डीएलएचएस के बारे में
भारत में आबादी तथा स्वास्थ्य संबंधी सर्वेक्षणों के सिलसिले में डीएलएचएस (परिवार को मिल रही सुविधाओं का जिला स्तरीय सर्वेक्षण) सबसे बड़े सर्वेक्षणों में गिना जाता है। इस सर्वेक्षण में देश के सभी जिलों के करीब सात लाख परिवारों को शामिल किया गया है। केंद्रीय परिवार तथा स्वास्थ्य कल्याण मंत्रालय ने वर्ष 1997 में पहला डीएलएचएस करवाया था ताकि स्वास्थ्य सूचकांकों से संबंधित जिला स्तरीय जानकारियां नीति निर्धारकों तथा उन्हें संचालित करने वाले प्रभारी व्यक्तियों तक पहुंचाकर योजना बनाने, उनकी निगरानी करने तथा उनका मूल्यांकन करने की विकेंद्रित व्यवस्था बनाने में मदद की जा सके।
इसी सिलसिले में वर्ष 1998-99 में डीएलएचएस-1 तथा वर्ष 2002-04 में डीएलएचएस-2 के बाद डीएलएचएस-3 को मातृ तथा बाल स्वास्थ्य, परिवार नियोजन तथा अन्य प्रजनन व स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं के सिलसिले में जरूरी आकलन के लिए कराया गया। पहली इस डीएलएचएस-3 सर्वेक्षण के जरिए जनसंख्या आधारित सुविधा सर्वेक्षण को अंजाम दिया गया। इसके तहत सभी जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों व उप स्वास्थ्य केंद्रों को भी सर्वेक्षण में शामिल किया गया। इसके लिए मध्यप्रदेश में दिसंबर 2007 से मई 2008 के बीच 51,419 परिवारों का सर्वेक्षण किया गया।
नवजात की देखभाल क्यों ?
नवजात शिशुओं की मौत को रोकने तथा उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए नवजात शिशुओं की स्वास्थ्य संबंधी देखभाल बेहद जरूरी हो गई है। दुनिया भर में होने वाली नवजात शिशुओं की मौतों में से 30 प्रतिशत यानी करीब 12 लाख मौतें भारत में होती हैं (यह अनुमान आरजीआई इंडिया, 2008 तथा एसआरएस द्वारा किए गए अध्ययनों व भारत की जनसंख्या अनुपात पर बनाए गए तकनीकी ग्रुप द्वारा लगाए गए जनसंख्या अनुपात के आकलन पर आधारित है); भारत में वर्ष 2005-06 में नवजात शिशुओं की मौत की दर 39 प्रति हजार थी (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-3) 2005-06, भारत, खंड 1, जनसंख्या विज्ञान का अंतरराष्ट्रीय संस्थान, मुंबई, 2007 के आंकड़ों पर आधारित)।
नवजात शिशु की अवधि
आम तौर पर नवजात शिशु की अवधि उनके जन्म से 28 दिन तक की मानी जाती है।
नवजात मृत्यु दर
इससे मतलब प्रति हजार उन नवजात शिशुओं की संख्या है जिन्होंने जन्म से लेकर 28 दिनों की अवधि में दम तोड़ दिया हो।
जाहिर है कि मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य के मौजूदा हालात नवजात शिशुओं की स्वास्थ्य संबंधी देखभाल की जरूरत पर जोर देते हैं। मध्यप्रदेश नवजात शिशुओं की मृत्यु दर 44.9 है (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, (एनएफएचएस-3), 2005-06, भारत)। डीएलएचएस-3 के सर्वेक्षण नतीजों से इन बढ़ी हुई मृत्यु दर के कारणों का खुलासा होता है। इसमें से 42 प्रतिशत मौतों के लिए शिशुओं का जन्म के समय कम वजन का होना प्रमुख कारण है। गौरतलब है कि अगर जन्म के समय नवजात का वजन कम हो तो पहले माह के दौरान उसके जीवित बचे रहने की संभावना बेहद कम हो जाती है। मध्यप्रदेश में वर्ष 2005-06 में जन्में बच्चों में 23.4 प्रतिशत नवजात शिशुओं का वजन ढाई किलोग्राम से भी कम था।
| मध्यप्रदेश के लिए एनएफएचएस-3 के स्वास्थ्य मानक नवजात मृत्यु दर |
44.9 |
| अपनी प्रजनन अवधि के दौरान (15-49वर्ष) महिलाओं में एनीमिया का प्रभाव |
58 |
| जन्म के समय कम वजन |
23.4 |
मध्यप्रदेश में नवजात शिशुओं के कम वजन होने का मुख्य कारण गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर में एनीमिया का प्रभावी होना है। गर्भावस्था के दौरान महिला के स्वास्थ्य की देखरेख बेहद जरूरी होती है, क्योंकि यही वह अवधि होती है जिसमें भ्रूण अवस्था से शिशु जन्म लेने की अवस्था तक विकसित होता है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि गर्भावस्था की पहली तिमाही के दौरान महज 33.9 प्रतिशत महिलाओं की ही प्रसव पूर्व देखभाल हो पाई। ग्रामीण क्षेत्रों में तो ऐसी महिलाओं का प्रतिशत घटकर 27.9 तक हो गया है। इसी तरह कुल 61.8 प्रतिशत माताओं को ही वर्ष 2007-08 के दौरान किसी भी तरह की प्रसवपूर्व देखभाल की सुविधा नसीब हो पाई (परिवार को मिल रही सुविधाओं का जिला स्तरीय सर्वेक्षण, भारत, डीएलएचएस-3, 2007-08)। इसका मतलब यह हुआ कि 38.2 प्रतिशत महिलाओं को प्रसव संबंधी संभावित कठिनाईयों का पता लगाने व उनसे बचाव के लिए जरूरी किसी भी तरह की प्रसव पूर्व देखभाल या परीक्षण की सुविधा नहीं मिल पाई।
मध्यप्रदेश की 41 प्रतिशत महिलाओं में उनके प्रजनन अवधि (15-49 वर्ष) के दौरान एनीमिया का सीमित प्रभाव रहा, वहीं 14.1 प्रतिशत महिलाओं में यह प्रभाव मध्यम रहा जो सही समय पर उपचार न मिलने की दशा में मातृत्व व नवजात मृत्यु क कारण बन सकता है (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-3) 2005-06, भारत, खंड 1, जनसंख्या विज्ञान का अंतरराष्ट्रीय संस्थान, मुंबई, सितंबर 2007 के मुताबिक)। देश की करीब 58 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं एनीमिया के विभिन्न स्तरों से पीड़ित हैं।
जाहिर है कि उपरोक्त कारणों से यह कहा जा सकता है कि राज्य में मातृत्व व नवजात की देखरेख की वर्तमान लचर हाल को देखते हुए नवजात अवधि के दौरान शिशु की देखभाल की सुविधाएं बढ़ाए जाने की जरूरत है कि ताकि प्रदेश में नवजात व शिशु मृत्यु की बढ़ती दर पर रोक लगाई जा सके।
नवजात शिशु की देखभाल की स्थिति तथा डीएलएचएस-3
जन्म के 24 घंटों के भीतर नवजात की जांच:
किसी भी शिशु के जन्म के 24 घंटों के भीतर उनकी स्वास्थ्य जांच की जानी बेहद जरूरी है ताकि किसी भी तरह की जन्म संबन्धी समस्या या बीमारी का पता लगाया जा सके और उसका समय रहते उपचार किया जा सके। लेकिन प्रदेश में ऐसे बच्चों की संख्या कम है जिन्हें जन्म के 24 घंटों के भीतर ही (सर्वे के दौरान मिले नवजात शिशु के जन्म के आखिरी आंकड़े के मुताबिक) जरूरी स्वास्थ्य संबंधी जांच की सुविधा नसीब हो पाई। प्रदेश के 44.4 प्रतिशत जिलों (20 जिले) में 35 प्रतिशत से भी कम शिशु ऐसे हैं जिन्हें जन्म के पहले दिन ही स्वास्थ्य संबंधी देखभाल मिल गई हो, यह समय बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रदेश के डिंडौरी सरीखे आदिवासी बहुल जिले में तो जन्म के पहले 24 घंटे में स्वास्थ्य जांच की सुविधा पाने वाले शिशुओं की संख्या महज 13.7 प्रतिशत रही।
मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में हालात और भी खराब हैं। प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रा में पैदा होने वाले हर 1000 शिशुओं में 65 की मौत शुरुआती 28 दिनों के भीतर ही हो जाती है। प्रदेश की राजधानी भोपाल के ग्रामीण क्षेत्रों तक में महज 20 प्रतिशत शिशु ऐसे मिले जिन्हें जन्म लेने के 24 घंटों के भीतर स्वास्थ्य जांच की सुविधा नसीब हुई हो। यह आंकड़ा प्रदेश के 33 जिलों में 40 प्रतिशत से भी कम है। यहां सबसे पुख्ता तथ्य है कि प्रदेश के सभी 48 जिलों में से एक में भी ऐसा कोई ग्रामीण क्षेत्र नहीं है जहां जन्म के 24 घंटों के भीतर स्वास्थ्य जांच किए जाने वाले शिशुओं की संख्या 60 प्रतिशत से ऊपर हो। हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में भारत सरकार ने भी इस बात पर जोर दिया था कि प्रदेश में नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए नए तरह की कोशिशों की बहुत ज्यादा जरूरत है।
मध्यप्रदेश के 37 जिलों, जिनमें भोपाल व ग्वालियर शामिल हैं में ऐसे शिशुओं की संख्या 50 प्रतिशत से भी कम है जिन्हें जन्म लेने के 10 दिन के भीतर किसी तरह की स्वास्थ्य जांच या देखभाल संबंधी सुविधा मिली हो (सर्वे के दौरान मिले नवजात शिशु के जन्म के आखिरी आंकड़े के मुताबिक)।
जाहिर है कि मध्यप्रदेश की नई विकास संबंधी नीति में नवजात शिशुओं की देखरेख का मसला जोड़ा जाना बेहद जरूरी है। 11वीं योजना के दस्तावेज के मुताबिक प्रदेश में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में कमी लाना सबसे महत्वपूर्ण कामों में से एक माना गया है। मध्यप्रदेश के 11वीं योजना के दस्तावेज में प्रदेश की बढ़ती जनसंख्या के मुताबिक यह सुनिश्चित करने का वादा किया गया है कि संस्थागत प्रसव तथा नवजात की देखभाल की बढ़ती मांग के मुताबिक स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाई जाएंगी। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में नए स्वास्थ्य संगठन स्थापित किए जाएंगे तथा सभी प्राथमिक स्वास्थ्य संगठनों को भवन भी मुहैया कराए जाएंगे। लेकिन इन तमाम वादों के बावजूद डीएलएचएस-3 के मुताबिक मध्यप्रदेश में अभी भी नवजात शिशुओं की देखभाल की स्थिति बेहद नाजुक है।
स्तनपान की स्थिति:
हालांकि नवजात शिशुओं को स्तनपान कराना भारत व मध्यप्रदेश में सामान्य है, लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि मध्यप्रदेश में वर्ष 2007-08 में महज 43.1 प्रतिशत शिशु ही ऐसे थे जिन्हें जन्म लेने के एक घंटे के भीतर ही स्तनपान कराया गया हो। लेकिन मध्यप्रदेश के कई जिलों में स्थिति अभी भी बेहद संवेदनशील है। टीकमगढ़ व श्योपुर जिलों में जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान कर पाने वाले शिशुओं की संख्या महज 25 प्रतिशत है। इसका मतलब यह है कि इन जिलों के 75 प्रतिशत शिशु उस नवदुग्ध से वंचित रह जाते हैं जो उनके भीतर तमाम तरह की बीमारियों से लड़ने व बचाव के लिए प्रतिरोधक क्षमता पैदा करने के लिए जरूरी है। प्रदेश के 38 जिलों में बमुश्किल 50 प्रतिशत शिशुओं को ही जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान कराया जाता है। सिर्फ बैतूल जिले में 60 प्रतिशत से ज्यादा (67.9 प्रतिशत) शिशुओं को जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान मिल पाता है।
नवजात की देखभाल के लिए 24 घंटे सुविधा वाले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र:
मध्यप्रदेश के 278 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में से महज 216 ही ऐसे हैं जहां नवजात शिशुओं की देखभाल के 24 घंटे की सुविधाएं मौजूद हैं। इनमें इंक्यूबेटर सरीखी सुविधाएं भी शामिल हैं। डीएलएचएस-3 की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में अभी भी 62 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में ऐसी सुविधाएं नहीं है जिनसे वे नवजात शिशुओं की देखभाल कर सकें।
नवजात के लिए वार्मर या इंक्यूबेटर की सुविधा वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र:
मध्यप्रदेश में केवल 8.23 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ही ऐसे हैं जिनमें नवजात शिशुओं की देखभाल व रखरखाव के लिए वार्मर या इंक्यूबेटर सरीखी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। मध्यप्रदेश में 1142 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में से केवल 94 स्वास्थ्य केंद्रों में ही नवजात शिशुओं के लिए इंक्यूबेटर की सुविधा मौजूद है।
बीते एक माह में नवजात शिशुओं की देखभाल की स्थिति :
डीएलएचएस-3 की रिपोर्ट के मुताबिक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में 27672 संस्थागत प्रसव कराए गए लेकिन पिछले एक महीने में ऐसे शिशुओं की संख्या महज 25687 रही जिन्हें पर्याप्त रखरखाव की सुविधा मुहैया कराई गई। इसका मतलब यह हुआ कि संस्थागत प्रसव के बावजूद 1985 शिशुओं को किसी भी तरह की देखरेख की रखरखाव की सुविधा नहीं मुहैया कराई गई।
एएनएम के लिए आईएमएनसीआई प्रशिक्षण :
मध्यप्रदेश में 3039 की मंजूर एएनएम पदों में से महज 523 एएनएम को ही बीते पांच वर्षों की अवधि में आईएमएनसीआई (राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत नवजात व शिशु रोग एकीकृत प्रबंधन) का प्रशिक्षण दिया गया है। यहां यह बताना भी उल्लेखनीय होगा कि प्रदेश में नर्स व दाईयों के 3039 मंजूर पदों में से महज 901 पद ही भरे जा सके हैं, 2138 पद अभी भी रिक्त हैं। |