माँ, माँ पृथ्वी है, जगत है, धूरी है,
माँ बिना इस सृष्टि की कल्पना अधूरी है,
तो माँ की ये कथा अनादि है,
ये अध्याय नही है……और माँ का जीवन में कोई पर्याय नहीं है,
''माँ'' एक ऐसा शब्द जिसे सुनते ही हर व्यक्ति को अपनी जन्मदायिनी महिला का ध्यान आ जाता है। वेदों में भी मां को भगवान से पहले पूज्य माना जाता है, परन्तु यह विडंबना ही है कि इसी मातृत्व के कारण विकासशील देशों की 15-45 वर्ष की लाखोँ महिलायें प्रतिवर्ष काल का ग्रास बन जाती हैं। सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि भारत में मातृ मृत्यु दर विकसित देशों की तुलना में चार गुनी हो जाती है। भारत में हर 7 मिनिट में एक महिला की मृत्यु मातृत्व या उससे जुड़े कारणों से होती है। देश में सर्वाधिक मातृ मृत्यु दर आसाम में 480 प्रति 1,00,000 जीवित जन्म है। जबकि केरल में न्यूनतम मातृ मृत्यु 95 प्रति 1,00,000 जीवित जन्म है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में मातृ मृत्यु दर 254 प्रति 1,00,000 जीवित जन्म है3। जबकि विश्व बैंक के आंकड़ें इसे 450 बताते है। मध्यप्रदेश में मातृ मृत्यु दर 335 प्रति 1,00,000 जीवित जन्म है4। हाल ही में मातृ मृत्यु के नये आंकड़े जारी किये गये हैं जिसके अनुसार भारत में मातृ मृत्यु दर 212 व मध्यप्रदेश में यही दर 269 हो गई है।5 इस रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश की स्थिति भारत में चौथे स्थान पर है।
गत वर्ष जून माह में मध्य प्रदे6ा की राजधानी भोपाल शहर में प्रदे6ा के सबसे बड़े अस्पताल सुल्तानिया जनाना अस्पताल में 48 घण्टों में 6 गर्भवती महिलाओं की मृत्यु प्रसव के दौरान हो गई विडंबना तो यह है कि इनमें से 4 महिलाओं की मृत्यु 8 घण्टे में हुई है। ये सभी महिलायें दूसरे स्थानों से गंभीर अवस्था में संदर्भित होकर आई थी। कितनी त्रासदायक प्रक्रिया है कि हमारी चिकित्सा संस्थाओं पर पदस्थ डॉक्टर या कर्मचारी स्थिति की गंभीरता को समझने में और निर्णय लेने में ही इतना वक्त लगा देते हैं कि महिला को संदर्भित स्थान तक पहुंचते पहुंचते स्थिति नियंत्रण से बाहर हो चुकी होती है। चिकित्सा संस्थायें भी प्रत्येक स्थितियों को इतनी सहजता से लेती हैं कि उनके लिये एक महिला की जिंदगी के कोई मायने नहीं होते है।
सच ही कहा गया है-''प्रसव के दौरान महिला का दूसरा जन्म होता है'' पर इस जीवनदायिनी प्रक्रिया में यदि जीवन देने वाली की ही मृत्यु हो जाये तो उस बच्चे के भविष्य का क्या होगा जिसने अभी इस दुनिया में आंख ही नहीं खोली है और उसे दुनिया में लाने वाली, उसकी देखभाल सार संभाल करने वाली ही दुनिया से चली गई।
स्थिति की भयावहता को समझते हुये सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों में जो 5वां लक्ष्य मातृ स्वास्थ्य का रखा गया है उसमें भी मातृ मृत्यु में तीन चौथाई तक कमी लाने का लक्ष्य तय किया गया है। सहस्त्राब्दि लक्ष्यों के अनुसार 2015 तक मातृ मृत्यु दर 109 प्रति एक लाख जीवित जन्म तक लानी है। भारत में इस लक्ष्य को केरल (81), तमिलनाडु (97) व महाराष्ट्र (104) राज्यों ने प्राप्त कर लिया है। इसे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये जरूरी कारको को भी इन विकास लक्ष्यों में सम्मिलित किया गया है। जैसे:
- कुशल स्वास्थ्य कर्मियों के द्वारा जन्म में सहायता
- 2015 तक प्रजनन स्वास्थ्य तक सार्वभौमिक पहुँच के लिये
- गर्भनिरोधक साधनों के उपयोग की दर बढ़ाना
- किशोरावस्था में जन्म दर रोकना
- प्रसवपूर्व जाँच (कम से कम चार बार)
- परिवार नियोजन की अपूरित माँग को खत्म करना
उक्त सभी कारक मातृ मृत्यु के प्रकरणों को बढ़ाते है। अत: आवश्यक है कि इन्हें पूरा करने के प्रयास सुनिश्चित किये जाय े।
सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिये आधा समय बीत चुका है उसके बावजूद भी मध्यप्रदेश की स्थिति यह है कि वर्ष 2011 प्रदेश के बड़वानी जिले के जिला अस्पताल में ही माह अप्रेल से नवम्बर के मध्य 25 माताओं की मृत्यु हुई व इनमें से 9 मृत्यु केवल नवम्बर माह में ही हुई। यह जिला वैसे ही आदिवासी बहुल जिला है व दूरदराज के गाँवों से जब प्रसूता को यहाँ लाया जाता है तो उन्हें जटिलता की अवस्था में 150 किमी दूर इन्दौर संदर्भित कर दिया जाता है और प्रसूता वहाँ पहुँचते पहुँचते दम तोड़ देती है। इस जिले में संस्थागत प्रसव का प्रतिशत वैसे भी काफी कम है (30 प्रतिशत से कम)6 और यदि संस्था में इतनी मातृ मृत्यु होंगी तो कौन इन संस्थाओं में प्रसव करवाने की जोखिम लेना चाहेगा। यूनीसेफ के एक अध्ययन के अनुसार कुल मातृ मृत्यु में 61 प्रतिशत योगदान दलित व आदिवासी समुदाय की महिलाओं का होता है।
मातृ मृत्यु में कमी लाने के लिये सरकार ने कई अभिप्रयोग शुरू किये है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के अन्तर्गत मातृ स्वास्थ्य के लिये राशि आवंटित की जाती है। भारतीय लोक स्वास्थ्य मापदंडों (आयपीएचएस) के तहत में विभिन्न स्तरों की स्वास्थ्य सुविधाओं पर उपलब्ध सेवाओं के सधन पैकेज प्रदान किये गये है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के अन्तर्गत गाँवों में ग्राम स्वास्थ्य एवं स्वच्छता समितियों तथा विभिन्न स्तर की सुविधाओं पर रोगी कल्याण समितियों को जिम्मेदारी दी गई है। संस्थागत प्रसव को बढ़ाकर भी इस समस्या से निजात पाने की कोशिश की गई है व इसके लिये जननी सुरखा योजना का क्रियान्वयन किया जा रहा है। इतने प्रयासों के बाद भी स्वास्थ्य सुविधाओं में उपलब्ध सेवाओं व सुविधाओं की हकीकत उपरोक्त चित्र से प्रकट हो जाती है जो कि एक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र के प्रसुति वार्ड का है। यहाँ महिलाओं के बिस्तर पर न तो चादरें बिछाई जाती है नहीं कोई कमरा है यह एक बरामदा है जिसमें नवम्बर माह में महिलाये अपने नवजात शिशुओं के साथ बिना पल्लों की खुली खिडकियों में से आती ठंडी हवाओं के बावजूद रहने को मजबूर है।
मातृ मृत्यु
गर्भावस्था व गर्भावस्था के समापन (प्रसव या गर्भपात) के 42 दिन के अंदर यदि महिला की मृत्यु होती है तो वह मातृ मृत्यु कहलाती है। परन्तु यह मृत्यु यदि आत्महत्या या किसी दुर्घटना या हत्या के कारण होती है तो इसे मातृ मृत्यु नहीं माना जायेगा। यदि पूर्व की किसी बीमारी का गर्भावस्था के दौरान बिगड़ जाना या ऐनेस्थेशिया के परिणामस्वरूप महिला की मृत्यु होती है तो वह मातृ मृत्यु की श्रेणी में आती है।
मातृ मृत्यु की परिभाषा
गर्भावस्था या प्रसव के दौना या गर्भावस्था के समापन के 42 दिनों के अंदर (गर्भावस्था का समापन या तो प्रसव के द्वारा या गर्भपात हो जाने या गर्भपात करवाने के कारण हो सकता है) यदि महिला की मृत्यु होती है तो उसे मातृमृत्यु कहा जाता है। परन्तु यह मृत्यु यदि हत्या आत्महत्या या किसी दुर्घटना के कारण होती है तो उसे मातृ मृत्यु नहीं माना जाता है।
यदि इसी अवधि के दौरान महिला गर्भावस्था से सम्बन्धित कारणों से बीमार या अपंग होती है तो उसे 'मातृत्व बीमारी' कहा जाता है। अधिकांश महिलायें एक से अधिक बार गर्भधारण करती हैं एवं हर बार गर्भ धारण करने पर पूरे समय मातृ मृत्यु की संभावना बनी रहती है। इसे महिलाओं का 'जीवनमय संकट' कहा जाता है।
मातृ मृत्यु के कारण
जिला स्तरीय परिवार सर्वेक्षण 3 के अनुसार मातृ मृत्यु के मुख्य कारण है रक्त स्त्राव (3431 प्रति6ात), संक्रमण (2115 प्रति6ात), असुरक्षित गर्भपात (1819 प्रति6ात), अवरूद्ध प्रसव (1115 प्रति6ात), गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप (1617 प्रति6ात) है।
मातृ मृत्यु के सभी चिकित्सकीय कारणों को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है, जैसे - प्रत्यक्ष कारण और अप्रत्यक्ष कारण।
1. प्रत्यक्ष कारण
गर्भावस्था, प्रसव के दौरान अथवा प्रसव पश्चात 42 दिनों के भीतर उत्पन्न जटिलताओं से हुई मृत्यु का कारण प्रत्यक्ष कारण होता है। तीन चौथाई या 75 प्रतिशत मातृ मृत्यु प्रत्यक्ष कारणों जैसे दौरे आना (एक्लेम्पशिया), असुरक्षित गर्भपात के कारण, संक्रमण होने से, ज्यादा खून बहने के कारण या अवरूध्द प्रसव (आब्स्ट्रक्टेड लेबर) के कारण होती है।
2. अप्रत्यक्ष कारण
गर्भावस्था, प्रसव के दौरान अथवा प्रसव पश्चात् (42 दिनों के भीतर) ऐसी बीमारियों के कारण हुई मृत्यु जो महिला को पहले से थी परन्तु गर्भावस्था, या प्रसव के कारण बिगड़ गई हो जेसे मलेरिया, खून की कमी, जिगर, हृदय या गुर्दे से सम्बंधित कोई बीमारी, एड्स आदि। इन चिकित्सकीय कारणों के अलावा अन्य कारणों से भी महिलाओं की मृत्यु हो सकती है। इनमें प्रमुख है प्रसव में 4 तरह की देरियां, ये 4 डी या 4 डिलेस कहलाये जाते है, ये निम्न हैं:
- डायग्नोसिस या निदान में देरी
- संदर्भित करने में देरी
- आवागमन में देरी
- सेवायें देने/लेने में देरी
3. निदान में देरी
किसी भी बीमारी का इलाज जितनी जल्दी शुरू किया जाये वह उतनी ही जल्दी ठीक हो सकती है पर यदि पहले से कोई ध्यान नहीं दिया जाता है तो स्थिति जटिल या संकटमय बन जाती है। इसलिये विश्व स्वास्थ्य संगठन ने प्रसव खतरे के कुछ कारण निर्धारित किये हैं। यदि इन पर ध्यान दिया जाये तो समय रहते इन महिलाओं को चिकित्सा सहायता दिलवाई जा सकती है।
निम्नलिखित स्थितियों में प्रसव की जटिलता या संकटमय होना अधिक संभावित होता है:
- पहली, चौथी या उसके बाद की गर्भावस्था
- गर्भवती महिला की आयु 18 वर्ष से कम या 35 वर्ष से अधिक होना।
- ऐसी गर्भवती महिलायें जिनको इससे पहले मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ हो, गर्भपात हो गया हो या ऑपरेशन से प्रसव हुआ हो।
- ऐसी गर्भवती महिलायें जो गर्भधारण के पहले से हृदय रोग, टीबी, मधुमेह या खून की कमी से पीड़ित हों।
- ऐसी गर्भवती महिलायें जो गर्भधारण के पश्चात् पैरो में सूजन, उच्च रक्तचाप या खून की कमी से ग्रस्त हों।
- ऐसी गर्भवती महिलायें जो बांझपन के इलाज के पश्चात् गर्भवती हुई हों।
- महिला के वजन का निर्धारित दर से न बढ़ना।
- ऐसी गर्भवती महिलायें जिनके पूर्व के नवजात शिशु की मृत्यु हो गई हो
- ऐसी गर्भवती महिलायें जिनकी ऊंचाई 145 से.मी. यानी 4 फीट 10 इंच या उससे कम हो।
- ऐसी गर्भवती महिलायें जिनको एक से अधिक बच्चे होने की संभावना हों।
ऐसे लक्षण जो उपरोक्त बीमारियों/अवस्थाओं से संबंधित हैं।
i. खून की कमी
सामान्य कामकाज करते हुए थकान महसूस करना, सांस फूलना, आंखों के अंदर के हिस्से का रंग फीका पड़ना, चेहरा सफेद पड़ना, नाखून सफेद होना, शाम के समय बुखार आना, चिड़चिड़ाहट आदि।
सुझाव
यदि संभव हो तो खून की कमी की जांच करवाकर आयरन फोलिक एसिड की गोलियां देना, भोजन में लौहतत्व युक्त भोजन जैसे गुड़, हरी पत्ती वाली सब्जी लोहे की कड़ाई में बनाकर खाना, पोहे, तरबूज, मूंगफली आदि का समावेश प्रतिदिन के भोजन में करने की सलाह देना।
ii. उच्च रक्तचाप
यूं तो उच्च रक्तचाप के लक्षण हर महिला में भिन्न -भिन्न हो सकते हैं परन्तु फिर भी कुछ सामान्य लक्षण है- चक्कर आना, सिर दर्द, पैरों में सूजन आना, चूड़ी, अंगूठी, चप्पल का फंसना या छोटी महसूस होना, आंखों का फूलना, वजन का तेजी से बढ़ना, (यदि एक महीने में 3 किलोग्राम या उससे अधिक वजन बढ़ता है तो यह खतरनाक हो सकता है), पेट में दर्द आदि।
सुझाव
उपरोक्त किसी भी लक्षण की शिकायत यदि महिला करती है तो उसका रक्तचाप नापा जाना जरूरी हो जाता है। यह रक्त चाप यदि 140/90 या उससे अधिक हो तो डॉक्टर की सलाह दिलवानी चाहिये। इसके साथ ही नमक, अचार, पापड़ आदि चीजें कम से कम खाने की सलाह देना होगी एवं महिला को पूर्णतया आराम करना चाहिये।
रक्त चाप अधिक होने या स्थिति बिगड़ने पर महिला को दौरे पड़ना या झटके आना देखें जाते हैं। इससे महिला एवं गर्भस्थ शिशु दोनों की मृत्यु हो सकती है। यह दौरे पड़ने या झटके आने की स्थिति प्रसव के दौरान या प्रसव के बाद 48 घंटे या दो दिन के अंदर हो सकती है। इस अवस्था में महिला को तुरंत अस्पताल ले जाना होगा। स्वास्थ्य कर्मी यदि महिला के साथ अस्पताल जा सके तो बेहतर रहता है। इस स्थिति को एक्लेम्पशिया कहते हैं।
iii. गर्भावस्था के दौरान रक्त स्त्राव: यह रक्त बहाव निम्नलिखित कारणों से होता है।
गर्भपात हो जाने या करवाने से:
गर्भावस्था के प्रथम 20 सप्ताह के दौरान गर्भपात के कारण रक्तस्त्राव होता है। यह गर्भपात किसी भी प्रकार का हो सकता है चाहे करवाया गया हो अथवा स्वयं हो गया हो। कभी-कभी रक्तस्त्राव गर्भपात न होने पर भी हो जाता है। जब गर्भपात करवाया जाता है तब रक्तस्त्राव के साथ-साथ संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है। संक्रमण का खतरा जब गर्भपात अप्रशिक्षित कर्मियों या अवैधानिक तरीकों से किया जाता है तब और अधिक बढ़ जाता है।
प्रसव पूर्व रक्तस्त्राव:
गर्भावस्था के 20 सप्ताह बाद होने वाले रक्तस्त्राव के सभी प्रकरण प्रसव पूर्व रक्तस्त्राव के रूप में जाने जाते हैं। यह रक्तस्त्राव मुख्यत: गर्भनाल के ढीले पड़ने के कारण देखा जाता है। कई बार यह रक्तस्त्राव गभाश्षय में ही रह जाता है तब गर्भाशय कड़ा व उसमें दर्द होता है। यह रक्तस्त्राव गर्भनाल के टूटने के कारण होती है। इस अवस्था में प्रसव अस्पताल में ही करवाया जाना चाहिये क्योंकि इस अवस्था में महिला को रक्त की आवश्यकता भी पड़ सकती है। अत: परिवार के सदस्य व मित्रों को भी, जो आवश्यकता पड़ने पर रक्तदान कर सकें, महिला के साथ अस्पताल जाना चाहिये। महिला को अस्पताल ले जाते समय उसे बायीं करवट लिटाकर ले जायें साथ ही महिला को पर्याप्त रूप से ढांककर व गर्म रखें। इस अवस्था में महिला का अंदरूनी परीक्षण ऐसे स्वास्थ्य केन्द्र पर नहीं किया जाना चाहिये जहां पर ऑपरेशन की सुविधा उपलब्ध नहीं हो।
प्रसवोत्तार रक्तस्त्राव
प्रसवोत्तार रक्तस्त्राव प्रसव संबंधी आकस्मिकताओं का ही एक हिस्सा है। एक सामान्य प्रसव के दौरान 150 से 200 मिली रक्तस्त्राव होता है परन्तु जब जन्म के पष्चात प्रथम मिनटों या घंटों में 500 मिली या उससे अधिक रक्तस्त्राव हो जाये तो उस अवस्था को प्रसवोत्तर रक्तस्त्राव कहते हैं। इसके साथ ही महिला की नाड़ी तेज चलना, रक्तचाप का गिरना, सांस तेज चलना, शरीर पीला पड़ना, सांस लेने में परेशानी होना, आदि लक्षण भी देखे जाते हैं। प्रसवोत्तार रक्तस्त्राव के लक्षण दिखाई देने व महिला की मृत्यु होने में बहुत कम समय का अंतर लगभग 2 घंटे होता है। अत: यदि समय पर महिला को संदर्भित अस्पताल में हीं पहुंचाया जा सका तो महिला की मृत्यु हो सकती है। कई बार यह रक्तस्त्राव प्रसव के 24 घंटे बाद भी शुरू हो सकता है। उक्त अवस्था में महिला को तेज गति वाले वाहन, संभव हो तो एम्बूलेन्स, द्वारा अस्पताल पहुंचाना चाहिये। इस समय भी महिला को रक्त दे सकने वाले व्यक्तियों को महिला के साथ अस्पताल जाना चाहिये।
iv. प्रसव संबंधी अन्य आकस्मिकतायें :
4.1. गर्भनाल का बाहर नहीं निकल पाना: सामान्य अवस्था में शिशु जन्म के बाद 15 से 20 मिनट के अंदर गर्भनाल शरीर से बाहर आ जाती है परन्तु यदि यह शिशु जन्म के बाद 30 मिनट तक यदि बाहर नहीं आती है तो उस महिला को तुरन्त अस्पताल ले जाना चाहिये क्योंकि इस अवस्था में रक्तस्त्राव व मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। इस अवस्था में गर्भनाल को खींचना नहीं चाहिये न ही गर्भाशय की मालिश करना चाहिये।
4.2. घाव का पकना या पस पड़ना सेप्सिस: प्रसवोत्तार सेप्सिस प्रसव के दौरान या प्रसवोत्तार काल में जननांगों में हुये संक्रमण के कारण देखा जाता है। इस अवस्था में हुआ संक्रमण गर्भावस्था के अंतिम चरण में रक्त वाहिकाओं की अधिकता के कारण तेजी से फैलता है। यदि शीघ्र इलाज शुरू नहीं किया गया तो इसके कारण बांझपन हो सकता है या गंभीर श्रेणी की बीमारियां हो सकती हैं। इसके मुख्य लक्षण हैं :
- पेट के निचले हिस्से में दर्द
- बदबूदार योनि स्त्राव
- देर से प्रसवोत्तार रक्तस्त्राव
- एक दिन से अधिक बुखार आना
अन्य लक्षण जैसे सिरदर्द, मांसपेषीय दर्द, उनींदापन व मानसिक भ्रम की अवस्था
गंभीर अवस्था होने पर महिला के गुर्दे काम करना बंद कर सकते हैं। साथ ही वह बेहोशी में जा सकती है इस अवस्था में तेज नाड़ी गति, कम रक्तचाप, तेज बुखार, चेहरे का तपना व भयावह या नशे में दिखना याने टॉक्सिक लुक आदि लक्षण दिखाई देते हैं। यदि प्रसवोत्तार सेप्सिस का कोई लक्षण दिखाई पडता है तो महिला को तुरंत अस्पताल ले जाया जाना चाहिये। भले ही लक्षण बहुत हल्के हों, क्योंकि इसमें स्थिति बहुत तेजी से बिगड़ती है। प्रसवोत्तार सेप्सिस प्रसव के दौरान यदि सफाई का ध्यान नहीं रखा जाये तो देखा जाता है। साथ ही प्रसव की लंबी अवधि या जटिलता के कारण भी प्रसवोत्तार सेप्सिस हो सकता है। पानी की थैली फटने के 12 घंटे के अंद प्रसूती शुरू नहीं होती तो भी संक्रमण के अवसर ज्यादा हो जाते हैं। इस समय भी महिला का अंदरूनी परीक्षण नहीं किया जाना चाहिये क्योंकि ये स्थिति संक्रमण के खतरे को और अधिक बढ़ा देती है। अप्रशिक्षित लोगों द्वारा अवैधानिक गर्भपात, जो कि अस्वच्छ वातावरण में किया जाता है, इसका मुख्य कारण होता है। इससे बचने हेतु गर्भ का चिकित्सकीय समापन व गर्भ निरोधक साधनों के प्रति जागरूकता बढाई जानी चाहिए। उक्त अवस्था से बचने के लिए आवश्यक है घरेलू प्रसव के दौरान 5 स्वच्छता संबंधी बातों का ध्यान रखा जाये, ये हैं:
- साफ हाथ
- प्रसव की जगह का साफ होना
- नई ब्लेड का प्रयोग
- नाल बांधने के लिये साफ धागा
- साफ नाल क्लिप या स्टम्प
4.3. गर्भस्थ शिशु की असामान्य अवस्था:
सामान्य अवस्था में प्रसव के दौरान शिशु का सिर सबसे पहले बाहर आता है। जबकि अन्य अवस्थाओं में पैर, घुटने, नितंब, हाथ, कंधे या पीठ बाहर आ सकती हैं। इन्हें असामान्य अवस्था (beach presentation or mal presentation) कहते हैं। यह अवस्था महिला एवं शिशु दोनों को प्रसव के दौरान गंभीर अवस्था में पहुंचा सकती है। आड़ा बच्चा जिसका कंधा, हाथ या पीठ पहले बाहर आ सकता हो सामान्य प्रसव के द्वारा नहीं हो सकता है। यदि समय पर ऑपरेशन नहीं किया जाये तो गर्भाशय क्षतिग्रस्त या rupture हो सकता है। इस असामान्य अवस्था को दखने के लिये गर्भावस्था के नवें माह के दौरान जांच की जानी चाहिये व शिशु की असामान्य अवस्था ज्ञात होते ही प्रसव अस्पताल में करवाने की सलाह देना चाहिये।
भारत में मातृ मृत्यु दर अन्य कई देशों की तुलना में अधिक है। भारत में आजादी के 63 वर्षों के बाद आज भी कई गांव सड़क यातायात से नहीं जुड़ पाये है। गांव के लोग आज भी कई किलोमीटर उबड़ खाबड़ सड़कों या पगडंडियों पर पैदल चलकर मुख्य रास्ते पर आते हैं जहां से टैंपो, जीप, बस या जुगाड़ में बैठकर कम खड़े होकर या लटक कर ज्यादा सफर करते हैं। ऐसी परिस्थितियों में गर्भवती महिला का सुरक्षित प्रसव के लिये अस्पताल पहुॅचना किस हद तक संभव है आसानी से सोचा जा सकता है।
मप्र क़े राजगढ़ जिले के खिलचीपुर ब्लॉक का एक गांव पपड़ेल है जिसकी सड़क ऐसी ही पथरीली है। वहां स्वास्थ्य सुविधाओं का पूर्णत: अभाव है ऐसे में किसी गर्भवती महिला का यदि सामान्य प्रसव नहीं हो पाता है तो परिवार के लोग महिला को बैलगाड़ी में लिटाकर बैलों को दौड़ा देते है। जिससे उन पत्थरों पर उछल उछल कर महिला का प्रसव हो जाता है। उन परिस्थितियों में जब कि अवरूद्ध प्रसव की स्थिति हो कई बार महिला का गर्भा6ाय इन झटकों में फट जाने से प्रसव हो जाता है परन्तु उसके पश्चात् महिला की मृत्यु अत्यधिक रक्तस्त्राव या गर्भा6ाय फटने के कारण उत्पन्न जटिलताओं के कारण हो जाती थी। जिसे गांव के लोग सामान्य मृत्यु के रूप में ले लेते है।
4.4. अवरूध्द प्रसव:
गर्भाशय के बेहतर संकुचन के पश्चात् भी यदि शरीर के निचले अंगों में कोई प्रगति नहीं देखी जाती है तो वह अवरूध्द या ऑब्सट्र्क्टेड प्रसव कहलाता है।
- यह शिशु के सिर व श्रेणी में सही अनुपात नहीं होने से
- शिशु की अवस्था असामान्य होने से
- जन्मजात असामान्यतायें जैसे सिर में पानी भरना या बच्चे के शरीर में पानी जमा होने के कारण देखी जाती है।
प्रसव में देरी गर्भाशय के कमजोर संकुचन के कारण भी हो सकती है। इस अवस्था में प्रसव ऑपरेशन द्वारा किया जाना होता है। प्रसव की लम्बी अवधि में सामान्य प्रसव अस्पताल में डॉक्टर की निगरानी में करावया जाना चाहिये, जबकि अन्य स्थितियां सामान्य हों। यदि शिशु की मृत्यु होने की संभावना हो तो प्रसव ऑपरेशन के द्वारा ही किया जाना चाहिये।
4.5. गर्भाशय का फटना: (Rupture Uterus)
अवरूध्द प्रसव के समय गलत दवाइयों के कारण गर्भाशय फट सकता है। यदि उपकरणों की सहायता से प्रसव करवाया जाये या गर्भनाल हाथ से निकल जाये या पूर्व के ऑपरेशन का घाव खुल जाये तो भी गर्भाशय फट सकता है। लक्षण: तेज नाड़ी गति, लगातार गंभीर दर्द, योनि से रक्तस्त्राव, गर्भाशय का संकुचन बंद होना, शिशु की धड़कन बंद होना, श्रोणि के ऊपरी हिस्से का नरम होना व फूलना व Hypo Voloemic Shock अर्थात् खून की मात्रा कम हो जाद आदि लक्षण देने जाते हैं। यदि गर्भाशय का पिछला भाग फटता है तो पेट संबंधी लक्षण नहीं देखे जाते हैं। परन्तु गर्भाशय का नरम होना, रक्तस्त्राव व सदमें के लक्षण मौजूद रहते हैं। इस अवस्था में महिला को रक्त चढ़ाने हेतु एवं गर्भाशय को ठीक करने हेतु तुरंत अस्पताल भेजा जाना चाहिये।
2 संदर्भित करने में देरी:
उपरोक्त अवस्थाओं में महिला की स्थिति तेजी से बिगड़ती है। अत: आवश्यक है कि आपात स्थिति को तुरन्त समझा जाये तथा शीघ्र ही महिला को उस अस्पताल तक भिजवाया जाये जहां कि इन स्थितियों से निपटने की व्यवस्था हो। हर महिला की गर्भावस्था के दौरान कम से कम 3 बार प्रसव पूर्व जांच होना चाहिये तथा कोई भी जटिलता महसूस होने पर तुरंत बड़े अस्पताल की ओर संदर्भित किया जाना चाहिये। साथ ही कोशिश की जानी चाहिये कि महिला का प्रसव अस्पताल में हो।
3 आवागमन में देरी:
किसी भी प्रकार की जटिलता आने पर 2 घंटे से लेकर 2 दिन के अंदर महिला की मृत्यु हो सकती है एवं आपात स्थिति में अस्पताल पहुंचाने हेतु यदि आवागमन का साधन समय पर उपलब्ध नहीं हो पाने से महिला की स्थिति और अधिक बिगड़ सकती है। उसकी मृत्यु भी हो सकती है। अत: आवश्यक है कि चाहे प्रसव घर पर ही करवाना हो तब भी आपात स्थिति के लिये एक वाहन की व्यवस्था पूर्व से कर ली जानी चाहिये।
4 सेवायें देने/लेने में देरी:
सेवायें लेने या देने में देरी कई कारणों से हो सकती है। जैसे समय पर पैसों की व्यवस्था नहीं हो पाने से, वाहन की उपलब्धता नहीं होने से, अस्पताल में रक्त, दवाई, डॉक्टर या आवश्यक उपकरण उपलब्ध नहीं होने से महिला की स्थिति और बिगड़ सकती है। अत: आवश्यक है कि पैसे, रक्तदाता, वाहन आदि की व्यवस्था पूर्व से कर के रखी जाये ताकि समय पर उनकी उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
मातृमृत्यु में कमी लाने के लिये भारत सरकार प्रतिबध्द है उसने सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों में भी इसे सम्मिलित किया गया है। सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों का पांचवा लक्ष्य है मातृ स्वास्थ्य को बेहतर बनाना। इसके लिये लक्षित किया गया है कि वर्ष 1998 में जो मातृ मृत्यु 407 प्रति 1,00,000 जीवित जन्म थी उसे कम करके 2015 तक 109 पर लाया जायेगा। इसके लिये आवश्यक है कि कुशल स्वास्थ्य कर्मचारी की मौजूदगी में प्रसव होना। यद्यपि इसमें सतत् वृध्दि देखी जा रही है परन्तु इसमें और प्रोत्साहित करने के लिये शासन ने कई योजनायें लागू की है, जैसे:
- आशाओं की नियुक्ति
- जननी सुरक्षा योजना
- विजयाराजे जननी बीमा योजना
- जननी एक्सप्रेस योजना
- जननी सहयोगी योजना
- प्रसव हेतु परिवहन एवं उपचार योजना
- एमसीपी कार्ड
- धन्वंतरी विकासखण्ड विकास योजना
आशा की अवधारणा मुख्य तौर राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिषन के अंतर्गत ग्रामीण क्षैत्रों में महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान प्रथम संपर्क के रूप में की गई है। आशा को कोई मानदेय न दिया जा कर उसके द्वारा किये गये कार्य जैसे संस्थागत प्रसव के लिये प्रोत्साहित कर प्रसव संस्था में करवाने पर, बच्चों का पूर्ण टीकाकरण करवाने पर, परिवार नियोजन के लिये प्रेरित करने पर, आदि।
संस्थागत प्रसव को बढ़ाने (कुशल स्वास्थ्य कर्मचारी की देखरेख में प्रसव) के लिये शासन ने जननी सुरक्षा योजना का क्रियान्वित की है इसके अन्तर्गत शासकीय संस्था में प्रसव करवाने पर महिला को नगद राशि दी जाती है। कुछ निजी अस्पतालों को भी इस योजना के अंतर्गत चिन्हित किया गया है तथा इन अस्पतालों में प्रसव करवाने पर भी सहायता दी जाती है यह राशि उसे यातायात के साधन की व्यवस्था के लिये भी दी जाती है। म.प्र. में जननी सुरक्षा योजना के अंतर्गत ग्रामीण क्षैत्र में महिला को 1400 रू. व आशा को ग्रामीण क्षेत्र में 600 रू तथा शहरी क्षेत्र में 200 रू. दिये जाते हैं ग्रामीण क्षैत्र में दिये जाने वाले 600 रू. में ही यातायात का व्यय भी सम्मिलित होता है। यह राशि आशा को उस स्थिति में दी जाती है जब वह गर्भवती महिला की कम से कम 3 प्रसव पूर्व जांच, टीटी के दो टीके व आयरन की 100 गोलियों के साथ महिला को अस्पताल में प्रसव के लिये तैयार करती है।
मातृ मृत्यु को कम करने के लिये ध्यान देने योग्य मुख्य बातें
मुख्य बातें जो गर्भावस्था, प्रसव के दौरान व प्रसव पश्चात् ध्यान रखी जानी चाहिये:
- गर्भवती महिला का पता चलते ही आंगनवाड़ी केन्द्र व ए.एन.एम. के रजिस्टर में महिला को दर्ज किया जाना चाहिए। बेहतर परिणामों के लिये सुनिश्चित करें कि महिला का पंजीयन गर्भ के प्रथम 4 माह के अंदर हो जाये। पंजीयन सभी गर्भवती महिलाओं का किया जाना है चाहे वह प्रसव के लिये मायके आई हो या मायके जाने वाली हो।
- संकटमय महिलाओं की सूची अलग से बना लें व उन्हें अस्पताल में प्रसव हेतु प्रेरित करें।
- सुनिश्चित करें कि क्षेत्र की सभी गर्भवती महिलाओं की गर्भावस्था के दौरान कम से कम 3 बार प्रसव पूर्व जांच हो सके।
- गर्भपात करवाना यदि अनिवार्य हो तो योग्य चिकित्सक द्वारा करवायें।
- गर्भावस्था के दौरान सामान्य खाने से ज्यादा मात्रा में डेढ़ गुना भोजन लेने की सलाह दें।
- सभी गर्भवती महिलाओं को टी.टी. के टीके समय पर लगवाने की सलाह दें।
- गर्भावस्था के दौरान हल्का सा भी रक्तस्त्राव होने पर तुरन्त चिकित्सकीय परामर्श लेने की सलाह दें।
- घर में प्रसव ए.एन.एम. या प्रशिक्षित दाई के द्वारा करवाया जाना चाहिये।
- यदि उपलब्ध हो सके तो डिस्पोजेबल डिलीवरी किट का उपयोग करें अन्यथा सफाई संबंधी 5 बातों का अनिवार्यत: प्रयोग करवाया जाना सुनिश्चित करें। जैसे साफ हाथ, प्रसव की साफ जगह, नई ब्लेड, साफ धागा व साफ क्लिप या स्टम्प।
- घर से करवाते समय भी आकस्मिकता या आपातकालीन स्थिति आ सकती है अत: संदर्भित अस्पताल ले जाने हेतु वाहन व आवश्यक पैसों की व्यवस्था पूर्व से कर के रखी जावे।
- बच्चे की असामान्य अवस्था जानने के लिये 9वें महीने में गहन परीक्षण किया जाना चाहिये व असामान्य अवस्था ज्ञात होने पर अस्पताल में प्रसव हेतु प्रेरित करें।
- प्रसव की संभावित दिनांक ज्ञात करने के लिये महिला से उनके अंतिम मासिक धर्म की तारीख व महीना पूछे व उसमें 9 महीने 7 दिन जोड़ने पर आने वाली तारीख व महीना प्रसव की संभावित दिनांक होगी।
- गर्भावस्था के दौरान महिला को दोपहर में 2 व रात को 8 घंटे आराम करना चाहिये।
- कठोर शारीरिक परिश्रम नहीं करना चाहिये।
- खून की कमी से बचाने के लिए गर्भवती महिला को 100 आयरन एवं फोलिक एसिड की गोलियां दी जानी चाहिये व यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि महिला यह गोलियां नियमित रूप से खाये।
- खून की कमी के लक्षण से गस्त महिला को 3 महीनों तक 2 गोली आयरन एवं फोलिक एसिड की प्रतिदिन लेने की सलाह दी जानी चाहिये।
- किन्हीं भी परिस्थितियों में गर्भावस्था के दौरान महिला को पीलिया नहीं होना चाहिये। यदि महिला को पीलिया होने की लक्षण दिखें तो तत्काल चिकित्सक की सलाह ली जाये।
- यदि महिला को रक्त देना पड़े तो संभवतया महिला के पारिवारिक सदस्यों या मित्रों का ही रक्त दिया जाना चाहिये।
- प्रत्येक महिला को नवजात शिशु के शीघ्र स्तनपान, एक्सक्लूसिव स्तनपान अर्थात् केवल स्तनपान, कोलोस्ट्रम या खीस देना आदि की जानकारी अनिवार्यत: दी जानी चाहिये।
माह नवम्बर 2010 में रीवा जिले की भी कुछ संस्थाओं में मातृ मृत्यु के प्रकरण देखने में आये थे व उन प्रकरणों में गहन अध्ययन के पश्चात् यह पाया कि अधिकांश प्रकरणों में चिकित्सक मामले की गंभीरता को समझ ही नहीं पाये और माता की मुत्यु हो गई। स्वस्थ शिशु का जन्म होने के पश्चात् भी माता की मृत्यु के 8 दिन के भीतर ही उस बच्चे की भी मृत्यु हो गई। एक प्रकरण में तो माता का इलाज इलाहाबाद के प्रायवेट डॉ. के यहाँ चल रहा था व डॉ. द्वारा दी संभावित प्रसव के दो दिन पूर्व जब माता प्रसव के लिये इलाहाबाद जा रही थी रास्ते में ही उसका प्रसव हुआ व उसने एक घण्टे के अन्तराल से दो स्वस्थ शिशुओं को जन्म दिया जिसके बाद उसकी तबियत बिगडना शुरू हुई व नजदीक के अस्पताल तक पहुँचने के पूर्व ही उसकी मृत्यु हो गई। महिला के शव को लेकर पुन: गाँव लौटने के दौरान रास्ते में ही एक एक कर दोनों बच्चों की भी मृत्यु हो गई। अत: जरूरत है मामले की गंभीरता को समझने व हर स्वास्थ्य कार्यकर्ता के साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को मातृ मृत्यु में कमी लाने का हर संभव प्रयास करना चाहिये।
1 यह जानकारी विकास संवाद की डॉ अपरा विजयवर्गीय द्वारा तैयार की गई है।
2 ओम व्यास ^^ओम की कविता माँ फूलों में खुशबू का वास है
3 SRS 2004-06
4 SRS 2004-06
5 SRS 2007-09
6 DLHS III |