देश भर में मुस्लिम महिलाओं को बेहद गहरे तक जड़ें जमाए बैठी असमानता और हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। इससे न केवल महिलाओं के अधिकारों का घोर उल्लंघन हो रहा है बल्कि इस्लाम धर्म के बुनियादी सिध्दांत और मूल्य भी इसमें दफन हो रहे हैं। महिला के खिलाफ हिंसा (वीओडब्ल्यू) इस्लामिक परंपरा का हिस्सा नहीं है, लेकिन यह मुस्लिम दंपतियों में काफी विस्तार से जड़ें जमाए हुए है। लैंगिक भेदभाव तथा पुरुषों द्वारा खुद को प्रभुत्वशाली मानने की प्रवृत्ति मध्यप्रदेश के मुस्लिम समाज में इस कदर गहरे पैठ बना चुकी है कि यहां मुस्लिम महिलाओं की स्थिति बदतर बन गई है। वे अक्सर तथाकथित दैवीय कारणों या विशेषाधिकार की मानसिकता के चलते मानसिक, शारीरिक व यौन प्रताड़ना का शिकार होती हैं।
| धर्म |
भावनात्मक हिंसा |
शरीरिक हिंसा |
यौन हिंसा |
भावनात्मक, शरीरिक या यौन हिंसा |
| हिंदू |
22.4 |
43.5 |
10.7 |
48.6 |
| मुस्लिम |
26.7 |
57.2 |
15.8 |
60.8 |
| जैन |
11.2 |
24.2 |
11.3 |
27.7 |
| अन्य |
22.3 |
37.9 |
13.4 |
43.6 |
महिलाओं और पुरूषों के बीच सत्ता के असमान बंटवारे का नतीजा महिलाओं के खिलाफ हिंसा के तौर पर देखा जा सकता है। मध्यप्रदेश में समाज के सभी वर्गों में लैंगिक भेदभाव मौजूद है और यह साफ तौर पर महसूस भी किया जा सकता है। यहां 15-49 आयु वर्ग की शादीशुदा महिलाओं में से 50.8 फीसदी महिलाएं अपने जीवन-काल में किसी न किसी तरह की शारीरिक या यौन हिसां जरूर झेलती हैं। हालांकि ज्यादातर मामलों में महिलाओं की असुरक्षा के लिए बाहर की दुनिया को जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन कड़वी सच्चाई यही है कि महिलाओं को उनके अपने दायरे के लोगों से ही ज्यादा हिंसा बर्दाश्त करनी होती है। महिलाओं के खिलाफ हिंसा के 83.2 प्रतिशत मामलों में उसपर शरीरिक हिंसा करने वाला उसका पति ही निकला है। वहीं शादीशुदा महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों में 84.4 प्रतिशत यौन प्रताड़ना के लिए उसका पति ही आरोपी ठहराया गया है।
महिलाओं के खिलाफ इस हिंसा की जड़ें समाज के ढांचे में ही काफी गहरे तक गई हुई हैं। इसके चलते मध्यप्रदेश की मुस्लिम आबादी में मानवाधिकार को काफी बड़े पैमाने पर उल्लंघन साफ तौर पर देखा जा सकता है। ताजा एनएफएचएस-3 की रिपोर्ट में मध्यप्रदेश का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि यहां अन्य धार्मिक समुदायों की तुलना में मुस्लिम महिलाएं शरीरिक, भावनात्मक व यौन प्रताड़ना के अलग-अलग या साझा मामलों में सर्वाधिक शिकार होती हैं। अगर भिन्न धार्मिक संप्रदायों के आधार पर महिलाओं पर होने वाली हिंसा की तुलना करें तो पता चलता है कि जैन महिलाओं में 27.7 प्रतिशत व हिंदू महिलाओं में 48.6 प्रतिशत की तुलना में सर्वाधिक 60.8 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं हिंसा का दंश झेलती हैं।
यौन हिंसा किसी महिला या बालिका के खिलाफ किया गया ऐसा यौन व्यवहार है जो उसकी इच्छा के खिलाफ किया गया हो; इसमें भुक्तभोगी की सहमति नहीं होती है। इन्हीं संदर्भों में विवाहित मुस्लिम महिलाएं सर्वाधिक 15.8 प्रतिशत यौन हिंसा का शिकार बनती हैं; यह अनुपात मध्यप्रदेश में 11 प्रतिशत का है जो राज्य की हिंदू, जैन व अन्य वर्ग की महिलाओं के साथ होने वाली यौन हिंसा के लगभग बराबर है। अक्सर यौन हिंसा के चलते एचआईवी/एड्स सरीखे यौन संक्रमित रोग हो जाते हैं। वहीं अनचाहा गर्भ, जबरन गर्भपात, कम वजन के बच्चे व उनकी आकस्मिक मौत सरीखे गंभीर नतीजे भी देखने को मिलते हैं।
जैन महिलाओं में अपेक्षाकृत कम हिंसा प्रतिशत को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस वर्ग की महिलाओं का सामाजिक स्तर अन्य वर्ग की महिलाओं की तुलना में कुछ बेहतर है। इस वर्ग की 25 प्रतिशत से भी कम महिलाएं शरीरिक हिंसा, 26.8 प्रतिशत महिलाएं शरीरिक या भावनात्मक हिंसा का षिकार होती हैं। वहीं मुस्लिम महिलाओं में यह अनुपात 57.4 प्रतिशत है। अगर केवल भावनात्मक हिंसा की बात की जाए तो 11.2 प्रतिशत जैन महिलाएं इस प्रवृत्ति का शिकार बनती हैं।
अगर भावनात्मक व मनोवैज्ञानिक हिंसा की बात की जाए तो इसके तहत विभिन्न तरीकों से मखौल उड़ाना, आलोचना करना, धमकी देना, बहिष्कार करना, तकलीफ देना व सार्वजनिक तौर पर प्रताड़ित करना आदि शामिल है। मध्यप्रदेश में 22 प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं जो घर की चारदीवारी के भीतर व उसके बाहर भावनात्मक हिंसा का शिकार बनती हैं। लेकिन यहां मुस्लिम महिलाओं की स्थिति ज्यादा बदतर है, उनमें 26.7 प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं जो किसी न किसी तरह की भावनात्मक हिंसा झेलती हैं। किसी भी तरह की हिंसा या प्रताड़ना का नतीजा अक्सर अवसाद, मानसिक तनाव, नींद न आना, भूख न लगना व भावनात्मक तनाव के तौर पर सामने आता है।
वहीं, शरीरिक व यौन हिंसा अक्सर शरीरिक चोट मसलन, गंभीर घाव, टूटी हड्डियां, सिर में चोट, आंखों से कम दिखना कई बार मौत का भी कारण बनती है। अगर 15-49 वर्ष की आयुवर्ग की उन महिलाओं की बात की जाए जिन्होंने बीते 12 महीनों में अपने पति की किसी न किसी तरह की शरीरिक या यौन हिंसा झेली है, तो हम देखते हैं कि इनमें 11.6 प्रतिशत महिलाओं को गंभीर शरीरिक चोटें आई हैं। वहीं, इसी अवधि में सामान्य शरीरिक व यौन हिंसा की शिकार बनी महिलाओं में से 20.8 प्रतिशत महिलाओं ने गंभीर शरीरिक चोट झेली है। महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा के लिए अक्सर महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। लेकिन सच तो यह है कि ऐसे दुर्भावनाजन्य व्यवहार से महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा को मिटाने के रास्ते में गंभीर बाधाएं खड़ी हो ेजाती हैं।
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