मध्यप्रदेश में मातृत्व स्वास्थ्य की बेहतर हो रही स्थिति पर नजर रखने के लिए वर्ष 2006 में परिवार नियोजन से संबंधित अपूर्ण जरूरतों को पांचवें सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य (एमडीजी) के साथ शामिल किया गया था। परिवार नियोजन को एमडीजी के लक्ष्यों को हासिल करने तथा सभी को स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लक्ष्य पाने के लिए एक अहम कारक माना गया है। लेकिन मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य सूचकांक से पता चलता है कि यह अभी भी परिवार नियोजन के लक्ष्य से 13.1 प्रतिशत के अपूर्ण होने के चलते एमडीजी लक्ष्य पाने से भी काफी दूर है।
गर्भनिरोध:
इसके तहत जानबूझकर ऐसे विभिन्न तरीके अपनाए जाते हैं जिनसे अनचाहा गर्भ ठहरने से रोका जा सके। या सरल शब्दों में कहें तो गर्भनिरोध ऐसा तरीका है जो किसी भी महिला को गर्भवती होने से रोकता है। गर्भनिरोधक उपायों या तरीकों के चयन व उनके इस्तेमाल का निर्णय ऐसा मुद्दा है जो लंबे समय से महिलाओं के प्रजनन अधिकार के साथ जुड़ा रहा है। प्रजनन स्वास्थ्य दरअसल जीवन के विभिन्न स्तरों पर प्रजनन प्रक्रिया, कार्यों व तरीकों से जुडा हुआ है।
प्रजनन स्वास्थ्य:
अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रजनन स्वास्थ्य की परिभाषा को देखें तो हम पाएंगे कि इसका अर्थ है जीवन या उम्र के सभी स्तरों में शारीरिक, मानसिक व सामाजिक स्तरों पर व्यक्ति का बेहतर स्थिति में होना ही उसके प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ा होता है। प्रजनन स्वास्थ्य के साथ व्यक्तियों की यह स्वतंत्रता भी निहित होती है कि वे संतोषजनक तथ सुरक्षित यौन जीवन जी सकें तथा प्रजनन संबंधी निर्णय लेने के साथ ही प्रजनन करने के लिए पूर्ण तौर पर सक्षम भी हों। वे यह निर्णय खुद ही ले सकें कि कब, कितने बार व किस तरह के प्रजनन या गर्भनिरोध संबंधी तरीके अपनाएंगे। इसमें यह अंतर्निहित है कि महिला व पुरुष दोनों को ही यह जानकारी व अधिकार हो कि वे परिवार नियोजन के लिए सुरक्षित, प्रभावी, उनकी पहुंच वाले व मान्य तरीके अपना सकें। साथ ही उन्हें ऐसी पर्याप्त स्वास्थ्य सुरक्षा सेवा भी मुहैया कराई जाए ताकि महिलाएं वहां गर्भावस्था तथा प्रसव के दौरान जा सकें व स्वास्थ्य लाभ भी कर सकें।
परिवार नियोजन की अपूर्ण जरूरतें:
जनसांख्यिकीय व स्वास्थ्य सर्वेक्षण (डीएचएस) के मुताबिक एक प्रजनन योग्य महिला जो यौन सक्रिय है तथा कम से कम दो साल तक बच्चा नहीं चाहने के बावजूद किसी तरह का गर्भनिरोधक इस्तेमाल नहीं करती उसकी गर्भनिरोधक की जरूरत अपूर्ण जरूरतों में आती है। अपूर्ण जरूरतों की यह अवधारणा दरअसल महिलाओं की प्रजनन चाहत व उनके गर्भनिरोधकों के प्रति व्यवहार के बीच के फर्क को दूर करने की ओर इशारा करती है।
जाहिर है कि प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं का अभाव दरअसल लड़कियों व महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य अधिकारों की गंभीर अवहेलना है। अपूर्ण जरूरतों की वजह से महिलाओं व पुरुषों के उन बुनियादी मानवाधिकारों की अवहेलना होती है जिसके तहत वे अपनी यौन सक्रियता पर नियंत्रण रख सकते हैं या अपने बच्चों की संख्या व उनके बीच का समय तय कर सकते हैं।
गर्भनिरोधक की अपूर्ण जरूरत की वजह से अनचाहे गर्भ की स्थिति को बढ़ावा मिलता है। इसके चलते महिला, उसके परिवार और अंतत: समाज के लिए खतरा पैदा होता है। डीएलएचएस-3 के नतीजों से साफ पता चलता है कि 15-49 वर्ष आयु वर्ग के प्रजनन योग्य दंपतियों की परिवार नियोजन संबंधी जरूरतों को पूरी करने में सरकारी प्रयास कितने असफल साबित हुए हैं। मध्यप्रदेशमें 15-49 वर्ष की आयु वर्ग के महज 56.2 प्रतिशत दंपती ही संतानोत्पत्ति को रोकने के लिए किसी तरह के गर्भनिरोधक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। राज्य में परिवार नियोजन के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले गर्भनिरोधक साधनों संबंधी अपूर्ण जरूरतों का प्रतिशत 13.1 है। कई जिलों में हालत काफी चिंताजनक मानी जा सकती है। उदाहरण के तौर पर, सतना और सीधी जिलों अपूर्ण जरूरतों का प्रतिशत क्रमश: 30.5 तथा 31.4 है। यहां तक कि झाबुआ, रायसेन, छतरपुर तथा श्योपुर जिलों में भी 15-49 वर्ष की आयु वर्ग के शादी-शुदा दंपतियों में 25 प्रतिशत ऐसे हैं जिनकी परिवार नियोजन संबंधी जरूरतें अभी भी अपूर्ण हैं।
ध्यान देने की बात है कि अपूर्ण जरूरतों के दायरे में केवल प्रजनन योग्य उम्र की शादी-शुदा महिलाओं को ही रखा गया है, वहीं इसी उम्र की अविवाहित लड़कियों इसके दायरे से बाहर रखी गई हैं। जबकि वे भी यौन सक्रिय होती हैं तथा उनमें गर्भ धारण करने का खतरा बना रहता है। जाहिर सी बात है कि जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा ऐसे अविवाहित युवा हैं जो यौन सक्रिय हैं और इनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
अपूर्ण जरूरतों का यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि परिवार नियोजन संबंधी सेवाएं अनुपलब्ध हैं। इसका यह अर्थ हो सकता है कि दंपतियों या युवाओं में गर्भनिरोधक साधनों व उनके इस्तेमाल के बारे में जानकारी का अभाव है। या फिर मौजूदा परिवार नियोजन संबंधी सेवाएं इनमें वह विश्वास नहीं पैदा कर पा रहीं हैं जिनके प्रभाव में आकर वे इन गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल कर सकें। इन सभी मामलों में महिलाओं की निर्णायक भूमिका लगभग नगण्य मानी जाती है। अक्सर युवा दंपतियों द्वारा गर्भनिरोधक के इस्तेमाल में सांस्कृतिक व पारिवारिक परंपराएं बाधाएं बनती हैं। ऐसे में परिवार नियोजन कार्यक्रमों के जरिए ऐसी जानकारियों का प्रभावी विस्तार किया जाना चाहिए जो गर्भनिरोधकों के बारे में ज्यादा से ज्यादा बता सकें व उनके सही इस्तेमाल से भी लोगों को अवगत करा सकें।
परिवार की सीमितता या अंतर के लिए परिवार नियोजन की जरूरतें :
परिवार नियोजन के तरीकों का इस्तेमाल परिवार का आकार सीमित रखने या संतानों के बीच अंतर रखने के लिए किया जा सकता है। मध्यप्रदेश में परिवार की संतानों में अंतर रखने के लिए अपूर्ण जरूरतों का प्रतिशत 5.5 है, वहीं परिवार को सीमित रखने के लिए यह प्रतिशत 7.6 है। परिवार नियोजन के तरीकों में अंतर रखने के तरीके ज्यादा प्रचलित हैं क्योंकि इनमें गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल रोककर संतानोत्पत्ति की जा सकती है। इस प्रक्रिया से आबादी पर प्राकृतिक तरीके से नियंत्रण रखा जा सकता है या उसकी वृध्दि दर को कम किया जा सकता है। इससे बेहतर मातृत्व व बाल स्वास्थ्य को भी सुनिश्चित किया जा सकता है। जाहिर तौर पर ऐसा होने से शिशुओं के जीवन प्रत्याशा बढ़ जाती है और बड़ा परिवार रखने की अवधारणा कमजोर पड़ती है।
बच्चों में अंतर रखने के गर्भनिरोधक साधनो में कंडोम सर्वाधिक प्रभावी माना जाता है। कंडोम के इस्तेमाल से न केवल गर्भ धारण करने पर रोक लगाई जा सकती है बल्कि यह यौन संक्रमिक बीमारियों (एसटीडी) के संचारण को भी रोकता है। मध्यप्रदेश सरकार का दावा है कि वह वर्ष 2007-08 में कंडोम इस्तेमाल करने संबंधी सेवाओं में 87.6 प्रतिशत उपलब्धि हासिल कर चुकी है, वहीं आईयूडी (इंट्रायूरेटीन डिवाइस) इस्तेमाल करने संबंधी सेवाओं में 68.7 प्रतिशत उपलब्धि हासिल कर चुकी है। लेकिन डीएलएचएस-3 के मुताबिक चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं, इनमें कहा गया है कि मध्यप्रदेश में महज 4.6 प्रतिशत लोग ही फिलहाल परिवार नियोजन के तरीकों में कंडोम को बतौर गर्भनिरोधक इस्तेमाल कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां 15-49 वर्ष के आयुवर्ग के शादी-शुदा दंपतियों में महज 2.5 फीसदी ही फिलहाल कंडोम का इस्तेमाल गर्भनिरोधक के तौर पर करते हैं। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि शादी-शुदा दंपतियों में से 95 प्रतिशत अभी भी यौन संक्रमित बीमारी होने के खतरे से जूझ रहे हैं। प्रदेश के 31 जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में 3 प्रतिशत से भी कम ऐसे विवाहित दंपती कंडोम का इस्तेमाल कर रहे हैं जो अभी गर्भधारण की उम्र में हैं। यहां तक कि प्रदेश के दो सर्वाधिक विकसित माने जाने वाले जिलों इंदौर व भोपाल में भी कंडोम का इस्तेमाल करने वाले दंपतियों की संख्या महज क्रमश: 9.2 प्रतिशत तथा 11.8 प्रतिशत है।
मध्यप्रदेश में आईयूडी (इंट्रा यूटेरिन डिवाइस) इस्तेमाल करने वालों का प्रतिशत महज 0.5 है, जो असुरक्षित यौन सम्बन्धों के बाद गर्भ ठहरने से रोकने के के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले आपातकालीन गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने वालों से लगभाग समान (4 प्रतिशत) है। लेकिन इन दोनों ही तरीकों के इस्तेमाल से यौन संक्रमित बीमारियों (एसटीडी) से बचाव का कोई रास्ता नहीं निकलता।
परिवार की संख्या सीमित रखने के लिए परिवार नियोजन का एक स्थायी तरीका नसबंदी है। मध्यप्रदेश में जारी जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम बड़े पैमाने पर महिला केंद्रित है, क्योंकि यहां पुरुष नसंबंदी की तुलना में महिला नसबंदी ज्यादा प्रचलित है। राज्य में जहां महिला नसबंदी का प्रतिशत 45 तक है वहीं पुरुष नसबंदी महज 0.8 प्रतिशत तक ही है। मुरैना और शिवपुरी सरीखे जिलों में जहां परिवार नियोजन के लिए पुरुष नसबंदी अपनाने वाले परिवारों की संख्या शून्य है वहीं इन्हीं जिलों में इसके लिए महिला नसबंदी कराने वालों की संख्या 35 प्रतिशत से ज्यादा है। यहां तक कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व परिवार कल्याण विभाग की ओर से वर्ष 2007-08 तथा 2008-09 (अप्रैल 08- जनवरी 09) की अवधि में जितनी नसबंदी की गईं उनमें से 93 फीसदी नसबंदी कराने वाली महिलाएं थीं, जबकि महज 6.5 प्रतिशत पुरुष ही नसबंदी कराने सामने आए। इससे साफ तौर पर पता चलता है कि दोनों तरह की नसबंदी के एक समान होने, किसी तरह की चीर-फाड़ न होने व अनुभवी डाक्टरों द्वारा किए जाने के बावजूद पुरुष नसंबंदी की तुलना में महिला नसबंदी की संख्या कहीं ज्यादा है। इसका मुख्य कारण कई तरह की भ्रांतियां व गलत अवधारणाएं हैं। पुरूषों के बीच यह आम धारणा है कि नसबंदी करने से उनकी यौन संबंध बनाने की क्षमता पर विपरीत असर पड़ेगा, उनकी यौन क्षमता कमजोर हो जाएगी, साथ ही यह प्रवृत्ति की परिवार सीमित रखने की जिम्मेदारी मुख्य तौर पर महिला की ही है, नसबंदी की अवधारणा को मंजूर करने में आड़े आती है। वहीं दूसरी ओर यह भी कहा जा सकता है कि जनसंख्या पर नियंत्रण रखने के लिए एक बेहद प्रभावी तरीके, पुरुष नसबंदी को प्रोत्साहित करने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।
परिवार नियोजन की अपूर्ण जरूरतों का स्वास्थ्य पर प्रभाव :
परिवार नियोजन की इन अपूर्ण जरूरतों का नतीजा अनवांछित गर्भ और बाद में अक्सर असुरक्षित गर्भपात के तौर पर सामने आता है। यह एक दु:खद तथ्य है कि भारत में होने वाली कुल मातृत्व मौतों का 8 प्रतिशत हिस्सा असुरक्षित गर्भपात के दौरान होता है। मध्यप्रदेश में एक लाख प्रसव में से मातृत्व मौतों की संख्या 379 है। यानी यहां होने वाली 379 मातृत्व मौतों में 30 मौतें असुरक्षित गर्भपात की वजह से होती हैं। असुरक्षित गर्भपात के चलते देश में हजारों महिलाओं के स्वास्थ्य व प्रजनन क्षमता पर विपरीत असर पड़ता है, वहीं 15000 ऐसी मौतें हो जाती हैं जिन्हें रोका जा सकता था। यही नहीं, परिवार नियोजन संबंधी अपूर्ण जरूरतों का दुष्परिणाम प्रजनन मार्ग में संक्रमण तथा एचआईवी-एड्स समेत कई यौन संक्रमित बीमारियों के रूप में भी सामने आता है। अपनी शारीरिक बनावट के चलते महिलाएं इन बीमारियों के प्रति ज्यादा ग्राह्य होती हैं। मध्यप्रदेश राज्य एड्स नियंत्रण सोसाइटी द्वारा जुटाए आंकड़ों के मुताबिक राज्य में एचआईवी-एड्स के कुल रोगियों में से 91.7 प्रतिशत को यह महारोग यौन संक्रमण के जरिए हुआ है।
परिवार नियोजन की अपूर्ण जरूरतों का परिणाम राज्य में उच्च उर्वरता दर के तौर पर सामने आता है। इसके चलते न केवल जनसंख्या में बढ़ोतरी होती है बल्कि महिलाओं का स्वास्थ्य में भी गिरावट आती है। प्रदेश की 15-49 वर्ष की आयुवर्ग की 58 प्रतिशत महिलाओं में विभिन्न तरह के एनीमिया के स्तर मौजूद हैं। जाहिर तौर पर प्रदेश में जनसंख्या पर नियंत्रण का यही उपाय है कि शिशुओं के जन्म में अंतर रखने तथा परिवार की संख्या सीमित रखने के प्रयासों को बढ़ावा दिया जाए; साथ ही यौन सक्रिय दंपतियों में गर्भनिरोधक के इस्तेमाल को प्रोत्साहन मिले।
प्रदेश में परिवार नियोजन कार्यक्रमों के चलते मातृत्व मौतों में तीन तरह से कमी आई है। इनसे अनचाहे गर्भ और अंतत: असुरक्षित गर्भपात में कमी लाने में सफलता मिली है। इससे आठ में से एक मातृत्व मौत में कमी लाई जा सकी है। अंतत: इससे ऐसे बच्चों के जन्म के अनुपात में कमी आई जिनकी वजह से उनकी मांओं को उम्र, जल्दी गर्भावस्था व स्वास्थ्य की वजह से कई तरह की जटिलताओं का सामना करना पड़ता था। परिवार नियोजन कार्यक्रमों के चलते ही एचआईवी-एड्स जैसी बीमारियों के फैलने की गति को भी धीमा रख पाने में सफलता मिली है।
खामियां और उन्हें दूर करने के उपाय:
प्रदेश के कई जिलों में परिवार नियोजन कार्यक्रम चलाने के बावजूद अपेक्षित सफलता न मिलने तथा कार्यक्रम की संदिग्ध सफलता के पीछे बड़ी जनसंख्या का निरक्षर होना एक बड़ा कारण है। उदाहरण के तौर पर झाबुआ, सीधी, सतना में महिला साक्षरता केवल 25.7 प्रतिशत, 36 प्रतिशत तथा 51.6 प्रतिशत ही है। यहां हाल में शादी-शुदा दंपतियों में गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने वालों की संख्या 50 प्रतिशत से भी कम है, वहीं अपूर्ण जरूरतों का प्रतिशत 30 से भी ज्यादा है।
लेकिन जाहिर तौर पर ऐसे कारणों को कार्यक्रम के लिए जिम्मेदार विभाग की नाकामी का कारण नहीं बताया जा सकता। वे यह नहीं कह सकते कि जब तक लोग शिक्षित नहीं हो जाते हम परिवार नियोजन संबंधी अपने लक्ष्य पूरे नहीं कर सकते। वैसे भी गर्भनिरोधक साधनों के इस्तेमाल के लिए साक्षरता कोई अनिवार्य जरूरत नहीं है। अक्सर यह भी कहा जाता है कि सामाजिक मान्यताएं व परंपराएं गर्भनिरोधकों के इस्तेमाल में अक्सर बाधा बनती हैं। लेकिन, अगर यह बात सच हो तो भी सवाल यह उठता है कि लोगों में व्यवहारगत बदलाव के लिए बड़े प्रयास क्यों नहीं अंजाम दिए जा रहे हैं।
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में व्यवहारगत बदलाव के लिए संचार (बीसीसी) एक अहम हिस्सा माना गया था तथा इसके लिए वर्ष 2008-09 में 1890.02 लाख रुपयों का प्रावधान किया गया था। इसके बावजूद व्यवहार बदलाव के लिए किए जाने वाले संवाद, संचार के नाम पर महज पोस्टर छापे गए तथा दीवार लेखन कराए गए। जाहिर है कि समाज में लंबे समय से फैली परंपराओं को दूर कर गर्भनिरोधक साधनों के अपनाने के लिए महज दीवार लेखन, पोस्टर या फिर होर्डिंग लगाने भर से सफलता नहीं मिल सकती। व्यवहारगत बदलाव के लिए संचार, संवाद कार्यक्रम के तहत गर्भनिरोधक उपायों को प्रोत्साहन देने के लिए प्रजनन योग्य आयु के महज शादी-शुदा दंपतियों को ही शामिल किया गया।
साथ ही वर्ष 2007-08 एवं 2008-09 के परिवार नियोजन कार्यक्रम के लिए आवंटित बजट के विश्लेषण से यह तथ्य सामने आता है कि वर्ष 2008-09 में प्रजनन स्वास्थ्य व परिवार कल्याण योजना में परिवार नियोजन के लिए महज 1.76 प्रतिशत हिस्सा ही आवंटित किया गया। साथ ही यह खुलासा भी होता है कि यह राशि वर्ष 2007-08 के 385.45 लाख से घटकर महज 346.06 लाख रुपए ही रह गई।
गर्भनिरोधक साधनों का इस्तेमाल महज एक जरूरत नहीं बल्कि लोगों का प्रजनन अधिकार भी है। लेकिन प्रदेश में परिवार नियोजन कार्यक्रम अभी भी अधिकार आधारित पहुंच के साथ ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपने दायरे में लाने में सफल नहीं हो सका है। अभी तक ऐसे ठोस प्रयास या पहल नहीं किए जा सके हैं जिनसे समुदाय की जरूरतों का आंकलन किया जा सके तथा परिवार नियोजन संबंधी संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए लोगों को जागरूक बनाया जा सके।
बची हुई चुनौतियां:
परिवार नियोजन संबंधी अपूर्ण जरूरतों से निपटने के लिए परिवार नियोजन कार्यक्रम को अभी भी कई चुनौतियों का सामना करना बाकी है।
- गर्भनिरोधकों का निरंतर इस्तेमाल: प्रदेश में गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल निरंतर न करने की दर काफी ऊंची है। अक्सर ऐसा अपर्याप्त समझाइश, फालोअप सेवाओं के अभाव तथा वैकल्पिक गर्भनिरोधक साधनों के अभाव में होता है।
- सेवा मुहैया कराने के तरीकों में सुधार: परिवार नियोजन कार्यक्रम को लोगों खासकर युवाओं के बीच अपने तौर-तरीकों व संदेशों को पहुंचाने के तरीकों में और सुधार लाने की गुंजाइश है। इस आयुवर्ग के बीच गर्भनिरोधक साधनों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने का एक मुख्य कारण संतानों के बीच अवधि बढ़ाना भी है। ऐसी सेवाएं मुहैया कराने के दौरान होने वाली किसी भी तरह की गड़बड़ी से निपटने के लिए फौरन उपाय करने जरूरी हैं।
- अविवाहित युवाओं को शामिल करना: परिवार नियोजन कार्यक्रम से अभी भी ऐसे युवाओं को अछूता रखा गया है जो प्रजनन योग्य हैं व यौन सक्रिय भी हैं। इन्हें कार्यक्रम में शामिल करना अभी भी एक बड़ी चुनौती है।
जरूरी नजरिया:
परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि प्रजनन योग्य उम्र के तमाम लोगों को अपनी पसंद, उपयोग या स्वास्थ्य के मुताबिक गर्भनिरोधकों के चयन करने का अधिकार व समझाश मिले तथा समय पर गर्भनिरोधक भी मुहैया हो।
परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत दी जाने वाली सेवाओं की गुणवत्ता की जांच छह तरीकों से की जा सकती है। गर्भनिरोधकों का चयन करने में अपनी पसंद रखने का अधिकार, लोगों को इस बारे में पूरी जानकारी देना, जानकारी देने वालों में संपूर्ण जानकारी का होना, जानकारी देने वाले तथा लेने वालों के बीच अंतर्वैयक्तिक संबंध होना, सेवाओं का फॉलोअप तथा निरंतरता का होना तथा सभी सेवाएं एक पैकेज या समूह के तौर पर उपलब्ध होना। जाहिर है कि अच्छी गुणवत्ता की सेवा देने से न केवल नए लोगों तक पहुंच बनाई जा सकेगी बल्कि गर्भनिरोधकों के प्रयोग में होने वाली अनियमितता को भी रोका जा सकेगा।
लोगों में व्यवहारगत बदलाव लाने से न केवल गर्भनिरोधकों के इस्तेमाल की प्रवृत्ति को बढ़ाया जा सकेगा बल्कि इससे पुरुषों को भी प्रोत्साहित किया जा सकेगा। यह भी जरूरी है कि सेवा प्रदाता की ओर से भी जानकारी देते समय बेहतर व्यवहार के लिए जरूरी बदलाव लाया जा सके। यह भी जरूरी है कि पुरुशों के लिए गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इस समूची प्रक्रिया में पुरुषों की सहभागिता और बढ़ाई जा सके। जाहिर है कि परिवार नियोजन कार्यक्रम के सभी संस्थागत गतिविधियां मुख्य तौर पर पुरुषों पर ही केंद्रित होनी चाहिएं ताकि उनमें गर्भनिरोधक साधनों की अपनाने की ग्राह्यता बन सके।
जाहिर है कि अपनी जनसंख्या के बेहतर प्रजनन स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए परिवार कल्याण कार्यक्रमों को सुचारू रूप से बढ़ाना व लागू करना चाहिए। परिवार नियोजन कार्यक्रमों में अभी तक महिलाओं द्वारा गर्भनिरोधक साधनों के इस्तेमाल तथा उनमें सकारात्मक व्यवहारगत बदलाव के लिए शैक्षिक तथ्यों का समावेश किया जा रहा है। यह जरूरी है कि गर्भनिरोधक संसाधनों के अनयिमित इस्तेमाल को रोकने के लिए पुरुषों को इससे संबंधित निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने के लिए सही सलाह दी जा जाए। परिवार कल्याण कार्यक्रमों से लोगों के प्रजनन अधिकारों की अवहेलना नहीं होनी चाहिए, बल्कि इससे उनमें सकारात्मक व्यवहारगत बदलाव लाने के लिए बढ़ावा देना चाहिए। |