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मध्यप्रदेश के शिशुओं व बच्चों में अतिसार

 
     
 

अतिसार घड़ी

  • अतिसार व इससे संबंधित बीमारियों से हर साल 20 लाख बच्चों की मौत।
  • इनमें से 80 प्रतिशत की मौत उनके जीवन के प्रथम दो वर्षों में ही हो जाती है।
  • हर हफ्ते 38,000 बच्चों की मौत।
  • एक दिन में 5400 मौतें।
  • हर घंटे 225 मौतें।
  • चार मौतें प्रति मिनट
  • हर 16 सेकंड में एक मौत।

अतिसार क्या है ?

अतिसार एक ऐसी बीमारी है जो लगभग सभी उम्र के लोगों को अपना शिकार बनाती है। इनमें अक्सर बच्चों की संख्या ज्यादा होती हैं। हालांकि इस बीमारी से आसानी से बचाव किया जा सकता है लेकिन लोगों में जागरूकता का अभाव तथा बीमारी पर नियंत्रण पाने की जानकारी का न होना इसमें बाधक बनता है।

अतिसार अपने आप में कोई बीमारी नहीं होती है। इसे कई दूसरी बीमारियों के लक्षण के तौर पर देखा जा सकता है। अतिसार का अर्थ है, बार-बार पतली या पानीदार दस्त का आना। साथ ही रोगी को पेट में दर्द होता है जो अक्सर दस्त के बाद कम हो जाता है या खत्म हो जाता है। गंभीर अतिसार अचानक ही अल्प समय के लिए बच्चों या बड़ों को अपना शिकार बना सकता है। वहीं लंबे समय तक व्यक्ति का अतिसार से पीड़ित बने रहने पर उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। अतिसार की स्थिति में शरीर में पानी और नमक की कमी हो जाती है। इसके चलते रोगी निर्जलीकरण का शिकार हो जाता है। यह स्थिति बेहद गंभीर होती है और जगह फौरन आवश्‍यक उपचार नहीं किया गया तो इसका नतीजा मरीज की मौत के तौर पर सामने आता है।

शिशुओं व बच्चों में अतिसार का प्रभाव:

पूरी दुनिया में अतिसार के कारण करीब एक करोड़ बच्चों की हर वर्ष मौत हो जाती है। इनमें से 20 फीसदी बच्चों की मौत अतिसार से संबंधित संक्रमणों के चलते होती है। बच्चे अपनी प्रारंभिक अवस्था में अतिसार सरीखी बीमारी के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं। औसतन एक बच्चा अपने पांच वर्ष के जीवन काल में 10-15 बार अतिसार की बीमारी से पीड़ित होता है। इनमें तीन से पांच बार तो उसे पहले वर्ष में ही अतिसार से जूझना पड़ता है। अतिसार से पीड़ित रहने के दौरान बच्चों के शरीर से भी उतना ही पानी और अन्य लवणीय तत्वों की कमी हो जाती है जितनी किसी वयस्क के शरीर में इस बीमारी के दौरान होती है। पांच किलो वजन के एक बच्चे के शरीर के एक लीटर पानी की कमी का होना 60 किलो वजन के किसी वयस्क की तुलना में ज्यादा खतरनाक होता है। कुछ मामलों में तो यह जानलेवा भी साबित हो सकता है। अगर शरीर में पानी और लवणों की कमी को तत्काल पूरा नहीं किया गया तो रोगी के शरीर में निर्जलीकरण की स्थिति बन जाती है।

अतिसार के लक्षण:  

अतिसार के कुछ मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:

  • बार-बार, पानीदार दस्त का होना।
  • भूख का न लगना।
  • अरुचि होना या उबकाई आना।
  • उल्टी होना।
  • पेट में दर्द होना।
  • उदर में दर्द व मरोड़ उठना।
  • निर्जलीकरण होना।
  • बुखार।
  • शरीर में झुनझुनी या सनसनी होना।
  • बैक्टीरिया व परजीवी के संक्रमण के कारण कई बार दस्त में खून आना।

अतिसार के कारण :

अतिसार का कोई एक नियत कारण नहीं है, यह विविध कारणों से हो सकता है। मसलन, बासी या गंदा खाना, संक्रमण आदि। अतिसार आंत में वाइरल फ्लू के कारण भी हो सकता है। अक्सर अतिसार तब होता है जब छोटी या बड़ी आंत की त्वचा पर खुजली या छिलने जैसी हालत होती है। इसके चलते सामान्य दस्त में पानी की मात्रा अक्सर बढ़ जाती है। 

यूं तो अतिसार के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन उनमें से कुछ मुख्य कारण नीचे दिए गए हैं:

  • बैक्टीरिया के कारण संक्रमण: दूषित भोजन अथवा गंदे पानी के सेवन की वजह से शरीर में आने वाले कई बैक्टीरिया अक्सर अतिसार का मुख्य कारण बनते हैं।
  • वाइरस से होने वाला संक्रमण: अतिसार के लिए अक्सर कई तरह के वाइरस या विषाणु भी जिम्मेदार होते हैं। इनके मुख्य नाम हैं, रोटावाइरस, नारवाक वाइरस, साइटोमेगालोवाइरस, हरपीस सिंप्लेक्स वाइरस तथा वाइरल हेपेटाइटिस। 
  • परजीवी संक्रमण: कई बार विभिन्न तरह के परजीवियों के संक्रमण के कारण में अतिसार हो सकता है।
  • अन्य कारण: अतिसार होने के अन्य कारणों में खाने के दौरान बरती गई लापरवाही, कई दवाईयों की विपरीत प्रतिक्रिया, आंतों की बीमारी व आंतों में जलन संबंधी अनियमितता।

अतिसार के चिकित्सकीय प्रकार

पानी जैसा अतिसार : इस किस्म का तीक्ष्ण अतिसार होने पर लगातार पानीदार दस्त होने लगते हैं। इसमें अक्सर खून नहीं दिखाई देता; यह अतिसार सात से 14 दिनों तक मरीज को पीड़ित कर सकता है। इसमें मरीज को उल्टी की शिकायत होती है और उसे बुखार भी बना रहता है। ऐसे तीक्ष्ण अतिसार से पीड़ित होने की हालत में मरीज को निर्जलीकरण की शिकायत होती है, भूख न लगने के कारण उसकी खराक  भी कम हो जाती है। इसके चलते वह कुपोषण का शिकार हो जाता है। ऐसे मरीजों की कई बार गंभीर निर्जलीकरण होने की वजह से मौत भी हो जाती है। यह रोटावाइरस की वजह से होता है।

पेचिश: पेचिश दरअसल इस तरह का अतिसार है जिसमें दस्त के साथ साफ तौर पर खून का निकलना भी देखा जा सकता है। पेचिश की वजह से मरीज की भूख खत्म हो जाती है, इससे उसका वजन काफी तेजी से कम हो जाता है और हमलावर बैक्टीरिया की वजह से आंतों की झिल्ली को काफी नुकसान हो जाता है। पेचिश की वजह से रोगी को कई और परेशनियों से भी जूझना पड़ता है।

दीर्घावधि का अतिसार : इसके तहत अतिसार मरीज में लंबे समय तक, अक्सर कम से कम 14 दिनों तक बना रहता है। इसकी शुरुआत पानीदार दस्त या फिर पेचिश से हो सकती है। इसमें शरीर का वजन कम होना आसानी से देखा जा सकता है। इसमें पानीदार दस्त काफी ज्यादा होत हैं और अक्सर इसका नतीजा निर्जलीकरण के तौर पर देखा जा सकता है। इसे क्रोनिक या चिरस्थाई अतिसार समझने की भूल नहीं करनी चाहिए जो वास्तव में गैर संक्रमित बीमारियों की वजह से होता है और मरीज में लंबे समय तक बना रहता है।

मध्यप्रदेश में अतिसार प्रबंधन की स्थिति

अतिसार पूरी दुनिया में पांच वर्ष से कम आयुवर्ग के बच्चों की मौत के सबसे सामान्य कारणों में से एक है। इसके बाद श्‍वसन संबंधी संक्रमण की बारी आती है। अगर विश्‍व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट देखें तो हमें पता चलता है कि विकासशील देशों में इस बीमारी से हर साल करीब बीस लाख बच्चों की मौत हो जाती है। अगर बच्चों के अतिसार पर काबू पाने के लिए फौरन जरूरी उपाय नहीं किए गए तो विश्‍व के तमाम देश चौथे सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य यानी वर्ष 2015 तक बाल मौतों में दो तिहाई की कमी लाने के लक्ष्य को पूरा कर पाने में सफल नहीं हो पाएंगे।

अगर हम भारत में अतिसार के संदर्भ में बच्चों के स्वास्थ्य की स्थिति पर एक नजर डालें, खासकर मध्यप्रदेश के संदर्भ में, तो हमें साफ तौर पर पता चलेगा कि यहां छोटे बच्चों की जान काफी हद तक खतरे में है। एनएफएचएस-3 की सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक सभी बच्चों में 9 प्रतिशत बच्चे अतिसार पीड़ित हैं। इनमें से एक प्रतिशत ऐसे हैं जिन्हें गंभीर किस्म का अतिसार है व उनके दस्त में खून भी जाता है। अगर वर्ष 2001 के मध्यप्रदेश की जनसंख्या के आंकड़ों पर गौर करें तो हमारे सामने यह तथ्य आता है कि पांच वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों की संख्या 1,06,18232 प्रदेश की कुल आबादी का 17.59 प्रतिशत है।

इसका सीधा मतलब यह हुआ कि प्रदेश के करीब 10 लाख बच्चे अतिसार से पीड़ित हैं उनमें से करीब एक लाख (106182.30) गंभीर किस्म के अतिसार से जूझ रहे हैं। अगर उन्हें समय पर सही उपचार मुहैया नहीं कराया गया तो ये मौत के मुंह में समा सकते हैं। उधर मध्यप्रदेश सरकार यह कहकर सच पर परदा डालने की कोशिश में जुटी हुई है कि जनवरी 2004 से अगस्त 2008 तक यानी साढ़े तीन वर्ष की अवधि में अतिसार से केवल वयस्कों समेत कुल 855 लोगों की मौत हुई है।

अगर हम सार्वजनिक स्वास्थ्य व परिवार कल्याण विभाग के आंकड़ों को सही मानें तो इसका मतलब यह होगा कि अतिसार से पीड़ित सौ फीसदी बच्चे राज्य सरकार के ओरल रिहाईड्रेशन उपचार के तहत आते हैं और सभी को समय पर उपचार भी मिल रहा है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि एनएफएचएस-3 की सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक अतिसार के उपचार व प्रबंधन संबंधी सरकारी कवायद प्रदेश के अतिसार पीड़ित 26 प्रतिशत बच्चों तक नहीं पहुंच पा रही है। यह नतीजा सर्वेक्षण के दौरान शुरुआती दो हफ्तों में इन 26 प्रतिशत बच्चों को किसी भी तरह का उपचार न मिल पाने से निकाला गया है। सरकारी व्यवस्था के तहत अतिसार से पीड़ित हर 6 से 10 बच्चों को एक स्वास्थ्य रक्षक की ओर से जरूरी सलाह या उपचार दिया जाना चाहिए।

मध्यप्रदेश में अतिसार से पीड़ित बच्चों में से महज 58.1 प्रतिशत ही स्वास्थ्य सेवाओं के लिए ले जाए जाते हैं जबकि राष्‍ट्रीय स्तर पर यह औसत 59.8 प्रतिशत का है। इसी तरह ओरल रिहाईड्रेशन उपचार के तहत महज 29.8 प्रतिशत बच्चों ही ओआरएस पैकेट से उपचार की सुविधा मिल पाती है वहीं 25 प्रतिशत बच्चों को ही अतिसार के होते हुए दो हफ्तों की अवधि में दलिया मिल पाया है। जबकि 44.2 प्रतिशत बच्चों को ओआरएस या दलिया में से कोई एक चीज मिल पाई है। अतिसार से पीड़ित बच्चों को मौत के मुंह में जाने से बचाने के लिए उनका उपचार बेहद जरूरी है लेकिन सच्चाई यही है कि 22.7 प्रतिशत बच्चे अब भी अतिसार से पीड़ित होने के बावजूद किसी भी तरह का उपचार नहीं हासिल कर पा रहे हैं।

अगर हम 0-59 माह की आयुवर्ग के बच्चों को देखें तो 6-11 माह की आयुवर्ग के बच्चे अतिसार के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील माने जाते हैं। मध्यप्रदेश में 6 से 11 माह की आयुवर्ग के 26.6 प्रतिशत बच्चे अतिसार से जूझ रहे हैं जबकि राष्‍ट्रीय स्तर पर यह औसत महज 18.1 प्रतिशत का है। लेकिन भारत में अक्सर इस उम्र के बच्चों में अतिसार की बीमारी को यह कहकर टाल दिया जाता है कि उनमें दांत आने की वजह से पतली दस्त होना आम बात है। इसके चलते इस आयुवर्ग के 33.3 प्रतिशत बच्चों को किसी भी तरह का उपचार नसीब नहीं हो पाता है। इसके चलते बड़ी संख्या में छोटे बच्चे काल का ग्रास बन जाते हैं। हालांकि अध्ययन बताते हैं कि बच्चों में दांत आने और अतिसार के बीच कोई रिश्‍ता नहीं है, इस वजह से यह जरूरी है कि इस उम्र के बच्चों को अतिसार होने पर जल्दी जरूरी चिकित्सकीय उपचार मुहैया कराया जाए।

एनएफएचएस-2 और एनएफएचएस-3 के बीच के सात वर्ष में ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में अतिसार से उपचार के लिए ओआरएस के प्रयोग को कोई बढ़ावा नहीं मिला है। इसका साफ अर्थ यह है कि आम लोगों में अतिसार प्रबंधन को लेकर किसी भी तरह की जागरूकता नहीं आ पाई है।

बचाव हमेशा उपचार से बेहतर होता है। लेकिन ऐसा लगता है कि मध्यप्रदेश में अतिसार की बीमारी से बचाव के लिए अपनाए जा सकने वाले प्रतिरोधात्मक तरीके बताने पर सबसे कम ध्यान दिया जा रहा है। अगर लोग साफ-सफाई पर ठीक से ध्यान दें तो अतिसार पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। साथ ही ओआरएस का प्रयोग बढ़ाकर, पेय पदार्थों के सेवन व स्तनपान के प्रयोग से अतिसार से होने वाली मौतों की संख्या पर भी नियंत्रण हासिल किया जा सकता है। उपयोगी व्यवहारगत बदलाव संचार (बीसीसी) कार्यक्रम के अभाव की वजह से पांच वर्ष की कम उम्र के केवल 8.4 प्रतिशत बच्चों को अतिसार से प्रभावित होने की स्थिति में ज्यादा पेय पदार्थों का सेवन कराया जाता है। लेकिन अभी भी 52.2 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जिन्हें अतिसार से पीड़ित होने की स्थिति में ना तो ओरल रिहाईड्रेशन उपचार मिल पाता है ना ही ज्यादा पेय पदार्थों का उन्हें सेवन करने को मिलता है।

सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं तथा माताओं में घरेलू उपचार मसलन, नमक और शक्कर का घोल बनाने की जानकारी से अतिसार की वजह से होने वाले निर्जलीकरण का उपचार किया जा सकता है। लेकिन मध्यप्रदेश में 26 प्रतिशत बच्चों को ऐसी हालत में जरूरी पेय पदार्थ से कम पेय मुहैया कराया जाता है।

मध्यप्रदेश में बीमारियों की हालत में अनजानी दवाओं का प्रयोग काफी आम बात है। यहां अतिसार से पीड़ित 10 में से 4 बच्चों को ऐसी दवाएं दी जाती हैं जिनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती। इससे साफ तौर पर माताओं के साथ-साथ स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में भी लचर जानकारी होने का पता चलता है।

डीएलएचएस-3 की सर्वेक्षण रिपोर्ट से पता चलता है कि मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य सूचकांक अभी भी बेहतर स्थिति में नहीं पहुंच पाया है। वर्ष 2007-08 की डीएलएचएस रिपोर्ट में अतिसार संबंधी सूचकांक कमोबेश वर्ष 2005-06 के डीएलएचएस रिपोर्ट के ही बराबर हैं। डीएलएचएस-3 की सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक अतिसार से पीड़ित केवल 29.9 प्रतिशत बच्चों को ही ओआरएस की सुविधा मिल पाती है। वहीं अतिसार पीड़ित 63.9 प्रतिशत बच्चों को ही चिकित्सकीय सुविधा मिल पाती है। प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में अतिसार पीड़ित महज 25.8 प्रतिशत बच्चों तक ही ओआरएस पहुंच पाता है।

अतिसार व कुपोषण के बीच का संबंध

अतिसार का कुपोषण के साथ सीधा संबंध देखा जा सकता है। विकासशील देशों में हुए अधिकांश अध्ययनों में यह पाया गया है कि कुपोषण के लिए अतिसार सबसे प्रभावी कारक है। अतिसार व इसके विविध प्रकारों की वजह से ही बच्चों को प्रोटीन व ऊर्जा संबंधी गंभीर कुपोषण का शिकार बनना पड़ता है। अगर बच्चों में अतिसार का प्रभाव लंबे समय तक बना रहे तो बच्चे गंभीर तौर पर कुपोषण के शिकार हो जाते हैं। यहां तक कि अतिसार के थोड़े से प्रभाव से भी उनके शरीर के वजन में हर दिन से एक से दो प्रतिशत कमी होने लगती है।

कुपोषण के चलते बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता का ह्रास हो जाता है। इसके चलते बच्चों में कई तरह के संक्रमण फैल जाते हैं जिससे उनकी खाना पचा पाने की क्षमता कम हो जाती है। इससे अतिसार का प्रभाव और घातक हो जाता है तथा अक्सर इसका नतीजा कुपोषण के मौत के रूप में सामने आता है। और इस तरह अतिसार-कुपोषण-अतिसार का एक कुचक्र बन जाता है।   

 
     
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