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मध्यप्रदेश में शिक्षा

 
     
 

कहते हैं कि नींव जितनी मजबूत होगी, इमारत उतनी ही बुलंद होगी। नींव से इमारत बनने की इस प्रक्रिया में कई तत्व सहायक की भूमिका अदा करते हैं और अंतत: इस गठजोड़ का सुखद परिणाम हमें इमारत के रूप में दिखाई देता है। सामाजिक संदर्भों में शिक्षा, किसी व्यक्ति के लिये सांस्कृतिक, संवेगात्मक व भावात्मक विकास को समेटते हुये एक नींव/आधार का कार्य करती है। शिक्षा किसी भी देश के लिये उसकी विरासत, उसकी राष्ट्रीय शिक्षा यानि महज़ पढ़ना-लिखना/साक्षर होना भर नहीं हैं अपितु यह व्यक्ति के लिये बौध्दिक विकास के सुअवसर प्रदान करने का एक माध्यम है। शिक्षा के संदर्भ में रस्किन का मत हैं कि 'शिक्षा का अभिप्राय यह नहीं कि मनुष्य उन वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करे जो जिनका उसे ज्ञान नहीं है अपितु उसका अभिप्राय है, उसको वैसा व्यवहार करने की शिक्षा देना, जैसा कि वह नहीं करता।' यह सीखने की परंपरा निर्वाह का एक प्रमुख आधार है जो कि असीम संभावनाओं के द्वार खोले हुये है। शिक्षा एक ऐसा अस्त्र है जिसके सहारे अज्ञानता के कई युध्द जीते जा सकते हैं।

प्रदेश में शिक्षा संस्थानों की स्थिति

क्रमांक

स्कूल सुविधायें

संख्या

1.

शासकीय प्राथमिक शाला

81335

2.

अनुदान प्राप्त प्राथमिक शाला

961

3.

निजी प्राथमिक शाला

13221

4.

शासकीय माध्यमिक शाला

24293

5.

अनुदान प्राप्त माध्यमिक शाला

370

6.

निजी माध्यमिक शाला

11236

7.

आश्रम शाला (प्रारंभिक स्तर)

878

तालिका क्र.1 - म.प्र.में शिक्षा संस्थानों की स्थिति

आज शिक्षा उस मुहाने पर खड़ी है जहाँ कि एक ओर तो उसका मूल्य आधारित स्वर्णिम अतीत है और दूसरी ओर थपेड़े और उलझनों से भरी आगामी राह, जो कि अत्यन्त चुनौतीपूर्ण राह है। शिक्षा के प्रगैतिहासिक काल में दो जुमले काफी चर्चा में रहे, प्रथम का संबंध तो शिक्षा की गुणवत्ता से है जबकि दूसरी अवधारणा सबको ओर समान शिक्षा से जुड़ी हुई है। आर्थिक उदारीकरण के युग के प्रारंभ होते ही शिक्षा का हास होना शुरू हो गया। अब शिक्षा अंर्तराष्ट्रीय व्यापक समझौते के अधीन चलने वाला सेवा व्यापार यानि सर्विस ट्रेड बना दी गई है। अर्थात् अब शिक्षा मूल्यों से नहीं अपितु बाजार से निर्धारित होगी। संरचनात्मक समायोजन की व्यूह रचना के नाम पर अंर्तराष्ट्रीय बाजार ने शिक्षा जैसे अति महत्वपूर्ण कार्यक्रमों से हाथ खींचने पर मजबूर किया और दुर्भाग्य कि सरकारों ने भी हाथ डालने शुरू कर दिये। शिक्षा पर किये जाने वाले व्यय में कटौती की जाने लगी। विश्व बैंक ने 1986 की शिक्षा नीति को आधार बनाकर निशाना साधा और अलग-अलग हैसियत के मान से बच्चों को अलग-अलग स्तर की शिक्षा दिये जाने की वकालत की । नई-नई योजनाओं के नाम पर शनै:-शनै: समानांतर संरचनाओं की रचना की जाती रही यानि हाथ खींचने की नई तकनीकें। अतएव इन सब थपेडों में उलझी षिक्षा, वर्तमान में अपने मूल स्वरूप से कहीं और है।

मध्यप्रदेश में शिक्षा

कदम-दर-कदम प्रयास

कदम दर कदम प्रयासों की बानगी प्रदेश के संदर्भ में यदि 90 के दशक से देखें तो पहली बार 1994 में 'सबके लिये बुनियादी शिक्षा' की दस्तक शासकीय प्रयासों में सुनाई दी। 1994 से ही 'डी.पी.ई.पी. (जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम) अस्तित्व में आया और यह दो चरणों में फलीभूत हुआ, प्रथम चरण 1994 और द्वितीय चरण 1997। ज्ञात हो कि वर्ष 1996 तक प्रदेश की 30,000 आबादियाँ बुनियादी स्कूली शिक्षा की पहुँच से दूर थीं। इस तरह की चुनौतियों सो पार पाने के लिये सन् 1997 में मध्यप्रदेश में शिक्षा गारंटी योजना की कदमताल शुरू की और इसमें एक किलोगीटर की परिधि में एक प्राथमिक स्कूल और किसी भी बसाहट में माँग के आधार पर 90 दिन में स्कूल खोलने की गारंटी दी गई। इस योजना के साथ ही समुदाय की भागीदारी रेखांकित करने का प्रयास शुरू हुआ। सन् 1999 में राजीव गाँधी शिक्षा मिशन की स्थापना हुई । इसी दशक में 'संपूर्ण साक्षरता मिशन' तथा पढ़ना-बढ़ना आंदोलन जैसे प्रयास भी गतिमान हुये। इस प्रकार सन् 2000 तक आते-आते सबके लिये बुनियादी शिक्षा की व्यापकता नजर आने लगी। संपूर्ण साक्षरता मिशन की मध्यवर्ती समीक्षा में यह बात उभरी कि महिलायें इस दौड़ में अभी भी पीछे हैं तो वर्ष 2002 से महिला पढ़ना-बढ़ना आंदोलन ने गति पकड़ी। इसके पूर्व दसवीं पंचवर्षीय योजना में प्रारंभिक शिक्षा के मुद्दे को रेखांकित करते हुये सर्वशिक्षा अभियान के रूप में एक विस्तृत कार्यक्रम बनाया गया तथा वर्ष 2002 में भी समुदाय की भागीदारी को सुनिश्चित करने की ऐतिहासिक पहल 'मध्यप्रदेश जन शिक्षा अधिनियम' के रूप में सामने आयी।

प्रारंभिक शिक्षा

संविधान के नीति निर्देशक तत्वों के अंर्तगत् यह स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि सरकार 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिये 'नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा' का प्रावधान करे। 1986 में बनी राष्ट्रीय शिक्षा नीति, जो कि संशोधित स्वरूप में सन् 1992 में आई और इसमें 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को 21वीं सदी में जाने के पूर्व 'नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा' की वकालत की। आज हम 21वीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं और ऐसे में प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति पर चर्चा करते हैं। वर्तमान में राज्य में साक्षरता दर 63.7 प्रतिशत है जो कि राष्ट्र के औसत से कुछ ही कम है। प्रदेश में नामांकन की स्थिति देखें तो हम पाते हैं कि वर्ष 2004-05 की तुलना में वर्ष 05-06 में प्राथमिक स्तर का सकल व कुल नामांकन कम हुआ है (देखें तालिका क्र. 1व 2)।
नामांकन की सिथति

स्तर

सकल नामांकन दर
(2003-04)

सकल नामांकन दर
(2004-05)

सकल नामांकन दर
(2005-06)

बाल.

बालि.

कुल

बाल­

बालि­

कुल

बा­

बा.

कुल

प्राथमिक

103.6

102.3

103

104.1

103.0

103.9

103.5

103.8

103.6

उच्च प्राथ.

84.4

79.7

82.3

89.1

85.0

87.3

91.5

88.7

90.3

कुल

97.7

95.8

96.8

99.4

98.1

98.9

99.8

99.4

99.6

तालिका क्र. 2 - प्रारंभिक शिक्षा में नामांकन (सकल नामांकन दर), स्त्रोत - सर्व शिक्षा अभियान


 

वर्ष 2004-05 (लाख में)

वर्ष 2005-06 (लाख में)

 

बालक

बालिका

कुल

बालक

बालिका

 कुल

प्राथमिक

5491291

4859802

10351093

5966854

5335646

11302500

उच्च प्राथ.

2156596

1670352

3826948

2375528

1878564

4254092

कुल

7647887

6530154

14178041

8342382

7214210

15556592

तालिका क्र. 3 - प्रारंभिक शिक्षा में नामांकन, स्त्रोत - सर्व शिक्षा अभियान

नतीजतन जब हम तालिका क्र. 3 को देखते हैं तो हम पाते हैं कि सर्व शिक्षा अभियान और ऐसी कई समानांतर संरचनाओं के बाद भी एक बड़ा वर्ग आज भी स्कूली शिक्षा की पहँच से बहुत दूर खड़ा है। कारण कई हो सकते हैं लेकिन मुख्य रूप से यहाँ शासन के प्रयासों की कलई खुलती दिखाई देती है। तालिका 2 हमारा ध्यान शिक्षा की गुणवत्ता पर भी ध्यान दिलाती है कि आखिर क्यों बच्चे स्कूलों को बीच में ही छोड़कर बाहर आ रहे हैं। तालिका 3 से स्पष्ट है कि लगभग 30.61 प्रतिशत बच्चे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर गये हैं। कुल जमा 5 लाख के आस-पास बच्चे आज भी प्रारंभिक शिक्षा की पहुँच से दूर हैं।

शाला की पहुंच से दूर बच्चों की स्थिति

आयु
वर्ग

अनामांकित बच्चे
वर्ष (2005-06)

बीच में ही शाला छोड़ने वाले बच्चे वर्ष (2005-06)

शाला से बाहर बच्चे
वर्ष (2005-06)

बालक

बालिका

कुल

बालक

बालिका

कुल

बालक

बालिका

कुल

5-11

132046

133681

265727

34370

33628

67998

166416

167309

333725

11-14

30751

34210

64961

36271

37285

73556

67022

71495

138517

5-14

162797

167891

330688

70641

70913

141554

233438

238804

472242

तालिका क्र. 4  - प्रारंभिक शिक्षा की पहुँच से दूर बच्चों की स्थिति, स्त्रोत - सर्व शिक्षा अभियान

ये कहाँ आ गये हम ?

दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) और वर्तमान स्थिति

10वीं पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल अगले वर्ष खत्म हो जायेगा और 11वीं पंचवर्षीय योजना लागू कर दी जायेगी। इस बीच वर्तमान स्थिति को 10वें पंचवर्ष के प्रस्तावित कार्यक्रम से मेल कराना जरूरी है जिससे यह तो पता चले कि हम आखिर कहाँ तक आ गये और हमें कहाँ पहुँचना था ? ज्ञात हो कि सर्व शिक्षा अभियान भी दसवीं पंचवर्षीय योजना का ही एक अंग है। इस योजना के निम्नलिखित लक्ष्य निर्धारित किये गये थे।

क्या है सर्व शिक्षा अभियान

यह विश्व बैंक समर्थित एक अभियान है जिसमें यह माना गया कि औपचारिक शिक्षा की बजाये कुछ भी चल सकता है यानि वैकल्पिक स्कूल और शिक्षा गारंटी भी देना संभव नहीं है तो ब्रिजकोर्स भी चलेगा। यानि जिससे सरकार शायद नामांकन करने में तो सफल हो जाये परन्तु गुणवत्ता का सवाल तब भी बरकरार रहेगा ? इस अभियान में यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि सरकार ने किस तरह से सार्वजनिक और अनिवार्य क्षेत्रों से अपनी जवाबदेहिता से हाथ खींचने की अपनी पहल शुरू कर दी है । बहरहाल सर्व शिक्षा अभियान के लक्ष्य निम्न हैं।

1. सभी बच्चे 2003 तक शाला में होंगे।
2. यह सुनिश्चित किया जाये कि सन् 2007 तक 5 वर्ष के बच्चे अपनी प्राथमिक स्तर की पढ़ाई पूर्ण कर सकें।
3. यह सुनिश्चित किया जाये कि सन् 2010 तक 8 वर्ष के बच्चे अपनी प्रारंभिक स्तर की पढ़ाई पूर्ण कर सकें।
4. गुणवत्ता पूर्ण शिक्षण पर जोर।
5. सामाजिक वर्गभेद व लिंग आधारित भेदों को प्राथमिक स्तर पर 2007 तक तथा प्रारंभिक स्तर पर 2010 तक जोड़ा जायेगा।
6. सभी बच्चों का 2010 तक शाला में ठहराव सुनिश्चित किया जायेगा।

  1. उच्च प्राथमिक स्तर तक सभी की पहुँच सुनिश्चित करना।
  2. नामांकन तथा शालाओं में ठहराव बढ़ाना व बच्चों के स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति में कमी लाना।
  3. प्राथमिक स्तर पर गुणवत्ता पूर्ण शिक्षण को बढ़ावा देना।
  4. ­अकादमिक पुर्नसंरचना को बढ़ावा देना।

अतएव आज जब हम विश्लेषण करते हैं तो हम पाते हैं कि कुछेक लक्ष्यों को छोड़कर प्रारंभिक शिक्षा के क्षेत्र में जस के तस ही हैं। चूँकि यह एक समग्र प्रयास है और इसे अलग से नहीं देखा जाना चाहिये। क्योंकि सर्वशिक्षा अभियान के ही एक अध्ययन में यह उल्लिखित किया गया है कि बच्चे के बीच में ही स्कूल छोड़ने के प्रमुख कारण क्या हैं? ये कारण निम्न हैं।

चार्ट क्र. - 1, बच्चे के स्कूल छोड़ने के कारक

  • बाल आश्रम
  • छोटे भाई-बहिनों को सम्हालना
  • पशु चराना
  • आर्थक स्थिति ठीक ना होना
  • शैक्षणिक सुविधाओं का अभाव
  • सामाजिक मान्यता
  • विकलांगता
  • स्कूली वातावरण का ना भाना
  • पलायन
शिक्षा की गुणवत्ता

अप्रशिक्षित शिक्षकों की संख्या और प्रतिषत

स्तर

कुल शिक्षक

अप्रशिक्षित शिक्षकों की
संख्या और प्रतिशत

प्राथमिक

171020

82903 (48 प्रतिशत)

उच्च प्राथमिक

72988

27995 (38 प्रतिशत)

योग

244008

110898 (45 प्रतिशत)

स्त्रोत - सर्व शिक्षा अभियान

शिक्षा की गुणवतता से आशय यही नहीं कि शिक्षक महज रोचक तरीके से शिक्षण करे अपितु शाला भवन, पुस्तकालय और खेल का मैदान, शिक्षकों का प्रशिक्षण, बैठने के लिये पर्याप्त जगह, शिक्षक विद्यार्थी अनुपात, पर्याप्त शौचालय (बालक-बालिका के लिये पृथक-पृथक) आदि व कुछ और बातें यथा शिक्षकों का व्यवहार व सामाजिक समरसता में कमी आदि ऐसी बाते हैं जो कि गुणवत्ता पूर्ण शिक्षण में कमी के प्रमुख कारक हैं। सर्वशिक्षा अभियान व ऐसी कई समानांतर संरचनाओं का ढिण्ढौरा तो खूब पीटा गया परन्तु पहल में अभी भी कमी बाकी है। वर्तमान में प्रदेश में प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्तर के क्रमश: 48 व 38 प्रतिशत शिक्षक अप्रशिक्षित हैं यानि लगभग आधे शिक्षक अप्रशिक्षित हैं तो हम शिक्षा की गुणवत्ता का अंदाजा लगा सकते हैं। और जो शिक्षक प्रशिक्षित हैं उनके अनुवर्तन की कोई भी ठोस योजना सरकार के पास नहीं हैं और ना ही उन्हें अद्यतन बनाये रखने की कोई क्रियाविधि ही सरकार के पास है। और जो प्रशिक्षण दिया जा रहा है उसकी विषयवस्तु क्या है? यह भी एक प्रश्न है या केवल लक्ष्य पूरा करने के लिये प्रशिक्षित होने का लेबल चस्पा किया जा रहा है।

शिक्षक – विद्यार्थी अनुपात

स्तर

शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात

प्राथमिक

48

उच्च प्राथमिक

36.8

स्त्रोत - सर्व षिक्षा अभियान

इसके अलावा हमें यह भी देखना होगा कि प्राथमिक स्तर पर शिक्षक-शिक्षार्थी का अनुपात कितना है जो कि एक महत्वपूर्ण कारक हैं। स्कूल के मापदण्ड़ एवं मानक कहते हैं कि प्राथमिक स्तर पर प्रति 30 बच्चों पर एक तथा माध्यमिक स्तर पर प्रति 35 बच्चों पर एक शिक्षक की अनिवार्यता होना ही चाहिये परन्तु वर्तमान में प्रदेश में प्राथमिक स्तर पर प्रति 48 तथा माध्यमिक स्तर पर प्रति 36.8 द्यार्थियों पर एक शिक्षक की उपलब्धता है। अतएव प्राथमिक स्तर पर यह अनुपात 18 की संख्या में अधिक है यानि 50 प्रतिशत से ज्यादा, जबकि प्राथमिक स्तर ही बच्चों को व्यक्तिगत रूप से ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है। इसके अलावा प्रदेश की 52.52 प्रतिशत यानि 12,760 माध्यमिक शालाओं के पास अपना स्वयं का भवन नहीं है तथा प्रदेश की 2.70 प्रतिशत यानि 2197 प्राथमिक शालाओं के पास अपना स्वयं का भवन नहीं है। चूँकि शिक्षा गारंटी जैसी वैकल्पिक संरचनाओं में तो भवन का प्रावधान ही नहीं रखा गया था और इसमें सरकार ने समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित कराकर अपना पल्ला झाड़ने की अभूतपूर्व कोशिष करनी शुरू की थी तो यह स्थिति तो बननी ही थी। यानि सरपंच की चौपाल हो या गाय बांधने की सार, गरीबों के बच्चे तो कहीं भी पढ़ाये जा सकते हैं।यह नजरिया घातक रहा और इसने शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह लगाये। इस स्थिति को ये ऑंकड़ें और स्थापित करते हैं कि प्रदेश की 3287 शालायें इस समय जर्जर स्थिति में हैं और उनमें बच्चे शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर हैं।

मूलभूत सुविधाओं की स्थिति

स्तर

भवन की अनुपलब्धता

जर्जर स्थिति में भवन

खेल मैदान की अनु.

पेयजल की अनु.

शौचालयों की अनु.

बालिका शौचा­की अनु.

प्राथमिक

2197
(2.70 प्रतिशत)

3287
(4.04 प्रतिशत)

48900
(60.12 प्रतिशत)

20031
(24.63 प्रतिशत)

39026
(47.98 प्रतिशत)

56866
(69.91 प्रतिशत)

उच्च
प्राथमिक

12760
(52.52 प्रतिशत)

1544
(6.35 प्रतिशत)

15413
(63.44 प्रतिशत)

9643
(39.69 प्रतिशत)

14382
(59.20 प्रतिशत)

15413
(63.44 प्रतिशत)

एक नजर मूलभूत सुविधाओं पर भी दौड़ानी आवश्यक है। आज प्रदेश की प्राथमिक व माध्यमिक स्तर की क्रमश: 48900 (60.12 प्रतिशत) तथा 15413 (63.44 प्रतिशत) शालाओं में खेल का मैदान नहीं है। प्रदेश की 24.63 प्रतिशत प्राथमिक शालाओं तथा 63.44 प्रतिशत् माध्य. शालाओं में पेयजल की अनुपलब्धता है सके चलते बच्चों को या तो अपने कांधे पर बॉटल लेकर जाना होता है या फिर प्यासे ही पढ़ना पड़ता है। यह समस्या अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में है जिससे यह भी स्पष्ट है कि इस समस्या से अधिकाधिक रूप से गरीब व वंचित वर्ग के बच्चों को ही दो-चार होना पड़ता है। इसी प्रकार प्रदेश की 47.98 प्रतिशत प्राथ. शालाओं तथा 59.20 प्रतिशत माध्य. शालाओं में शौचालयों की अनुपलब्धता है साथ ही इसी से जुड़ी एक और समस्या वह यह कि बालिका शिक्षा प्रोत्साहन को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाले इस राज्य में प्राथमिक व माध्यमिक स्तर की क्रमष: 56866 (69.91 प्रतिशत) तथा 15413 (63.44 प्रतिशत) शालाओं में बालिकाओं के लिये पृथक से शौचालय की व्यवस्था नहीं है। इसके अलावा कुछ और अप्रत्यक्ष कारक हैं जिन्हें पहचाना तो गया है परन्तु जिन्हें मापा नहीं जा सकता है जैसे कि शिक्षकों का व्यवहार, बच्चों से मारपीट, छुआछूत आधारित भेदभाव आदि कारक भी बच्चे के गुणवत्ता पूर्ण शिक्षण में बाधक हैं।

मध्यान्ह भोजन योजना

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण व अन्य कई अध्ययनों से यह बात लगातार सामने आती रही है कि बच्चों को ना मिलने वाला उचित स्वास्थ्य व पोषण का स्तर भी बच्चों का शाला से दूर रखने में मददगार है। मध्यप्रदेश के ही मानव विकास प्रतिवेदन 2002 के अनुसार प्रदेश में कम वजन के 58.4 प्रतिशत तथा 53.4 प्रतिशत बच्चे कम ऊँचाई के पाये गये। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार प्रदेश के तीन चौथाई (74.1 प्रतिशत) आदिवासी बच्चे कम वजन के तथा (73.4 प्रतिशत) बच्चे कम ऊँचाई के पाये गये। इसके अलावा 42 प्रतिशत बच्चे गंभीर स्वास्थ्य समस्या से ग्रसित हैं। इन्हीं स्थितियों को ध्यान में रखते हुये इस योजना की शुरूआत की गई । नि:संदेह यह योजना एक लोककल्याणकारी योजना के रूप में सामने आई और इसने स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में नामांकन भी बढ़ाया और बहुत हद तक ठहराव भी किया। परन्तु यह योजना लड़खड़ा गई और अपने अभीष्ट उद्देश्यों की पूर्ति में कहीं अटक गई। आज भी प्रदेश की 61058 यानि 75.06 प्रतिशत प्राथमिक शालाओं में मध्यान्ह भोजन योजना के लिये पृथक रसोईघर नहीं है। प्रदेश की 20031 शालाओं में पेयजल की कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। सामाजिक समरसता का उद्देश्य पाने में भी यह योजना नाकाम रही क्योंकि रसोईयों के चयन में भी दलितों व विशेषत: वंचित वर्गों को तवज्जो नहीं दी गई। सवर्णों और निम्न जातियों के बीच के अंतर को पाटने में भी यह योजना परवान ना चढ़ पाई और इसके उदाहरण बुंदेलखंड़ और बघेलखंड़ अंचल हैं। आदिवासी क्षेत्रों में तो महीनों से राशन नहीं पहुँच पा रहा है और शालाओं के ना खुलने पर मध्यान्ह भोजन का ना मिलना आम बात है। प्रदेश में आ रही कुछ चुनौतियाँ

1.   शालाओं में पृथक रसोई घर का अभाव।
2.   सामाजिक समरसता बढ़ाने की कोई स्पष्ट क्रियाविधि नहीं।
3.   संबंधित विभागों में समन्वय का अभाव।
4.   एकशिक्षकीय शालाओं में शिक्षण ना होना।
5.   बजट का अभाव।
6.   आदिवासी अंचलों में खाद्यान्न का ना पहुँचना।

पालक-शिक्षक संघ

मध्यप्रदेश जन शिक्षा अधिनियम में समुदाय की जुगलबंदी को पित करने के उद्देश्य से पालक शिक्षक संघ की संकल्पना लाई गई। पा.शि.सं. का मुख्य उद्देश्य नामांकन के साथ -साथ, स्कूल प्रबंधन तथा शिक्षा संबंधित मुद्दों को ग्रामसभा में प्रस्तुत करना, जनशिक्षा योजना तथा प्रतिवेदन तैयार करना, शाला के लिये धनसंग्रह करना आदि। मूल रूप से यह शिक्षा की अपनी जिम्मेदारी से बचने की एक साजिश है। वर्तमान में मध्यप्रदेश में 104676 पा.शि.सं. गठित किये जा चुके है लेकिन वास्तविकता यही है कि अधिकतर पा.शि.सं. निष्क्रिय हैं। प्रदेश के अधिकांश पा.शि.सं. के सदस्यों को यह नहीं मालूम है कि वे पा.शि.सं. के सदस्य हैं तो हम इन पा.शि.सं. के हतर कार्य करने की व्याख्या को सुपरिभाषित कर सकते हैं। साथ ही इनके क्षण व जन शिक्षा योजना व प्रतिवेदन भी संदेह के घेरे में है। हाँ कई जगहों पर यह राजनीतिक अखाड़ों के रूप में अवश्य उभरे हैं। देखा ह भी देखा गया है कि पा.शि.सं. में महिलाओं की गीदारी अतिनिम्न है।

वर्ष 2006-07 के लिये इस योजना का बजट 393 करोड़ रूपये रखा गया है। यदि विगत वर्ष (2005-06) के नामांकित बच्चों की संख्या ही लें तो प्रदेश के 1,12,74071 बच्चों के लिये प्रतिदिन 2.00 रूपये का व्यय मानें तो वर्ष के 200 दिवस में यह व्यय लगभग 450 करोड़ का आता है अतएव यहाँ पर हम 57 करोड़ रूपये का सीधा अंतर देख सकते हैं । यहाँ ज्ञात हो कि सूखा प्रभावित जिलों में गर्मी की छुट्टियों में दिया जाने वाला मध्यान्ह भोजन का व्यय सम्मिलित नही किया गया है।

साक्षरता

वर्तमान में प्रदेश की साक्षरता दर 64.11 प्रतिशत है जो कि राष्ट्रीय स्तर को लगभग छू रही है। यह ऐतिहासिक उपलब्धि रही है परन्तु क्या यह असल स्थिति है ? यह एक जाँच का विषय है। प्रदेश में पढ़ना-बढ़ना समितियों का हश्र क्या हुआ है, यह देखना होगा। 10 वीं पंचवर्षीय योजना के एप्रोच पेपर के अनुसार 2012 तक महिला साक्षरता का लक्ष्य पूर्ण किया जाना है लेकिन 2006 के अंत में यह असंभव सा दिखता है। क्योंकि वर्ष 2001 में महिला साक्षरता का प्रतिशत 50.28 था जो कि स्वातंत्रयोत्तर काल की बड़ी उपलब्धि मानी जाती है, वह अगले उसका अगले 06 वर्षों में शत-प्रतिशत हो पाना संदेहास्पद है क्योंकि उस अनुपात में प्रयास नहीं किये जा रहे हैं।

तालिका क्र.- मध्यप्रदेश साक्षरता जानकारी

 

साक्षरता
दर

साक्षरता
दर

साक्षरता में
दशकीय वृध्दि

(1991)

(2001)

(1991 -2001)

पुरूष

58.54

76.8

18.26

महिला

29.35

50.28

20.93

योग

44.67

64.11

19.44

स्त्रोत - जनांकिकीय - 1991 एवं 2001

 

 

 

 

 

 

तालिका क्र- ज़ाति आधारित
साक्षरता जानकारी

अजा

42

अजजा

62

ग्रामीण महिला

4296

स्त्रोत - जनांकिकीय - 2001

चुनौतियाँ

  • निम्न नामांकन तथा उच्च ड्रॉप आऊट दर
  • सामाजिक समता
  • बालिका शिक्षा
  • पोषण का गिरता स्तर
  • बजट का अभाव
  • समान्तर संरचनाएं
  • घुमंतू तथा विमुक्त प्रजातियाँ
  • पलायन
  • छात्र-शिक्षक पर्याप्तानुपात
 
     
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