सतना जिले के उंचाहारा ब्लॉक में स्थित हरदुआ गांव की दो बहनों गुड़िया तथा अर्चना ने एक हफ्ते के भीतर ही अपनी जान गंवा दी। उनके पिता पप्पू कहते हैं, यह विश्वा स कर पाना बेहद मुश्किल हो रहा है कि मेरे पास दो बेटियां थीं और दोनों ही महज सात दिनों की अवधि के दौरान चल बसीं। डॉक्टरों ने पप्पू को बताया था कि दोनों ही बच्चियां बेहद कमजोर (कुपोषित) थीं। लेकिन अब, जब कभी भी पप्पू अपनी बच्चियों की मौत के लिए कुपोषण की बात करता है, सरकारी अधिकारी उसे रोकते हैं और उस पर दबाव डालते हैं कि वह कहे कि उसकी बच्चियों की मौत किसी अज्ञात बीमारी की वजह से हुई है, न कि कुपोषण की वजह से। लेकिन पप्पू के मुताबिक वह इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकता है कि उसकी दोनों ही बेटियां बेहद कमजोर (कुपोषित) थीं।
ऊपर बताई गई घटना के उदाहरण से प्रदेश के आईएमएनसीआई (राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत नवजात व शिशु रोग एकीकृत प्रबंधन) जिलों के तहत चुने गए 12 जिलों में सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों की संवेदनशीलता और नवजातों की सुरक्षा व देखभाल तथा शिशु रोगों की वजह से होने वाली बाल मौतों से निपटने के लिए किए जा रहे सरकारी प्रयासों की पोल-पट्टी खुल जाती है। ये जिले 11 वीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) के तहत आईएमएनसीआई जिलों के तौर पर चयनित किए गए हैं। मध्यप्रदेश भोजन के अधिकार अभियान तथा आदिवासी अधिकार मंच, सतना की ओर से किए गए सर्वेक्षण में जिले के दो ब्लाकों में मई 2008 से जनवरी 2009 के बीच के नौ महीनों की अवधि में 0-6 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों की 93 मौतों का खुलासा कर दिया गया।
यहां तक कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व परिवार कल्याण विभाग की ओर से हासिल किए गए दस्तावेजों से भी यही प्रमाणित होता है कि आईएमएनसीआई जिलों की हालत प्रदेश के अन्य जिलों से कतई बेहतर नहीं है। उदाहरण के तौर पर सतना जिले में बीते 10 माह की अवधि (अप्रैल 2008 से जनवरी 2009) के दौरान 1469 शिशुओं की मौत दर्ज की गई है। यह प्रदेश की कुल शिशु मौतों का 6.21 प्रतिशत है। इसी तरह शिवपुरी में जो आईएमएनसीआई के तहत आने वाला एक और जिला है, वर्ष 2007-08 तथा वर्ष 2008-09 में क्रमश: 1048 व 912 शिशुओं की मौत दर्ज की गई है।
भारत जैसे विकासशील देशों में शिशु तथा बाल मौतों के होने के मुख्य कारणों में जन्म के समय की परिस्थितियां, श्वसन तंत्र का संक्रमण, डायरिया, मलेरिया, चेचक तथा कुपोषण हैं। छोटे बच्चों की लगातार अस्वस्थता या रुग्णता के भी यही प्रमुख कारण हैं। मध्यप्रदेश में शिशु मौतों की दर लगातार काफी ऊंची 72/1000 (अक्टूबर 2008 में जारी एसआरएस 2007 के मुताबिक) बनी हुई है। मध्यप्रदेश में होने वाली शिशु मौतों के कुल आंकड़े में 64 प्रतिशत हिस्सा नवजातों की मौत का है, जिनमें से अधिकांश उनके जन्म लेने के पहले हफ्ते के दौरान हो जाती है। इसी तरह जन्म लेने के दो महीने की अवधि में होने वाली मौत की दर भी ज्यादा उम्र में होने वाली मौतों की तुलना में काफी ज्यादा है। जाहिर है कि शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए लागू की जाने वाली किसी भी स्वास्थ्य संबंधी योजना का मुख्य लक्ष्य नवजात के जन्म से दो महीने के भीतर स्वास्थ्य संबंधी देखभाल पर होना चाहिए। इसमें भी जन्म के पहले हफ्ते का समय काफी अहम माना जाना चाहिए।
आईएमएनसीआई क्या है :
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत नवजात व शिशु रोग एकीकृत प्रबंधन ( आईएमएनसीआई) को नवजात शिशुओं व बाल मृत्यु दर को घटाने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य अभियान/प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य योजना-2 के एक हिस्से के तौर पर बाल स्वास्थ्य के क्षेत्र में नए हस्तक्षेप के तौर पर देखा जा सकता है। वर्ष 1990 के दशक के मध्य के दौर में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने यूनिसेफ समेत कई संस्थाओं व व्यक्तिओं के सहयोग से एक रणनीति का विकास किया था, जिसे शिशु रोग एकीकृत प्रबंधन (आईएमसीआई) के नाम से जाना जाता है। यहां यह बात भी ध्यान देने लायक है कि आईएमसीआई की रणनीति को विकसित करने के पीछे उपचारात्मक देखभाल मुख्य कारण था। इसके अलावा यह रणनीति पोषण, टीकाकरण व बीमारी रोकने के अन्य महत्वपूर्ण कारकों व स्वास्थ्य बेहतर करने के तरीकों पर भी प्रकाश डालती है। इस रणनीति का मुख्य लक्ष्य नवजातों तथा शिशुओं की मौतों की संख्या को घटना तथा रोगों व विकलांगता की आवृत्ति व घातकता को भी कम करना है। साथ ही उनकी वृध्दि व विकास को सुनिश्चित करना है। लेकिन चूंकि भारत में शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए नवजातों की देखभाल एक अहम मुद्दा है इसीलिए इस नजरिए को भारत द्वारा अपनाए गए आईएमएनसीआई पैकेज में शामिल किया गया है। इस रणनीति को भारत के विभिन्न जिलों में लागू किया गया है और इसके नाम का पुनर्निधारण नवजात व शिशु रोग एकीकृत प्रबंधन (आईएमएनसीआई) के तौर पर किया गया है।
भारत के जिन जिलों आईएमएनसीआई योजना लागू की गई वह राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन/प्रजनन व बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम-चरण 2 के तहत अपनाई जाने वाली बाल स्वास्थ्य रणनीति के हिस्सा के तौर पर ही देखी जाती है। इसमें शामिल है :-
- नवजातों तथा शिशुओं की देखभाल
- स्तनपान को बढ़ावा देना, दो साल के कम उम्र के सभी बच्चों को स्तनपान कराने के लिए परामर्श देना
- नवजातों व बाल रोगों की पहचान तथा उनके उपचार के लिए जरूरी प्रबंधन
- पांच वर्ष से कम आयुवर्ग के सभी बच्चों का टीकाकरण सुनिश्चि करना।
- नवजात के जन्म के बाद नव-प्रसूता के घर जाना।
जाहिर है कि आईएमएनसीआई के तहत नव-प्रसूता मां के घर जाना एक नई पहल के तौर पर देखी जा सकती है। नव प्रसूताओं के घर जाकर स्वास्थ्य कार्यकर्ता (एएनएम, एडब्ल्यूडब्ल्यू, आशा कार्यकर्ता व सहयोगी स्वयंसेवी कार्यकर्ता) मां व परिवार के अन्य सदस्यों की मदद करते हैं तथा उन्हें नवजात शिशु की खास जरूरतों के बारे में बताने के अलावा उनके कम वजन का होने या बीमारी को पहचानने तथा उसके उपचार के लिए जरूरी प्रबंधन संबंधी जानकारियां भी देते हैं। इसके तहत नव प्रसूता के घर शिशु के जन्म होने के पहले हफ्ते में तीन भ्रमण करने होते हैं। इसमें पहला भ्रमण उसी दिन करना होता है जिस दिन नवजात शिशु का जन्म हुआ हो, दूसरा भ्रमण तीसरे दिन तथा तीसरा भ्रमण सातवें दिन करना होता है। अगर नवजात शिशु कम वजन वाला हुआ तो उसके जन्म के एक माह की अवधि के भीतर कम से कम छह भ्रमण अनिवार्य होते हैं। इन सभी भ्रमणों के दौरान स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा अपनाई जाने वाली गतिविधियों तथा नव-प्रसूता तथा उसके परिवार को दी जाने वाली जानकारियों के बारे में कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण के दौरान बताया जाता है।
हर प्रदेश में दो तरह के जिले हैं, एक वे जो आईएमएनसीआई रणनीति या योजना को लागू करते हैं और दूसरे वे जो इसको लागू नहीं करते, पर मौजूदा योजना को ही क्रियान्वित कर रहे हैं। वे जिले जहां आईएमएनसीआई लागू नहीं हो रहा है, उनमें पहले से चल रही योजनाओं में टीकाकरण, डायरिया नियंत्रण, एआरआई नियंत्रण, विटामिन ए पूरक तत्वों की आपूर्ति तथा नवजात शिशुओं की विशेष देखभाल, जिसमें छह महीने तक अनिवार्य स्तनपान, छह माह के बाद से अनिवार्य ठोस आहार देने की शुरुआत का प्रशिक्षण या सलाह देना शामिल है।
मध्यप्रदेश के आईएमएनसीआई जिले:
आईएमएनसीआई पैकेज के तहत मध्यप्रदेश में 12 जिले शामिल किए गए हैं। ये हैं (1) भोपाल, (2) सीहोर, (3) विदिशा, (4) मुरैना, (5) दतिया, (6)भिंड, (7) शिवपुरी, (8) गुना, (9) रतलाम, (10) जबलपुर, (11) कटनी तथा (12) सतना।
आईएमएनसीआई जिले तथा नवजात एवं शिशु स्वास्थ्य की स्थिति :
मध्यप्रदेश में नवजात एवं शिशु स्वास्थ्य की स्थिति सीधे तौर पर गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की देखभाल पर निर्भर करती है। साथ ही नवजात के जन्म लेने के फौरन बाद उसकी देखभाल, स्तनपान व जरूरी टीकाकरण भी उसके स्वास्थ्य के लिए अहम भूमिका निभाते हैं। इन तमाम जरूरतों का पूरा होना सीधे तौर पर ब्लॉक व गांव के स्तर पर स्थापित स्वास्थ्य संगठनों मसलन, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तथा उप स्वास्थ्य केंद्रों में मौजूद सुविधाओं तथा सेवाओं पर निर्भर करता है।
प्रसव के दौरान अधूरी या अपर्याप्त देखभाल मां व नवजात दोनों के लिए ही खतरा बढ़ा देते हैं। गर्भवती मां की पर्याप्त देखभाल कहीं न कही नवजात शिशु के जी पाने की संभावना पर गहरा असर डालता है। मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य संबंधी हालात के विश्लेषण से पता चलता है कि यहां मातृत्व सुरक्षा व देखभाल संबंधी सेवाओं को और मजबूत करने की आवश्यकता है। प्रदेश में शिशु मृत्यु दर की ऊंची दर खास तौर पर प्रसव से पूर्व व नवजातों की मौत सीधे तौर पर समय से पूर्व प्रसव, जन्म के समय नवजात का कम वजन का होना, असुरक्षित प्रसव व नवजात को टिटनेस होने सरीखी समस्याओं से जुड़ी हुई है।
मातृत्व स्वास्थ्य व देखभाल सीधे तौर पर नवजातों तथा शिशुओं के स्वास्थ्य पर असर डालता है। प्रदेश में शिशु व मातृत्व मौत की ऊंची दरों को देखते हुए यहां मातृत्व व बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। एसआरएस 2007 के मुताबिक मध्यप्रदेश में शिशु मृत्यु दर 72/1000 है। वहीं एनएफएचएस-3 के आंकड़ों के मुताबिक मध्यप्रदेश में प्रति एक हजार जन्म में से नवजातों की मौत का प्रतिशत 44.9 है। वहीं प्रदेश में औसत मातृत्व मृत्यु दर प्रति एक लाख में 397 है।
आईएमएनसीआई जिलों में मातृत्व व शिशु स्वास्थ्य संकेतक :
मध्यप्रदेश के सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा परिवार कल्याण विभाग के बीते तीन सालों के स्वास्थ्य बुलेटिन से प्रदेश के तमाम जिलों में ऊंची शिशु मृत्यु दर तथा मातृत्व दर की असलियत सामने आती है। इसमें आईएमएनसीआई जिले भी शामिल हैं। मध्यप्रदेश के 12 आईएमएनसीआई जिलों में वर्ष 2006-07 में 9427 नवजात शिशुओं की मौत हुई जो इसी अवधि में राज्य में हुई शिशुओं की कुल मौतों का 31.13 प्रतिशत है। ठीक इसी तरह आईएमएनसीआई जिलों में वर्ष 2007-09 तथा वर्ष 2008-09 (अप्रैल-नवंबर 08) के दौरान क्रमश: 29385 में 7946 मौतें तथा 23660 में से 5369 मौतें दर्ज की गई हैं।
आईएमएनसीआई जिलों तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि चार आईएमएनसीआई जिलों में तो हालात लगभग भयावह हैं। ये आईएमएनसीआई जिले हैं, सतना, गुना, शिवपुरी तथा भिंड। सतना अकेले जिले में ही वर्ष 2006-07, 2007-08 तथा वर्ष 2008-09 के दौरान क्रमश: 2060, 1668 व 1192 नवजातों की मौत दर्ज की गई है। इसी तरह शिवपुरी, गुना व भिंड में भी नवजातों की मौत दर्ज की गई है। इन चार आईएमएनसीआई जिलों में मातृत्व मृत्यु दर भी काफी ज्यादा है। वर्ष 2007-08 में हुई कुल 1422 मातृत्व मौतों में से सतना में 60 मौतें दर्ज की गई थीं वहीं गुना में 52 मातृत्व मौतें हुई थीं। यहां तक कि मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल जो आईएमएनसीआई जिलों में विषेश दर्जा पाता है, में भी बड़ी संख्या में मातृत्व मौतें दर्ज हुई हैं। वर्ष 2008-09 के सात महीनों की अवधि के दौरान भोपाल में 49 मातृत्व मौतें दर्ज की जा चुकी हैं जो इसी अवधि में पूरे मध्यप्रदेश में हुई मातृत्व मौतों का 4.9 प्रतिशत है।
आईएमएनसीआई जिलों में संस्थागत प्रसव की स्थिति:
मध्यप्रदेश के परिवार कल्याण कार्यक्रमों में मातृत्व एवं बाल स्वास्थ्य को प्रोत्साहन एक मुख्य उद्देश्य रहा है। इसके बावजूद डीएलएचएस-3 की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2007-08 में मध्यप्रदेश में संस्थागत होने वाले औसत प्रसव का प्रतिशत महज 47.1 तथा ग्रामीण क्षेत्रों में महज 40.8 प्रतिशत ही रहा।
गर्भवती महिलाओं की प्रसव पूर्व देखभाल या जांच डाक्टरों या स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा की जाती है। गौरतलब है कि आंगनबाड़ी केंद्रों के प्रयासों से गर्भवती महिलाओं को दी जाने वाली चिकित्सकीय सहायता तथा पोषित आहार के सुझावों के अलावा आयरन व फोलिक एसिड के टेबलेट नियमित मुहैया कराने से प्रदेश में मातृत्व रुग्णता एवं मृत्यु दर में गिरावट आई है। हालांकि मध्यप्रदेश के 10 आईएमएनसीआई जिलों में ऐसी गर्भवती महिलाओं की संख्या अभी भी 50 प्रतिशत से कम है जो सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित करने के लिए गर्भावस्था के दौरान आंगनबाड़ी केंद्रों में कम से कम तीन बार जाती हों। ग्रामीण इलाकों में तो यह स्थिति और भी गंभीर है जहां महज 25 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं ही गर्भावस्था के दौरान कम से कम तीन बार जांच कराने आंगनबाड़ी केंद्र जाती हैं।
मध्यप्रदेश की शिशु व मातृ मृत्यु दर को देखते हुए यहां की प्राथमिकताओं में साफ व सुरक्षित प्रसव, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ऊपर की सूची में से एक है। हालांकि प्रदेश के आईएमएनसीआई जिलों के ग्रामीण इलाकों में सुरक्षित संस्थागत प्रसव के आंकड़े सरकार के दावों पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। प्रदेश के चार आईएमएनसीआई जिलों क्रमश: सतना, कटनी, शिवपुरी एवं विदिशा में शहरी व ग्रामीण क्षेत्रा में होने वाले कुल प्रसवों में से संस्थागत प्रसवों की संख्या 50 प्रतिशत से भी कम है। इनमें सतना में 42.4 प्रतिशत, कटनी में 43.7 प्रतिशत, शिवपुरी में 44.3 प्रतिशत तथा विदिशा में 48.5 प्रतिशत प्रसव ही संस्थागत दर्ज किए गए हैं। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि इन जिलों में जन्म लेने वाले आधे नवजात अपने जन्म के समय से ही खतरे में रहते हैं। नवजातों को होने वाला टिटनेस भी शिशु मृत्यु का एक बड़ा कारण बना हुआ है।
नवजातों को होने वाला टिटनेस ऐसे प्रसवों में बेहद आम है जो असुरक्षित व कम साफ-सफाई वाले माहौल में कराया जाता है तथा जन्म के बाद बच्चे की नाल औजारों को बिना असंक्रमित किए ही काट दी जाती है। हालांकि नवजातों का टिटनेस गर्भवती महिलाओं को टिटनेस टॉक्साईड की दो खुराक देने से टाला जा सकता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि शिवपुरी जिले में ऐसी गर्भवती महिलाओं का प्रतिशत महज 30.1 है जिन्हें टिटनेस टॉक्साईड की खुराक दी गई हो, वहीं गुना में ऐसी गर्भवती महिलाओं की संख्या महज 32.9 प्रतिशत ही थी। इससे साफ तौर पर मध्यप्रदेश में संस्थागत प्रसव के अफसोसजनक स्थिति की जानकारी मिलती है।
आईएमएनसीआई जिलों में नवजात देखभाल की स्थिति :
नवजातों की सबसे पहली और महत्वपूर्ण जरूरतों में स्तनपान तथा चिकित्सकीय जांच शामिल है। शिशु के जन्म के दिन से ही उसकी स्वास्थ्य की जांच की जानी चाहिए तथा नवजात अवधि के दौरान उसकी नियमित स्वास्थ्य जांच की जानी चाहिए। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन जरूरी निर्देशों का ध्यान आईएमएनसीआई जिलों तक में नहीं रखा जाता जो नवजातों तथा शिशुओं की देखभाल के लिए ही खासतौर पर चिन्हित किए गए हैं। उदाहरण के तौर पर लगभग सभी आईएमएनसीआई जिलों में ऐसे नवजात शिशुओं की संख्या महज 40-55 प्रतिशत तक ही है जिन्हें जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान मुहैया कराया गया हो। इसी तरह आईएमएनसीआई जिलों में ऐसे नवजात शिशुओं की संख्या 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है जिनकी जन्म के 24 घंटों के भीतर किसी न किसी तरह की चिकित्सकीय जांच की गई हो। इसका सीधा यह अर्थ हुआ कि आईएमएनसीआई जिलों में भी करीब 50 प्रतिशत नवजात ऐसे हैं जिनके शिशु रोगों की पहचान व निदान के लिए किसी भी तरह की चिकित्सकीय जांच नहीं की गई। शिवपुरी, दतिया एवं गुना में ऐसे नवजात शिशुओं की संख्या 25 प्रतिशत से भी कम रही जिन्हें जन्म के 10 दिनों के अंदर किसी भी तरह की चिकित्सकीय जांच मुहैया कराई गई हो। जबलपुर प्रदेश का ऐसा जिला है जिसमें स्वास्थ्य जांच की सुविधा पाने वाले नवजात शिशुओं का प्रतिशत सबसे ज्यादा है, लेकिन यह भी 60 प्रतिशत से कम ही है।
| मध्यप्रदेश के 12 आईएमएनसीआई जिलों के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सूचकांक
जिले |
कुल प्रसव में से 15-19 वर्ष की महिलाओं को होने वाले प्रसव की संख्या |
संस्थागत प्रसव
| जन्म के 24 घंटों के भीतर नवजात की जांच |
जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान |
शिशु जिनका पूर्ण टीकाकरण हुआ हो |
| भिंड |
14.6 |
47.8 |
29.1 |
43.9 |
38.5 |
| भोपाल |
9.6 |
33.4 |
20 |
39.5 |
52.2 |
| दतिया |
20.6 |
41.8 |
19.3 |
47.8 |
8.8 |
| गुना |
10.4 |
43 |
18.5 |
35.2 |
18.6 |
| जबलपुर |
14.1 |
47 |
39.4 |
45.2 |
41.3 |
| कटनी |
11.6 |
38.5 |
32.5 |
45.8 |
46.4 |
| मुरैना |
19.6 |
54 |
29.1 |
29.6 |
34.3 |
| रतलाम |
13.9 |
56.4 |
44.2 |
31.8 |
50.4 |
| सतना |
11.8 |
39.1 |
37.2 |
37.6 |
26.5 |
| सीहोर |
13.6 |
50.1 |
42.5 |
43.7 |
58.3 |
| शिवपुरी |
16.9 |
39.4 |
16.7 |
39.6 |
15.5 |
| विदिशा |
15.3 |
41.5 |
21.8 |
40.6 |
21.7 |
स्रोत: डीएलएचएस-3 रिपोर्ट - 2007-08
मध्यप्रदेश के आईएमएनसीआई जिलों में बाल टीकाकरण की स्थिति :
शिशुओं को छह अहम बीमारियों से बचाने के लिए 12 से 23 माह की आयु वर्ग के दौरान टीकाकरण करने की बाल स्वास्थ्य देखभाल संबंधी योजना मध्यप्रदेश में दरकिनार कर दी गई है। अभी भी प्रदेश के दो आईएमएनसीआई जिले, दतिया व शिवपुरी ऐसे हैं जिनमें 20 प्रतिशत से कम बच्चों का पूर्ण टीकाकरण किया गया है। आईएमएनसीआई के तहत आने वाले 12 जिलों में से केवल भोपाल व सीहोर ही ऐसे हैं जिनमें 60 प्रतिशत से अधिक शिशुओं का पूर्ण टीकाकरण हो पाया है। जबकि आईएमएनसीआई के तहत आठ जिलों में 40 प्रतिशत से भी कम बच्चों का पूर्ण टीकाकरण हो पाया है। देश व प्रदेश में पोलियो उन्मूलन अभियान के बावजूद मध्यप्रदेश के आईएमएनसीआई जिलों में 25 प्रतिशत बच्चे अब भी ऐसे हैं जिन्हें पोलिया की तीन खुराक नहीं मिल पाई है। नवजातों एवं शिशुओं को बेहतर स्वास्थ्य, बुध्दि व विकास के लिए विटामिन ए की खुराक बेहद जरूरी है। लेकिन शिवपुरी एवं गुना जिलों में 9 से 35 माह की आयुवर्ग के महज 15.7 एवं 18.5 प्रतिशत बच्चों को ही विटामिन ए के पूरक तत्व की एक खुराक मिल पाई है।
आईएमएनसीआई जिलों में स्वास्थ्य संस्थाओं की स्थिति :
डीएलएचएस-3 की रिपोर्ट के मुताबिक ब्लॉक व गांवों के स्तर पर स्थापित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तथा उप स्वास्थ्य केन्द्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं व सेवाओं के जरिए मातृत्व व बाल स्वास्थ्य की स्थिति को और बेहतर किया जा सकता है। इस संदर्भ में यह अनिवार्य है कि आईएमएनसीआई जिलों में मातृत्व बाल स्वास्थ्य की स्थिति के आंकलन के लिए यहां स्थित स्वास्थ्य संस्थाओं में मुहैया की जाने वाली सुविधाओं व सेवाओं का विश्ले षण किया जाए। अगर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तथा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के दिशा-निर्देशों पर गौर करें तो हम पाएंगे कि इसमें स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए कम से कम अलग लेबर रूम, खून संग्रहण ईकाई, महिला रोग विषेशज्ञ, महिला विषेशज्ञ, एम्बुलेंस सेवा और बड़े डीप फ्रीजर का होना न्यूनतम अनिवार्यता है।
सामुदायिक/ प्राथमिक/ उप स्वास्थ्य केंद्र जिनमें लेबर रूम मौजूद हैं:
प्रदेश के सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में अलग से लेबर रूम नहीं है। हालांकि इन स्वास्थ्य सामुदायिक केंद्रों का निर्माण ग्रामीण आवादी को विश्व। स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के लिए ही किया गया है। इसी तरह आईएनएनसीआई जिलों में महज 40.9 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र व 5.49 प्रतिशत उप स्वास्थ्य केंद्रों मे ही अलग से लेबर रूम मौजूद हैं ताकि प्रसव के दौरान सफाई रखी जा सके व सुरक्षित प्रसव अंजाम दिया जा सके। असुरक्षित और गंदगी वाले माहौल में प्रसव से नवजात की जान को खतरा हो सकता है।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जिनमें खून संग्रहण ईकाई की सुविधा है:
ग्रामीण क्षेत्रों में ऑपरेशन से होने वाले प्रसव की संख्या 5.6 प्रतिशत (एनएफएचएस-3,2005-06, भारत) है। ऐसे में इन क्षेत्रों में खून की जरूरत साफ तौर पर समझी जा सकती है। लेकिन बमुश्किल तीन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ही ऐसे हैं जहां प्रसव के दौराई किसी जटिलता के दौरान जान बचाने के लिए खून संग्रहण ईकाई की सुविधा मुहैया कराई गई हो। इसका यह अर्थ हुआ कि प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं से निपटने के लिए केवल 4.61 प्रतिशत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को ही समुचित सुविधाओं से लैस किया गया है।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जहां प्रसूति विषेशज्ञ/महिला विषेशज्ञ डॉक्टर मौजूद हैं :
मध्यप्रदेश के आईएमएनसीआई जिलों के महज 17 प्रतिशत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में प्रसूति विषेशज्ञ/महिला विषेशज्ञ डॉक्टर मौजूद हैं। इसी तरह महज 9.2 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में ही महिला स्वास्थ्य अधिकारी (एलएमओ) की नियुक्ति की गई है। भोपाल, दतिया, कटनी, रतलाम, सतना, शिवपुरी तथा विदिशा जिलों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में एक भी प्रसूति विषेशज्ञ या महिला विशेज्ञ की नियुक्ति नहीं की गई है।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जिनमें बड़े डीप फ्रीजर हैं :
स्वास्थ्य केंद्रों में दवाओं व टीकों को सुरक्षित ढंग से रखने के लिए बड़े डीप फ्रीजर की आवश्येकता होती है। लेकिन प्रदेश के आईएमएनसीआई जिलों में महज 46 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तथा 45 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में ही राज्य सरकार की ओर से बड़े डीप फ्रीजर मुहैया कराए गए हैं।
सामान्य प्रसव किट वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र :
प्रसव के लिए बेहद उपयोगी मानी जाने वाली सामान्य प्रसव किट प्रदेश के केवल 42.73 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में ही मुहैया कराई गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि प्रदेश के आधे से ज्यादा स्वास्थ्य केंद्रों में अभी भी प्रसव के दौरान असुरक्षित औजारों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
नवजातों के वार्मर (इंक्यूबेटर) से लैस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र :
आईएमएनसीआई के 227 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में से महज 27 स्वास्थ्य केंद्रो में ही नवजातों को जटिल स्थिति से बचाने के लिए वार्मर या इंक्यूबेटर की सुविधा से लैस किया गया है। रतलाम जिले में 25 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में से एक भी स्वास्थ्य केंद्र में वार्मर या इंक्यूबेटर की सुविधा नहीं है ताकि सर्दियों में नवजातों का तापमान कमरे के तापमान के मुताबिक किया जा सके।
ऑटो डिस्पेंसिबल सिरिंज की सुविधायुक्त उप स्वास्थ्य केंद्र :
मध्यप्रदेश के महज 14.75 प्रतिशत उप स्वास्थ्य केंद्रों (2019 में से 298) में ही इलाज व टीकाकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले ऑटो डिस्पेंसिबल सिंरिज मुहैया कराए गए हैं। सभी 12 आईएमनएनसीआई जिलों में एक भी ऐसा जिला नहीं है जहां 30 प्रतिशत से ज्यादा उप स्वास्थ्य केंद्रों में ऑटो डिस्पेंसिबल सिरिंज मुहैया कराए गए हों। सतना जिले में तो केवल 8.91 प्रतिशत उप स्वास्थ्य केंद्रों में ही ऑटो डिस्पेंसिबल सिरिंज दिए गए हैं।
11वीं पंचवर्षीय योजना के तहत बाल स्वास्थ्य के लिए वर्ष 2007-08 में बजट 1079.59 लाख रुपयों से बढ़ाकर 3170.47 लाख रुपए कर दिया गया है। मध्यप्रदेश के 12 आईएमएनसीआई जिलों में प्रशिक्षण, रख-रखाव खर्च व ट्रेनिंग सेंटर तथा फॉलोअप आदि के लिए 571.78 लाख रुपयों का बजट स्वीकृत किया गया है। इसमें 10 आईएमएनसीआई जिलों के जिला अस्पतालों में 578.00 लाख रुपयों की लागत से नवजातों के लिए विशेष 'सिक न्यूबॉर्न यूनिट' तथा हर जिले में दो सीईएमओएनसी (आपातकालीन प्रसूति व नवजात देखभाल केंद्र) स्थापित किए गए हैं। इसके बावजूद शिशु स्वास्थ्य के संकेतकों में किसी भी तरह के संतोषजनक सुधार नजर नहीं आ रहे हैं, साथ ही यह सारी व्यवस्था इन जिलों में शिशु मौतों की ऊंची दर पर लगाम कसने में भी नाकाम दिखती नजर आ रही है।
आईएमएनसीआई के तहत 12 जिलों का ही चयन क्यों ?
अगर हम शिशु स्वास्थ्य के संकेतकों पर नजर डालें तो यह बुनियादी सवाल उठता है कि आईएमएनसीआई के तहत उपरोक्त 12 जिलों का चयन करने के पीछे आखिर क्या आधार है। दूसरे जिले इससे अलग किस आधार पर रखे गए। आखिर छतरपुर, बालाघाट, सागर, बैतूल, सीधी व उज्जैन जैसे जिलों को इससे अलग क्यों रखा गया, जबकि इनमें भी शिशु मृत्यु दर काफी ऊंचीं है। वर्ष 2008-09 में अप्रैल से जनवरी माह के दौरान छतरपुर में 1415, बालाघाट में 1261, सागर में 1728, सीधी में 975, बैतूल में 962 व उज्जैन में 800 शिशुओं ने उचित देखभाल व ध्यान न देने की वजह से अपनी जान गंवा दी। अगर इन जिलों की तुलना में आईएमएनसीआई के तहत आने वाले भोपाल, विदिशा, सीहोर व रतलाम सरीखे जिलों की तुलना की जाए तो हम देखते हैं कि आईएमएनसीआई जिलों में शिशु मृत्यु दर अपेक्षाकृत कम है।
- यह दस्तावेज सीमा जैन ने विकास संवाद इंफो पैक सीरीज कार्यक्रम के तहत तैयार किया है। इसका हिंदी में अनुवाद अमन नम्र द्वारा किया गया है। |