PovertyMedia and Rights Food Security Livelihood Disability Women Rights Globalisation Health Social Exclusion Education Child Rights Environment Right to Information and Governance

 

     
 
| Print this Page
 
     
  YOU ARE HERE: Home > Infopack > Madhya Pradesh Mein Krishi  
     
  मध्यप्रदेश में कृषि  
     
 

मध्यप्रदेश के लिए कृषि वास्तविक अर्थों में जीवन रेखा रही है। विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे जब पहले ''राज्य'' पर निबंध लिखते थे तो उस निबंध का पहला वाक्य यही होता था कि मध्यप्रदेश एक कृषि प्रधान राज्य है, यहां की तीन चौथाई जनसंख्या कृषि और कृषि से जुड़े व्यवसाय के जरिये जीवनयापन करती है और यही व्यावसायिक एकरूपता समाज को वास्तव में एक सूत्र में पिरोने का काम करती है। परन्तु आज की स्थिति में निश्चित रूप से निबंध की शुरूआती पंक्तियां राज्य के वास्तविक रूप को पेश नहीं करती है।

अब कृषि जीवनयापन की सहज संस्कृति नहीं बल्कि एक चुनौतीपूर्ण जोखिम भरा काम बन चुका है। नेशनल सेम्पल सर्वे आर्गनाइजेशन द्वारा किसानों की कर्जदारी (ऋणग्रस्तता) पर किया गया अध्ययन यह बताता है कि मध्यप्रदेश के कुल 64 लाख किसानों में से 32 लाख किसान कर्जे के बोझ तले दबे हुये हैं। हर किसान पर औसतन 14128 रूपये का कर्ज है। बैंक की प्रक्रिया और अमानवीय वसूली प्रक्रिया के कारण उनका सरकारी वित्तीय संस्थानों से विश्‍वास कम हुआ है। अब भी 40 प्रतिशत कर्ज गैर-सरकारी स्रोतों से किसानों के प्रदेश में मिलता है।

अतीत की बात करना एक चुनौतीपूर्ण स्वर्णयुग की चर्चा करने जैसा है। वर्तमान यह बताता है कि मध्यप्रदेश में भी चूंकि सरकार ने आर्थिक उदारवाद की नीतियों को नीतिगत रूप से स्वीकार कर लिया है इसलिये कृषि को भी अब संवेदनशील नजरिये से देखे जाने की बजाये खुले बाजार के एक पक्ष के रूप में ही देखा जायेगा। किसान अब स्वयं एक उत्पादक के बजाये बजार का उपभोक्ता है। हम संदर्भ लें मध्यप्रदेश के वित्तमंत्री के वर्ष 2006-2007 के बजट भाषण का। जिसमें वे कहते है। कि ''कृषि के क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ाने के लिये अब मंहगे आदानों का महत्व बढ़ गया है परन्तु मौसम की अनश्चितता के कारण कृषि में अस्थिरता बढ़ रही है। अर्थव्यवस्था के वैश्विकीकरण् के कारण जहां एक तरफ विकास की नई संभावनायें उपलब्ध हुई है, वहीं नई चुनौतियां भी मिल रही है।''

वर्ष राज्य के सकल घरेलू उत्पादन में अंश (प्रतिशत) कृषि पर निर्भर जनसंख्या
(प्रतिशत)
1960-61 59.9 79.3
1970-71 55.9 79.4
1980-81 43.6 76.2
1990-91 38.2 75.3
2000-01 25.8 72.9

स्वतंत्रता के बाद विकास का अध्ययन करने के एक स्पष्ट सीख उभकर आती है। वह सीख यह है कि देश में विकास के अवसरों और संसाधनों का एक समान वितरण नहीं हुआ है। किसी राज्य को ज्यादा फायदा मिल तो किसी को कम। एक तथ्य के रूप में हम वर्ष 2000-01 के (तत्कालीन चालू मूल्य) राज्य मे प्रतिव्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 10,803 रूपये था। जबकि यही उत्पाद पंजाब में 25,048 रूपये और 27,742 रूपये यानी दुगना था। मध्यप्रदेश प्राकृतिक संसाधनों और कृषि क्षेत्र में संभावनाओं के मामले में कभी कमतर नहीं रहा किन्तु उन संभावनाओं का उपयोग करने में यह राज्य लगातार पिछड़ता चला गया।

उपरोक्त तालिका बताती है कि 1960-61 में राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में 59.9 प्रतिशत योगदान कृषि क्षेत्र से आता था और तब 79.3 प्रतिशत जनसंख कृषि पर निर्भर थी। कृषि का योगदान तो घटते-घटते 25.8 प्रतिशत (यानी लगभग 32 फीसदी कम हुआ) पर आ गया परन्तु इस व्यवसाय पर आज भी 72.9 प्रतिशत जनसंख्या निर्भर है, इसमें केवल 8.6 प्रतिशत की कमी आई। 1960 से 1980 के बीच के समय में कृषि में विकास की दर लगभग 1 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही जबकि देश में कृषि क्षेत्र का विकास दो प्रतिशत (यानी दुगनी दर से) की दर से हो रहा है।

मध्यप्रदेश की कृषि के सामने सवाल –

स्वाभाविक सा निष्‍कर्ष यह है कि जरूरत के अनुरूप कृषि के विकास के लिये राज्य और समाज दोनों के स्तर पर सघन प्रयास नहीं हुये। राज्य ने स्वयं नवाचार करने के बजाये आयातित तकनीकों और उत्पादन को विस्तार देने की रणनीति अपनाई; तो वहीं दूसरी ओर समाज ने अपनी जरूरत को पूरा करने के लिये राज्य पर दबाव नहीं बनाया। अभी 10 वीं पंचवर्षीय योजना चल रही है और सरकार का लक्ष्य है कि इस योजना के दौरान प्रदेश में खाद्यान्न उत्पादन 178.50 लाख टन तक बढ़ाना है। वर्ष 2003-04 की स्थिति में प्रदेश में यह उत्पादन 158.72 लाख टन था। इसी तरह मोटे अनाज के उत्पादन में 139.54 लाख टन वृध्दि क़ा लक्ष्य तय किया गया है और दलहन का उतपादन 38.96 लाख टन किया जायेगा। किन्तु जब व्यावहारिक स्तर पर नीतियों का विश्लेषण करते है। तो दो बातें उभरकर सामने आती हैं; पहली बात तो यह कि सरकार खाद्यान्न उत्पादन को प्रोत्साहित नहीं कर रही हैं बल्कि वह चाहती है कि किसान कपास, सोयाबीन जैसी नकद फसलों के साथ उच्च और मध्यम वर्ग डीजल की जरूरत को पूरा करने के लिये जेट्रोपा का उत्पादन करें। इससे उसे आर्थिक लाभ होगा। वहीं दूसरी ओर सरकार खाद्यान्न, फल और सब्जी उगाने के लिये अनुबंध खेती को नीतिगत रूप से स्वीकार कर रही है। साथ ही अब निजी कम्पनियाँ भी कृषि के क्षेत्र में उतर सकती हैं। दोनों बिन्दु एक दूसरे से जुड़े हुये हैं। किसान पैसा कमाये और अनाज खरीदने के लिये बाजार जाये। शायद यह सच्चाई भूलना घातक होगा कि बाजार में धन का बहाव तेज करने के लिये हम खाद्य सुरक्षा और उत्पादन चक्र को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

जनसंख्या में वृध्दि के साथ-साथ प्रदेश की खाद्यान्न जरूरतें भी बढ़ी हैं परन्तु उत्पादन कम हो रहा है। 1960-61 से 2002-03 के बीच यह स्थिति साफ नजर आती हैं :-

उत्पादन प्रतिशत में
वर्ष
फसल उत्पादन 1960-61 1970-71 1980-81 1990-91 2002-03
अनाज 63.6 61.0 61.5 51.4 48.4
दालें 20.6 20.6 21.3 20.9 21.3
तिलहन 9.4 9.3 8.4 16.7 22.8
कपान 4.2 3.3 2.8 2.5 2.3
फल-सब्जी 0.8 0.6 0.8 4.4 3.8
कुल खाद्यान्न फसलें 85.7 83.0 84.4 77.0 72.1
कुल गैर खाद्यान्न फसलें 14.3 17.0 15.6 23.0 27.9

पिछले चालीस वर्षों में खाद्यान्न उत्पादन मध्यप्रदेश में कुल उत्पादन में लगातार घटता जा रहा है। 1960-61 में जहां प्रदेश में कुल कृषि उत्पादन का 63.6 फीसदी हिस्सा खाद्यान्न फसलों का होता था वह घटकर 48.4 प्रतिशत पर आ गया है। जबकि इसी दौर में गैर-खाद्यान्न फसलों का उत्पादन 14.3 फीसदी से बढ़कर 27.9 प्रतिशत हो गया है। अनाज में भी गेहूं और ज्वार के उत्पादन में भारी कमी आई है। बहरहाल 1960-61 में जहां सोयाबीन का उत्पादन शून्य प्रतिशत था वह 2002-03 में बढ़कर 17.6 प्रतिशत हो गया। कपास का उत्पादन भी कम हुआ है।

कृषि के आधुनिकीकरण से प्रदेश में अनाज, सब्जी, और फलों की उत्पादन लागत में वृध्दि हुई है। मध्यप्रदेश में व्यापक स्तर पर एकल फसल पध्दति अपनाई जाती रही हे। पिछले 30 सालों में अमेरिका से सोयाबीन का आयात हुआ और इसके कारण परम्परागत खाद्य फसलों (खरीफ) ज्वार, मक्का, कपास, तिल, मूंग, उड़द, मूंगफाली, अरहर, अरण्डी का क्षेत्रफल घटता चला गया। इसी कारण कपास और ज्वार, कपास और अरहर, ज्वार और अरहर जैसी अंतरवर्ती फसल पध्दति समाप्त हो गई। कपास का उत्पादन कुल फसल का हिस्सा 4.2 प्रतिशत से घटकर 2.3 प्रतिषत रह गया। यह केवल कपास का उत्पादन कम हो जाने का मामला नहीं है बल्कि यह सिध्द करता है कि अब कपास के कारण खट-खट करने वाले करघे भी थम रहे हैं।

सोयाबीन की चुनौती –

मध्यप्रदेश की जनसंख्या को आमतौर पर कुपोषित और कमजोर माना जाता रहा है। ऐसी स्थिति में सोयाबीन के उत्पादन के लिये मध्यप्रदेश एक उपयुक्त स्थान बना। इसमें 18 प्रतिशत तेल और 40 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। सोयाखली का निर्यात करके उद्योगपतियों को काफी लाभ मिला और सरकार ने भी विदेशी मुद्रा कमाई है। इसका कुछ तात्कालिक लाभ भी किसानों को मिला। इसे एकल फसल पध्दति में इस्तेमाल किया गया। जिसका किसानों पर भारी नकारात्मक प्रभाव पड़ा। लगातार एक ही फसल बार-बार लेते रहने के कारण मिट्टी राजोक्टोनिया, स्कलेरोशियम, फ्यूजेरियम, जैसी रोगजनक फफूंद से सवंमित होती चली गई। अब नये-नये कीट प्रदेश के किसानों पर आक्रमण कर रहे हैं। पत्ता गोभी का ब्लू-बीटल अब सोयाबीन के प्रमुख कीट के रूप में दर्ज किया जा रहा है। अब सोयाबीन की फसल के लिये रसायनों, कीटनाशकों और उर्वरकों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है जिससे किसानों का शुध्द लाभ घटता जा रहा है। माना यह जाता है कि सोयाबीन अन्य खाद्यान्न फसलों से ज्यादा उत्पादन और फायदा देता है किन्तु यह सच्चाई नहीं है, जैसे -

फसल उपज क्विंटल (प्रति हेक्टेयर) भाव प्रति (क्विंटल) कुल आय रूपये लागत खर्च (अनुमान) शुध्द लाभ (अनुमानित)
सोयाबीन 12 1200 14400 6000 8400
ज्वार 32 800 25600 10000 15600
मूंग 10 3000 30000 10000 20000
उड़द 12 3100 37200 12000 25000

कृषि की स्थिति –

मध्यप्रदेश में वर्ष 2004-05 में कुल 203 लाख हेक्टेयर भूमि का उपयोग कृषि के उद्देष्य से किया गया। इसमें से 24.4 प्रतिशत भूमि यानी लगभग 50 लाख हेक्टेयर जमीन सिंचित की जा सकी है मध्यप्रदेश में सकल और कुल सिंचित कृषि क्षेत्र की स्थिति इस तरह है

वर्ष कुल सिंचित क्षेत्र (हजार हेक्टेयर में) प्रतिषत
1960-61 924 5.2
1970-71 1481 7.4
1980-81 2332 11.5
1990-91 4314 18.5
2000-03 4735
24.0

 

अलग-अलग फसलें और सिंचाई (प्रतिशत सिंचित)
वर्ष गेहूं दलहन कपास धान
1970-71 15 6 2 14
1980-81 29 10 9 17
2000-03 98 36 35 22

मध्यप्रदेश में कृषि को फायदे का आजीविका साधन बनाने के लिये इसे सिंचित करने की सबसे खास जरूरत रही है किन्तु आश्चर्यजनक है कि चालीस वर्षों के दौरान सिंचित क्षेत्रफल 5 फीसदी से बढ़कर 24 फीसदी हो पाया।

मध्यप्रदेश सरकार ने दसवीं पंचवषर्वीय योजना में सिंचाई की जरूरत को महत्व देना शुरू किया। नवीनतम बजट दस्तावेज दर्ज करता है कि मानसून पर हमारी कृषि अर्थव्यवस्था की अत्याधिक निर्भरता के परिप्रेक्ष्य में सिंचाई विकास का महत्व स्पष्ट है। दसवीं पंचवर्षीय योजना अवधि में वृहद् परियोजनाओं के अन्तर्गत लगभग 5.80 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता निर्मित हो रही है। नौंवी पंचवर्षीय योजलना में 96000 हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता निर्मित की गई थी। जबकि अब सरकार 7 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचित बनाने का लक्ष्य तय कर रही है।

मध्यप्रदेष में अब 98 प्रतिशत फसल सिंचित है किन्तु दाल केवल 20 प्रतिशत और धान 22 फीसदी ही सिंचित है।

जोतों का आकार एक चुनौती -

मध्यप्रदेश में कुल जोतों की संख्या 66.37 लाख है। और औसतन एक किसान के पास ढाई हेक्टेयर कृषि भूमि है। छोटी जोत होने के कारण भूमि का उपचार नहीं हो पाया है और कृषि पध्दति में एकरूपता नहीं आ पाई है। पिछले चार दशकों में जोतों का यह औसत आकार भी कम हुआ है, जैसे -

वर्ष छोटा भूमि आकार (लाख) छोटा भूमि आकार (लाख) औसत आकार( हक्टेयर)
1961-62 22 लाख 19 लाख 4.1
1971-72 26 लाख 20 लाख 3.9
1980-81 33 लाख 19 लाख 3.4
1990-91 37 लाख 22 लाख 2.6
1995-96 41 लाख 24 लाख 2.3

1961-62 में प्रदेश के किसानों के पास औसतन 4.1 हेक्टेयर कृषि भूमि थी जो 1980-81 में 3.4 हेक्टेयर और 1995-96 में और ज्यादा घटकर 2.3 हेक्टेयर पर आ गई। इसी समय 40 फीसदी किसानों के पास औसतन 0.40 हेक्टेयर जमीन थी। प्रत्यक्ष रूप से इस स्थिति में नजर आता है कि प्रदेश में धीरे-धीरे छोटी जोतों वाले मजदूरों की संख्या बढ़ रही है। ग्रामीण श्रमिक सर्वेक्षण के सातवें दौर परिणामों से पता चलता है कि मध्यप्रदेश में जमीन रखने वोले कृषि मजदूरों की संख्या 1987 में 49 प्रतिशत से बढ़कर 1999-2000 में 57 प्रतिशत हो गई है। विश्लेषण कहता है कि छोटी जोत वाले किसान जमीन अनुत्पादकता के कारण श्रमिक मजदूर बनने के लिये मजबूर हो रहे हैं।

कृषि भूमि और उत्पादकता
मध्यप्रदेश में प्रति हेक्टेयर उत्पादन

फसल मध्यप्रदेश में प्रति हेक्टेयर उत्पादन भारत में प्रति हेक्टेयर उत्पादन भारत की अपेक्षा प्रदेश का उत्पादन (प्रतिशत में)
चावल 1058 किलो 2051 किलो 52
गेहूं 1867 किलो 2707 किलो 69
कपास 307 किलो 307 किलो 62
दाल 694 किलो 792 किलो 88
सोयाबीन 1130 किलो 1200 किलो 94

भारत की कुल पड़त भूमि का 19 प्रतिशत हिस्सा मध्यप्रदेश में आता हैं प्रदेश में फसल उतपादन की समयावधि 150 से 180 दिन होती है और वर्तमान में कुल 24 फीसदी कृषि भूमि ही सिंचित है। ऐसी स्थिति में पड़त भूमि का उपचार करने की बहुत बड़ी जरूरत हैं क्योंकि यदि यह उपचार नहीं किया गया तो जमीन के सतह के पानी और भू-जल दोनों को मिलाकर भी केवल 55 फीसदी जमीन की ही सिंचाई की जा सकेगी। इसके लिये सामुदायिक कृषि के सिध्दान्त का भी उपयोग किया जा सकता है। मध्यप्रदेश में एक हेक्टेयर कृषि भूमि पर 1058 किलो चावल का उत्पादन होता है जबकि भारत के स्तर पर औसतन 2051 किलो उत्पादन होता है। इतना ही नहीं गेहूं के मामले में प्रदेश भारत के औसत से 840 किलो कम उत्पादन होता हैं

सिंचाई के स्रोत

पिछले दो दशकों में जल संकट नित नये रूप लेकर समाज और राज्य के सामने आता रहा है। एक ओर तो प्रदेश में सिंचाई के साधन और संभावनायें किसानों के लिये अस्तित्व का सवाल बनी तो वहीं दूसरी ओर सिंचाई के जो संसाधन विकसित हुये उनसे यह लगता है कि सतही जल के उपयोग की प्रवृत्ति को किसान त्यागते गये हैं। मध्यप्रदेश में 1960-61 में नहर से 48 फीसदी और सतही जल से 61 प्रतिशत सिंचाई होती थी। जो 2002-03 में घटकर 29 प्रतिशत और 31 प्रतिशत पर आ गई। इसी दौर में भूजल का कृषि उपयोग 39 प्रतिशत से बढ़कर 69 प्रतिशत हो गया।

नई परिस्थितियों में मध्यप्रदेश सरकार ने खरीफ और रबी की फसलों को संरक्षित करने के लिए खेतों में तालाब बनाने की योजना शुरू की है। सरकार का मकसद है कि कृषि के लिए ज्यादा से ज्यादा सतही पानी का उपयोग हो और खतरे के निशान को पार कर चुके भूजल स्तर को पुर्नजीवित किया जा सके। वर्ष 2006-07 के बीच सरकार 20 हजार तालाब बनाने की योजना क्रियान्वित कर रही है।

सरकारी कोशिशें

जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए आईसोपाम योजना के अन्तर्गत वर्मी कम्पोस्ट खादपिट बनाने की प्रक्रिया शुरू की गई है। जितनी तेजी से रासायनिक खाद का उपयोग बढ़ा है उससे कृषि की लागत भी बढ़ी है। जंगल का मसला विवादित होने के कारण प्रदेश साढ़े तीन लाख पशुधन भी संकट में हैं, ऐसे में जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए नीतियों में व्यापक परिवर्तन लाना होगा।

कृषि का औद्योगीकरण और अनुबंध की खेती -

सरकार ने नौंवी पंचवर्षीय योजना में कृषि पर 5.63 प्रतिशत और सिंचाई-बाढ़ नियंत्रण व्यवस्था पर 13.56 प्रतिशत बजट की व्यवस्था की थी। दसवीं पंचवर्षीय योजन में कृषि क्षेत्र पर व्यय को ममूली तौर पर बढ़ाकर 6.28 प्रतिशत किया गया। बहरहाल सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण की मद में वृध्दि ज्यादा रही। अभी यह 19.10 प्रतिशत है। सरकार अब निजी क्षेत्र को कृषि क्षेत्र सौंपने के लिए तैयार दिख रही है। मध्यप्रदेश में अब इंडियन टोबैको कम्पनी (आईटीसी) ने ई-चौपालों की स्थापना की। तकनीक का उपयोग अब बाजार पर नियंत्रण करने का प्रयास शुरू हो चुका है। अब इंटरनेट पर पल-पल के दाम ई-चौपालों पर बताये जाते हैं। ई-चौपाल पर आईटीसी कम्पनी किसानों से बेहतर गुणवत्ता का अनाज खरीद रही है। यहां सरकारी खरीद व्यवस्था से बेहतर व्यवस्था की गई है ताकि लोग मंडी न जायें। किसानों को लगता है कि अब वे सरकारी शोषण से मुक्त हो रहे हैं परन्तु संभावना यह है कि जैसे-जैसे किसानों का मंडी व्यवस्था से विश्‍वास उठ जायेगा वैसे-वैसे निजी कम्पनियों का दायरा बढ़ता जायेगा और जब सरकारी विकल्प कमजोर होकर खत्म हो जायेगा तब निजी कम्पनी का राज स्थापित होगा।

अब सरकार किसानों को प्राकृतिक आपदा और बीमारी के प्रकोप की स्थिति में सीधे-सीधे मुआवजा नहीं देगी बल्कि इसके लिए किसान बीमा योजना लागू की गई है। इस योजना का वास्तविक स्वरूप किसानों को मदद नहीं कर पा रहा है। किसानों को होने वाले नुकसान का 20 फीसदी ही वापस मिल पा रहा है।

पिछले कई सालों से, खासतौर पर जबसे सरकार ने बीज, ऊर्वरक, खाद और कृषि सामग्री को खुले बाजार में छोड़ा है तबसे किसान नकली सामग्री जैसे नकली बीज और खाद का संकट भोगने को मजबूर हुए हैं। अनुमान है कि हजारों किलो नकली बीज पिछले तीन वर्षों में मध्यप्रदेश के किसानों को बेचा गया है किन्तु मामले केवल 15 ही दर्ज हुए हैं।

नीतिगत मुद्दों के प्रभाव –

हरित क्रांति ने भी समतामूलक उन्नति के अवसर पैदा नहीं किए। वास्तव में आधुनिक तकनीक को कृषि उत्पादन में वृध्दि के लिए चरम स्तर तक इस्तेमाल किया गया। ट्रेक्टर और थ्रेशर के उपयोग ने शुरूआती दौर में तो काम को आसान बनाया और उत्पादन भी बढ़ा। परन्तु नीति बनाने वाले यह भूलते गये कि एक थ्रेशर 100 कृषि मजदूरों के रोजगार के अवसरों को समाप्त कर देता है। रासायनिक ऊर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग से भी दीर्धकालीन उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव दिखने शुरू हो गये हैं। जब हम मध्यप्रदेश के संदर्भ में बात करते हैं तो एक बार फिर अनुपचारित भूमि सिंचाई के अवसरों में कमी और छोटी जोत वाले खेतों का मुद्दा अहम् हो जाता है। नई कृषि नीति के तहत ट्रेक्टर खरीदने के लिए रियायती दर पर कर्ज दिया जा रहा है किन्तु यह सच्चाई नजरंदाज की जा रही है कि छोटे और सीमांत किसानों के लिए इसके कोई मायने नहीं। इसके बावजूद भी जो किसान ट्रेक्टर खरीद रहे हैं वे सिंचाई की व्यवस्था न होने के कारण पैदावार भी नहीं बढ़ा पर रहे हैं, जिससे उन पर आर्थिक संकट गहराता गया है। वर्ष 1999 के बाद तीन साल सूखे का संकट रहा जिसमें किसान अपनी जरूरत पूरी करने के लिए भी पर्याप्त उत्पादन हासिल नहीं कर पाया। ऐसे में बैंक के कर्ज की किश्तें चुकाना तो एक असंभव बात रही है। पिछले पांच वर्षों में बिजली की दरें पांच गुना बढ़ गई हैं, उर्वरकों के दाम दो गुने हो गये हैं जिससे फसल की लागत में भी दो गुना बढ़ोत्तरी हुई है किन्तु इस अवधि में सरकार द्वारा निर्धारित किये गये समर्थन मूल्य में केवल 60 रूपये की वृध्दि हुई है। नई कृषि नीति के तहत ही अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियां किसानों से बाजार या उनकी जरूरत के मुताबिक फसल का उत्पादन करवा सकेंगी। अब आलू का उत्पादन केवल सब्जी के लिए नहीं होता है बल्कि आलू की चिप्स का बाजार अब ज्यादा फायदेमंद हो गया है। इस बाजार के बढ़ने का लाभ किसान को नहीं मिलेगा बल्कि उस कम्पनी को मिलता है जो चिप्स बनाती हैं, उसे हरा-पीला-नीला रंग देती हैं और आर्कषक ढंग से पैक करके पेश करती हैं। किसानों को मिलती है इसके ऐवज में उसकी लागत और दो वक्त की रोटी। इस नीति में संकट यह है कि कम्पनियों को कानूनी संरक्षण मिलेगा किन्तु किसान उपेक्षित ही रहेंगे।

आज की स्थिति में जबकि सरकार यह स्वीकार कर रही है कि कृषि की विकास दर को चार प्रतिशत के स्तर तक लाने की जरूरत है। इसे हासिल करने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने के साथ-साथ सड़क, सिंचाई, बिजली जैसी जरूरतों को पूरा करने के लिए क्रांतिकारी प्रयास करने होंगे। कृषि में पूंजी के बजाय श्रम को ज्यादा सम्मान दिया जाना चाहिए और भूमि सुधार कार्यक्रम को प्राथमिकता के साथ लागू किया जाना चाहिए। समाज का चरित्र क्या है यह सवाल कृषि नीति का मूल आधार होना चाहिए। जिस तरह राज्य बाजार को ध्यान में रखकर नीति लागू कर रहा है उससे आजीविका और खाद्यान्न सुरक्षा की स्थिति पर संकट छा रहा है।

जरूरत

  • वर्तमान परिस्थितियों में कृषि क्षेत्र में कम हो रहे सरकारी संरक्षण को पुन: स्थापित करने की जरूरत है।
  • कर्जदारी का नकारात्मक प्रभाव कृषकों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है। यह जरूरी है कि एक मर्तबा यह कर्ज तार्किक ढंग से वास्तव में समाप्त किया जाये और भविष्य में कर्ज पर तीन से चार फीसदी से ज्यादा ब्याज दर ना हो।
  • बीजली के बढ़ती दरों से भी लागत बढ़ी जबकि दाम स्थिर है। स्वाभाविक है कि घाटे को फायदे में बदलने के लिए बिजली की दरों को नियंत्रित करना होगा।
  • भूमि सुधार के बिना संसाधनों के समुचित उपयोग और उन्नति संभव नहीं है। सरकार पड़त भूमि को निजी क्षेत्र को सौंप रही है। इसके बजाये किसानों और भूमिहीनों कों बांटकर उन्हें भूमि विकास में मदद की जाना चाहिये।

मध्यप्रदेश कृषि क्षेत्र के तथ्य -

  • मध्यप्रदेश में कुल कार्यशील जनसंख्या - 2.57 करोड़
  • मध्यप्रदेश में कुल कृषक जनसंख्या - 1.10 करोड़
  • मध्यप्रदेश में कुल खेतिहर मजदूर - 74 लाख
  • मध्यप्रदेश का कुल क्षेत्रफल - 3.08 करोड़ वर्ग हेक्टेयर
  • मध्यप्रदेश में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उत्पादन - 249.20 किलो

मध्यप्रदेश में कृषि भूमि -

  • ग्रामीण पत्रको में दर्ज क्षेत्रफल - 2.32 करोड़ वर्ग हेक्टेयर
  • वनों के अन्तर्गत क्षेत्रफल - 85 लाख वर्ग हेक्टेयर
  • शुध्द बोया गया क्षेत्रफल - 150 लाख वर्ग हेक्टेयर
  • कुल बोया गया क्षेत्रफल - 198 लाख वर्ग हेक्टेयर
  • द्विफसली क्षेत्रफल - 48 लाख वर्ग हेक्टेयर
  • एक फसल क्षेत्रफल - 150 लाख वर्ग हेक्टेयर
  • कुल सिंचित कृषि भूमि - 57 लाख वर्ग हेक्टेयर
  • कुल जोतों की संख्या - 66.37 लाख
  • कृषि जोतों का औसत आकार - 2.3 हेक्टेयर

मध्यप्रदेश में कृषि उत्पादन

  • खाद्यान्न उत्पादन (वर्ष 2004-05) - लगभग 141.05 लाख मीट्रिक टन
  • तिलहन - 53.86 लाख मीट्रिक टन
  • कपास - 6.58 लाख गांठे

मध्यप्रदेश और भारत में औसत उत्पादन

फसल भारत में प्रति हेक्टेयर उत्पाद भारत में प्रति हेक्टेयर उत्पाद
गेहूं 1867 किलो 2707 किलो
चावल 1058 किलो 2051 किलो
कपास 189 किलो 307 किलो
दलहन 694 किलो 792 किलो
सोयाबीन 1130 किलो 1200 किलो

मध्यप्रदेश में सिंचाई के साधन (संख्या)

  • कुऐं - 1443000
  • नलकूप - 281000
  • पम्पसेट - 1389000

मध्यप्रदेश में सिंचाई के स्रोत (प्रतिशत में / एक से ज्यादा स्रोत उपयोग होने पर)

  • नहरें - 29 प्रतिशत
  • टैंक - 02 प्रतिशत
  • सतही जल - 31 प्रतिशत
  • कुएं - 35 प्रतिशत
  • नलकूप एवं अन्य - 34 प्रतिशत
  • भूजल - 69 प्रतिशत

- सचिन कुमार जैन

 
     
  Next Article  
  Infopack Main Page  
  Infopack Archives