PovertyMedia and Rights Food Security Livelihood Disability Women Rights Globalisation Health Social Exclusion Education Child Rights Environment Right to Information and Governance

 

     
 
| Print this Page
 
     
  YOU ARE HERE: Home > Infopack > Madhya Pradesh Ke Upekshit Tabake Mein Bal Mrityu Ke Mool Karan  
     
  मध्यप्रदेश के उपेक्षित तबके में बाल मृत्यु के मूल कारण
स्वास्थ्य के सभी मानकों पर लड़ाई हारते आदिवासी
 
     
 

भोपाल में हाल ही में जारी की गई एनएफएचएस-3 की मध्यप्रदेश केंद्रित रिपोर्ट में जो चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत की गई है उससे पता चलता है कि प्रदेश का आदिवासी समुदाय तमाम स्वास्थ्य मानकों की लड़ाई हारने की कगार पर खड़ा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक आदिवासी समुदाय के हर 1000 जीवित जन्म लेने वाले बच्चों में से 140 बच्चे दम तोड़ देते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि आदिवासियों में 14 फीसदी बच्चे अपना 5वां जन्मदिन मनाने के लिए जीवित ही नहीं बचते। यह मध्यप्रदेश की जन्म के पांच के भीतर होने वाली शिशुओं की औसत बाल मृत्यु दर 94.2 प्रति हजार से बहुत ज्यादा है।

नवजात मृत्यु : इसका अर्थ उन मौतों की संख्या से है जो किसी भी वर्ष में जीवित जन्म लेने वाले प्रति हजार शिशुओं में 28 दिन के भीतर हो जाती हैं।
शिशु मृत्यु दर: इसका अर्थ प्रति हजार जीवित जन्म लिए शिशुओं में से दम तोड़ देने उन शिशुओं की संख्या है जो अपना एक वर्ष भी पूरा नहीं कर पाते।
बाल मृत्यु दर: या पांच वर्ष के भीतर मृत्यु दर से अभिप्राय उन बच्चों की संख्या से है जो प्रति हजार जीवित बच्चों में से पांच वर्ष की उम्र पूरी नहीं कर पाते।

मध्यप्रदेश में आदिवासियों में हर एक हजार बच्चों में 56 बच्चे जन्म लेने के 28 दिनों के भीतर ही दम तोड़ देते हैं। वहीं प्रति हजार में 44.9 बच्चे अपना पहला जन्मदिन नहीं मना पाते। जबकि राज्य में यह औसत 69.5 का है। जाहिर बात है कि मध्यप्रदेश के आदिवासी समुदाय में बच्चों की जिंदगी चिंता का एक बड़ा विषय है।

इसी तरह आदिवासी बच्चों में कुपोषण एक बड़ी समस्या है। अगर राज्य के स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों पर नजर डालें तो हम देखते हैं कि आदिवासियों के 60 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं, लेकिन एनएफएचएस-3 की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक आदिवासी समुयदाय के 60 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के दंश के साथ जीवन बिता रहे हैं।

देश के कुल नवजात मृत्यु दर और बाल मृत्यु दर में मध्यप्रदेश सबसे बड़े योगदानकर्ता प्रदेशों में से एक है। एनएफएचएस-3 की सर्वेक्षण रिपोर्ट में मध्यप्रदेश के बच्चों के स्वास्थ्य देखभाल की चिंताजनक तस्वीर साफ तौर पर देखी जा सकती है। खासकर जाति आधारित बच्चों की स्वास्थ्य संबंधी स्थिति की रिपोर्ट से पता चलता है कि हर बच्चे के जीने के अधिकार की रक्षा के लिए अभी बहुत गंभीर प्रयास किए जाने की जरूरत है।

मध्यप्रदेश के आदिवासियों में शिशु मृत्यु और बाल मृत्यु दर
राज्य शिशु मृत्यु दर बाल मृत्यु दर
मध्यप्रदेश 95.6 140.4
छत्तीसगढ़ 90.6 128.5
राजस्थान 73.2 113.8
गुजरात 86.0 115.8
झारखंड 93.0 138.5
उड़ीसा 78.7 136.3

प्रदेश के पिछड़े तबके तथा आदिवासी अभिभावकों के लिए उनके बच्चों का बेहतर स्वास्थ्य अभी भी दिन में सपने देखने जैसा ही है। प्रदेश के आदिवासियों में जन्म लेने वाले प्रति हजार जीवित शिशुओं में से 56.5 शिशु अपने शुरुआती 28 दिनों में ही प्राण त्याग देते हैं। इसी तरह अनुसूचित जाति के प्रति हजार जीवित नवजात शिशुओं में से 50.2 शिशु अपने जीवन का एक माह भी पूरा नहीं कर पाते हैं। 

अजा/जजा नवजात मृत्यु दर शिशु मृत्यु दर बाल मृत्यु दर
भारत 39 57 74.3
मध्यप्रदेश 44.9 69.5 94.2
अनुसूचित जाति 50.2 81.9 110.1
अनुसूचित जनजाति 56.5 95.6 140.7
अन्य पिछड़ी जातियां 53.3 79 97.6
अन् 39.6 68.8 79.9

मध्यप्रदेश में अनुसूचित जाति (15.17) तथा अनुसूचित जनजाति (20.27) को मिला दें तो ये प्रदेश की कुल आबादी का 34.44 प्रतिशत हिस्सा होते हैं। लेकिन यह बेहद चिंता और अफसोस की बात है कि समाज के इस वर्ग को इस बात का कोई भरोसा नहीं है कि उनके बच्चे कल का सूरज देख पाएंगे या नहीं। मध्यप्रदेश के प्रति हजार जीवित जन्म लेने वाले बच्चों में पांच वर्ष के भीतर दम तोड़ देने वाले 94.2 बच्चों की तुलना में अनुसूचित जाति के बच्चों में पांच वर्श के भीतर दम तोड़ने वाले बच्चों की संख्या 110 प्रति हजार तथा अनुसूचित जनजाति में ऐसे बच्चों की संख्या 140 प्रति हजार है।

मध्यप्रदेश के अनुसूचित जाति व जनजाति के बच्चों में नवजात, शिशु व बाल मृत्यु दर की इस बढ़ी हुई संख्या के पीछे के कारणों पर अगर गौर किया जाए तो हम पाते हैं कि इस वर्ग के बच्चों में कुपोषण तथा एनीमिया की अधिकता, स्तनपान की कमी के अलावा किसी भी तरह के टीकाकरण का न होना ही मुख्य प्रभावी कारण हैं। 

मध्यप्रदेश में अनुसूचित जाति, जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग के बच्चे स्वास्थ्य सूचकांक के सभी पैमानों पर लगभग असुरक्षित हैं। आदिवासी बच्चों के जीवित रह पाने के अवसर बेहद सीमित हैं; इनमें 71.4 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं, 82.5 प्रतिशत बच्चे विभिन्न स्तरों की एनीमिया से पीड़ित हैं। वहीं बीते पांच वर्षों में ऐसे आदिवासी बच्चों की संख्या महज 11.7 प्रतिशत थी जो जन्म के एक घंटे की अवधि के भीतर स्तनपान कर सके थे। वहीं प्रदेश में ऐसे बच्चों की संख्या 15.9 प्रतिशत थी। इसी तरह आदिवासियों में महज 23.3 प्रतिशत बच्चे ही ऐसे हैं जिन्हें सभी बुनियादी टीके लगाए जा सके हों।

अजा/जजा बच्चों में किसी भी स्तर का एनीमिया जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान सभी बुनियादी टीकाकरण (12 से 23 माह) बच्चों में कुपोषण (0.3वर्ष) -2एसडी से कम का प्रतिशत
मध्यप्रदेश 74.1 15.9 40.3 60.3
अनुसूचित जाति 75.6 17.4 40.5 62.6
अनुसूचित जनजाति 82.5 11.7 22.3 71.4
अन्य पिछड़ी जातियां 70.6 16.8 41 57.4
अन्य 68.5 18.2 62.4 45.3

विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के ताजा मानकों के मुताबिक बेहद कम कुपोषण की ग्रेडिंग के लिए जेड-स्कोर या एसडी सिस्टम का इस्तेमाल करें।

अगर अन्य पिछड़ी जातियों के बच्चों की अनुसूचित जाति के बच्चों से तुलना की जाए तो हम देखते हैं एनीमिया, स्तनपान तथा कुपोषण जैसे मामलों में अनुसूचित जाति के बच्चों से अन्य पिछड़ी जातियों के बच्चों की स्थिति थोड़ी बेहतर है। अनुसूचित जाति के बच्चों में जहां 75.6 प्रतिशत बच्चे एनीमिया के शिकार हैं वहीं अन्य पिछड़ा वर्ग के 70.6 प्रतिशत बच्चे ही एनीमिया से पीड़ित पाए गए। इसी तरह अगर कुपोषण के मामले को देखें तो हम पाते हैं कि राज्य के बच्चों में औसत 60.3 प्रतिशत कुपोषण की तुलना में अनुसूचित जनजाति के बच्चों में जहां 62.3 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं वहीं पिछड़े वर्ग के बच्चों में 57.4 प्रतिशत बच्चों में कुपोषण पाया जाता है। लेकिन अगर हम समग्र तौर पर देखें तो साफ तौर पर कहा जा सकता है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के बच्चे निश्चित तौर पर स्वास्थ्य और जिंदगी की लड़ाई में खतरे में हैं।

सबसे चिंताजनक विषय तो यह है कि शिशु व बाल मृत्यु दर के बेहद ज्यादा होने के बावजूद समाज के इस उपेक्षित तबके लिए कुछ खास प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। अभी भी आदिवासियों में 0-71 माह के महज 51.9 प्रतिशत बच्चे ही ऐसे हैं जिन्हें आंगनवाड़ी केंद्रों की किसी तरह की सुविधा मिल पा रही हो। इससे एकीकृत बाल विकास परियोजना के उस मुख्य लक्ष्य व उसके पूरा होने के दावों पर बड़ा सवालिया निशान लग जाता है जिसमें छह वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों को पोषण व स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं मुहैया कराने व उनका स्वास्थ्य स्तर बेहतर बनाने की बात कही गई है

 
     
  Next Article  
  Infopack Main Page  
  Infopack Archives