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  खसरे के खतरे को समझना जरूरी: टीकाकरण ही है प्रभावी उपाय  
     
 

दुनिया भर में हर दिन 450 लोग खसरे के कारण मारे जाते हैं। इनमें बच्चों की संख्या बहुत ज्यादा है। भारत में भी इसका आंकड़ा चिंता में डालने वाला है। खसरा एक बेहद संवेदनशील और संक्रमण वाली बीमारी है। भारत मे कुपोषण से जूझ रहे बच्चों में रोगों से लड़ने की क्षमता वैसे ही बहुत कम है। दूसरी और तमाम कोशिशों के बाद भी टीकाकरण का प्रतिशत बहुत तीव्र गति से नहीं बढ़ पा रहा है। इसलिए इस बात को समझना बेहद जरूरी है कि बच्चों को रोगों से बचाने और सुरक्षित करने के लिए टीकाकरण की पहुंच ज्यादा से ज्यादा बच्चों तक हो। उन्हें वह सब जरूरी टीके मिलें, जिनसे वह ऐसी बीमारियों के खिलाफ मजबूती से लड़ाई कर पाते हैं।

खसरे का असरकारी टीका देश में चालीस सालों से उपलब्ध है। इसके बावजूद खसरा छोटे बच्चों की मृत्यु का एक प्रमुख कारण बना हुआ है। यह सबसे अधिक संक्रामक बीमारियों में से एक है। इसके वायरस के संपर्क में आने से कई गैर-प्रतिरक्षक बच्चे इस श्वसन संबंधी बीमारी का शिकार हो जाते हैं। खसरा पैरामाइक्सोवाइरस परिवार के एक वायरस के कारण एक तेजी से फैलने वाली घातक बीमारी है।

क्या है खसरे का इतिहास 

खसरे के सबसे पहले प्रमाण 165-180 ईसा पूर्व प्लेग ऑफ गॉलेन के रूप में मिलते हैं। चेचक और खसरे के रूप में कही जाने वाली बीमारी ने कुछ क्षेत्रों की एक तिहाई आबादी और रोमन सेना को पूरी तरह से खत्म कर दिया था। खसरे की बीमारी को वैज्ञानिक तरीके से पहचानने का श्रेय फारसी चिकित्सक मोहम्मद इब्न जकारिया अर रजी को जाता है। उन्होंने इस पर एक किताब द बुक ऑफ स्मॉल पॉक्स एंड मीजल्स भी लिखी थी।  1529 में क्यूबा में खसरे की महामारी ने दो तिहाई वाशिंदो को मौत की नींद में सुला दिया था। पिछले 150 सालों में खसरे से दुनिया भर में दौ सौ लाख लोगों के मारे जाने का अनुमान है। 1850 में खसरा ने हवाई आबादी के पांचवे हिस्से को नष्ट कर दियाा था। इसके पच्चीस साल बाद फिजी में एक बार फिर खसरे का कहर बरपा और चालीस हजार लोग मारे गए। 19वी सदी में अंडमान में यह फिर सामने आया। खसरे का टीका सबसे पहले मर्क में मोरिस हिलमैन ने विकसित किया था। 1963 में इस टीके को लाइसेंस प्राप्त हुआ। खसरे के टीकाकरण अभियान की शुरूआत दक्षिण अफ्रीका से हुई थी। यहां खसरे से 48 बच्चों की मौत े बाद सभी सरकारी स्कूलों में बच्चों को टीका लगाये गए थे। जापान में 2007 में खसरा इस कदर विकराल हो गया था कि अधिकतर सार्वजनिक संस्थानों को बंद करना पड़ा था। दस साल पहले फिलीपींस में भी ऐसी स्थिति आई थी।

बाल मृत्यु दर और खसरा

मध्यप्रदेश के आदिवासियों में शिशु मृत्यु और बाल मृत्यु दर 
राज्य शिशु मृत्यु दर बाल मृत्यु दर
मध्यप्रदेश 956 1404
छत्तीसगढ़ 906 1285
राजस्थान 732 1138
गुजरात 860 1158
झारखंड 930 1385
उड़ीसा 787 1363

एनएफएचएस-3 की मध्यप्रदेश केंद्रित रिपोर्ट में जो चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत की गई है उससे पता चलता है कि प्रदेश का आदिवासी समुदाय तमाम स्वास्थ्य मानकों की लड़ाई हारने की कगार पर खड़ा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक आदिवासी समुदाय के हर 1000 जीवित जन्म लेने वाले बच्चों में से 140 बच्चे दम तोड़ देते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि आदिवासियों में 14 फीसदी बच्चे अपना 5वां जन्मदिन मनाने के लिए जीवित ही नहीं बचते। यह मध्यप्रदेश की जन्म के पांच साल के भीतर होने वाली शिशुओं की औसत बाल मृत्यु दर 942 प्रति हजार से बहुत ज्यादा है।

खसरे के लक्षण

खसरे में सबसे पहले तीन चार दिन तक तेज बुखार आता है जो 104 डिग्री तक भी पहुंच सकता है। इसके तीन लक्षणों को तीन सी के रूप में देखा जाता है। कफ, काराईजा और कन्जक्टिवाइटिस। मुंह में तालू पर सफेद धब्बे भी नजर आते हैं। तीन-चार दिन के बुखार के बार सारे शरीर पर लाल दाने हो जाते हैं। यह दाने बाद में त्वचा पर गहरे भूरे रंग का दाग भी छोड़ जाते हैं। इनकी शुरूआत अमूमन सिर से होती है। इनमें खुजली भी होती है। खसरे से प्रभावित व्यक्ति को खांसी चलती है, और आंखें लाल हो जाती हैं । खसरे को अंग्रेजी में मीजल्स कहते हैं। यह श्वसन से पफैलने वाली बीमारी है और संक्रमित व्यक्ति के मुंह और नाक से बहते द्रव के सीधे या व्यक्ति के संपर्क क्षेत्र में आने से होती है। यह किसी भी परिवार में आसानी से फैलता है। यह औसतन 14 दिनों तक प्रभावी रहता है।

भारत में खसरा

दुनिया के कई विकसित देशों में खसरे को रोकने में कामयाबी मिली है, लेकिन विकासशील देशों में यह अब भी एक चुनौती है। 1980 के पहले जब खसरे का टीका बहुत प्रचलित नहीं हो  पाया था तब खसरे के कारण 26 मिलियन लोग दुनिया भर में हर साल मौत के शिकार हो जा रहे थे। 2000 से 2008 के बीच में इसकी दर में 78 प्रतिशत तक की कमी आई और मौतों का आंकड़ा घटकर 73 लाख 3 हजार तक आया। 2008 में यह संख्या 1 लाख चौसठ हजार तक सिमट गई है। भारत में बच्चों के विकास में गुणात्मक सुधार आया है परंतु खसरा अब भी बच्चों में मौत का एक कारण बना हुआ है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में हर साल पचास हजार से एक लाख बच्चे खसरे के कारण मारे जाते हैं। डीएलएचएस के तीसरे सर्वे के मुताबिक मीजल्स के टीके का राष्ट्रीय स्तर पर कवरेज 69 प्रतिशत है। इस दृष्टि से 31 प्रतिशत बच्चों तक इस टीके को पहुंचाना अब भी एक चुनौती है। खसरे का टीका नौ माह की उम्र में सबसे प्रभावी नतीजे देता है। 9 माह में टीके लगवाने पर इसकी प्रभाविता 85 प्रतिशत तक होती हैं।

मध्यप्रदेश में खसरा

मध्यप्रदेश में तमाम कोशिशों के बावजूद 58 प्रतिशत बच्चे पूर्ण टीकाकरण से वंचित हैं। बड़ी बाधा यह है कि लगभग 28 प्रतिशत लोगों तक इस बात की जानकारी नहीं है कि टीकाकरण बच्चों की स्वास्थ्य की दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण है, और 26 प्रतिशत लोग यह जानने समझने के बाद भी टीकाकरण को बच्चों के लिए जरूरी नहीं मानते। दूसरी और एनएफएचएस के अनुसार मध्यप्रदेश में साठ प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं।

आईएमएनसीआई जिलों में टीकाकरण की स्थिति

शिशुओं को छह अहम बीमारियों से बचाने के लिए टीकाकरण करने की बाल स्वास्थ्य देखभाल संबंधी योजना मध्यप्रदेश में दरकिनार कर दी गई है। अभी भी प्रदेश के दो आईएमएनसीआई जिले, दतिया व शिवपुरी ऐसे हैं जिनमें 20 प्रतिशत से कम बच्चों का पूर्ण टीकाकरण किया गया है। आईएमएनसीआई के तहत आने वाले 12 जिलों में से केवल भोपाल व सीहोर ही ऐसे हैं जिनमें 60 प्रतिशत से अधिक शिशुओं का पूर्ण टीकाकरण्ा हो पाया है। जबकि आईएमएनसीआई के तहत आठ जिलों में 40 प्रतिशत से भी कम बच्चों का पूर्ण टीकाकरण हो पाया है।

जिले पूर्ण टीकाकरण की स्थिति 
भिंड 385
भोपाल 522
दतिया 88
गुना 186
जबलपुर 413
कटनी 464
मुरैना 343
रतलाम 504
सतना 265
सीहोर 583
शिवपुरी 155
विदिशा 217

खसरे के खतरे से बचने के लिए अभियान

भारत में नियमित टीकाकरण से वंचित 31 प्रतिशत बच्चों तक खसरे का महत्वपूर्ण टीका पहुंचाना है तो इसके लिए विशेष प्रयास करने होंगे। मध्यप्रदेश में तो यह 57 प्रतिशत ही है। इसमें भी ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और ज्यादा खराब है। डीएलएचएस का सर्वे कहता है कि ग्रामीण क्षेत्र के 53 प्रतिशत बच्चे ही खसरे का टीका लगवा पाते हैं। जाहिर सी बात है कि इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को खसरे से असुरक्षित नहीं रखा जा सकता। चीन ने 2012 तक खुद को खसरे को दूर करने का लक्ष्य तय किया है। हमारे देश में भी इस दिशा में कोशिशें चल रही हैं। इसके लिए जरूरी है कि लोगों को टीकाकरण करवाने का एक और मौका दिया जाए।

इस दिशा में उन चौदह राज्यों में एक विशेष अभियान चलाया जा रहा है जहां 9 माह से लेकर दस साल तक के बच्चों में मीजल्स का कवरेज अस्सी प्रतिशत से कम है। खसरे का वायरस बेहद खतरनाक ढंग से लोगों को अपनी चपेट में लेता है, इसलिए तय किया गया है कि कम से कम 90 प्रतिशत लोगों को टीकाकरण के दायरे में लाया जा सके। इस अभियान के माध्यम से 9 माह से लेकर 10 साल तक के 13 करोड़ बच्चों को खसरे का टीका लगाया जाएगा। इसके लिए तीन सप्ताह का एक अभियान होगा। पहले सप्ताह में अध्ययन संस्थानों और दूसरे तथा तीसरे सप्ताह में सामुदायिक केन्द्रों पर टीकाकरण आयोजित होगा। इस दौरान उन बच्चों को भी खसरे का टीका दिया जा सकेगा जिन्होंने इसे पहले से ही ले लिया है।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में लगभग 450 लोग प्रति दिन खसरा की वजह से मारे जाते हैं जिनमें ज्यादातर बच्चे होते हैं।
  • खसरा के विरुद्ध एक बच्चे के टीकाकरण में 45 रूपए से से भी कम का खर्च आता है।
  • 2008 में यूनिसेफ ने खसरा के 174 मिलियन खुराकों के साथ-साथ सुरक्षित टीकाकरण उपकरणों को खरीदा था। 
  • वर्ष 2000 के आंकड़ों की तुलना में 2010 तक खसरा से होने वाली मौत को 90 प्रतिशत तक घटाने के लिए - मई 2005 में वर्ल्ड हेल्थ एसेंबली में एक वै6विक लक्ष्य निर्धारित किया गया था। 
  • खसरा से होने वाली मौतों को कम करने में दुनिया भर में मिली कामयाबी के बावजूद एक अनुमान के मुताबिक 2008 में लगभग 164,000 लोग खसरा की वजह से मौत के शिकार हुए थे, यह आखिरी वर्ष है जिसके लिए आंकड़े उपलब्ध हैं। 
  • डब्ल्यूएचओ के 193 सदस्य देशों में भारत एकमात्र ऐसा देश है जिसके पास खसरे के टीकाकरण के लिए एक खुराक वाला उपाय मौजूद है।
 
     
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