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  मध्‍यप्रदेश में टीबी की स्थिति  
     
 

भूमण्‍डलीकरण की प्रक्रिया में दुनिया के लगभग सभी विकसित देशों को फायदा हुआ है, लेकिन विकासशील देशों एवं अविकसित देशों को नुकसान ही हुआ है। अमीर और गरीब ही नहीं, देशों के बीच का अंतर भी बढ़ा है, और सबसे बड़ी बात तो यह कि इसका प्रभाव गरीब देशों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि कई विकसित देशों के गरीबों पर भी बुरा असर पड़ा है। इसके परिणामस्‍वरूप उनके स्‍वास्‍थ्‍य पर असर पड़ा है और स्‍वास्‍थ्‍य का ढांचा भी चरमराया है। 1990 एवं 1995 के बीच केवल अफ्रीकी देशों ने ही 13.4 अरब डालर प्रति वर्ष अपने ऋणदाताओं को चुकाए हैं, जो इन देशों द्वारा स्‍वास्‍थ्‍य एवं शिक्षा पर किए जाने वाले संयुक्‍त खर्च से भी ज्‍यादा है। 1987 से 1993 के बीच  अफ्रिका द्वारा विश्‍वबैंक 38 अरब डालर राशि चुकाई गई। परिणाम स्‍वरूप इन देशों के बाहर एवं अंदर भी गैर बराबरी तेजी से बढ़ी। विश्‍व में सबसे अमीर एवं गरीब देशों में आय का अंतर दुगने से ज्‍यादा हो गया है। अगर हम 1960 के दशक के लोगों पर नजर डालें तो हम पाएंगे कि 20 प्रतिशत लोगों की आय 20 प्रतिशत गरीबों की तुलना में 30 गुना थी आज उनकी आय 74 गुना ज्‍यादा हो गई है। 80 से ज्‍यादा देशों में प्रति व्‍यक्ति आय पिछले दशक की तुलना में कम हो गई है। 55 देश जिसमें ज्‍यादातर, अफ्रिका पूर्व यूरोप तथा पूर्व सोवियत संघ के ही हैं। की प्रति व्‍यक्ति आय में भारी कमी आई है।

स्रोत- वर्तमान दौर में भी पुरूषों की तुलना में महिलाओं की मजदूरी तथा काम की निम्‍न परिस्थितियों के साथ समझैता करती है। कई सार्वजनिक सुविधाओं और सेवाओं में कमी आई है और तुलनात्‍मक रूप से महिलाओं द्वारा किए जाने वाले बिना मजदूरी के कार्यों में वृद्धि हुई है। छोटे बच्‍चे जिनमें बालिकाओं की संख्‍या ज्‍यादा है। शालाओं से बाहर हो रहे हैं। खतरनाक और कम भुगतान के अनौपचारिक मजदूरी के क्षेत्र में शामिल हो रहे हैं। भोजन की बढ़ती कीमत साथ ही गरीबों को दी जाने वाली सब्सिडी में कमी की जा रही है। जिनके पास पहले ही कम संसाधन हैं, उन्‍हें अधिक गरीबी की ओर धकेला जा रहा है। यह स्थिति समहिलाओं और बच्‍चों को अनुपात से ज्‍यादा प्रभावित करता है/ इन निम्‍नतम जीवन परिस्थितियों में लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य पर भी बुरा असर पड़ा है और वे कई संक्रामक बीमारियों से ग्रसित हुए है।

संक्रामक बीमारियों का कहर - वैसे तो 1960 में संक्रामक बीमारियों पर प्रभावित नियंत्रण का आनंद हम आज तक मना रहे हैं, लेकिन 40 साल बाद एक पूर्णत- नया परिदृश्‍य सामने प्रकट हो रहा है, एड्स जैसी भयानक बीमारी हमें अपने आगोश में लेती जा रही है। उपसहारन अफ्रिका को हैजा, पीला बुखार तथा दक्षिण अमेरि‍का को मलेरिया, एवं डेंगू और नानाविध दवाओं से प्रभावहीन टी.बी., प्‍लेग, डेंगू एवं मलेरिया का भारत में पुनर्जागरण हो रहा है। भारत में स्‍वास्‍थ्‍य व्‍यवस्‍था पिछले 15 सालों में जब से 1991 में आर्थिक उदारीकरण कार्यक्रम प्रारंभ किया गया है, सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं के लिए ली जाने वाली फीस की नीति में नकारात्‍मक प्रभाव डाला है, विशेष रूप से गरीब, वंचित समूहों तथा महिलाओं के ऊपर इसका ज्‍यादा असर देखने को मिला है।  राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य नीति स्‍वीकार करती है कि स्‍वासथ्‍य सुविधा की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं और इसका प्रमुख कारण स्‍वास्‍थ्‍य पर खर्चा निकलकर सामने आता है परिणाम स्‍वरूप लोग कर्ज में डूबते हैं। विश्‍व में चिकित्‍सा अनुसंधान पर खर्च होने वाले 56 अरब डालर के 10 प्रतिशत से भी कम राशि 90 प्रतिशत जनता को प्रभावित करने वाली स्‍वासथ्‍य समस्‍याओं के लिए खर्च होता है।  90 फीसदी राशि उन बीमारियों के अनुसंधान पर खर्च की जाती है। जिसका वास्‍तवा मह 10 फीसदी लोगों से है। टी.बी. भी एक ऐसी ही बीमारी है जिससे भारतीय निम्‍न वर्ग ज्‍यादा प्रभावित है। इसे गरीबों की बीमारी कहा जाता है दो वक्‍त की रोटी के अभाव में गरीब व्‍यक्ति अपने रोग प्रतिरोधक क्षमता घटा देते हैं और टी.बी. जैसी बीमारी की चपेट में आ जाते हैं।

टी.बी. यानी क्षय रोग के बारे में

भारत में टी.बी. यानी क्षय रोग की चपेट में प्रति वर्ष 18 लाख से भी ज्‍यादा लोग आते हैं। विश्‍व में 1 करोड़ 40 लाख क्षयरोग  से पीडि़त हैं। इस भयानक बीमारी से भारत में प्रतिवर्ष 5 लाख लोगों की मृत्‍यु होती है। यह एक संक्रामक रोग है जो कि माइक्रोबेक्‍टीरियम, ट्यूबरकुलोसिस नाम के जीवाणु से होती है। ट्यूबर बैसीलाई मुख्‍यत: फेफड़ों पर असर कर फेफड़ों की टी.बी. (पल्‍मोनरी) ट्यूबरकुलोसिस कहते हैं। कुछ व्‍यक्तियों में शरीर के दूसरे अंग भी प्रभावित होते हैं। जिसे एक्‍ट्रा पल्‍मोनरी ट्यूबरकुलोसिस कहते हैं।

क्षय रोग का फैलाव - 

टी.बी. के जीवाणु द्वारा फैलते हैं। जब एक क्षय रोगी खांसता है या छींकता है तो ये जीवाणु छोटे काणों के रूप में हवा में फैल जाते हैं। इन कणों को जब स्‍वास्‍थ्‍य व्‍यक्ति सांस द्वारा अपने शरीर में लेता है तो उसे वह बीमारी हो जाती है। चुंबन के द्वारा भी यह बीमारी एक व्‍यक्ति से दूसरे व्‍यक्ति में प्रवेश कर सकती है।

भारत में क्षय रोग की समस्‍या -  इसके लिए आवश्‍यक तथ्‍यों पर नजर डाले तो स्थिति बिल्‍कुल साफ हो सकती है।

  1. हमारे देश में करीब 140 लाख व्‍यक्ति टी.बी. की बीमारी से ग्रसित हैं इनमें से करीब 35 लाख स्‍पूटम पाजीटिव हैं।
  2. हर वर्ष करीब 22 लाख क्षय रोगी इसमें जुड़ जाते हैं, जिनमें से करीब 10 लाख स्‍पूटम पाजीटिव होते हैं।
  3. भारत में हर वर्ष करीब पांच लाख व्‍यक्ति टी.बी. के कारण मरते हैं, अर्थात् प्रत्‍येक मिनट 1 व्‍यक्ति की मौत टी.बी. के कारण होता है।
  4. एक स्‍पूटम पाजीटिव मरीज एक वर्ष मे 10-15 व्‍यक्तियों को टी.बी. से ग्रसित करता है।
  5. यह एक अनुमान है कि वर्तमान में एक लाख की जनसंख्‍या पर एक वर्ष में करीब 229 क्षय रोगी खोजे जाते हैं।

 

क्षय रोग का वर्गीकरण

क्षय रोग
पल्‍मोनरी
स्‍पूटम पाजीटिव
एक्‍ट्रा पल्‍मोनरी
1.  लिम्‍फ नोड्स
2. हड्डी व जोड़
3. यूरोलाईटल तंत्र
4. तंत्रिका तंत्र (मेनिन्‍जेज)
5. आहार नली

फैफड़ों की टी.बी. - यह भी दो प्रकार की होती है।

स्‍पूटम पाजीटिव - ऐसे पीडि़त व्‍यक्ति जिसके सूक्ष्‍मदर्शी परीक्षण में कम से कम दो खखार के नमूनों में एसिड फास्‍ट बेसीलाई माईक्रोबेक्‍टीरियम हो।

ट्यूबर क्‍यूलोसिस निकलते हैं, स्‍प्‍यूटम पॉजीटिव मरीज कहलाता है। या तो ऐसा मरीज जिसके केवल एक खंखर के नमूने में जीवाणु निकलते हैं और जिसका एक्‍स-रे एक्टिव पल्‍मोनरी टी.बी. होना बाताता है। वही भी स्‍प्‍यूटम पाजीटिव मरीज कहलाता है।

स्‍प्‍यूटम नेगेटिव – ऐसे पीडि़त व्‍यक्ति जिसके सभी लोग खंखार के नमूनों में कीटाणु नहीं निकलते हैं एव उसका एक्‍स-रे एक्टिव पल्‍मोनरी टी.बी. (फेफड़ों को छोड़कर) को दर्शाते हैं, वह एक्‍सट्रा पल्‍मोनरी टी.बी. का मरीज कहलाता है।

क्षय रोग के लक्षण – पाल्‍मोनरी टी.बी. के लक्षणों को पहचानना ज्‍यादा कठिन नहीं है, बस जरूरतें हैं तो ध्‍यान देने की। लक्षणों में तीस सप्‍ताह से अधिक खांसी (खंखार के साथ) आती है और शाम के समय शरीर गर्म हो जाता है। वजन में दिन-प्रतिदिन कमी आती जाती है। रोज भूख में उदासीनता आ जाती है। छाती में दर्द होता है और खंखार में खून आता है। टी.बी.मरीजों के लिए ऐसा माना जाता है टी.बी. के मरीजों को।

एक्‍ट्रा पल्‍मोनरी टी.बी. – इसमें अन्‍य मरीजों की तरह जिन्‍हें एक्‍ट्रा पल्‍मोनरी टी.बी. होती है, उनके लक्षण में शरीर का कौन सा अंग प्रभावित हुआ है इस पर निर्भर करते हैं।

    1. लिम्‍फनोड टी.बी. – गले के बगल में सूजन (गठान) होना अकेले या साथ में डिस्‍चार्जिंग साईनस के साथ।
    2. मस्तिष्‍क की टी.बी. – सिर दर्द, बुखार, सुस्‍तीपन, दिमागी विचलता, गर्दन कड़क होना।
    3. फैफड़ों की टी.बी. – ऐसे मरीज जिसके 3 में से 2 खंखार के नमूनों में जीवाणु निकलते हैं वह फेफड़ों की टी.बी. से ग्रस्‍त होना निश्चितत होता है।

राष्‍ट्रीय क्षय नियंत्रण कार्यक्रम – टी.बी. को नियंत्रित करने के लिए एक कार्यक्रम बनाया गया, जिसका नाम राष्‍ट्रीय क्षय नियंत्रण कार्यक्रम किया गया। भारत में राष्‍ट्रीय क्षय नियंत्रण कार्यक्रम (एनटीपीसी) वर्ष 1962 में जिला क्षय के केन्‍द्र, टी.बी. क्‍लीनिक एवं अस्‍पताल की स्‍थापना के द्वारा प्रारंभ किया। तथा शुरूआत से ही यह कार्यक्रम सामान्‍य स्‍वास्‍थ्‍य सेवा से समन्वित किया गया। पहले तो इस कायक्रम की सेवाएं प्राथमिक स्‍वास्‍थ्‍य सेवा के इन्‍फ्रास्‍टक्‍चर के द्वारा दी गई,लेकिन एनटीपीसी के परिणाम उत्‍साहवर्धक नहीं थे। इसलिए वर्ष 1992 में क्षय नियंत्रण कार्यक्रम की गतिविधियों को दोबारा शुरू किया गया था। इसके साथ ही पुनरीक्षित क्षय नियंत्रण कार्यक्रम की क्रमवार शुरूआत हुई।

पुनरीक्षित राष्‍ट्रीय क्षय नियंत्रण कार्यक्रम (आरएनटीपीसी)

इस कार्यक्रम को बनाने से पहले कुछ उद्देश्‍य एवं लक्ष्‍य रखे गय थे उसे प्राप्‍त करके ही इस कार्यक्रम को बनाया जा सकता था जिसके लिए मापदण्‍ड रखे गये –

1.  नए धनात्‍मक रोगियों में से 85 प्रतिशत से अधिक क्‍योर रेटा हो।
2. कम से कम 70 प्रतिशत संभावित नए धनात्‍मक रोगियों को खोजना।
3. सभी खोजे गए मरीजों को पंजीयन आवश्‍यक है। सभी पंजीकृत मरीजों का उनके रोग से मुक्‍त होने तक इलाज किया जाए।
4. डायरेक्‍टली आब्‍जर्ब्‍ड चिकित्‍सा शॉट-कोर्स कीमोथेरेपी (डॉट्स) सभी हो दी जाए।
5. दवाइयों की नियमित उपलब्धि।
6. मरीजों के खंखार की जांच दर्शाए गए अंतर से कराकर मरीजों की अवस्‍था एवं रोग मुक्ति की जांच करें।
7. ऐसे मरीज जिनको 3 सप्‍ताह या ऊपर की खांसी चलती हो, स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍था में आते हैं उनका निदान खंखार की जांच द्वारा किया जाए।

(डॉट्स) का मतलब सीधी देखरेख में ‘अल्‍पकालीन चिकित्‍सा’ जिसमें मरीज को स्‍वास्‍थ्‍य कार्यकर्ता या डॉट्स प्रोवाइटर के सामने क्षय रोग की दाव खिलाई जाती है, उसे डॉट्स कहते हैं। टी.बी; कि चिकित्‍सा में 2 पक्ष है। दो से तीन माह का गहन पक्ष एवं चार से पांच माह तक का निरंतर पक्ष। यह निर्भर करता है कि मरीज किस श्रेणी का इलाज ले रहा है। कार्यक्रम के तहत इंटैसिव फेज (गहनपक्ष) में सप्‍ताह में तीन बार एक दिन छोड़कर मरीज को दो से तीन माह तक दवा खिलाई जाए। उसके बाद खंखार की जांच की जाए और यदि उसमें जीवाणु नहीं निकलते हैं तो मरीज को एक सप्‍ताह की दवाई का बिलस्‍टर पेक घर पर खाने के लिए दे दिया जाए। जिसे वह एक दिन छोड़कर सप्‍ताह निकालकर खाए। साप्‍ताहिक पेक का पहला डोज स्‍वास्‍थ्‍य कार्यकर्ता की उपस्थिति में खिलाया जाए मरीज ने अपने घर पर दवाई खाई है अथवा नहीं इसकी जांच उससे खाली पेक बुलवाकर की जाए। स्‍वास्‍थ्‍य जब वह अगले सप्‍ताह दवा लेने आए। कन्‍टीन्‍यूएशन फैज (निरंतर पक्ष) के दो माह बीत जाने के बाद एवं उपचार की समाप्ति पर खंखार की जांच अवश्‍य कराई जाए।

डॉट्स की खासियत –

1.  मरीज के रोग मुक्‍त होने की जिम्‍मेदारी स्‍वास्‍थ्‍य कार्यकर्ता की है न कि मरीज।
2. मरीजों के लिए एक सेवा है।
3. क्षय की बीमारी फैलने में रोककर समाज को इन बीमारियों से सुरक्षित रखती है।
4. कास्‍ट इफेक्टिव है।
5. केवल यही विधि है जिससे रोग मुक्ति सु‍निश्चित है।

क्‍योर रेट (रोग मुक्ति)

ऐसा मरीज जो पहले स्‍पूटम पाजीटिव था और अपना इलाज पूरा कर लेता था एवं बाद में कम से कम दो बार स्‍पूटम नेगेटिव (जिसमें से एक स्‍पूटन परीक्षण उपचार समाप्ति पर किया गया तो) निकलता है। उसे रोग मुक्‍त घोषित किया जाता है।  

क्‍योर रेट
कितने स्‍पूटम पाजीटिव मरीजों को चिकित्‍सा पर रखा गया एवं उसमें से कितने मरीज रोग मुक्‍त हुए, इसके अनुपात को क्‍योरेट कहते हैं, अगर इलाज तो रहे  स्‍पूटम पाजीटिव 100 मरीजों में से 85 मरीज रोगमुक्‍त घोषित किए गए तो क्‍योर रेट 85 प्रतिशत होगा।

क्षय रोग सस्‍पेक्‍ट क महतवपूणर्ण बिन्‍दु

  1. स्‍वास्‍थ्‍य कार्यकर्ता को जितनी जल्‍दी हो सके क्षय रोग सस्‍पेक्‍ट को पहचान लेना चाहिए ताकि बीमारी का फैलाव न हो।
  2. ऐसे सभी मरीज जिसके लक्षण फैफड़ों की टीबी के हो उन सभी को खंखार परीक्षण हेतु समीप के माइक्रोसॉफ्ट सेंटर पर पहुंचाएं।
  3. फेफड़ों की टी.बी. के सर्वाधिक मुख्‍य लक्षण तीन सप्‍ताह या ऊपर की लगातार खांसी होना है।
  4. फैफड़ों की टी.बी. के दूसरे लक्षण जैसे वजन में कमी बुखार रात को आना, छाती में दर्द, भूख में कमी और खंखार में खून निकलना।

टी.बी. रोधी दवाइयों के कुप्रभाव

टी.बी. रोधी दवाइयों सामान्‍यता सुरक्षित होती हैं तथापि कभी इनका कुप्रभाव भी पड़ सकता है, यदि निम्‍न में से कोई विपरीत प्रभाव दिखाई दें तो दवाई रोक देनी चाहिए और रोगी को डाक्‍टर से तुरंत मिलना चाहिए।

  1. त्‍वचा और आंखों के तारों का पीला पड़  जाना यानि पीलिया हो जाना।
  2. गहन चरण के दौरान धुंधला दिखाई देता है।
  3. श्रेणी-2 के रोगियों के गहन चरण के दौरान चक्‍कर आता है सुनने की शक्ति भी कम होती जाती है।
  4. नियमित और पूर्ण उपचार होने पर टीवी का आधुनिक दवाइयों से पूर्णतया उपचार यिका जा सकता है।
  5. दवाइयों के पूरे कोर्स को बगैर इसे रोके यथा निर्धारित नियमित रूप से पूरा
  6. करना चाहिए अन्‍यथा टी.वी. की ओर गंभीर अवस्‍था तक पहुंच सकती है।
  7. बलगम की अनुपरीक्षण जांच महत्‍वपूर्ण है और प्रगति की जांच के लिए इसे करवाना चाहिए।
  8. ऐसे किसी भी व्‍यक्ति जिसे तीन महीने से इससे अधिक खांसी है को तुरंत चिकित्‍सक के पास ले जाना चाहिए और बलगम के तीन नमूनों की जांच करवानी चाहिए।
  9. सरकारी स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्रों में टी.वी. का निदान आैर उपचार नि:शुल्‍क किया जाता है।

खानपान मे ध्‍यान देना चाहिए प्रोटीन और विटामिन युक्‍त आहार के साथ ऊर्जा वाले आहार भी लेना चाहिए साथ में आराम भी करना चाहिए। काम को ज्‍यादा नहीं करना चाहिए जिससे मरीज की सांस फूलने लगे और सांस लेने में कठिनाई होने लगे ऐसे समय में पर्याप्‍त नींद और आहार लेना चाहिए। शरीर के किसी अन्‍य भाग में होने वाले टी.वी. का उपचार ठीक वेसे ही होता है जैसे कि फैफड़े का और रीढ़ की हड्डी के गंभीर टी.वी. वाले बच्‍चों में लकवे को रोकने के लिए अन्‍य चिकित्‍सा की जरूरत पड़ सकती है।

टी.बी. की हालत ए बयां

प्रदेश के शिवपुरी जिले के मझेरा गांव एक ऐसा गांव है जहां पर बड़ी संख्‍या में विधवा महिलाएं हैं और इसका मुख्‍य कारण है कि उनके पतियों की मृत्‍यु क्षय रोग यानि टी.बी. से हुई है। लगभग यहां पर 42 विधवाएं हैं जिनके पति टी.बी. का शिकार हुए हैं। यह आंकड़ा ही दिखा रहा है कि पुरूषों में यह जयादा पाया जाता है तो ऐसा नहीं है बल्कि प्रदेश का यह एक मातृ गांव नहीं, बल्कि न जाने ऐसे कितने गांव होंगे जो टी.बी. जैसी खतरनाथ बीमारी के चपेट में होंगे। अगर राजधानी भोपाल पर नजर डालें तो दिसंबर 2006 तक टी.बी. अस्‍पताल में भर्ती मरीजों की संख्‍या 1874 थी जिसमें से पुरूष 1385 और महिलाएं 489 थी। जिसमें से डिस्‍चार्ज हुए पुरूष 1304 और महिलाएं 498 तथा करने वाले मरीजों की संख्‍या 150 जिसमें पुरूष 112 और महिलाएं 38 थीं और यही आंकड़ा मार्च 2007 तक भर्ती मरीजों की संख्‍या 397 जिसमें 264 पुरूषों और 133 महिलाएं थीं। डिसचार्ज होने वाले मरीजों की संख्‍या पुरूष 22 और महिलाएं 29 थी। ये सारे आंकडे़ यहीं हकीकत वयां करते हैं कि महिलाओं की अपेक्षा पुरूष इसके ज्‍यादा शिकार हो‍ते हैं।

कुपोषण के कारण

बढ़ती विकास दर के बावजूद कुपोषण में वृद्वि की प्रवृ‍‍त्ति विकास नीतियों पर भी प्रश्‍न चिन्‍ह लगाती है पिछले दशक में 60 प्रतिशत आबादी की रोजी रोटी का स्‍त्रोत माने जाने वाली कृषि की विकास दर मात्र 1.5 प्रतिशत हो रही है, जो कि आबादी वृद्वि दर से भी कम है। देश की आबादी के बड़े भाग के लिए अपन बच्‍चों एवं गर्भवती महिलाओं को समुचित पोषण प्रदान करना संभव नहीं है, बच्‍चों एवं गर्भवती महिलाओं को समुचित पोषण प्रदान करने के लिए सन् 1975 में एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम शुरू किया था। गर्भवती महिलाओं एवं तीन वर्ष से कम आयु के बच्‍चों को पूरक पोषण प्रदान करने के लिए आंगनबाडियों की व्‍यवस्‍था भी की है। परंतु इनकी संख्‍या अपर्याप्‍त होने, समूचित बजट न मिलने के तथा अन्‍य कई कारणों की वजह से ये अपने दायित्‍वों का समुचित पालन ही नहीं कर पा रही है।

वर्ष 1991 में प्रति व्‍यक्ति भोजन की उपलब्‍धता 178 किलोग्राम की तुलना में 2004 में 154 किलोग्राम हो गई जबकि भारत में पश्चिमी देशों को जानवरों के लिए अनाज का निर्यात किया जाता है। आज भी हमारी आधी ग्रामीण जनता की भोजन उपलब्‍धता अफ्रीकी देशों में नीचे है। योजना आयोग के द्वारा लागू किए गए 1300 कैलोरी प्रतिदिन को पूर्णत: अनुचित पैमाने के द्वारा तय किए गए हैं। 27 प्रतिशत गरीबों की तुलना में 240 कैलोरी प्रतिदिन आवश्‍यकता के आधार पर 1999-2000 में हमारी ग्रामीण आजादी का 75 प्रतिशत गरीब में वर्गीकृत किया जा सकता था। शिशु एवं बच्‍चों की ऊंची मृत्‍यु दर को हमें अभी भी प्राप्‍त करना है।

गरीबी और कुपोषण दोनों एक दूसरे के पूरक ही हैं। आज भी आधी से ज्‍यादा जनता गांव में बसती है। गांव में कई भ्रांतियां होती हैं मसलन महिलाएं तब भोजन करती हैं जब घर के सारे लोग खाना खा लें। इस चक्‍कर में वह आधा पेट या फिर कभी- कभार भूखी भी रह जाती हैं। और धीरे-धीरे कुपोषण की शिकार हो जाती हैं। ऐसा ही हाल बच्‍चों का भी होता है वह भी ठीक ढंग से खा-पी नहीं पाते इसलिए वे भी कुपोषण का शिकार हो जाते हैं। यही एक वजह है कि कुपोषण के कारण महिलाओं व बच्‍चों को यह जल्‍दी ही अपनी चपेट में ले लेता है।

सह-संक्रमण से ज्‍यादा प्रभावित करती टी.बी.

एच.आई.वी. संक्रमित आबादी के मायने में भारत विश्‍व का सबसे पड़ा देश है। इसमें से 20 लाख लोगों को टी.वी. के सह संक्रमण होने का अनुमान लगाया जाता है। एच.आई.वी. नेगेटिव संक्रमित व्‍यक्तियों में टी.बी. रोग विकसित होने की संभावना मात्र 10 प्रतिशत होती है वहां दूसरी ओर एच.आई.वी. संक्रमित व्‍यक्तियों के जीवित रहने की संभावनाएं कम हो जाती है।

समन्‍वय का अभाव भी है

संशोधित राष्‍ट्रीय क्षय नियंत्रण तथा राष्‍ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन द्वारा टी.बी. एचआईवी संक्रमित टी.वी. से जुड़ी रूग्‍णता एवं मृत्‍यु दर को कम कर दोनों व्‍याधियों को प्रभावी नियंत्र एवं रोकथाम सुनिश्चित करना है। इस योजना के प्रथम चरण में सन् 2001 में अत्‍यधिक एचआईवी प्रभावित राज्‍यों (आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्‍ट्र, मणिपुर, नागालैंण्‍ड तथा तामिलनाडु) में गतिविधियां प्रारंभ की गई थी। द्वितीय चरण में सन् 2003 में इन गतिविधियों का विस्‍तार आठ अन्‍य राज्‍यों तक किया गया। इन गतिविधियों की फौरी प्राथमिकता इन 14 राज्‍यों में स्‍वैच्छिक सलाह तथा परीक्षण केन्‍द्रों एवं क्षय नियंत्रण में समन्‍वय को मजबूती से स्‍थापित करना है समन्‍वय के प्रयास निम्‍न बिन्‍दुओं पर केन्द्रित है।

  1. नीति निर्धारकों को समन्‍वय के प्रति पर्याप्‍त संवेदनशील बनाना।
  2. कार्यकर्ताओं हेतु संयुक्‍त प्रशिक्षण कार्यक्रमा।
  3. जिला, राज्‍य एवं राष्‍ट्रीय स्‍तर पर इस समन्‍वय के मूल्‍यांकन हेतु निरीक्षण एवं मूल्‍यांकन केन्‍द्र स्‍थापित करना।
  4. सामाजिक प्रचार-प्रसार हेतु दोनों कार्यक्रमों में गैर सरकारी संगठनों तथा निजी चिकित्‍सकों को जोड़ना।
  5. सूचना, शिक्षा तथा सम्‍प्रेषण हेतु संयुक्‍त प्रयास।

मध्‍यप्रदेश की स्थिति

मध्‍यप्रदेश में टीबी अस्‍पतालों की संख्‍या 7 है। ये भोपाल, जबलपुर, इंदौर, छिंदवाड़ा, नौगांव (छतरपुर) और सागर में है। क्षय रोग को नियंत्रित करने के उद्देश्‍य से पुनरीक्षित राष्‍ट्रीय क्षय नियंत्रण कार्यक्रम संपूर्ण देश में चलाया गया उसी संदर्भ में मध्‍यप्रदेश में नवम्‍बर 1998 से शुरू किया गया जो क्रमबद्ध तरीके से दिसम्‍बर 2004 तक प्रदेश के संपूर्ण  जिलों में लागू किया गया। इस योजना के अंतर्गत प्रदेश में एक टीबी यूनिट वहां स्‍थापित किया गया जहां 5 लाख की जनसंख्‍या हो, आदिवासियों के लिए इसमें 2.50 जनसंख्‍या को रखा गया वहीं 1 लाख की जनसंख्‍या आदिवासी क्षेत्रों में 3 हजार की जनसंख्‍या पर खोला जाता है। वर्तमान में प्रदेश में 7 क्षय चिकित्‍सालय, 142 टीबी, यूनिट, 714 माईक्रोस्‍कोपी सेन्‍टर तथा 10,456 डॉट सेन्‍टर स्‍थापित हैं जिनके माध्‍यम से प्रदेश की संपूर्ण आबादी को कार्यक्रम के अंतर्गत लाभान्वित किया जा रहा है। पुनरीक्षित राष्‍ट्रीय क्षय नियंृण कार्यक्रम के अंतर्गत नवम्‍बर 1998 से मार्च 2007 तक 2,47,264 क्षय रोगियों को खोजा जा चुका है। जिसमें 18,607 मरीजों को रोग मुक्‍त किया जा चुका है तथा शेष मरीजों का उपचार चल रहा है। वैसे तो टी.बी. के लिए पिछले दो वर्षों में 12 करोड़ रूपए का बजट प्रस्‍तावित था, लेकिन स्थिति सामान्‍य नहीं है इतना पैसा टी.बी. के लिए आया था उसका उपयोग उतना नहीं हो पाया।

जिला अस्‍पताल भोपाल में 8 डॉक्‍टर हैं। वहीं इनका साथ देने के लिए नर्सों की पद संख 39 है जिसमें से 2 ने रिटायरमेंट ले ली है। और 4 काटजू अस्‍पताल में कार्यरत हैं और मात्र 3 कंपाडर के साथ जिला अस्‍पताल टीबी खतरनाक बीमारी से लड़ने को हमेशा तैयार रहता है। जब राजधानी के अस्‍पताल की यह हालत है तो फिर बाकी छह टीबी अस्‍पतालों की हालत क्‍या होगी। इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

वर्तमान टी.बी. की स्थिति

 

दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्र में भारत उन प्रथम देशों में से है, जिसने संयुक्‍त टी.बी. एचआईवी इकाइयां स्‍थापित कर प्रशिक्षक की शुरूआत की है। अधिकांश राज्‍यों में सूचना, शिक्षा तथा सम्‍प्रेषण गतिविधियों के परिणाम स्‍वरूप स्‍वैच्छिक के सलाह तथा परीक्षण केन्‍द्रों में संबद्ध 3 लाख टी.बी. से संबंधित सूचनाए प्राइज़ कर कचुके हैं। कई राज्‍यों में जिला तथा राज्‍य स्‍तरीय समन्‍वय समितियों का गठन हो चुका है तथा राष्‍ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन द्वारा राष्‍ट्रीय क्ष्‍ज्ञय नियंत्रण कार्यक्रम के सहयोग से टी.बी. रोगियों में एचआईवी की निगरानी का कार्य किया जा चुका है।

केस स्‍टडी

भोपाल के टी.बी. अस्‍पताल में 50 वर्षीय शगीर खान जून 21 तारीख को ही भर्ती हुआ मरीज तीन साल पहले भी भर्ती हुआ था और अब की बार फिर भर्ती हो गया। टी.बी. जैसी खतरनाक बिमारी का पता चल जाने के बाद से शगीर बहुत डर गया था, उसने पहले  भी डॉट्स से ही इलाज करवाया था परन्‍तु अब उसे लग रहा था कि शायद उसने डॉट्स की पूरी खुराक नहीं ली होगी इसलिए उसे टी.बी. की बीमारी पुन: हो गई, लेकिन वह यहां के डॉक्‍टरों पर भी यह आरोप लगाया ळे कि जेसे कि यह सब लोग जानते हैं यह छूत की बीमारी है। इसका संक्रमण बहुत तेजी से फैलता है इसलिए डॉक्‍टर भी हिचकिचाते हैं कि कहीं उन्‍हे भी टी.बी. की बीमारी न हो जाए। ऐसा ही रवैया होता है नर्सों का भी जो मरीज की सही देखभाल नहीं कर पाती हैं। प्रदेश सरकार का यह दावा भी खोखला नजर आता है जिसमें वे दावा कर रहे हैं कि नवम्‍बर 1998 से मार्च 2007 तक 2,47,264 क्षय रोगियों को खोजा जा चुका है। जिसमें 1,18,607 मरीजों को रोग मुक्‍त किए जा चुके हैं तथा शेष मरीजों का उपचार चल रहा है। शायद लीला बई जो कि मात्र 23 साल की है जो जोगीपुरा, दिवानगंज रेल्‍वे स्‍टेशन के समीप ही रहती है जिसे तीन महीने पहले ही पता चला कि उसे टी.बी. की बबीमारी है उसने पास के ही सरकारी अस्‍पताल सांची में अपना इलाज करवाया परंतु वहां का इलाज न जाने क्‍यों काम नहीं आया।इसलिए हमें यहां आना पड़ा। शायद यह तो एक ही केस था जिसमें प्रदेश सरकार की कलई खुलती नजर आ रही थी परंतु न जाने ऐसे कितने अनगिनत केस होंगे जिसमें मरीजों को यहां-वहां भटकना पड़ता है फिर भी उन्‍हें सही इलाज नहीं मिल पाया और लीला बाई का केस बहुत ही संवेदनशील था क्‍योंकि उसका लड़का भी है जो मात्र आठ महीने का है जिसे पूरी संभावना है टी.बी. होने की। क्‍या यही है स्‍वास्‍थ्‍य कार्यकर्ताओं और डॉक्‍टरों का फर्ज।

 
     
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