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  जे.एन.एन.यू.आर.एम - सहभागी शहरी विकास की नई भूलभुलैया  
     
 

आर्थिक उदारीकरण के दौर के बाद जनसहभागिता का जुमला नये कलेवर में सामने आया और चर्चा का केन्द्र बना। यहाँ जनसहभागिता के मायने शासकीय प्रयासों में जनों को शामिल करने यानि उनकी सहभागिता सुनिष्चित करने से नहीं है अपितु इस आड़ में यह विशुध्द रूप से निजीकरण को बढ़ावा देने का छिपा एजेन्डा ही है। वर्तमान में जनसहभागिता का नया पाठ देश के चुनिंदा 63 शहरों में लागू की गई
जे.एन.एन.यू.आर.एम (जवाहर लाल नेहरू अर्बन रिन्यूवल मिशन) योजना के अंर्तगत पढ़ाया जा रहा है। आगे बढ़ने के पूर्व अपनी बात कहने की जमीन मैं इस तरह से तलाशता हूँ कि स्वतंत्रता के उपरांत शहरी विकास के जितने भी बड़े कार्यक्रम (लगभग 15) आये, वे शहरी बस्तियों में अवस्थापना विकास के साथ-साथ शहरी गरीबों के जीवन में गुणात्मक परिवर्तन के लिये किये गये हैं। इनके नतीजे हमारे समक्ष स्पष्ट हैं क्योंकि इन विकास कार्यक्रमों के बीच उस वर्ग की नब्ज़ को कभी भी नहीं टटोला गया जो कि शहर में आने के पूर्व अपने गाँव में और शहर में आने के उपरांत झुग्गी बस्तियों में रहते हुये वंचित व उपेक्षित ही रहा है। विडंबना यह भी है कि सैध्दांतिक रूप से इन विकास कार्यक्रमों के केन्द्र में यही गरीब तबका रहा है।

जे.एन.एन.यू.आर.एम (जवाहर लाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूवल मिशन) - एक परिचय

वर्ष 2005 के अंत में प्रारंभ किये गये इस मिशन का आधार यही है कि स्लम में निवास करने वालों की निरंतर बढ़ती जनसंख्या, शहरी आधारभूत सेवाओं तथा अवस्थापन पर जबरदस्त दवाब उत्पन्न कर रही है, जिसके लिये उचित शहरीकरण नीति/रणनीति बनाना नितांत आवश्यक है। यह योजना सुधार आधारित परियोजना है और इस कार्यक्रम में राज्यों की राजधानियों, ऐतिहासिक व पर्यटन महत्व के 28 शहरों के अलावा तथा 10 लाख की आबादी के 35 शहरों समेत कुल 63 शहरों को शामिल किया गया है। प्रदेष में यह योजना चार शहरों भोपाल, इंदौर, उज्जैन तथा ग्वालियर में लागू की गई है। इस योजना के दो मुख्य उपमिशन हैं।

- शहरी अवस्थापना और अभिशासन
- शहरी गरीबों को आधारभूत सेवायें

इस योजना में राज्य व नगर निकायों के स्तर पर दो तरह के सधुार किये जाने है। यें सधुार हैं आवष्यक औच्छिक। कहने को सुधारों को एच्छिक कहा गया है परन्तु वह भी 7 वर्षों में क्रियान्वित किये जाने हैें अर्थात् ऐच्छिकता महज समय । छूसीमा में फेरबदल को लेकर ही हैट है तो बस इतनी कि ऐच्छिक सुधार की समय सीमा नगर निकाय अपनी सहूलियत से कर ले ,लेकिन यह सभी 7 वर्षों में ही होना चाहिये।

इस योजना में 50 प्रतिषत राषि केन्द्र, 20 प्रतिषत् राषि राज्य सरकार तथा 30 प्रतिषत राषि स्थानीय निकायों को खर्च करनी है।

जे.एन.एन.यू.आर.एम की चीरफाड़

अतिउत्साहित नजरिया तो हमें सुधार के इस कार्यक्रम के पक्ष में गाल बजाने पर हमें मजबूर करेगा लेकिन विश्लेषणात्मक नजरिया इस संदर्भ में हमारे कदमों को दो कदम पीछे खींच लेता हैं, आइये जोर-शोर से प्रचारित की जा रही इस योजना के विभिन्न पक्षों को समेटने की हम कोशिष करते हैं।

  1. भ्रांति - सर्वप्रथम तो यह कि इस योजना को लेकर बड़ी वाहवाही लूटी जा रही है कि यह योजना यूपीए सरकार की योजना है जबकि यह योजना दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) के शहरी नियोजन का का एक भाग है ना कि यूपीए सरकार का एजेण्ड़ा। यह महज संयोग ही है कि यह योजना 2005 में लागू हुई और तब सत्तारूढ़ यूपीए रही । यहाँ यह संज्ञान रहे कि पंचवर्षीय योजना का मसौदा तीन या चार वर्ष पूर्व से ही तैयार किया जाता है।
  2. जे.एन.यू.आर.एम. के संदर्भ में यह प्रचारित भी किया जाता रहा है कि यह 1 लाख करोड़ रूपये की योजना है, जो कि सही है परन्तु यदि इसे 63 शहरों में बाँटकर देखें तो प्रति शहर के खाते मेें 160 करोड रूपये के आसपास ही आते हैं।
  3. ज्ञात हो कि इस मिशन के दो उपमिशन हैं और योजना में कहीं भी उन दोनों मिशनों के बीच बजट अलग-अलग अनुपात कितना होगा, यह कहीं भी स्पष्ट नहीें किया गया है । और इस दुर्भावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि अवस्थापना विकास और अभिषासन वाले उपमिशन में ज्यादा प्रावधान कर दिया जाये और गरीब जनों के खाते वाले इस उपमिशन में टोटा ही रहे।
  4. इस मिशन को समेकित विकास की दिशा में अभूतपूर्व कदम माना जा रहा है किन्तु इस मिशन के दोनों उपमिशन दो अलग-अलग मंत्रालयों शहरी विकास तथा शहरी रोजगार एवं निवारण मंत्रालय के अधीन हैं, अतएव यह कहना असंगत ही होगा कि यह पूरक गतिविधियाँ होंगी अपितु यह समानांतर गतिविधियाँ होंगी और दोनों के बीच समन्वय का अभाव भी होगा।

सुधार कार्यक्रम

शहरी निकाय के स्तर पर (अनिवार्य सुधार)

  1. सुधार कार्यक्रमों के चलते नगरीय निकायों की स्थिति बेहतर होगी जिससे उनकी साख बढ़ेगी तथा मार्केट कैपिटल तक उनकी पहुँच बढ़ेगी।
  2. सुधार कार्यक्रमों का स्पष्ट उद्देष्य यही है कि निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना। यह तब भी स्पष्ट है जबकि मिषन के अंर्तगत् निजी क्षेत्र की सहभागिता वाली परियोजनायें प्राथमिकताओं के आधार पर स्वीकृत करने का प्रावधान है। पब्लिक प्राईवेट पार्टनरषिप (PPP) का जुमला।
  3. यह सामर्थ्य के अनुरूप शहरी गरीबों को आवास उपलब्ध कराने की बात करता है लेकिन निजी क्षेत्र की सहभागिता होने पर यह सामर्थ्य क्या होगी, यह समझ से परे है क्यूँकि अभी तक के अनुभव बताते हैं कि शहरी अभिकरणों या शासकीय शिक्षा संस्थानों द्वारा जो EWS/LIG क्वाटर बनाये गये हैं वे किस हद तक गरीबों की पहुँच के बाहर हैं ? मतलब उन मकानों की कीमत भी वे ही तय करेगें जो उसे बनायेंगे और अर्फोडेबल (सामर्थ्य) की परिभाशा भी उनकी ही होगी, फिर चाहे वह गरीब की पहुँच में हो या ना हो ?
  4. सम्पत्ति कर का उचित एकत्रीकरण और अगले 7 वर्षों में यह 85 प्रतिशत तक हो जाये।
  5. उपयुक्त उपभोक्ता शुल्क लगाना । यहाँ उपयुक्त की परिभाषा कौन तय करेगा ? स्वभावत: निजी क्षेत्र फिर चाहे गरीब की चमड़ी उधड़ जाये।
  6. इसमें एक ही चीज अच्छी है कि दाहरी लेखा प्रणाली को अपनाना। पर इसमें सदेंह है कि यह किस हद तक लागू हो पायेगा?

राज्य स्तरीय सुधार (अनिवार्य सुधार)

  1. 74वें संविधान संषोधनों के प्रावधानों को लागू कराना ? इसके मायने यही हुये कि अभी तक यह लागू नहीं है?
  2. एक और खतरनाक सुधार  है 'शहरी हदबंदी अधिनियम' को खत्म करना यानि निजी क्षेत्र आगे आयें और 'बाँटो और लूटो' के गीत को कानूनी तर्ज मिल जाये।
  3. स्टॉम्प डयूटी कम करना । ये सभी सुधार एक दूसरे से बड़े ही सुव्यवस्थित ढंग से अंर्तसंबंधित हैं। यानि इधर से हदबंदी हटेगी और उधर से निजी कंपनियाँ धडल्ले से रजिस्ट्री करा सकें और स्टॉम्प डयूटी कम होगी तो इन्हें राहत मिल सकेगी ?
  4. जनसहभागिता के जुमले को कानूनी जामा पहनाना ?

ऐच्छिक सुधार

  1. नगर निकायों में प्रापर्टी टाइटल प्रमाणपत्र की व्यवस्था को लागू करना ? इस व्यवस्था के आधार पर कंपनियाँ/बैंक गरीबों को मकान खरीदने के लिये ऋण उपलब्ध करा देंगी और कर्ज ना चुका पाने की स्थिति में कुर्की की जा सकेगी, इस तरह से झंझट वाली प्रक्रियाओं को आसान बनाना।
  2. कृषि योग्य भूमि का गैर कृषि कार्यों के लिये रूपान्तरण के लिये कानूनी प्रक्रिया का सरलीकरण, जबकि कृषि नीति, कृषि भूमि के गैर कृषि उपयोग को रोकने पर जोर देती है ?

ढाँचागत सुधार

इसके चलते कर्मचारियों की छँटनी की जायेगी।

सलाहकार दल

अब जरा इस कार्यक्रम के सलाहकार दल पर भी गौर कर लते हैं। इस योजना के जो तकनीकी सलाहकार समूह के सदस्य हैं, उनकी अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि क्या है ? उनका अपना ज्ञान व कौशल किसी और क्षेत्र का है लेकिन वे यहाँ किसी और हैसियत से ही हैं। दूसरा जो भी सलाहकार CDP के संदर्भ में अपना ज्ञान मोटी रकमों के बदले बाँट रहे हैं वे पूर्व में फायनेन्स मार्केट में काम करते रहे हैं। वे अचानक शहरी नियोजन के विशेषज्ञ कैसे हो गये ?

भोपाल के विशेष संदर्भ में जे.एन.एन.यू.आर.एम

भोपाल के विशेष संदर्भ में देखें तो यहाँ पर जनसहभागिता का नया स्वरूप सामने आया है क्योंकि यहाँ पर शहर नियोजन का दृष्टि पत्र यानि CDP  (सिटी डेव्हपलमेंट प्लॉन) महज तीन माह में ही बनकर तैयार हो गया। अब चूँकि इस योजना का पैसा 'पहले आओ पहले पाओ' के सिध्दांत पर ही दिया जाना है जिसके चलते आनन-फानन में ही CDP बना दिया गया। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि जिन सलाहकारों का CDP बनाने में सहभाग रहा है उनकी अपनी विषय पर पकड़ कितनी है ?

CDP की मूल भावना यही थी कि शहर के विकास का एक दृष्टि पत्र बनाया जाये जिसमें जनसहभागिता सुनिश्चित की जाये और स्थानीय जनों की प्राथमिकता के आधार पर होने वाले कार्यों को सूचीबध्द किया जाना था । परन्तु भोपाल में हुआ इसके विपरीत। वार्ड सभाओें में चर्चा कर CDP तैयार किये जाने के दावे तो खूब किये जा रहे हैं परन्तु कितनी बैठकें हुईं ? क्या चर्चा हुई ? कितने सुझाव आये ? ये ऑंकड़ा किसी के पास भी नहीं है।

जनसहभागिता का एक तरीका तो यह है कि अमुक-अमुक कार्य अमुक योजना के तहत् आपके यहाँ किये जाने हैं, यह महज़ पढ़कर सुनाना। जिससे लोग योजना के विषय में जान जायें और ख्याली पुलाव पकाने लगें। और दूसरा तरीका यह कि शहर में कौन से कार्य किये जाने हैं और किन वर्गों को प्रमुख आवष्यकता है, यह सभी के साथ मिलकर तय किया जाये। जाहिर सी बात है कि भोपाल ने जनसहभागिता की शासकीय परिपाटी को ही आत्मसात करते हुये पहले आसान तरीके को चुन लिया। यहाँ भी संदेह की स्थिति तब निर्मित होती है जबकि CDP बनने की भनक, शहरी नियोजन के संदर्भ में सबसे खास महकमे टाऊन एंड़ कंट्री प्लानिंग विभाग को तक ना लगी अर्थात् एक विषेषज्ञ विभाग से सलाह लेना तक उचित नहीं समझा गया ? जबकि उक्त विभाग शहर का मास्टर प्लॉन तैयार कर रहा है। अर्थात् जब CDP की प्रक्रिया को लेकर दो आपसी विभागों में ही मतभेद हो तो फिर आम जनता की सहभागिता सुनिश्चित करने की बातें बेमानी हैं ?

सूचना के अधिकार के अंर्तगत् आवेदन लगाने पर (आवेदन लंबित है) भी CDP की प्रति देखने को नहीं दी जा रही है तो फिर बस्ती स्तर पर कितना विचार विमर्ष हुआ होगा, यह समझ से परे है। अधिकारी गण कहते है कि CDP इंटरनेट पर आम जनता के लिये उपलब्ध है तो यह स्थिति हास्यास्पद है क्योंकि कितने प्रतिशत आम लोग इंटरनेट का उपयोग करते हैं या कितने लोगों की इंटरनेट तक पहुँच है ? यह एक गंभीर सवाल है ? और यदि जनसहभागिता के मायने यही है तो हमारी इससे असहमति है ?

ADB कर्जे का घालमेल और गरीबों का उपमिशन

ज्ञात हो कि नगरीय जलापूर्ति एवं पर्यावरण सुधार परियोजनांर्तगत् भोपाल शहर में एडीबी का करोडों रूपया कर्ज लिया गया है, इस योजना के अंर्तगत् जलापूर्ति के संबंध में कई सुधार किये जायेगें, जिसमें से एक खतरनाक सुधार यह है कि वर्ष 2009 तक सार्वजनिक क्षेत्र के सारे जलस्त्रोत बंद कर दिये जायेंगें तथा जो पैसा देगा वही पानी लेगा ।  भोपाल में नगरनिगम ने इस योजना को जेएनएनयूआरएम में समाहित करने का फैसला लिया है अर्थात्  जब योजना समाहित होगी तो फिर शर्तें भी लागू होंगी ? अब यहाँ से दूसरे उपमिशन (गरीबों को बुनियादी सुविधायें) में झाँकने का प्रयास करते हैं तो अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है।

अपील

साथियों, यह है इस योजना की हकीकत । हमारे सामने सबसे बडा सवाल यह है कि यह योजना लागू हो चुकी है और अब हमारे पास केवल एक ही विकल्प बचता है कि दवाब कुछ इस तरह से बनाया जाये कि इस योजना का क्रियान्वयन ठीक ढंग से हो और यह योजना अपने मूल रूप में साकार हो सके। हमें CDP का अध्ययन करना होगा तथा जिस वंचित वर्ग के साथ हम खड़े हैं उनके साथ मिलकर इस योजना के बजट में उनके लिये विशेष प्रावधानों को सुनिष्चित करवाने का प्रयास करना होगा। साथ ही प्रशासन के साथ एक संवाद की स्थिति निर्मित करने का प्रयास करना होगा।
 
साथियों इस योजना की हकीकत को और साथियों तक भी पहुँचायें, और विश्लेषित करें तथा जानकारियों का आदान-प्रदान करें । हमें ड़र है कि जनसहभागिता के नाम पर किये जा रहे इस तरह के प्रयोगों से एक ओर तो वाहवाही लूटी जा सकती है किन्तु सही मायनों में यह गरीबों को और गरीब करने की साजिश ही है। ड़र तो इस बात का भी है कि गरीबों के इस रिन्यूवल मिशन में या कथित सहभागी विकास की इस भूलभुलैया में से गरीबों का रिमूवल (सफाया) ना हो जाये।

स्त्रोत्: ऑक्सफेम इंडिया ट्रस्ट तथा विज्ञान फाऊन्डेशन, लखनऊ का विश्लेषण

प्रशान्त कुमार दुबे

 
     
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