भूमिका
'सबके लिए स्वास्थ्य' - 1978 में अल्मा आटा के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन ने स्वास्थ्य नीतियों के विकास में एक अहम भूमिका निभाई है। सम्मेलन में सभी लोगों तक स्वास्थ्य पहुंचाने की बात रखते हुये स्वास्थ्य की एक नई परिभाषा दी गई। साथ ही, उसमें यह तय किया गया कि 2000 तक 'सभी के लिए स्वास्थ्य' उपलब्ध करा दी जाएगी और इसके लिए उसी वक्त से पहल शुरू की गई।
स्वास्थ्य की व्यापकता की वकालत भारतीय संविधान का अनुच्छेद -47 भी करता है। इसमें 'सबके लिये स्वास्थ्य' को व्यापक अर्थ में कहा गया है। इसमें यह उल्लेखित है कि सरकार का दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि सस्ती व उत्तम स्वास्थ्य सेवाओं, सुरक्षित पेयजल तथा स्वच्छता प्रबंध, पर्याप्त पोषण, वस्त्र, आवास तथा रोजगार तक हर किसी की पहुंच हो और वर्ग, जाति, लिंग या समुदाय के आधार पर किसी के साथ भेदभाव न हो। यानी जब हम स्वास्थ्य की बात करेंगे तो वह महज रोग या रोग का प्रतिरोध तक सीमित न रहने वाली चीजों के बजाय उससे जुड़ी पूरक स्थितियों पर भी केन्द्रित होगी।
संविधान का अनुच्छेद-47 का व्यापक अर्थ सबके लिये स्वास्थ्य की दिशा में 'यह सुनिश्चित करना है कि सस्ती व उत्तम स्वास्थ्य सेवाओं, सुरक्षित पेयजल तथा स्वच्छता प्रबन्ध, पर्याप्त पोषण, आवास तथा रोजगार तक हर किसी की पहुंच हो। साथ ही वर्ग, जाति, लिंग या समुदाय के आधार पर किसी के साथ भेदभाव न हो।'
'स्वास्थ्य भौतिक, मानसिक एवं सामाजिक सभी में पूर्ण रूप से कुषलता की अवस्था है। मात्र रोग की अनुपस्थिति ही स्वास्थ्य नहीं है।'
यहां एक अन्य तथ्य को समझना भी जरूरी है कि स्वास्थ्य के मसले के भीतर एक सूक्ष्म भिन्नता है और वह यह कि 'स्वास्थ्य' और 'स्वास्थ्य सेवायें' दो अलग-अलग भाग हैं, पर हम कभी-कभार इसे एक मानने की भूल कर बैठते हैं। क्योंकि प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा एक ऐसी स्वास्थ्य सेवा होती ह,ै जो कि ऐसी विधियों व तकनीकों पर आधारित होती है जिन तक आम आदमी व साधारण परिवारों की पहुंच हो और जिसमें समाज की पूर्ण हिस्सेदारी हो, लेकिन जब हम स्वास्थ्य की बात करेंगे तो हमें अनुच्छेद - 47 के तहत व्याख्यायित व्यापकता को आधार मानना होगा।
बच्चों का स्वास्थ्य
वर्ष 2000 में 3-6 सितम्बर को संयुक्त राष्ट्र की एक बैठक न्यूयार्क सिटी के संयुक्त राष्ट्र कार्यालय में आयोजित की गई थी, जिसमें दुनिया भर से अनेक राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्ष, शासन प्रमुख, प्रधानमंत्री आदि शामिल हुए थे। यह बहुत ही महत्वपूर्ण बैठक थी। इस बैठक में 189 देश शामिल हुए थे। बैठक का मुख्य उद्देश्य था 21वीं सदी में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका में बदलाव लाना। इसके परिणाम में संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दि घोषणा की गयी। घोषणा में 8 लक्ष्यों को निर्धारित किया गया, जिसे सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य नाम दिया गया।सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों के तहत चौथा लक्ष्य बाल मृत्यु दर को कम करना है। पूरी दुनिया में 1990 की स्थिति से 2015 तक 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु को दो तिहाई कम करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यानी यदि 100 बच्चे प्रति हजार मृत्यु हो रही है तो उसे 33 बच्चे प्रति हजार पर लाना होगा। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के अनुसार विकासशील देषों में पांच वर्ष तक के प्रति हजार बच्चों में 100 की मृत्यु हो जाती है। उनकी मौत का कारण वे बीमारियां होती हैं, जो सहजता से ठीक हो सकती है या फिर नियंत्रित की जा सकती है। इस तथ्य को देखते हुए यह मानना लाजिमी है कि विश्व में बच्चों के स्वास्थ्य की स्थिति चिंतनीय है और इसी वजह से शिशु मृत्यु दर मेंं भी कमी नहीं दिख रही है।
विश्व में भारत देश अपने औद्यौगिक व आर्थ्ािक विकास के नये कीर्तिमान स्थापित कर अलग पहचान बना ली ह,ै पर बच्चों के स्वास्थ्य के मामले में स्थिति अभी भी चिंताजानक बनी हुई है। एनएफएचएस - 3 सर्वेक्षण के अनुसार देश मे पांच वर्ष से कम आयु के लगभग आधे बच्चे (602 प्रतिशत) कुपोषित हैं। इसी सर्वेक्षण के अनुसार सन्् 1998-99 से लेकर सन्् 2005-06 की अवधि में 6-35 माह के बच्चों में एनेमिया (खून की कमी) का स्तर 74 प्रतिशत से बढ़कर 79 प्रतिशत हो गया है।
मध्यप्रदेश की स्थिति
मध्यप्रदेश में आज बच्चों के स्वास्थ्य की स्थिति देखें तो यहा भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। भारत सरकार के आर्थिक सर्वेंक्षण 2007-08 के अनुसार शिशु मृत्यु दर के मामले में मध्यप्रदेष अव्वल है। प्रतिदिन प्रदेश में 371 शिशु एवं 35 महिलायें प्रसव के दौरान या प्रसव में आई जटिलताओं के कारण दम तोड़ रही है। ऐसे में प्रदेश में बच्चों के स्वास्थ्य की स्थिति दयनीय है। संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने में लगी सरकार ने अधोसंरचना विकास की प्राथमिकता स्पष्ट नहीं की है और एक के बाद योजनायें लादकर वाहवाही लूट रही है।
प्रस्तुत दस्तावेज में मध्यप्रदेश में बच्चों के स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न पहलुओं जैसे - शिशु मृत्यु दर, बच्चों के पोषण की स्थिति, पौष्टिक भोजन की उपलब्धता, बच्चों मे एनेमिया, स्वास्थ्य व पोषण सेवाओं की स्थिति, टीकाकरण एवं विभिन्न नीतिगत मसलों को उठाया गया है।
प्रदेश |
शिशु मृत्यु |
दर |
कुल |
ग्रामीण |
शहरी |
बिहार |
60 |
62 |
45 |
उत्तरप्रदेश |
71 |
75 |
53 |
मध्यप्रदेश |
74 |
79 |
52 |
उड़ीसा |
73 |
76 |
53 |
केरल |
15 |
16 |
12 |
शिशु मृत्यु दर
मध्यप्रदेश शिशु मृत्यु के मामले में अव्वल स्थान पर है। यहाँ 74 बच्चे प्रति 1000 की जनसंख्या पर असमय काल के गाल में समा जाते हैं, जिसमें से ग्रामीण क्षेत्रों के 79 तथा शहरी क्षेत्रों में 52 शिशु होते हैं [एसआरएस]। अन्य राज्यों से तुलना करें तो हम पाते हैं कि अन्य बीमारू कहे जाने वाले राज्यों जैसे - बिहार, उत्तरप्रदेश एवं उड़ीसा की स्थिति भी मध्यप्रदेश से बेहतर है। 1993 में प्रदेश में शिशु मृत्यु दर 106 थी, जो कि घटकर 2003 में 82 आ गई, पर राष्ट्रीय स्तर पर यह कमी 1993 में 74 से घटकर 57 पर पहुंच गई।
दसवीं पंचवर्षीय योजना के एप्रोच पेपर में सन् 2007 तक यह दर '45 प्रति हजार जीवित जन्म' पर लाने का लक्ष्य रखा गया, पर क्रियान्वयन की स्थिति और निपटने के तरीकों से स्थिति पर काबू नहीं पाया जा सकां वर्तमान में प्रदेष में 371 शिशुओं की प्रतिदिन मौत हो जाती हैं। बाल मृत्यु दर 144 प्रति हजार है। राज्य शासन वर्तमान में संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देकर शिशु मृत्यु को रोकने का प्रयास कर रहा है, पर अन्य पूरक स्थितियों को नजरअंदाज किये हुये है।
मध्यप्रदेश में बाल स्वास्थ्य की स्थिति |
क्रम |
सूचक |
वर्ष |
मध्यप्रदेश |
भारत |
स्त्रोत |
1. |
शिशु मृत्यु दर (प्रति 100 जीवित जन्म पर) |
2007 |
74 |
57 |
एसआरएस |
2. |
शिशु मृत्यु दर - ग्रामीण |
2007 |
79 |
62 |
एसआरएस |
3. |
शिशु मृत्यु दर - नगरीय |
2007 |
52 |
39 |
एसआरएस |
4. |
शिशु मृत्यु दर - महिला |
2007 |
77 |
59 |
एसआरएस |
5. |
शिशु मृत्यु दर - पुरुष |
2007 |
72 |
56 |
एसआरएस |
6. |
5 वर्ष से कम मृत्यु दर (प्रति 100 जीवित जन्म पर) |
1998-2002 |
144 |
98 |
एसआरएस |
7. |
5 वर्ष से कम मृत्यु दर (पुरुष) |
1998-2002 |
134 |
90 |
एसआरएस |
8. |
5 वर्ष से कम मृत्यु दर (महिला) |
1998-2002 |
157 |
107 |
एसआरएस |
9. |
पूर्णत: टीकाकृत बच्चों का प्रतिषत (12 से 23 माह ) |
2005-06 |
40.3 |
43.5 |
एनएफएचएस 3 |
10. |
उन बच्चों का प्रतिशत जिन्होंने विटामिन ए की कम से कम एक खुराक ली हैे, उनका प्रतिशत (12 से 23 माह) |
2005-06 |
16.1 |
21.0 |
एनएफएचएस 3 |
11. |
डायरिया से प्रभावित बच्चों का प्रतिशत (12 से 23 माह) |
2005-06 |
28.6 |
26.2 |
एनएफएचएस 3 |
12. |
प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा जन्म का प्रतिशत |
2005-06 |
37.1 |
48.2 |
एनएफएचएस 3 |
13. |
संस्थागत प्रसव का प्रतिशत |
2005-06 |
29.7 |
40.7 |
एनएफएचएस 3 |
- 5 वर्ष तक के कुपोषित बच्चों की संख्या 1998-99 में 53.5 प्रतिषत की तुलना में 2005-06 में 60 प्रतिशत हो गई है। (स्रोत- एनएफएचएस-3, 2005-06)
- तीन वर्ष तक के उन बच्चों की संख्या, जिन्हें जन्म के समय मां का दूध मिल पाता है, मात्र 14.9 प्रतिशत है। (स्रोत- एनएफएचएस-3, 2005-06)
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- मध्यप्रदेश में प्रति 5 मिनट पर एक शिशु की मृत्यु होती है। (यूनीसेफ)
- मिड टर्म हेल्थ सेक्टर स्ट्रेटजी - 2006, म.प्र.में वर्ष 2015 तक शिशु मृत्यु दर प्रति हजार शिशु पर 53.14 तक लाने का लक्ष्य रखा गया है, जो सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों से कतई मेल नहीं खाता।
बच्चों में कुपोषण
कुपोषण एक ऐसा चक्र है जिसके चंगुल में बच्चे अपनी मां के गर्भ में ही फंस जाते हैं। उनके जीवन की नियति दुनिया में जन्म लेने के पहले ही तय हो जाती है। यह नियति लिखी जाती है गरीबी और भुखमरी की स्याही से। स्थिति गंभीर होने पर जीवन में आशा की किरणें भी नहीं पनप पाती हैं। कुपोषण के मायने होते हैं आयु और शरीर के अनुरूप पर्याप्त शारीरिक विकास न होना, एक स्तर के बाद यह मानसिक विकास की प्रक्रिया को भी अवरूध्द करने लगता है। बहुत छोटे बच्चों खासतौर पर जन्म से लेकर 5 वर्ष की आयु तक के बच्चों को भोजन के जरिये पर्याप्त पोषण आहार न मिलने के कारण उनमें कुपोषण की समस्या जन्म ले लेती है। इसके परिणाम स्वरूप बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता का ह्नास होता है और छोटी-छोटी बीमारियां उनकी मृत्यु का कारण बन जाती हैं।
श्योपुर जिले के पातालगढ़ गांव में फरवरी 2005 में एक के बाद एक 13 बच्चों की कुपोषण के कारण मृत्यु हुई थी। संघर्ष और बहस के हर मंच पर यह मुद्दा उठा। सर्वोच्च न्यायालय के आयुक्तों ने वहां आंगनबाड़ी खोलकर कुपोषण खत्म करने के निर्देष दिये किन्तु चूंकि कुपोषण सरकार का प्राथमिक मुद्दा नहीं है इसलिये वहां आंगनबाड़ी नहीं खोली गई। परिणाम यह हुआ कि मार्च से मई 2006 के बीच वहां फिर 10 बच्चे असामयिक मौत के षिकार हो गये। इस गांव में घटना के पूर्व की अवधि तक तीन सालों में केवल पांच दिन का सरकारी रोजगार ग्रामीणों को मिला, अस्पताल 63 किलोमीटर दूर, मध्यान्ह भोजन और आंगनबाड़ी योजना का कोई अस्तित्व नहीं (क्योंकि यहां की जनसंख्या 700 से कम है), ऐसे में प्रसव के दौरान यहां हर 10 में से एक महिला की मृत्यु हो जाती है क्योंकि उन्हें भोजन नहीं मिलता है। जब एक नवजात षिषु की मां गुड्डी से पूछा गया कि अब इस बच्चे को आप अपना दूध कब पिलाओगी? तो उसका जवाब था, ''कहां से पिलाऊंगी? जब मैंने ही 7 दिन से कुछ नहीं खाया है तो दूध कहां से उतरेगा?'' वास्तव में संकट असुरक्षित मातृत्व से शुरू होता है और कुपोषण की कभी न मिटने वाली इबारत का रूप ले लेता है।
प्रदेश में पाँच वर्ष से कम आयु के आधे से अधिक बच्चे कुपोषित है। सवाल केवल आंकड़ों का नहीं है बल्कि उस कड़वी सच्चाई का है जो यह बताती है कि चमकदार विकास की दौड़ में छोटे बच्चों को कुचलते हुये हम आगे बढ़ रहे हैं। विडम्बना यह है कि यह सच्चाई मध्यप्रदेष के लिये सबसे ज्यादा कड़वी है क्योंकि जिस निरंतरता से इस राज्य को प्रगति और उन्नति के लिये पुरस्कार-सम्मानों से नवाजा जा रहा है, उसी दौड़ में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-तीन (एन.एफ.एच.एस-तीन) से पता चलता कि पिछले आठ वर्षों (एनएफएचएस के दूसरे और तीसरे सर्वेक्षण के बीच की अवधि) में मध्यप्रदेष में कुपोषित बच्चों की संख्या में पांच फीसदी का गंभीर इजाफा हुआ है। राज्य में पोषण आहार की कमी स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव और पारिवारिक खाद्य असुरक्षा के कारण भुखमरी के षिकार होते बच्चों की संख्या 54 फीसदी से बढ़कर 60.3 प्रतिषत पर पहुंच गई है।
जो लोग मानते हैं कि कुपोषण का व्यापक समाज से कोई संबंध नहीं है उन्हें अब यह समझ लेना होगा कि शारीरिक और मानसिक क्षमताओं का विकास न हो पाने की स्थिति में न तो औद्योगिकीकरण फलदायी होगा न ही आठ और दस फीसदी की विकास दर के सपने को सच ही किया जा सकेगा। सबसे दु:खद बात यह भी है कि दुनिया के सबसे गंभीर कुपोषण ग्रस्त इलाके और समुदाय भी मध्यप्रदेष में ही है। दूसरी ओर महाराष्ट्र में कुपोषण्ा 10 फीसदी, राजस्थान में 7 फीसदी, छत्तीसगढ़ में 9 फीसदी और उत्तरप्रदेष में 5 फीसदी कम हुआ है।
ऐसा नहीं है कि पहले कुपोषण का संकट इतना गंभीर नहीं था। सच यह है कि बाल अधिकारों के अन्य पक्षों की तरह ही इसे भी लगातार नजरअंदाज ही किया गया क्योंकि बच्चे न तो वोट बैंक होते हैं और न ही वे विधानसभा के सामने धरने पर बैठकर अपने पोषण के अधिकारों की लड़ाई लड़ सकते हैं। बहरहाल विकास की असमान नीतियों ने उन्हें एक लगातार जारी रहने वाली भूख हड़ताल पर जरूर बिठा रखा है। उम्मीद यह जरूर की जाती रही है कि शायद जनप्रतिनिधि लोकतंत्र के सदनों (विधानसभा और लोकसभा) में ऐसी नीतियों के निर्माण की पहल करेंगे जिनसे बच्चों को पोषण का बुनियादी अधिकार सम्मानजनक तरीके से मिल सके किन्तु अफसोस कि इस विषय को प्रष्नकाल में भी बहुत कम समय मिलता है। बच्चों को कुपोषण से मुक्ति के लिये तो एक मर्तबा भी हंगामा इन सदनों में नहीं बरपा। अब इस सवाल पर विष्लेषण होना लाजिमी हो जाता है कि जब बार-बार यह कहा जा रहा है कि हर तरफ विकास हो रहा है तो फिर दूसरी तरफ कुपोषण में इतनी गंभीर वृध्दि की वजहें क्या है? बिना पूर्वाग्रह के गांव और शहर की बस्तियों में कुछ दिन बिताने पर इस सवाल का जवाब खुद-ब-खुद मिल जाएगा।
कुपोषण वस्तुत: एक स्तर के बाद स्वास्थ्य का मुद्दा बन जाता है, पर मध्यप्रदेष में कुपोषण के संदर्भ में स्वास्थ्य विभाग की भूमिका आपको चिराग लेकर ढूंढने पर भी नजर नहीं आयेगी। एएनएम (गांव का भ्रमण करने वाली नर्स बहनजी) से लेकर राज्य स्तर पर नीतियां बनाने वाले तक इस संकट की घड़ी में बच्चों के साथ खड़े होने के लिये तैयार नहीं हैं। और फिर जब बच्चों की कुपोषण के कारण मृत्यु हो जाती है तो वे किसी बीमारी का नाम दर्ज करके मृत्यु प्रमाणपत्र जरूर जारी कर देते हैं। कुपोषण का मुद्दा मूलत: परिवार की खाद्य सुरक्षा से सीधा संबंध रखता है। यदि परिवार को जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ और सुरक्षित आजीविका का अधिकार नहीं मिलता है तो स्वाभाविक है कि कुपोषण की समस्या को समाप्त नहीं किया जा सकेगा। अब जबकि यह पता चल ही गया है कि मध्यप्रदेष में कुपोषण घटने के बजाय बढ़ रहा है तो इसका मतलब यह है कि सरकार को यह मान लेना होगा कि वह जनकल्याणकारी योजनाओं और रोजगार-आजीविका के क्षेत्र में जनोन्मुखी पहल नहीं कर पाई है। यहाँ ये भी आवश्यक है कि हम सरकार केवल उन्हें न माने, जो सत्ताा में हैं, बल्कि वे भी इसमें भागीदार है जो चुने हुये जनप्रतिनिधि हैं और किसी न किसी रूप में नीतियां बनाने, निगरानी करने का काम करते हैं। इन परिवारों की जिम्मेदारी समाज को भी उतनी ही गंभीरता से स्वीकार करना होगी; क्योंकि समाज का मौन,संकटकोविकरालबनारहाहै।
आंगनबाड़ी
सबसे अहम् जवाब तो यही है कि बच्चों की खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दे को मुख्यधारा के विकास का केन्द्रीय विषय माना ही नहीं गया है। इसके लिये एकीकृत बाल विकास परियोजना चला कर सरकार ने अपने काम को पूरा मान लिया।
आइसीडीएस (समेकित बाल विकास परियोजना)योजना का सच भी कुछ कम कड़वा नहीं है। वर्ष 2001 से 2005 तक की अविध में महिला एवं बाल विकास विभाग को कुल 1685.64 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया जिसमें से महज 1210.34 करोड़ रुपये की राषि खर्च हो पाया। यानी 475.30 करोड़ रुपये तो उपयोग में ही नहीं आ पाया। एक तरह से पांच में से दो वर्ष का बजट ही खर्च नहीं हो पाया। विष्लेषण से पता चलता है कि प्रदेष के 1.06 करोड़ बच्चों को पोषण और स्कूल पूर्व षिक्षा का अधिकार उपलब्ध कराने हेतु 6500 करोड़ रुपये पोषण आहार के लिये, आंगनबाड़ियों के रखरखाव के लिये 125 करोड़ रुपये और नई आंगनबाड़ियों के रखरखाव के लिए 650 करोड़ रुपये की जरूरत है। दूसरे अर्थों में सरकार को यदि वास्तव में बच्चों के प्रति संवेदनषीलता दर्षानी है तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को मुफ्त जमीन बांटने के बजाय इस क्षेत्र में प्रावधान को चार गुना बढ़ाना होगा।
पीड़ा देने वाली बात तो यही है कि अभी प्रदेष में कुल 23 फीसदी बच्चे ही आंगनबाड़ियों में दर्ज हैं यानी सामान्य बच्चों तक पहुंचने की बात तो दूर, हम अभी कुपोषित बच्चों तक भी नहीं पहुंच पाये हैं। मध्यप्रदेष के संदर्भ में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षा के महालेखाकार की रिपोर्ट सच्चाई को यह कहकर और कड़वा बना देती है कि यह कार्यक्रम 52 से 62 फीसदी बच्चों और 46 से 59 फीसदी गर्भवती-धात्री महिलाओं तक अंषमात्र भी नहीं पहुंचता है।
निगरानी व्यवस्था चरमराई हुई है। कुपोषण और बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े प्रयासों के प्रति राजनैतिक प्रतिबध्दता का अभाव भी साफ तौर पर देखा जा सकता है। अब न तो समुदाय स्वयं कोई सवाल-जवाब करने को तैयार है और न ही बच्चे को भूख से लिपटकर सोते देखते हुये किसी आम आदमी का खून खौलता है। ऐसे में कुपोषण के बढ़ते दायरे के लिये केवल सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। एनएफएचएस के दूसरे सर्वेक्षण्ा के बाद वर्ष 2001 सें सरकार ने कुपोषित बच्चों की पहचान के लिये बाल संजीवनी अभियान शुरू किया है, पर यह अभियान भी बच्चों को केवल तराजू में बिठाकर बच्चों का वजन मापने की गतिविधि तक सीमित रह गया है। आज भी हजारों बस्तियां, बसाहट और गांव आंगनबाड़ी विहीन है जहां तक न तो नियमित रूप से पोषण आहार पहुंचता है न ही बच्चों के विकास के लिये कोई शैक्षिक गतिविधियां आयोजित होती हैं। यह सही है कि इस मुद्दे पर अब राज्य और केन्द्र सरकार टकराव की मुद्रा में आमने-सामने हैं। क्योंकि राज्य सरकार बाल संजीवनी अभियान के दस्तावेजों के आधार पर कहती है कि मध्यप्रदेष में कुपोषण घटकर 49 प्रतिषत के स्तर पर आ गया है। और दावा यह है कि सरकार ने सत्तार लाख बच्चों की जांच की है, पर सच यह भी है कि उन 70 लाख बच्चों तक पोषण आहार और स्वास्थ्य सेवायें नहीं पहुंची हैं तो स्वाभाविक रूप से कुपोषण में कमी के दावे पर सवाल उठता ही है। राज्य सरकार को अब यह कोषिष करना चाहिये कि वह कुपोषण के मुद्दे को विवादास्पद न बनाये।
झाबुआ जिले का आदिवासी बहुल कोटड़ा गांव 12 फलियों में बंटा हुआ है। परन्तु कुपोषित बच्चों की पहचान और उपचार के लिये चलाये जा रहे बाल संजीवनी कुपोषण निवारण अभियान के तहत इस में भी केवल एक ही दिन मेला लगा, ताकि औपचारिकता पूरी की जा सके। अंतत: सरकार यह मानने लगी है कि कुपोषण गंभीर है। पर क्या इससे निपटने के लिये उसके पास प्रतिबध्दता है?
राजनैतिक प्रतिबध्दता का कितना गंभीर अभाव है इस बात का प्रमाण इन अनुभवों से मिल जाता है कि आंगनबाड़ी केन्द्रों को संचालित करने में ग्रामसभा और पंचायतों को सुझाव देने का अधिकार है, पर उन सुझावों को स्वीकार-अस्वीकार करने का हक अफसरों के पास ही है। जब पोषण आहार आंगनबाड़ी केन्द्र पर पहुंचेगा तो पंचायतों को यह देखना है पोषण आहार बंटे; परन्तु इस सच्चाई से उनका कोई वास्ता नहीं होगा कि गांव में साल भर में 9 महीने पोषण आहार पहुंचता ही नहीं है। मध्यप्रदेष में कुपोषण दूर कैसे होगा, जबकि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को पिछले चार-पाँच महीने का मानदेय तक नहीं मिला है और बच्चों के लिये आवंटित तेल, कंघी, दवाओं और खिलौनों की राषि भ्रष्ठाचार की भेंट चढ़ रही हो?
बच्चों की स्वास्थ्य सेवाओं हेतु आंगनबाड़ी केन्द्र भी खोले गए, पर बसाहटों में आंगनबाड़ी केन्द्र होने के वाबजूद भी बच्चों तक इन सेवाओं का लाभ नहीं पहुंच पा रहा है। एनएफएचएस-3 के अनुसार 6 वर्ष से कम आयु के महज 43.8 फीसदी बच्चे ही आंगनबाड़ी सेवाओं का लाभ उठा पायें हैं। हालांकि बच्चों को संपूरक भोजन मुहैया कराने की जिम्मेदारी आंगनबाड़ी केन्द्रों की है, पर मध्यप्रदेष में लगभग आधे बच्चे (49.8 प्रतिषत) ही इस सुविधा का लाभ उठा पाए हैं। आंगनबाड़ी केन्द्र में गर्भवती महिलाओं को पोषण आहार देने का भी प्रावधान है परंतु मध्यप्रदेष में केवल 31 प्रतिषत गर्भवती व धात्री महिलाएं ही इस सेवा का लाभ उठा पा रही हैं, केवल 25.1 प्रतिषत महिलाओें के स्वास्थ्य की जांच आंगनबाड़ी केन्द्र में हुई हैं व 21.7 प्रतिषत महिलाओं को ही आंगनबाड़ी केंद्र से स्वास्थ्य व पोषण पर कोई जानकारी मिली हैं।
बच्चों में एनेमिया
भारत में बच्चों में खून की कमी (एनेमिया) जैसे एक आम बात हो गई है। एनएफएचएस - 3 सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 6-9 वर्ष की आयु के 10 में से 7 बच्चे (69.5 प्रतिषत) रक्तअल्पता (एनीमिया) से ग्रसित हैं, जिनमे 3 प्रतिषत गंभीर रूप से एनेमिया की चपेट में हैं। इसी सर्वेक्षण के अनुसार ग्रमीण क्षेत्र, निम्न परिवार, अनुसूचित जाति व जनजाति में एनेमिया का संकट दूसरे समूहों के मुकाबले अधिक विकट है। मध्यप्रदेष की बात की जाए तो देष में खून की कमी से जुझते बच्चों के मामले में बिहार (78 प्रतिषत) के बाद मध्यप्रदेष का द्वितीय स्थान है। यहां 4 में से तकरीबन तीन बच्चे (74.1 प्रतिषत) रक्तअल्पता (एनीमिया) से ग्रस्त हैं।
साफ़ तौर पर देखा जाए तो बच्चों में रक्तअल्पता (एनीमिया) का संबंध पौष्टिक अहार की कमी, गर्भवती महिला की सही देखरेख का न होना व उचित स्वास्थ्य सेवा के अभाव से है। इनमें से किसी भी आयाम में कमी रह जाने से बच्चों में खून की कमी हो जाती है। अव्यवस्थाओं के चलते गर्भधारण के समय सही पोषण व देखरेख न मिलने के कारण मां और बच्चे में खून की कमी की समस्या बढ़ती जा रही है और दिन ब दिन अधिकाधिक बच्चे रक्तअल्पता (एनीमिया)कीचपेटमेंआरहेहैं। अनियमित टीकाकरण
भारत सरकार व विष्व स्वास्थ्य संगठन के टीकाकरण कार्यक्रम के अनुसार प्रत्येक षिषु के 12 माह के हो जाने तक उसे सभी प्राथमिक टीके लगा दिये जाना चाहिए, परं एनएफएचएस-3 के अनुसार मध्यप्रदेष में केवल 40.3 प्रतिषत बच्चों का ही पूर्ण टीकाकरण हो पाया है, इनमें भी षहरी क्षेत्र के 69 प्रतिषत की तुलना में ग्रामीण क्षेत्र में महज 32 प्रतिषत बच्चे ही पूर्ण टीकाकरण करवा पाए हैं। राज्य में 5 प्रतिषत बच्चे ऐसे भी हैं जिन्हें किसी प्रकार का टीका नहीं लगा है। नियमित टीकाकरण के अभाव में बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमताएं क्षीण हो जाती है जिससे वह साधारण बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं।
जनसंख्या शोध केंद्र, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार ने मध्यप्रदेष के बच्चों के टीकाकरण के संदर्भ में एक शोध रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार 12 से 36 माह की आयु के बच्चों में से केवल 47 फीसदी बच्चों का ही पूर्ण टीकाकरण हो पाया है एवं 13 फीसदी बच्चों का किसी प्रकार का टीका नहीं लगा है। रिपोर्ट के अनुसार 45 जिलोें में से 3 जिलों में 75-100 फीसदी, 21 जिलों में 50-74 फीसदी, 17 में 25-49 फीसदी और 4 जिलों में 0-24 फीसदी तक टीकाकरण हुआ है। है। टीकाकरण सेवाओं की उपयोगिता में राज्य के अलग-अलग संभागों एवं क्षेत्रों में विविधता देखने की मिलती है। राज्य के दक्षिण पष्चिमी भागों में टीकाकरण
सर्वाधिक बच्चों को मिला है, वहीं विंध्य क्षेत्र में यह सबसे निम्न है। बालाघाट जिला अव्वल स्थान पर है, यहां 90 फीसदी बच्चों का टीकाकरण हुआ है। पन्ना में केवल 11 फीसदी बच्चे ही टीकाकरण का लाभ उठा पाए हैं। इसके साथ ही मुरैना, झाबुआ एवं टीकमगढ़ जिलों भी टीकाकरण के मामले काफी पीछे हैं।
टीकाकरण के अभाव में बच्चों की मौत
मध्यप्रदेष विधान सभा के मानसून सत्र में 9 अगस्त 2005 के अतारांकित प्रष्न संख्या 57/2355 के माध्यम से विधायक गजराज सिंह सिकरवार ने यह प्रष्न पूछा कि ग्वालियर ग्वालियर चंबल संभाग में जनवरी-जून 05 तक मीजल्स एवं चिकन पॉक्स कितनी जगह मामले आए और इससे कितने बच्चों की मौत हुई एवं टीकाकरण की
क्या स्थिति है? इसके लिखित जवाब में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री रूस्तम सिंह का यह जवाब आया कि उक्त क्षेत्र में 4 जगह बीमारी के प्रकरण आए, 10 बच्चों की मौत हुई।
यदि रोग प्रतिरोधक टीकों की बात की जाए तो 71 फीसदी बच्चों को बी.सी.जी., 62 फीसदी को डी.पी.टी.की तीन खुराक, 71 फीसदी को पोलियो की तीन खुराक एवं 57 फीसदी को खसरे की तीन खुराक मिल पाए हैं। मध्यप्रदेष में एक तिहाई से भी कम बच्चों को विटामिन ए की खुराक मिल पाई है एवं 5 फीसदी बच्चों को आयरन की गोलियां मिल पायी हैं।
बच्चों का स्वास्थ्य और वंचित समुदाय
यूं तो मध्यप्रदेश में अनेक जनजातियां निवास करती हैं पर इनमें बैगा एवं सहरिया जनजातियों के वनोंपज पर अधिकाधिक निर्भरता होने के कारण इनकी स्थितियों को समझना बहुत ही जरूरी है। सरकार की वन नीतियों एवं कानूनों का प्रकोप अपनी अपनी आजीविका और जीवन शैली पर झेल रहे ये समूह विकास की दौड़ में हाषिये पर ढकेले जा चुके हैं। इसी कारण इन समूहों के बच्चों के स्वास्थ्य का मुद्दा और गंभीर हैं।
बैगा आदिवासी के संदर्भ में - बैगा आदिवासी बहुल मंडला जिले के खटिया-नारंगी गांव में बैगा आदिवासी षिवकली ने 4 अप्रैल 2007 को अपनी झोपड़ी में संग्राम सिंह को जन्म दिया था। उसकी जचकी गांव की ही दाई जेठीबाई ने करवाई थी। इसी गांव में सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है। खास बात यह है कि यह गांव मुख्यधारा से बहुत दूर नहीं है। यह दुनिया के जाने माने कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के बिल्कुल प्रवेष द्वार पर मेन रोड पर बसा हुआ गांव है। आष्चर्य की बात है कि खटिया में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र की स्थापना का उद्देष्य गांव के आदिवासियों को स्वास्थ्य का अधिकार उपलब्ध करवाने के बजाय देष-दुनिया से यहां आने वाले पर्यटकों की देखभाल करना रहा है। अब इसकी खूबसूरत इमारत बन चुकी है, किन्तु पिछले एक साल में इस अस्पताल में हर रोज तीन से चार ग्रामीण ही पहुंचते हैं। खटिया के सोनसाय बताते हैं कि जब भी स्वास्थ्य केन्द्र आओ, तो यही पता लगता है कि हर कोई मीटिंग में जिला या विकासखण्ड मुख्यालय गया हुआ है। ऐसे में लोग बिछिया या मंडला जाने के लिये मजबूर हो जाते हैं। न जाने क्यों यह बात नकार दी गई कि बैगा आदिवासी (जिन्हें इंदिरागांधी ने राष्ट्रीय मानव कहा था) एक पारंपरिक व्यवस्था में रहते आये हैं। अब जंगल पर से अधिकार छिनने के कारण उनकी पारंपरिक दवायें भी उनसे छिन गई हैं। जिससे महिलायें एवं बच्चे मर रहे हैं, पर आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था उनसे बहुत दूर है।
संग्राम सिंह की मां शिवकली की मौत प्रसव के 6 दिन बाद हुर्इ्र। मां के गुजर जाने के बाद संग्राम सिंह का जीवन मझधार में आ खड़ा हुआ। जन्म के समय भी इसका वजन 2.4 किलो था, यानी उसका विकास रुक गया था। ऐसे में स्थानीय स्वास्थ्य कर्मचारियों ने उसका इलाज करने से इंकार कर दिया। अंतत: यहां के सामाजिक कार्र्यकत्ताओं की मदद से 22 मई को संग्राम सिंह नैनपुर के चिकित्सक मुकेष रूटेला के पास पहुंचा। जहां पता चला कि संग्राम सिंह 88 हजार बच्चों की तरह कुपोषण के चौथे ग्रेड में पहुंच चुका है, और संक्रमण का षिकार है। यदि उसका गंभीरता से इलाज नहीं हुआ तो संभावनायें कम ही हैं। संग्राम के परिवार ने आंखों में आंसू और गुस्से के साथ सरकारी अस्पताल से नाता तोड़ने का निर्णय ले लिया और अंतत: समाज और सरकार के रवैये की कीमत संग्राम सिंह को चुकानी पड़ी। एक माह बाद संग्राम सिंह इन सारे सवालों को हमारे बीच छोड़कर चल बसा। इतना ही नहीं इस मौत के लिए कौन जिम्मेदार है, यह कभी तय नहीं हो पाया।
यदि बच्चों की सुरक्षा सुनिष्चित करना है तो सरकार को ईमानदार और संवेदनषील व्यवहार के जरिये बैगा आदिवासियों को स्वास्थ्य व्यवस्था के करीब लाना होगा। केवल दीवार पर लिखे नारे और अविष्वसनीय आंकड़ों से षिषु और मातृ मृत्यु को कम नहीं किया जा सकेगा।
सहरिया आदिवासी के संदर्भ में - मध्यप्रदेष के सहरिया आदिवासियों के लिये जीवन का सबसे बड़ा अर्थ है उपेक्षा। राज्य की सबसे पिछड़ी हुई जनजाति के लोगों की जीवन में भुखमरी, कुपोषण और बीमारियों का चक्रवात ठीक उसी तरह निरंतरता से आता है, जिस निरंतरता से व्यापक समाज में अष्टमी, नवमी और चतुर्दषी आती है। वर्ष 2001 से यह समुदाय लाल सुर्खियों में रहा है और सुर्खियों में आने का कारण रहा है भुखमरी और बीमारी के कारण इनका सिमटता अस्तित्व। श्योपुर के गोठरा कपूरा गांव में इस बात के साफ प्रमाण मिलते हैं कि सरकारी व्यवस्था के ध्वस्त हो जाने के कारण किस तरह सहरिया एक बीमार, कमजोर और भुखमरी के षिकार समुदाय के रूप में पहचाना जाने लगा है।
48 परिवारों वाले इस गांव में हर बच्चों के शरीर पर फूट चुकी हुई फुंसियों से मवाद रिसने लगा था। पर कभी भी इस त्वचा रोग का इलाज करने की कवायद नहीं हुई। आंखों की पोरों से लेकर बालों के बीच, बांह, पेट, पीठ, नितम्ब, हथेली और तलुओं तक इस तरह के खुले घाव बच्चों के शरीर पर फैल गये थे। हर घाव पर कुछ सफेद सी दवा लगी दिखाई दे रही थी। जानने पर पता चला कि पहले एएनएम ने गांव में हर परिवार को पैरासिटामोल की गोलियां बांटी थी, उसी को पीसकर ग्रामीणों ने बच्चों के घावों पर लगा दी थी। पंसूरी बाई बताती हैं कि मक्खियों ने बच्चों के घावों पर बैठ-बैठकर न केवल परेषान कर दिया था बल्कि उनमें अंडे भी दे दिये थे जिससे उनमें छोटे-छोटे कीड़े जैसे भी पाये गये थे। एएनएम से बार-बार कहने पर भी दवा नहीं मिली, वह कहती थी साबुन से साफ कर लो, पर जब रोटी खाने के लिये लोगों के पास पैसा नहीं है तो साबुन कहा से खरीदेंगे। यदि पैसा ही होता तो किसी ओर का मुंह देखते क्या? इसीलिये सबने बुखार की गोली पीस कर घावों पर लगा दी। इससे कम से कम मक्खियां तो शरीर पर नहीं बैठेंगी। अब चूंकि एएनएम भी हर बार जांच करके दवा देने के पैसे लेती है, इसलिये बच्चों को नहीं नहलाते ताकि कहीं दवा न धुल जाये, धूल जाने पर फिर दवा के पैसे देने पड़ेंगे।
नीतिगत मसले
बच्चों के स्वास्थ्य से संबंधित नीतिगत मसलों पर ध्यान दिया जाए, तो पोषण आहार की आपूर्ति का मसला भी एक गंभीर रूप लेकर सामने आया हैं । वर्ष 2002 में सरकार ने यह निर्णय लिया था कि आंगनबाड़ियों को पोषण आहार भेजने का काम दलित-आदिवासी महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को सौंपा जायेगा। इससे 750 समूहों को फायदा होने वाला था, किन्तु वर्ष 2006 में सरकार ने नीति फिर बदल दी। अब निजी निर्माता डेढ़ सौ करोड़ रूपये का पोषण आहार बनायेगें और आंगबाड़ियों को भेजेंगे। पिछले पांच वर्षों के अनुभवों के बारे में सरकार कहती है कि दलित आदिवासी समूह अभी पोषण आहार बनाने में सक्षम नहीं है पर महालेखाकार का अध्ययन कहता है कि पोषणआहर की आपूर्ति में दो सालों में ही 20 करोड़ रुपये का घोटाला नजर आता है क्योंकि जिन स्वयं सहायता समूह वास्तव में पिछड़े समूहों की महिलायें नहीं चला रही हैं बल्कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, ठेकेदार और अफसरों के द्वारा बनाये गये समूह पोषण आहार लील रहे हैं और सजा भुगत रहे हैं दलित-आदिवासी समूह। पोषण का अधिकार कार्यक्रम क्रियान्वित करने और निगरानी करने में स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेय भूमिका अभी भी तय की जाना शेष हैं। मध्यप्रदेष का अनुभव माथे पर बल ला देता है क्योंकि यहां कुपोषण की समस्या से निपटने के लिये होने वाले सीमित प्रयासों में भी स्वास्थ्य विभाग की किंचित मात्र ही भूमिका नजर आई है। इस भूमिका की पहले जांच होना चाहिये और फिर उसमें जवाबदेहिता तय की जाना चाहिये। आष्चर्य की बात है कि प्रदेष स्वास्थ्य नीति षिषु मृत्यु दर कम करने की बात कहती है किन्तु कुपोषण को मिटाने का लक्ष्य उसकी नीति का हिस्सा नहीं है।
पिछले 25 वर्षों में मध्यप्रदेष की सरकारों ने प्राथमिकता के साथ विकास के लिये औद्योगिकीकरण की नीति को लागू किया। इस नीति से न तो प्रदेष में उत्पादक औद्योगिकीकरण हो पाया न ही कुपोषण और अन्य पोषण के संकट को चुनौती ही दी जा सकी। अब 11वीं पंचवर्षीय योजना में सरकार को पोषण की कमी को दूर करना अपना प्राथमिक लक्ष्य रखना चाहिये। इससे स्वास्थ उत्पादक बढ़ेगी। सरकार को स्वीकार करना होगा कि बीमार बच्चों से बीमार युवा पीढ़ी का निर्माण होगा और बीमार युवा पीढ़ी राज्य के सपनों को पूरा नहीं कर पायेगी। यह विष्व बैंक से आयातित विचारधारा है कि विकास से पोषण की कमी दूर होगी। पर वास्तविकता यह है कि पोषण की कमी जब तक रहेगी विकास नहीं हो पायेगा। यहां श्रीलंका जैसे गृह युध्द से ग्रस्त देष का उदाहरण रख देना निरर्थक नहीं है। श्रीलंका में पिछले तीन दषकों से अषांति का वातावरण बना हुआ है किन्तु समाज और राज्य ने महिलाओं, बच्चों के पोषण के अधिकार को संरक्षित किया जिससे तमाम विपदाओं के बावजूद भी वहां कुपोषण और मातृ मृत्यु की दर बिल्कुल नगण्य है यानी भूख से मृत्यु की संभावनायें मध्यपदेष की तुलना में साढ़े पांच गुना कम होती है।
सुझाव
वास्तव में बच्चों के स्वास्थ्य एवं पोषण के अधिकार के संदर्भ में सरकार को दो स्तरों पर प्रतिबध्दतायें तय करने की जरूरत है। पहले स्तर पर तो यह तय करना होगा कि एकीकृत बाल विकास योजना के क्रियान्वयन के
तरीके में बदलाव लाया जाए। सरकार को यह सिध्द करना होगा कि आज के परिदृष्य में आंगनबाड़ी केन्द्र सभी बच्चे के विकास का केन्द्र बने न कि किसी खास वर्ग के बच्चों का। इसे सामाजिक-आर्थिक वर्गभेद की अवधारणा से निकालना होगा।
दूसरे स्तर पर सरकार को तय करना होगा कि देष की हर बसाहट में सभी साधनों से सम्पन्न आंगनबाड़ी की स्थापना हो और यह किसी एक सरकारी विभाग का दायित्व न हो बल्कि पंचायत एवं ग्रामीण विकास, स्कूल षिक्षा, स्वास्थ्य, वित्त, आदिवासी विकास जैसे विभागों की स्पष्ट भूमिकायें इस योजना में तय र्हों।
जहां तक आर्थिक संस्थाधनों की जरूरत का सवाल है, सरकार को अपने दस्तावेज के पहले वाक्य में यह कहना चाहिये कि इस योजना के लिये किसी भी तरह का आर्थिक संकट नहीं आने दिया जायेगा।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से जिस तरह के काम की अपेक्षा की जाती है उसके अनुरूप न तो उसे मानदेय दिया जाता है न ही सम्मान और न ही प्रषिक्षण। वह जनगणना का भी सर्वे कर रही है और षिक्षा का भी; एक तरह से वह शोषितों की नई जमात का रूप ले रही है। उनकी भूमिका के संदर्भ में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को एक सरकारी बाबू के बजाय रचनात्म्क कार्यकर्ता की भूमिका निभाने का अवसर दिया जाना चाहिये।
वैष्विकीकरण के समर्थक नीति निर्माताओं को यह जान लेना होगा कि कुपोषण से मुक्ति एवं बच्चों के लिये किया गया व्यय कोई रियायत ;ैनइेपकलध्द नहीं बल्कि बेहतर विकास के लिये किया गया निवेष है।
बच्चों के स्वास्थ्य की समस्या एक जटिल समस्या है और यह मसला परिवार से भी जुड़ा है इसलिए घरेलू खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है और यह तभी संभव है जब गरीब समर्थक नीतियां बनाई जाए, जो कुपोषण और भूख को समाप्त करने के प्रति लक्षित हों।
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