतिशत परिवार गरीब हैं पर बाद में उन्हीं के द्वारा स्थापित तेंडुलकर समिति ने बताया कि भारत में 37.5 प्रतिशत और गांवों में 41.8 प्रतिशत गरीब है। भारत सरकार ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा स्थापित डॉ. एन.सी. सक्सेना समिति ने सिद्ध किया कि 50 प्रतिशत ग्रामीण गरीब हैं। भारत सरकार के पोषण संबंधी आंकड़ों के मुताबिक 75.8 प्रतिशत जनसंख्या को पूरा पोषण नहीं मिलता है और अर्जुनसेन गुप्ता समिति की रिपोर्ट के मुताबिक देश के 77 प्रतिशत लोग 20 रूपये प्रतिदिन से कम में गुजारा करते हैं। पर सरकार केवल 37.2 प्रतिशत को ही गरीब मान रही है और उन्हें ही इस कानून का सीमित लाभ देने पर अड़ी हुई है।
इसी दौर में यह बात खुलकर सामने आ गई कि गरीबी की रेखा मापदण्ड वंचितों के भोजन के अधिकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। सरकार ने खर्च के जिन मापदण्डों (गांवों में 12 रूपये प्रतिदिन और शहरों में 19 रूपये प्रतिदिन प्रति व्यक्ति से कम खर्च करने वालों को गरीब माना जा रहा है) को गरीबी की रेखा का आधार बनाया है उससे भरपेट भोजन भी मिलना संभव नहीं है यह राषि हमारी थाली में जरूरत का एक तिहाई से भी कम भोजन लाती है। अर्जुन सेन गुप्ता और उत्सा पटनायक के आंकलन साफ बताते हैं कि 80 से 84 करोड़ लोगों को नियमित रूप से सस्ते अनाज, दाल और तेल का अधिकार अब बेहद जरूरी हो गया है। भारत में हर दो में एक बच्चा कुपोषण और महिला खून की कमी की शिकार है। उन्हें सम्मानजनक जीवन का अधिकार तब तक संभव नहीं है जब तक कि उनकी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जायेगी। विसंगतिपूर्ण गरीबी की रेखा की परिभाषा और पहचान के तरीकों के कारण दो तिहाई लोग भूखे सोने को मजबूर हो रहे हैं। जब सरकार यह कहती है कि वह (विसंगतिपूर्ण और बहुत छोटी) गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को ही 35 किलो सस्ता राशन देगी तो हमें अपनी ही सरकार पराई नजर आती है क्योंकि सरकार गरीबी और भूख के साथ जीने वालों की थाली को आधा ही भर रही है। इसमें भी दालें, खाद्य तेल और दूसरे मोटे-पोषक अनाज शामिल नहीं हैं। ऐसे में पेट की थैली में कुछ पड़ तो जायेगा पर उनकी पोषण सम्बन्धी जरूरत पूरी न हो पायेगी। इसलिये जरूरी है कि गेहूं और चावल की सूची में ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी को शामिल करते हुये पात्रता को 50 किलो तक बढ़ाया जाये। इसके साथ ही सस्ती दर पर दाल और तेल का अधिकार भी तय हो।
शहरी झुग्गी बस्तियों का समाज
शहरी झुग्गी बस्तियों और उनमें रहने वाले लोगों को एक सुनियोजित तरीके से समाज के ऊपर एक दाग के रूप में स्थापित करने की कोशिश हुई। यह कहा जाता रहा है कि वे अपराधी हैं; वे अनैतिक व्यापार करते हैं, मैले-कुचैले और गंदे हैं। यदि विकास करना है तो हमें उन्हें शहर से बाहर करना होगा। पर यह एक बुना गया झूठ है। एक कल्पना कीजिये कि यदि इन झुग्गी बस्तियों के लोग एक हफ्ते के लिये हड़ताल पर चले जायें तो तुम्हारी जिन्दगी क्या होगी? क्या तुम्हारे बच्चों के स्कूल का वाहन आयेगा, क्या घर के काम होंगे, क्या सब्जी मिलेगी, क्या शहर की सफाई होगी? नहीं !! जबकि तुम्हारी जिन्दगी का पहिया है ये झुग्गी वाशिंदे। इनकी जिन्दगी को खत्म करने की नहीं अपने बराबर लाने की बात करो। भारत के 640 शहरों में 420 लाख लोग घोषित झुग्गी बस्तियों में रहते हैं और इनकी जिन्दगी का सबसे बड़ा सच है आधा खाली पेट। यहां 52 हजार झुग्गी बस्तियां हैं पर इनमें से केवल आधी को ही वैधानिक माना जाता है। चैंकाने वाली बात यह है कि तथाकथित अवैधानिक बस्तियों में 17 करोड़ बच्चे रहते हैं और अस्वच्छता के साथ भूख को जीते हैं। इन्हें न तो स्थाई पता मिलता है न पहचान। न पीने को पानी न बिजली और सफाई।
आय बहुत कम होने के कारण ये पोषणयुक्त भोजन पर ज्यादा खर्च नहीं कर पाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आयुक्तों की आठवीं रिपोर्ट (पृष्ठ 62) के मुताबिक भारत में 46 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं किन्तु शहरी झुग्गी बस्तियों में 70 प्रतिशत बच्चे भूख के साथ जीते हुये कुपोषण के शिकार हो चुके हैं। शहरों का यह समाज केवल 9.55 किलोग्राम खाद्यान्न का हर माह उपभोग करता है। बस्तियों में 2970 आंगनबाड़ी केन्द्र खोलने की जरूरत है पर वैधानिक-अवैधानिक बस्तियों की बहस के बीच बच्चों को पोषण का अधिकार ही नहीं मिल पा रहा है। बस्ती के लोग अस्वस्थ्यकर वाली ऐसी परिस्थितियों में काम करते हैं जो कई बीमारियों का कारण बनती है और लगातार चलने वाली भुखमरी उन्हें उन बीमारियों से लड़ने की ताकत हासिल नहीं करने देती। इन बस्तियों में जीवन जीना हर दिन की एक चुनौती है पर फिर भी इन्हें खाद्य सुरक्षा का अधिकार देने में इतनी हिचक क्यों? क्या हम अपने ही समाज में एक नया भेदभाव पैदा नहीं कर रहे हैं?
भूख, विकास और प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून
आज राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून बनाने की पहल थोड़ा जोर पकड़ रही है। इस कानून की कवायद ऐसे दौर में की जा रही है जब भारत दुनिया की सबसे तेज गति से प्रगति करने वाली अर्थव्यवस्था (वास्तव में रोजगार विहीन और सामाजिक असुरक्षा पैदा करने वाली प्रगति) मानी जाती है। इसी देश में दुनिया के सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे भी रहते हैं। यहां 360 अरबपति हैं परन्तु यहां की 93 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या असंगठित क्षेत्र मे है। अनाज की कीमतें खूब बढ़ रही है, उत्पादन की दशा और दिशा बदल रही है। सरकार का संरक्षण किसानों, महिलाओं, विकलांगों से हट रहा है। भूख हमारे विकास के दावों को बार-बार सच का आईना दिखाती है पर सरकार उस सच से बार-बार मुंह फेर लेती है।
मध्यप्रदेश में 60 प्रतिशत बच्चे कुपोषित, 57 प्रतिशत महिलायें खून की कमी की शिकार है और पिछले 10 वर्षों में यहां 14 हजार किसानों ने आत्महत्या की है। इतना ही नहीं राज्य में प्रति व्यक्ति अनाज उत्पादन घट रहा है पर यहां अभी तक 4.5 लाख हैक्टेयर जमीन 200 उद्योगों को दी जा चुकी है और आगे भी दी जाना है। हम जमीन का उपयोग ऐसे कामों के लिये कर रहे हैं जिनसे उत्पादन लगातार कम होता जायेगा। पानी और बिजली भी सबसे ज्यादा और सबसे पहले उद्योगों को मिल रही है; क्या इन मसलों को नजरअंदाज करके एक प्रभावी खाद्य सुरक्षा कानून लागू किया जा सकेगा?
क्या हैं सरकारी बहाने?
जब हम यह बात करते हैं कि देश की तीन चैथाई आबादी को खाद्य सुरक्षा का कानूनी हक दिया जाये तो सरकार कहती है कि हमारे पास इतना धन नहीं है कि इतना व्यापक कानून बनाया जा सके। और फिर वे यह भी कहते हैं कि देश में इतना उत्पादन नहीं है कि सरकार इतनी बड़ी मात्रा में अनाज की खरीदी करे। इससे खुले बाजार में भाव गिर जायेंगे, अफरा-तफरी मच जायेगी। पर हम कहते हैं कि ये सफेद झूठ है। सरकार के पास पैसा भी है और देश में इतना उत्पादन भी वास्तव में..... खाद्य असुरक्षा के मूल कारणों से निपटने की बात नहीं करता है। इस विषय पर चल रही बहस में खाद्य सुरक्षा कानून को व्यापक और लोकव्यापी बनाने से इंकार करते हुये बार-बार दो तर्क दिये जा रहे हैं -
सरकार के पास इतने संसाधन नहीं है कि वह इस कानून के लिये 1 लाख करोड़ रूपये सब्सिडी दे सके। हम आपको यह बताना चाहते हैं कि भारत सरकार ने उद्योगों और पूंजीपतियों को वर्ष 2010 में 5.20 लाख करोड़ रूपये की कर रियायत दी है। क्या इसका एक चैथाई हिस्सा भी भूख और कुपोषण से मुक्ति के लिये खर्च नहीं किया जा सकता है? साथ ही आप देश में सरकार की सरपरस्ती में हुये 5 लाख करोड़ रूपये के घोटालों पर क्यों मौन हैं?
दूसरे स्तर पर रंगराजन् समिति ने कहा कि इतना उत्पादन देश में नहीं है कि सरकार सभी के लिए कानून बना सके। हम आपको बताना चाहते हैं कि देश में होने वाले कुल उत्पादन 230 लाख टन में से सरकार महज 20 से 25 प्रतिशत अनाज की ही खरीदी करती है इसमें से भी केवल 18 प्रतिशत ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली से वितरित होता है। रंगराजन समिति चिंतित है कि अनाज का कारोबार करने वाली कम्पनियों का क्या होगा पर वह भूख और कुपोषण के शिकार लोगों या आत्महत्या कर रहे किसानों के बारे में कतई चिंतित नहीं है। क्यों नहीं सरकार अपनी खरीदी को 50 से 60 प्रतिशत के स्तर तक लेकर नहीं जाना चाहती; यह आपको पूछना चाहिये?
ऐसी कोई प्रतिबद्धता नहीं दर्शाती है जिससे यह संकेत मिले की जल, जंगल, जमीन जैसे मूल संसाधनों का खाद्यान्न आधारित खेती के इतर उपयोग नहीं किया जायेगा; इसमें किसानों और खेती पर निर्भर समाज के संरक्षण के बारे में कोई ठोस प्रावधान नहीं है; आप मान रहे है कि अफसरशाही भ्रष्टाचार में लिप्त है परन्तु आप उनसे जुर्माना वसूल करके ही मुक्त कर देना चाहते हैं और आप ग्रामसभा या समुदाय की कोई भूमिका इस कानून में नहीं देखना चाहते हैं इसलिये इस फ्रेमवर्क को केवल नकारा ही जाना चाहिये।
खाद्य असुरक्षा की स्थिति के स्थायी निपटारे के लिए खाद्यान्न उत्पादन, भण्डारण और वितरण की व्यवस्था का विकेन्द्रीकरण करना अनिवार्य है। अब तक भारत सरकार पंजाब, हरियाणा, आंध्रप्रदेश जैसे राज्यों से ही अनाज की खरीदी करती रही है। हम कहते हैं कि देश के हर प्रदेश और हर जिले में खरीदी की जाये। इससे स्थानीय उत्पादन को भी प्रोत्साहन मिलेगा और एक राज्य से दूसरे राज्य में अनाज भेजने पर जो खर्चा होता है उसमें भी कमी आयेगी।
सरकार को इस कानून के तहत देश में अलग-अलग राज्यों में हो रहे उत्पादन की खरीदी को सुनिश्चित करना होगा साथ ही साथ ब्लॉक या उससे नीचे के स्तर पर भण्डारण की व्यवस्था करना होगा। इसके अलावा सांस्कृतिक रूप से जिन अनाज का उपयोग किया जाता रहा है उसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत वितरित किया जाना चाहिये। पर सरकार को लगता है कि इससे अनाज का व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को घाटा होगा।
क्या है हमारा मानना?
जो भी प्रस्ताव सामने रखे जा रहे हैं, वे भुखमरी से निपटने की ईमानदार कोशिश नहीं है; बल्कि भुखमरी के शिकार होने वाले लोगों को आज के लिये जिंदा रखने की नाकाम कोशिश का नमूना है। वर्तमान ढांचे को देखकर यह भी लगता है कि यह समग्र खाद्य सुरक्षा की स्थिति लाने के बजाये हितग्राही मूलक योजना बनाने की कोशिश है। एवं इसमे कही भी पोषण की सुरक्षा के अधिकार की बात नहीं की गयी है।
हम यह मानते हैं कि उत्पादन के पहलू को जोड़े बिना खाद्य असुरक्षा का सही दिशा में हल खोजना संभव नहीं होगा। साथ ही प्रस्तावित ढांचे को देखकर लगता है कि इस कानून के अन्तर्गत शामिल होने वाली योजनायें रहम की योजनायें हैं तथा इनका चरित्र बदला जाना चाहिये।
क्या हों राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के मूल सिद्धांत?
सार्वजनिक वितरण व्यवस्था - गरीबी की रेखा के आधार पर 35 किलो अनाज की व्यवस्था को हम नकारते हैं। हम मानते हैं कि खाद्य सुरक्षा कानून के तहत हर परिवार (2 बच्चों सहित पांच सदस्य) के लिये 50 किलो अनाज, 10 किलो दाल और 4 लीटर खाद्य तेल प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिये; इसके अभाव में भारत सरकार द्वारा बनाया जाने वाला कानून देश के नागरिकों और जनता को आधे पेट रखेगा। प्रावधान और वितरण के लिए व्यक्ति को ही इकाई माना जाना चाहिए और प्रति सदस्य के मान से 14 किलो विविध किस्म के अनाज की जरुरत को आधार माना जाये। राशन कार्ड महिलाओं के नाम से हो।
हम मानते हैं कि इस कानून को सर्वव्यापी करते हुये एपीएल व बीपीएल की श्रेणी को हटाकर सभी के लिए लागू करना चाहिए। राषन व्यवस्था के सर्वव्यापीकरण में सम्पन्न वर्ग (पूंजीपति, तयशुदा राशि से ज्यादा मासिक वेतन पाने वाले व नौकरीपेशा) को इससे बाहर किया जा सकता है।
सार्वजनिक वितरण व्यवस्था का विकेन्द्रीकरण - इसके साथ ही अनाज/खाद्यान्न के सार्वजनिक वितरण की व्यवस्था का भी विकेन्द्रीकरण होना चाहिये। सुझाव यह है कि स्थानीय स्तर पर खरीदे गये अनाज के भण्डारण की व्यवस्था स्पष्ट रूप से ब्लाक स्तर पर लागू किया जाये।
सरकारी खरीदी व वितरण की विकेन्द्रीकृत व्यवस्था होना चाहिए और निजी खरीदी पर रोक लगनी चाहियें। सरकारी गेहूं की अधिकांष खरीदी पंजाब-हरियाणा से व चावल की खरीदी आंध्रप्रदेश से हो रही है, जिससे अन्य राज्य खाद्यान्न उत्पादन के मामले में भेदभाव के षिकार होकर हतोत्साहित हुये हैं। बाकी प्रांतों के गेहूँ/चावल उत्पादन और पूरे देश के मोटे अनाज दलहन, तिलहन आदि की खेती को प्रोत्साहन व संबल देने के लिए विकेन्द्रित खरीदी-वितरण व्यवस्था होना चाहिए। इस व्यवस्था से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत प्रबंधन, प्रशासन और परिवहन पर होने वाले भारी-भरकम व्यय को बहुत कम किया जा सकेगा और भ्रष्टाचार (लीकेज) में भी कमी आयेगी। इस बचत से समर्थन मूल्य को बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा अनाज खरीदी की प्रक्रिया में मण्डी व्यवस्था की केन्द्रीय भूमिका हो।
खाद्य सम्प्रभुता और आजीविका के साधनों की सुरक्षा - खाद्य सुरक्षा कानून के सही, उपयोगी और लोकोन्मुखी क्रियान्वयन के लिये जरूरी है कि सरकार कृषि क्षेत्र में दी जाने वाली रियायतों को खाद्यान्न/खाद्य सुरक्षा देने वाली कृषि पर केन्द्रित करे। नकद/व्यावसायिक फसलों को प्रोत्साहन के लिये दी जाने वाली रियायत को खत्म किया जाना चाहिये। खाद्यान्न कृषि को प्रोत्साहित करने के लिये रियायतों और सरकारी निवेश को बढ़ाया जाना चाहिये और इसे अनिवार्य अधिकार की श्रेणी में रखा जाना चाहिये।
आजीविका के साधनों की सुरक्षा के साथ ही देश -समाज की खाद्य सुरक्षा जुड़ी हुई है। अतः इस कानून के तहत यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि कृषि भूमि (मौजूदा और संभावित उपयोग में आ सकने वाली) का डायवर्जन उद्योगों, सेज या गैर-कृषि उपभोग के लिये नहीं किया जायेगा। इसी तरह वन भूमि का अन्य उपयोग के लिये डायवर्जन नहीं किया जायेगा। यह आजीविका और पर्यावरण की सुरक्षा दोनों के लिये अनिवार्य है। जल स्रोतों पर पहला हक कृषि का हो एवं यह जल किसी भी स्थिति में औद्योगिक या व्यापारिक धंधों के लिए नहीं छीना जाए। वनों में खदान, फैक्ट्री या अन्य कोई भी विनाशकारी काम नहीं किये जायें। जल, जंगल, जमीन का पहला हक खाद्य सुरक्षा की आपूर्ति के लिये किया जाये।
सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना का सर्वव्यापीकरण - सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना को वर्तमान ढांचे से बाहर रखा गया है जो कि बिल्कुल गलत है। सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना का भा सर्वव्यापीकरण होना चाहिये एवं इसके हितग्राही तय करने में बीपीएल की पात्रता की शर्त न जोड़ी जाये। इसके सर्वव्यापीकरण में सम्पन्न वर्ग (पूंजीपति, तयशुदा राशि से ज्यादा मासिक वेतन पाने वाले व नौकरीपेशा) को इससे बाहर किया जा सकता है। पेंशन की राशि को सरकारी मापदण्डों के अनुसार देखा जाना चाहिये। इसके लिए एक माह तक मिलने वाली न्यूनतम मजदूरी की आधी राशि पेंशन के रूप में दी जानी चाहिये।
मातृत्व व बाल सहयोग
मौजूदा चर्चाओं में किशोरी बालिकाओं, बच्चो के लिये झूलाघर, प्रसव के दौरान मातृत्व सहायता का जिक्र नहीं किया गया है। हमारी मांग है कि 0 से 6 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों के भोजन के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए यह जरूरी है कि मांओं को प्रसव के दौरान मदद दी जाएं तथा कार्यस्थल पर झूलाघर की सुविधा मुहैया कराई जाए एवं किशोरी बालिकाओं के पोषण की व्यवस्था की जायें।
खाद्य सुरक्षा को बच्चों, किशोरी बालिकाओं और गर्भवती-धात्री महिलओं के जीवन के अधिकार के चक्र के साथ जोड़कर परिभाषित किया जाना चाहिये। इसीलिये जरूरी है कि मातृत्व सुरक्षा, स्कूल पोषण कार्यक्रम और एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम को कानूनी रूप देते हुये बच्चों, किशोरी बालिकाओं और महिलाओं को भूख और कुपोषण से मुक्ति का अधिकार दिया जाये। नवजात शिशुओं के लिये स्तनपान के व्यवहार को भी संरक्षण देने की जरूरत है। सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों की पोषण एवं खाद्य सुरक्षा सम्बन्धी जरूरतों को पूरा करने के लिये डिब्बा बंद या कृत्रिम पोषक तत्वों वालें खाने के सामान को प्रोत्साहित न किया जाये।
नीतिगत बदलाव
खाद्यान्न निर्यात-आयात पर प्रतिबंध हो जब तक कि देश में खाद्य और पोषण की असुरक्षा की स्थिति न सुधर जाये। भुखमरी की स्थिति मिट न जाये। अब यह स्पष्ट हो चुका है कि भारत गंभीर खाद्य असुरक्षा की स्थिति में पहुंच चुका है। यह स्थिति प्राकृतिक स्थिति नहीं है बल्कि इसका जन्म विसंगतिपूर्ण सरकारी नीतियों और ढांचागत अव्यवस्थाओं के कारण हुआ है। ऐसे में नीतिगत रूप से सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि देश में भुखमरी और कुपोषण खत्म होने तक अनाज-खाद्यान्न का निर्यात पूर्णतः प्रतिबंधित रहेगा। इसके साथ ही आपातकालीन परिस्थितियों को छोड़कर अनाज-खाद्यान्न के आयात पर भी रोक रहेगी ताकि स्थानीय किसानों-उत्पादकों को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की हिंसक प्रतिस्पर्धा का सामना न करना पड़े।
आपातकालीन स्थितियाँ
विसंगतिपूर्ण विकास नीतियों के कारण सूखा, बाढ़, अकाल, चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदायें समाज के लिये अब स्थाई चुनौतियाँ बन गई है। इन प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में सरकार तत्काल सुनिश्चित करे कि {1} राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के तहत 100 दिन के रोजगार की सीमा को हटाया जाये और जितनी जरूरत हो उतना काम दिया जाये, {2} मजदूरी को स्थिर करने ; हमें (Wage Freeze) की नीति वापस ली जाये, {3} न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण न्यूनतम मजदूरी अधिनियम में परिभाशित जरूरतों के आधार पर किया जाये, {4} राशन व्यवस्था से अनाज, दालों और तेल की अतिरिक्त मात्रा उपलब्ध करवाई जाये।
शिकायत निवारण तथा निगरानी
वर्तमान ढांचे में सिर्फ प्रावधानों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति पर सिर्फ जुर्माने की बात कही जा रही है। परन्तु हमारी मांग है कि इस कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करने वालों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज करके कठोर दण्डात्मक कार्यवाही की व्यवस्था होना चाहिये। निगरानी और शिकायत निवारण व्यवस्था में ग्रामसभा की मुख्य भूमिका होना चाहिये। ग्रामसभा द्वारा पारित प्रस्ताव को कार्यवाही का आधार बनाकर जांच व्यवस्था (ब्लाक स्तर पर और जिला स्तर पर) तत्काल जांच करके तीन माह की अवधि में शिकायत का निवारण हो। जिन व्यक्तियों के हकों का हनन होगा उनको मुआवजे का हक होगा एवं दोषी के खिलाफ गैर जमानती फौजदारी मुकदमा दर्ज होना चाहिये। मुकदमा दर्ज होते ही हितग्राही को मुआवजा दिया जाये। इस तरह के मामले में जांच के निराकरण का इंतजार नहीं किया जायेगा।
सोशल ऑडिट के निष्कर्ष/अनुशंसाओं पर कार्यवाही करना राज्य सरकार और जिला स्तरीय शिकायत निवारण ढांचे की अनिवार्यता होगी। सामाजिक अंकेक्षण में निकलने वाली अनियमितताओं के खिलाफ कार्यवाही के लिए समय सीमा निर्धारित की जाए। नामजद अधिकारी द्वारा निर्णय किया जाए। जिला, राज्य और ब्लाक स्तर पर शिकायत निवारण व्यवस्था में नामजद अधिकारी की नियुक्ति होना चाहिये। |