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मध्यप्रदेश में बाल टीकाकरण की स्थिति

 
     
 

डीएलएचएस के बारे में

भारत में आबादी तथा स्वास्थ्य संबंधी सर्वेक्षणों के सिलसिले में डीएलएचएस (परिवार को मिल रही सुविधाओं का जिला स्तरीय सर्वेक्षण) सबसे बड़े सर्वेक्षणों में गिना जाता है। इस सर्वेक्षण में देश के सभी जिलों के करीब सात लाख परिवारों को शामिल किया गया है। केंद्रीय परिवार तथा स्वास्थ्य कल्याण मंत्रालय ने वर्ष 1997 में पहला डीएलएचएस करवाया था ताकि स्वास्थ्य सूचकांकों से संबंधित जिला स्तरीय जानकारियां नीति निर्धारकों तथा उन्हें संचालित करने वाले प्रभारी व्यक्तियों तक पहुंचाकर योजना बनाने, उनकी निगरानी करने तथा उनका मूल्यांकन करने की विकेंद्रित व्यवस्था बनाने में मदद की जा सके।

इसी सिलसिले में वर्ष 1998-99 में डीएलएचएस-1 तथा वर्ष 2002-04 में डीएलएचएस-2 के बाद डीएलएचएस-3 को मातृ तथा बाल स्वास्थ्य, परिवार नियोजन तथा अन्य प्रजनन व स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं के सिलसिले में जरूरी आकलन के लिए कराया गया। पहली इस डीएलएचएस-3 सर्वेक्षण के जरिए जनसंख्या आधारित सुविधा सर्वेक्षण को अंजाम दिया गया। इसके तहत सभी जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्‍द्रों प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों व उप स्वास्थ्य केंद्रों को भी सर्वेक्षण में शामिल किया गया। इसके लिए मध्यप्रदेश में दिसंबर 2007 से मई 2008 के बीच 51,419 परिवारों का सर्वेक्षण किया गया।

बाल टीकाकरण क्यों ?

आम तौर पर शिशु प्राकृतिक तौर पर कुछ रोग प्रतिरोधकक्षमता के साथ पैदा होते हैं, जो उन्हें अपनी मां और स्तनपान से मिलते हैं। बाद में जैसे-जैसे शिशु का अपना रोग प्रतिरोधी तंत्र विकसित होना शुरू होता है यह प्राकृतिक क्षमता घटती चली जाती है। शिशु के संक्रमण के चलते कई गंभीर रोगों के प्रति काफी ग्राह्यशील व संवेदनशील होते हैं, क्योंकि उनका शरीर ऐसे संक्रमणों से जूझने के लिए पहले से तैयार नहीं होता है। टीकाकरण से शिशुओं को ऐसे कई रोगों से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता मिलती है जिनसे उनकी जान तक जा सकती है। 

शिशुओं के टीकाकरण के लिए आदर्श समय-सारणी

भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा अनुशंसित) उम्र: एक से डेढ़ माह  बी.सी.जी. (इंजेक्‍शन)
डी.पी.टी. -1 (इंजेक्‍शन)तथा
ओ.पी.वी. -1 (खुराक)
उम्र: दो से ढाई माह डी.पी.टी. -2 (इंजेक्‍शन)तथा
ओ.पी.वी. -2 (खुराक)
उम्र: तीन से साढ़े तीन माह डी.पी.टी. -3 (इंजेक्‍शन)तथा
ओ.पी.वी. -3 (खुराक)
उम्र: नौ माह खसरा (इंजेक्‍शन)
उम्र: 16 से 24 माह डी.पी.टी. बूस्टर (इंजेक्‍शन)तथा
ओ.पी.वी. बूस्टर (खुराक)

डीएलएचएस-3 तथा बाल टीकाकरण की स्थिति

डीएलएचएस-3 की रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश में कुल 32.6 प्रतिशत तथा ग्रामीण क्षेत्रों में महज 31.4 प्रतिशत बच्चे ही टीकाकरण का लाभ उठा पाए हैं। यह सरकार के उस दावे के एकदम उलट है जिसमें कहा गया है कि 2007-08 में 62.5 प्रतिशत तथा 2008-09 में 63.6 प्रतिशत बच्चे बाल टीकाकरण योजना के तहत पूरी तरह रोग प्रतिरोधी टीकाकरण का लाभ उठा चुके हैं। इसी तरह सार्वजनिक स्वास्थ्य व परिवार कल्याण विभाग के स्वास्थ्य बुलेटिन के मुताबिक प्रदेश के 47 जिलों के 50 प्रतिशत से ज्यादा बच्चों का टीकाकरण किया जा चुका है।

डीएलएचस-3 के तहत बच्चों के टीकाकरण की वस्तुस्थिति का पता लगाने के लिए 12 से 23 माह की आयुवर्ग के  4765 बच्चों का सर्वेक्षण किया गया जिनमें 3784 बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों से थे जबकि 981 बच्चे शहरी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते थे।

डीएलएचएस-3 की रिपोर्ट से यह खुलासा भी होता है कि मध्यप्रदेश में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के तहत बच्चों को छह गंभीर लेकिन रोकी जा सकने वाली बीमारियों से बचाने के टीके लगाने की योजना ही दरकिनार नहीं की गई, बल्कि दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से 12 से 23 माह की आयुवर्ग की उम्र के बच्चों को आम बीमारियों से पूरी तरह बचाने के टीके भी नहीं लगाए जा सके।

इस डीएलएचएस-3 रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश में कुल 32.6 प्रतिश तथा ग्रामीण क्षेत्रों में महज 31.4 प्रतिशत बच्चे ही टीकाकरण का लाभ उठा पाए हैं। यह सरकार के उस दावे के एकदम उलट है जिसमें कहा गया है कि 2007-08 में 62.5 प्रतिशत तथा 2008-09 में 63.6 प्रतिशत बच्चे बाल टीकाकरण योजना के तहत पूरी तरह रोग प्रतिरोधी टीकाकरण का लाभ उठा चुके हैं (हेल्थ बुलेटिन, सार्वजनिक स्वास्थ्य व परिवार कल्याण विभाग, मप्र सरकार)। इसी तरह सार्वजनिक स्वास्थ्य व परिवार कल्याण विभाग के स्वास्थ्य बुलेटिन का दावा है कि प्रदेश के 47 जिलों के 50 प्रतिशत से ज्यादा बच्चों का टीकाकरण किया जा चुका है।

यह रिपोर्ट आगे यह खुलासा भी करती है कि मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों के 11.3 प्रतिशत बच्चे तथा कुल मिलाकर 9.8 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जिनका किसी भी तरह का टीकाकरण नहीं हो सका है।

डीएलएचएस की सर्वेक्षण रिपोर्ट तथ्यों के साथ यह खुलासा भी करती है कि मध्यप्रदेश के पांच जिले जिनमें दो आईएमएनसीआई (राष्‍ट्रय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत नवजात व शिशु रोग एकीकृत प्रबंधन) जिले (दतिया तथा शिवपुरी) शामिल हैं ऐसे हैं जहां टीकाकरण 20 प्रतिशत से कम हुआ है। यही नहीं, सर्वेक्षण रिपोर्ट में यह खुलासा भी हुआ कि आईएमएनसीआई के तहत आने वाले प्रदेश के 12 में से महज चार जिले ही ऐसे हैं जहां बाल टीकाकरण 40 प्रतिशत से ज्यादा हुआ है। समूचे प्रदेश में सर्वाधिक बुरी स्थिति ग्रामीण इलाकों की है जहां 12 जिलों में (आईएमएनसीआई के चार जिलों समेत) 25 प्रतिशत से भी कम टीकाकरण अंजाम दिया जा सका है।

मध्यप्रदेश   के 12 आईएमएनसीआई जिलों में टीकाकरण की स्थिति
जिला
पूरी तरह टीकाकृत बच्चे जिन बच्चों को बीसीजी लगा जिन बच्चों को डीपीटी लगा पोलियो की 3 खुराक पाने वाले बच्चे खसरे की वैक्सीन पाने वाले बच्चे 9-35 माह की आयुवर्ग के बच्चे जिन्हें विटामिन के पूरक तत्व मिले
दतिया 17.2 78.5 32.2 36.9 40.8 24.1
शिवपुरी 17.1 78.5 23.6 42 29 15.7
गुना 24 69.1 27.3 39.4 41.6 18.5
सतना 25.6 84.6 45.8 54.8 58.4 49.9
विदिशा 26.9 77.9 46.3 43.6 40.9 25
मुरैना 34.9 86.9 44.7 53.7 54.2 36.7
जबलपुर 36.8 97.1 54.5 67.1 66.9 61.5
भिंड 37.8 85.3 52.1 53.5 62 38.2
कटनी 50.3 86.6 52.3 65.3 71.6 54.3
रतलाम 55.6 91.2 68.6 67.7 69.7 50.3
सीहोर 60.1 90 65.6 66.1 65.7 47.4
भोपाल 70.1 99 78.7 76 81 62.4

स्रोत: डीएलएचएस-3 सर्वेक्षण रिपोर्ट, 2007-08, सभी आंकड़े प्रतिशत में

टिटनेस टीकाकरण की स्थिति

मध्यप्रदेश में महज 60.4 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को ही टिटनेस का टीका कम से कम एक बार लग पाया है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में टिटनेस का टीका हासिल करने वाली गर्भवती महिलाओं की संख्या महज 55.2 प्रतिशत है। वहीं शिवपुरी जिले में तो केवल 30.3 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं ही ऐसी हैं जिन्हें टिटनेस से बचाव का टीका लगाया गया है।

टिटनेस टॉक्साइड इंजेक्षन क्यों ?

टिटनेस टॉक्साइड या टीटी के इंजेक्‍शन से गर्भवती महिला तथा उसके होने वाले शिशु का टिटनेस सरीखी घातक बीमारी से बचाव हो सकता है। हर गर्भवती महिला को टीटी के कम से कम दो इंजेक्‍शन जरूर लगवाने चाहिएं।

बीसीजी टीकाकरण की स्थिति

बीसीजी टीकाकरण के मामले में मध्यप्रदेश की स्थिति थोड़ी बेहतर है। प्रदेश के 84.2 प्रतिशत बच्चे बीसीजी टीकाकरण से सुरक्षित हो चुके हैं। लेकिन अभी भी 15.8 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो घातक बीमारी से बचने के लिए बीसीजी टीके की बाट जोह रहे हैं। मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ जिले में (87 प्रतिशत जनसंख्या आदिवासी) महज 56.6 प्रतिशत बच्चों को ही बीसीजी टीके लगाए जा सके हैं। इसी तरह गुना जो कि आईएमएनसीआई जिला है, में 30.9 प्रतिशत बच्चों को टीबी से बचाव के लिए बीसीजी के टीके नहीं लगाए जा सके हैं।

बीसीजी टीकाकरण क्यों ?

बीसीजी का टीकाकरण ट्यूबरकुलोसिस या टीबी जैसी घातक बीमारी से बचाव के लिए बेहद जरूरी है। यह टीका शिशु के जन्म होने के फौरन बाद लगाया जाना चाहिए, अगर किसी कारण वर्षे ऐसा नहीं हो पाता तो अन्य टीकों के साथ इसे भी जल्द से जल्द लगाया जाना चाहिए।

डीपीटी टीकाकरण की स्थिति :

मध्यप्रदेश के 51.1 प्रतिशत (23) जिलों में 50 प्रतिशत से भी कम बच्चों को तीन घातक बीमारियों से बचाव के लिए लगाया जाने वाला डीपीटी टीकाकरण हो सका है। प्रदेश के 37 जिलों (82.2 प्रतिशत) के ग्रामीण क्षेत्रों में तो 40 प्रतिशत से भी कम बच्चों को डीपीटी का टीका लग सका है। खासकर झाबुआ, टीकमगढ़, दमोह तथा शिवपुरी जैसे जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में क्रमश: 17, 19.1, 20.7 व 20.8 प्रतिशत टीकाकरण के साथ हालत की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

डीपीटी टीकाकरण क्यों ?

यह टीकाकरण शिशु को एक से डेढ़ महीने, दो से ढाई महीने तथा तीन से साढ़े तीन माह की उम्र में तथा एक से डेढ़ वर्ष की आयु में बूस्टर के साथ लगाया जाता है। यह तीन बीमारियों डिप्थीरिया, परटयूसिस जैसी सांस की बीमारियों व टिटनेस से बचाव करता है।

पोलियो टीकाकरण की स्थिति :

मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य बुलेटिन के मुताबिक वर्ष 2007-08 में प्रदेश में पोलियो टीकाकरण के मामले में 97.7 प्रतिशत सफलता अर्जित की गई है। लेकिन डीएलएचएस-3 की रिपोर्ट के मुताबिक झाबुआ और मंडला जैसे आदिवासी बहुल जिलों में पोलियो सरीखी बीमारी से लड़ने के लिए लगाए जाने वाले पोलिया टीके का आंकड़ा क्रमश: 23.5 व 28.5 प्रतिशत से आगे नहीं जा पाया है। रिपोर्ट के मुताबिक 12 से 23 माह की आयुवर्ग के महज 55.1 प्रतिशत बच्चे ही पोलियो की तीन खुराक हासिल कर पाए हैं।

पोलियो टीकाकरण क्यों ?

पोलियो के सभी तीन तरह के वायरसों का मुकाबला करने के लिए एक से डेढ़ माह, दो से ढाई माह तथा तीन से साढ़े तीन माह की आयुवर्ग के शिशुओं को पोलियो की खुराक दी जाती है। डेढ़ साल की उम्र में पोलिया की बूस्टर खुराक दी जाती है। गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से पल्स पोलियो कार्यक्रम चलाया जा रहा है जिसके तहत पांच साल से कम उम्र के आयुवर्ग के सभी बच्चों को नियमित पोलियो टीकाकरण के अलावा साल में दो बार पोलियो ड्रॉप्स पिलाई जाती हैं।

खसरा टीकाकरण की स्थिति

मध्यप्रदेश में कुल 57.7 प्रतिशत बच्चों को ही खसरा से बचाव के लिए जरूरी टीके लग पाए हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में टीकाकरण किए हुए बच्चे महज 53.6 प्रतिशत ही हैं। जबकि झाबुआ तथा शिवपुरी सरीखे जिलों में तो ऐसे बच्चों की संख्या 30 प्रतिशत से भी कम है।

खसरा टीकाकरण क्यों ?

खसरे से बचाव के शिशु को 9 माह की उम्र में टीका लगाया जाता है। खसरा श्‍वसन तंत्र का एक घातक व बेहद संक्रामक रोग है। जिन शिशुओं को खसरा का संक्रमण होता हैं उनमें से बहुत से शिशुओं को सीने का संक्रमण, दौरे व दिमागी क्षति सरीखे कई गंभीर नुकसान उठाने पड़ सकते हैं।  

विटामिन ए के पूरक तत्वों की आपूर्ति की स्थिति

मध्यप्रदेश के 9 जिलों में 9 से 35 माह की आयुवर्ग के 25 प्रतिशत से भी कम बच्चों को विटामिन ए का कम से कम एक खुराक दिया गया है। झाबुआ की स्थिति इस मामले में भी बदतर है, यहां साक्षरता दर महज 31.5 प्रतिशत है, यहां भी केवल 18.5 प्रतिशत बच्चों को ही विटामिन ए की एक खुराक मिल सकी है।

विटामिन ए के पूरक तत्व क्यों ?

तकरीबन सभी बच्चे विटामिन ए के कम भंडारण के साथ जन्म लेते हैं। शिशुओं तथा बच्चों की दृष्टि, वृध्दि व सर्वांगीण विकास के लिए विटामिन ए बेहद जरूरी माना जाता है। केवल स्तनपान से शिशुओं में विटामिन ए के भंडार में बढ़ोत्‍तरी होती है। लेकिन मध्यप्रदेश में 0-6 माह की आयुवर्ग के महज 0.6 प्रतिशत बच्चे (डीएलएचएस-3 सर्वेक्षण रिपोर्ट 2005-06 के मुताबिक) ही केवल स्तनपान का लाभ उठा पाते हैं। ऐसे ही मध्यप्रदेश के लिए यह बेहद जरूरी है कि वह 9 से 35 माह की आयुवर्ग के सभी बच्चों को कम से कम एक बार विटामिन ए दिया जाना सुनिश्चित करे।
 
कितनी सुरक्षित हैं बाल टीकाकरण योजनाएं ?

डीएलएचएस-3 की सर्वेक्षण रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया है कि बाल टीकाकरण के लिए चलाई जा रही योजनाएं आखिर किस हद तक सुरक्षित हैं। क्या वे बच्चों को वास्तव में घातक बीमारियों से बचा पात हैं, या फिर वे उन्हें कुछ और घातक बीमारियों के शिकंजे में धकेल रही हैं?

टीकों के संग्रहण के लिए जारी किए गए अनिवार्य दिशा-निर्देशों के मुताबिक उनका प्रशीतिकरण जरूरी है। क्योंकि कई दवाएं या टीके मसलन खसरे से बचाव का टीका, उच्च तापमान की स्थिति में निष्क्रिय या नाकारा हो जाती हैं।

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तथा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डीप फ्रीजर की मौजूदगी:

टीकों के बेहतर रखरखाव का महत्व मध्यप्रदेश सरकार ने लगभग उपेक्षित कर रखा है। मध्यप्रदेश के 278 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में से महज 184 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में ही बड़े डीप फ्रीजर मौजूद हैं। इसी तरह प्रदेश के 1142 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में से महज 178 केंद्रों में ही बड़े डीप फ्रीजर मुहैया कराए गए हैं। इनकी कार्यक्षमता व सुचारू संचालन के लिए मध्यप्रदेश में निरंतर बड़े पैमाने पर हो रही बिजली कटौती एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। मध्यप्रदेश में अभी भी स्वास्थ्य संस्थाओं को आपात सेवाओं की तरह नहीं समझा जाता, यही कारण है कि यहां तमाम स्वास्थ्य संस्थाओं को बिजली कटौती झेलनी पड़ती है।

 
     
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