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  पोषण सुरक्षा: सबसे अहम जरूरत  
     
 

पोषण कितना जरूरी है इसे देश की मौजूदा परिस्थितियों से समझा जा सकता है। जितनी ताकत अन्न ग्रहण करने में है, उतनी ही ताकत अन्न त्यागने में भी है। अन्न त्यागने की ताकत से पूरे देश में हलचल पैदा हो सकती है। बहरहाल अन्न का मानव संस्कृति सभ्यता की शुरूआत से ही नाता है। जैसे-जैसे संस्कृति पुष्ट होती रही है वैसे-वैसे ही अन्न, भोजन, पोषण में भी कई स्तरों पर बेहतर होते जाने की कवायद चलती रही है।  पोषण सुरक्षा को मानव सभ्यता की शुरूआत से ही देखा जाता रहा है। किसी भी प्राणी के लिए पोषण जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि संतुलित पोषण कैसे हो ?

कितना पोषण है जरूरी

इंडियन कांउसिल फॉर मेडिकल रिसर्च ने एक व्यक्ति के लिए कितना पोषण जरूरी है उसे कैलोरी के अनुसार मापदंड तय किया है। आईसीएमआर के मुताबिक एक औसत भारतीय के लिए भारी काम करने वालों के लिए रोजाना 2400 कैलोरी प्रति व्यक्ति और कम शारीरिक श्रम करने वाले लोगों के लिए 2100 कैलोरी पोषण जरूरी है। पोषण सुरक्षा का मतलब यह भी है कि किसी भी व्यक्ति की अपने जीवन चक्र में ऐसे विविधता पूर्ण पर्याप्त मात्रा मेपहुंच सुनि6चित होना जिसमें जरूरी कार्बोहाईड्रेट, प्रोटीन, वसा, सूक्ष्म पोषण तत्व की उपलब्धता हो। इन तत्वों की आपूर्ति अलग-अलग तरह के अनाजों, दालों, तेल, दूध, अण्डे, सब्जियों और फलों से होती है, इसलिए इनकी उपलब्धता और वहन करने की परिस्थितियां बननती चाहिये। इसी तारतम्य में पीने के साफ पानी की उपलब्धता भी जरूरी है।

पोषण सुरक्षा पर राज्य की संवैधानिक बाध्यताएं

भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 हर एक के लिए जीवन और स्वातंत्र्यता का मौलिक अधिकार सुनिश्चित करता है। इस अनुच्छेद के तहत उपलब्ध जीवन और स्वातं.त्र्यता के अधिकार में भोजन का अधिकार सम्मिलित है। वहीं संविधान का अनुच्छेद 47 कहता है कि लोगों के पोषण और जीवन के स्तर को उठाने के साथ ही जनस्वास्थ्य को बेहतर बनाना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

  • मानव अधिकारों पर जारी अन्तर्राष्ट्रीय घोषणा पत्र (1949) की धारा-25 हर व्यक्ति के लिये पर्याप्त भोजन के अधिकार को मान्यता देती है।
  • आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय सहमति दस्तावेज की धारा-11 (1966) और आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की समिति हर व्यक्ति को भूख से मुक्त रखने के संदर्भ में राज्य की जिम्मेदारियों की विस्तार से व्याख्या करती है।
  • इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र संघ के बाल अधिकार समझौते (धारा-271 अौर 273) अौर महिलाओं के खिलाफ होने वाले हर तरह के भेदभाव की सामाप्ति के लिये सम्मेलन (सीडा) के घोषणा पत्र (धारा-12) महिलाओं और बच्चों की खाद्य-पोषण सुरक्षा के बारे में राज्य की जिम्मेदारी को स्पष्ट करते हैं।

राज्य सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए कमजोर वर्ग के लोगों को सस्ती दरों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराता है। इसके साथ ही आईसीडीएस और मिड डे मील के जरिए बच्चों को पोषण सुरक्षा प्रदान की जा रही है। मध्यप्रदेश में अलग अलग समुदाय अपनी संस्कृतियों के साथ विविधता के साथ बसर करते हैं। कमोबेश पोषण के नजरिए से भी देखें तो मध्यप्रदेश में बहुत विविधता पाई जाती है। बावजूद इसके प्रदेश में स्वास्थ्य मानकों के नजरिए से स्वास्थ्य की तस्वीर बहुत अच्छी नहीं है।  खासकर बच्चों के संदर्भ में देखें तो यहां साठ प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं।

कुपोषण क्यों है

इसे पोषण की उपलब्धता और उसके वितरण के नजरिये से देखा जाना चाहिए। 1972-73 में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 153 क़िलोग्राम अनाज को उपभोग होता था, अब वह 1222 क़िग्रा प्रतिमाह आ गया है। 2005-06 में एक सदस्य औसतन उपभोग 11920 क़िग्रा था जो 2006-07 में औसत भोजन का उपभोग घटकर मात्र 11685 (1़97 प्रतिशत कम) किग्रा प्रति व्यक्ति रह गया। नि6चित ही यह एक अच्छा संकेत नहीं है। यही कारण है कि यहां 5 वर्ष से कम उम्र के 70 फीसदी बच्चों में खून की कमी है। 19 में से 11 राज्यों में 75 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे एनीमिया के शिकार हैं।

पोषण का महत्व

सही पोषण से बच्चों की बढ़त अच्छी होती है। और दिमाग का विकास होता हैं। सही पोषण से बीमारियों से लड़ने की शक्ति मिलती है और बार-बार बीमार नहीं पड़ते। पोषण से ही बार-बार बीमार होने से बचा जा सकता है और कुपोषण के दायरे से मुक्ति भी पाई जा सकती है। सही पोषण से बीमारी नहीं होती, इसका असर एक व्यक्ति के जीवन पर देखने को मिलता है, उत्पादकता में बढ़ोत्तरी होती है, बच्चों की एकाग्रता बढ़ जाती है और पढ़ाई में मन लगता है। देश का बेहतर भविष्य सुनिश्चित होता है।

महिलाओं और किशोरियों में खून की कमी बड़ी चुनौती

भारत में खून की कमी या एनीमिया बहुत आम बीमारी है। देश में 6 से 59 माह की आयु वर्ग में हर दस में सात बच्चे 695 प्रतिशत खून की कमी का शिकार हैं। इनमें से चालीस प्रतिशत बच्चे मामूली तौर पर और तीन प्रतिशत बच्चे गंभीर रूप से प्रभावित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं, युवतियां व बच्चे एनीमिया से ज्यादा पीड़ित हैं। एनएफएचएस के दूसरे सर्वे से तीसरे सर्वे में एनीमिया 74 प्रतिशत से बढ़कर 79 प्रतिशत पाया गया था। मध्यप्रदेश की तस्वीर इस मामले में और भी बदतर है। प्रदेश में 74 प्रतिशत बच्चे एनीमिया से ग्रसित हैं। प्रत्येक दस में से आठ गर्भवती मांएं खून की कमी से संघर्ष करती हैं।  मां में खून की कमी का प्रभाव उनकी संतान पर सीधे रूप से पड़ता है। सर्वे में पाया गया है कि जिन मांओं को एनीमिया था उनमें से 544 प्रतिशत शिशुओं में भी खून की कमी थी। मध्यप्रदेश बिहार के बाद दूसरा राज्य है जहां बच्चों में सबसे ज्यादा एनीमिया है। किशोरी युवतियों में भी यह एक गंभीर बीमारी है, यहां हर दस में से छह युवतियां एनीमिया का शिकार हैं।

बच्चों में कुपोषण

देश में बच्चों की आधी आबादी कुपोषण का शिकार है। 24 प्रतिशत बच्चे गंभीर कुपोषण का शिकार हैं। मध्यप्रदेश में हाल ही में राष्ट्रीय पोषण संस्थान हैदराबाद ने अध्ययन किया है। इस अध्ययन में पाया गया है कि मध्यप्रदेश में ग्रामीण क्षेत्र में 519 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। एनएफएचएस के तीसरे सर्वे के मुकाबले यहां लगभग दस प्रतिशत कुपोषण कम पाया गया हैं। यह एक सुखद संकेत हो सकता है, लेकिन एक चुनौती भी है, क्योंकि प्रदेश में आधे से ज्यादा बच्चे अब भी कुपोषण के संकट में अपनी जिंदगी से संघर्ष कर रहे हैं। इसके लिए जरूरी है कि उनके पोषण और सुरक्षा पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाए।

कुपोषण के प्रकार और मप्र में हालात कुपोषण की तीन तरीकों से पहचान हो सकती है। राष्ट्रीय पोषण संस्थान के ताजा अध्ययन के मुताबिक मध्यप्रदेश में 519 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट, 489 प्रतिशत बच्चे स्टंटिंग और 258 प्रतिशत बच्चे वास्टिंग श्रेणी में आ रहे हैं।

मानव अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र की सर्वव्यापी घोषणा कहती है, ''हरेक को अपने व अपने परिवार की भलाई व स्वास्थ्य हेतु ऐसे पर्याप्त जीवन-स्तर का अधिकार है जिसमें रोटी, कपड़ा, मकान व स्वास्थ्य सेवा व आवश्यक सामाजिक सुविधाएं शामिल हैं

बाल-अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र प्रतिज्ञा-पत्र (1989) का अधिनियम 24 पोषण-सम्बंधी बच्चों के अधिकार की साफ तौर पर व्याख्या करता है। यह प्रतिज्ञा-पत्र कहता है, ''सारे गवाह राज्य इस अधिकार के पूर्ण क्रियान्वयन हेतु जतनऔर खास तौर पर इस बाबत उपयुक्त कदम उठाएं , रोग एवं कुपोषण से निपटने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे के तहत अन्य बातों के साथ-साथ तुरन्त उपलब्ध टेक्नोलॉजी का प्रयोग व पर्याप्त पौष्टिक आहार व पीने का साफ पानी कराना ।

  • अंडरवेट ( कम वजन ) : इसको आयु के हिसाब से कम वजन होने के नजरिए से देखा जाता है। यह सबसे ज्यादा पाया जाने वाला कुपोषण है। उम्र के हिसाब से वजन कुपोषण मापने का एक सामान्य मापदंड है, लेकिन इसमें उंचाई को शामिल नहीं किया जाता है।
  • स्टंटिंग ( उंचाई के अनुपात में कम वजन ) : इसे उम्र के हिसाब से उंचाई के मान से परिभाषित किया जाता है। यह मानक किसी भी शिशु के पूर्व में पोषण को प्रतिबिम्बित करता है।
  • वास्टिंग ( उंचाई के अनुपात में कम वजन ) : इस मानक का मतलब यह है कि उंचाई के मुताबिक वजन कितना है। वास्टिंग को बच्चे की उम्र जाने बिना उसके वजन के मान से समझा जाता है।

शिशुओं की जरूरतें क्या है ?

स्तनपान शिशु का सर्वोत्तम पोषण है। वि6ोषज्ञों का मानना है कि जन्म के 1 घंटे के भीतर स्तनपान की शुरूआत शिशु के पूरे जीवन के लिए बुनियाद का काम करती है। इसी तरह छह माह की उम्र तक एक्सक्लूसिव स्तनपान बच्चे को कई बीमारियों से बचाने का काम करता है। बहरहाल इस दिशा में काम करने की बेहद जरूरत है। राष्ट्रीय पोषण संस्थान के सर्वे में भी प्रदेश में संस्थागत प्रसव को बढ़ाने की दिशा में उल्लेखनीय काम हुआ है और अब यहां लगभग 78 प्रतिशत प्रसव स्वास्थ्य संस्थाओं में हो रहे हैं, लेकिन जन्म के पहले घंटे में स्तनपान का प्रतिशत केवल 264 है। यह अब भी चुनौती बना हुआ है। इस दिशा में व्यापक जनचेतना की आव6यकता है।

शिशुओं की पोषण सुरक्षा के क्या मायने हैं ?

1 शिशु और छोटे बच्चों के भोजन के संदर्भ में कौशलपूर्ण सहायता और सलाह का दिया जाना।

2 बच्चे के जन्म के 6 माह बाद तक माता को आर्थिक और पोषण सहायता दिया जाना।

3 समुदाय और कार्यस्थल पर समस्त सेवाओं और सामग्री सहित झूलाघर ।

पोषण सुरक्षा के लिए नीतिगत व्यवस्थाएं

  • राष्ट्रीय बाल नीति- 1974
  • एकीकृत बाल विकास परियोजना आईसीडीएस- 1975
  • राष्ट्रीय पोषण नीति- 1993
  • नेशनल प्लान ऑफ एक्शन फॉर न्यूट्रीशन- 2005
  • एनीमिया को रोकने के लिए वि6ोष योजना, आइरन टेबलेट के संदर्भ में
  • देश के सभी शासकीय प्रायमरी स्कूलों में मध्याह्न भोजन योजना।
  • 9 माह से 3 साल तक के बच्चों को विटामिन ए की वि6ोष खुराक
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली

बच्चों के लिए पूरक पोषण आहार छह माह बाद क्यों ?

  • छ: महीने के बच्चे की शारीरिक जरूरतें बढ़ जाती है इसलिए मां के दूध के साथ ऊपरी  आहार की शुरूआत करना आवश्यक है।
  • बच्चे का शारीरिक हलचल बढ़ जाता है जिसके लिये अधिक ताकत की आवश्यकता होती है, इसलिए मां के दूध के साथ ऊपरी आहार की जरूरत होती है।
  • छ: माह से बच्चा ऊपर का आहार पचा सकता है।
  • छ: माह के बच्चे में स्वाद के के तंतु विकसित हो जाते हैं। निगलने और चबाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

छ: माह से पहले क्यों नहीं

  • इससे बच्चे को माँ का दूध पूरा नहीं मिल पाएगा। अत: 6 माह तक जो ऊर्जा प्राप्त होनी थी, उसमें कमी हो जाएगी। बच्चे का आमशय छोटा होता है, यदि उसे तरल पदार्थ से भर दिया जाता है, तो उसे पोषकता नहीं मिल पाती है।
  • यदि ऊपरी आहार ज्यादा तरल एवं कम पोषकता वाले होते हैं, तो बच्चा कमजोर हो सकता है।
  • बच्चे को बीमारी का खतरा बढ़ जाएगा। समय के पूर्व ऊपरी आहार कम सुरक्षित एवं पचने में आसान नहीं होता है।
  • माता के पुन: गर्भवती होने के अवसर बढ़ जाते हैं।

ऊपरी आहार क्यों ?

  • 6 माह की उम्र तक मां के दूध से आवश्यक ऊर्जा प्राप्त होती है।
  • 6 माह के बाद मां के दूध के अलावा अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता बच्चे को होती है।
  • इस तरह 6 महीने के बाद बच्चों को मां के दूध के साथ ऊपरी आहार देना आवश्यक होता है। इस उम्र में बच्चे की पाचन संस्थान भोजन पचाने के लिए भी तैयार हो जाता है।

ऊपरी आहार कैसा हो ?

बच्चे को दिया जाने वाला ऊपरी आहार स्थानीय उपलब्ध खाद्य सामग्री में से होना चाहिए। इसमें कम से कम निम्नानुसार भोजन शामिल करने की कोशिश की जानी चाहिए –

  • अनाज जैसे चावल, गेहूं, मक्का, बाजरा।
  • स्टार्च युक्त सब्जी जैसे आलू, शकरकंद आदि और स्टार्च युक्त फल जैसे केला आदि।
  • ऊपरी आहार सफाई से पकाया, परोसा एवं खिलाया जाना चाहिए।
  • इसमें एक चम्मच घी या तेल अवश्य मिलना चाहिए।
  • प्राय: ऊपरी आहार तरल करके बच्चे को दिया जाता है, ऐसा माना जाता है कि गाढ़ा भोजन बच्चे के गले में फसेगा तथा अपच करेगा, इससे उसमें पानी आदि मिलाकर उसे पतला कर दिया जाता है। यह जरूरी है कि बच्चे की मां को उसे देने वाले भोजन के गाढ़ेपन की जानकारी दी जाए। भोज्य पदार्थ इतना गाढ़ा होना चाहिए, जो की चम्मच तिरछी करने पर धीरे-धीरे टपके। इतना पतला न हो कि तुरन्त ही बह जाए या इतना गाढ़ा न हो की चम्मच तिरछी करने पर गिरे ही न।

बच्चे को खाना देने की मात्रा

7 वें माह से- नरम दाल - दलिया, दाल - चावल, दाल - रोटी मसलकर अर्ध ठोस (चम्मच से गिराने पर सरके, बहे नही), खूब मसले साग एवं फल, प्रतिदिन दो बार तथा मात्रा। 2 - 3 भरे हुए चाय के चम्मच दें। स्तनपान जारी रखें। वनस्पतियाँ, अनाज, दालें एवं फलों के साथ मांस, मछली एवं अण्डा यदि खाते हैं तो अव6य शामिल करें तथा नियमित स्तनपान भी जारी रखें।

8-9 वें माह से -नरम दाल - दलिया, दाल - चावल, दाल - रोटी, प्रतिदिन धीरे - धीरे मात्रा बढ़ाते हुए नियमित स्तनपान के साथ 2-3 बार चम्मच से 250 मिली0 या प्रत्येक भोजन में 35 कप अव6य शामिल करें एवं टुकडों में फल भी अव6य दें।दूध, दूध से बने पदार्थ, अनाज, दालें एवं फलों के साथ मांस, मछली एवं अण्डा यदि खाते हैं तो अव6य शामिल करें तथा नियमित स्तनपान भी जारी रखें।

9-11 माह - नरम दाल - दलिया, दाल - चावल, दाल - रोटी, प्रतिदिन धीरे - धीरे मात्रा बढ़ाते हुए अच्छी तरह कटे हुए फल एवं बिना मसला आहार हुआ दिन में तीन बार दें तथा नियमित स्तनपान जारी रखें। एक बार में 250 मिली0 का कप भरकर आहार बच्चा प्रत्येक भोजन में ग्रहण करें।

12 माह - 5 वर्ष - घर पर पका पूरा खाना, धुले एवं कटे फल, 3 भोजन तथा 2 नाश्ते के रूप में दें, एक बार में 250 मिली0 का कप भरकर आहार बच्चा प्रत्येक भोजन में ग्रहण करें। स्तनपान के बीच में आहार देना चाहिए, नियमित स्तनपान जारी रखें।

  • 6 माह तक जब बच्चा सिर्फ मॉ का दूध पीता है, तब कि उसे किसी भी भोज्य पदार्थ की आवश्यकता नहीं होती है, परन्तु जब उसे ऊपरी आहार दिया जाता है, तब पेय पदार्थ देना आवश्यक होता है।
  • पेय पदार्थ की मात्रा बच्चे को दिए गए भोजन के गाढ़ेपन एवं मां के दूध पर निर्भर करेगी।
  • यदि बच्चा बार-बार हल्के पीले रंग की पेशाब करता है, तो उसे पर्याप्त पेय पदार्थ दिए जा रहे हैं। यदि कम तथा गहरे रंग की पेशाब करता है, तब उसे अधिक पेय पदार्थ देने की आवश्यकता है।
  • बच्चे को दस्त लगने या बुखार आने पर उसे अधिक बार पेय पदार्थ देने चाहिए।
  • पानी के अलावा फलों के रस भी बच्चों को दिए जा सकते हैं, परन्तु बच्चे के दांतों की सुरक्षा के लिए यह रस पानी मिलाकर पतले दिए जाने चाहिए। रस इतना नहीं देना चाहिए बच्चा अन्य भोज्य पदार्थ न खा सके।
  • चाय या कॉफी बच्चे के आयरन के अवशोषण को कम करता है।
  • कोई भी पेय पदार्थ शुद्ध और साफ होना चाहिए। पानी उबला हुआ तथा ढककर साफ बर्तन में रखना चाहिए। पानी निकालते वक्त उसमें हाथ नहीं डालना चाहिए।

एनीमिया क्या है

नई रक्त कोशिकाओं के निर्माण हेतु जरूरी एक या एक से अधिक पोषक तत्वों की कमी से रक्त में हीमोग्लोबिन का स्तर सामान्य से कम होना। किशोरी बालिकाओं में हीमोग्लोबिन का स्तर 12 ग्राम100 एमएल से कम होने पर एनीमिया कहलाता है।

एनीमिया के लक्षण

जो व्यक्ति एनीमिया से पीड़ित होता है उसकी जीभ, आंखों व नाखुनों का रंग फीका दिखाई देने लगता है। उसके पैरों में सूजन होती है। साँस फूलना और थकान महसूस होने लगती है। सा काम करने पर कमजोरी महसूस होती है।

एनीमिया के कारण

एनीमिया मुख्यत: भोजन में आयरन या लौह तत्व की कमी होने के कारण होता है। किसी व्यक्ति को बार-बार मलेरिया हो तब भी व्यक्ति एनीमिया का शिकार हो सकता है। युवतियों और महिलाओं में माहवारी के दौरान अधिक खून बहना भी एनीमिया का एक कारण है। परजीविक कारण और काम के हिसाब से पोषण की कमी भी एनीमिया के रूप में सामने आती है। बच्चों में एनीमिया मुख्यत : मां से ही मिलता है।

किशोरावस्था में एनीमिया के दुष्प्रभाव

किशोरावस्था में एनीमिया होने के दुष्प्रभाव एक व्यक्ति के पूरे जीवन में दिखाई पड़ता है। इससे कार्यक्षमता पर दुष्प्रभाव पड़ता है। भूख कम होने लगती है और सही पोषण नहीं मिलने से आयु के अनुसार शारीरिक वृद्धि नहीं हो पाती है।  युवतियों में एनीमिया आगे जाकर उनकी गर्भावस्था को भी प्रभावित करता है और वह असुरक्षित मातृत्व के दौर से गुजरती है। यही कारण है कि यहां पर उच्च मातृत्व मृत्यु दर है। उनके बच्चे भी कम वनज के पैदा होते है, और कुपोषण का शिकार हो जाते हैं।

आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया के नियंत्रण के तरीके

एनीमिया से बचने का सबसे आसान और सुरक्षित तरीका यह है कि भोजन में संतुलित आहार की मात्रा बढ़ाई जाए। आहार की गुणवत्ता और पौष्टिकता को बढ़ाकर ही एनीमिया से स्थायी रूप से मुक्ति पाई जा सकती है। इसके साथ ही मलेरिया से बचाव करके और सप्ताह में एक बार आयरन की गोली लेना भी फायदेमंद साबित हो सकता हैं कई चीजें ऐसी भी होती है जो भोजन में लौहतत्व के अभिशोषण को अवरूद्ध कर देती हैं। ऐसे पदार्थों से बचने की जरूरत है। आयरन युक्त आहार जैसे बाजारा, खजूर, गुड़, अंकुरित दालें, हरी पत्तेदार सब्जियां (जैसे पालक, मैथी, बथुआ) अण्डा, माँस, मछली इत्यादि ज्यादा से ज्यादा करना होगा। विटामिन ''सी'' युक्त खाद्य पदार्थ जैस- नींबू, आंवला, संतरा, अमरूद आदि लेने से आयरन के अवशोषण की क्षमता बढ़ जाती है। लोहे की कढ़ाई में खाना बनाने की सलाह भी वि6ोषज्ञों द्वारा दी जाती है। आयरन टेबलेट लेने के कुछ समय बाद कुछ मिचली अथवा काले रंग के दस्त होने की शिकायत हो सकती है। लेकिन ऐसी स्थिति में भी इन गोलियों का उपयोग बंद नहीं करना चाहिए।

निन के सर्वें के मुताबिक प्रदेश में 78 प्रतिशत किशोरियों को आयरन फोलिक एसिड की टेबलेट मिल पा रही है। यानी लगभग 22 प्रतिशत महिला और किशोरियोें को यह किसी भी रूप में नहीं मिल रही है। बड़ी चुनौती यह है कि कैसे हम सभी लोगों तक आयएफए टेबलेट पहुंचा सकें।

इंडियन कौंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च के मुताबिक 5 सदस्य परिवार के लिए मासिक जरूरत –

सदस्य अनाज (किलो) दाल (किलो) खाद्य तेल (ग्राम)
औसत मेहनत करने वाला पुरूष 14.4 27 1050
औसत मेहनत करने वाली महिला 10.8 2.25 900
1-6 वर्ष का बच्चा 5 1.1 675
7-12 वर्ष का बच्चा 9 1.8 750
बुजुर्ग तीसरा बच्चा 9 1.8 675
कुल 482 9.65 4050

मोटे अनाज की पौष्टिकता अन्य अनाजों की तुलना में ज्यादा होती है।

अनाज प्रोटीन (ग्राम) रेशा (ग्राम) मिनरल (ग्राम) आयरन (मिग़्राम) कैल्शियम (मिग़्राम)
बाजरा 10.6 1.3 2.3 16.9 38
रागीनाचनी 7.3 3.6 2.7 3.9 344
कांगभादी 12.3 8 3.3 2.8 31
कोदो 8.3 9 2.6 0.5 27
कुटकी 7.7 7.6 1.5 9.3 17
सावाबट्टी 11.2 10.1   15.2 11
चावल 6.8 0.2 0.6 0.7 10
गेहूं 11.8 1.2 1.5 5.3 41
 
     
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