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  बालविवाह रोकथाम - मंजिल अभी दूर है  
     
 

चाक पर चढ़ी माटी
घूमती है चाक पर,
खेलती है कुम्हार के हाथ,
कभी पानी लगाता है कुम्हार
कभी ढ़ालता है उसे एक आकार में
धीरे-धीरे लेने लगती है माटी आकार
फिर बनता है घड़ा, सुराही,गुल्लक या कुछ और
लेकिन पकने पर ही हो सकता है, इन सबका उपयोग।
लेकिन फिर नहीं बनता है इनमें से कुछ भी
यदि रह जाती है माटी गीली
या नहीं दे पाता है कुम्हार ध्यान
नहीं लगाता है सही समय पर और सही जगह पर हाथ
तो वह बिगस जाती है
और
रह जाती है, माटी की माटी ।
पर माटी तो माटी है, जैसा ढ़ालोगे, ढ़ल जायेगी ।
पर बेटी या बेटा तो अप
ना ही है ।

प्रदेश के हाल बयां करते कुछ आंकड़े

  • प्रदेश में 6 वर्ष से कम उम्र मे 60 फीसदी से ज्यादा बच्चे कुपोषित1 । संख्या में देखे तो लगभग 67 लाख बच्चे कुपोषित हैं, जो कि देश में सर्वाधिक है। 
  • इनमें से भी 1206 फ़ीसदी बच्चें गंभीर कुपोषित यानी लगभग 13 लाख बच्चे गंभीर कुपोषित हैं2 ।
    मप्र में 56 फीसदी महिलायें एनीमिक3 हैं । 
  • मप्र में दस जिले ऐसे है जहां लिंगानुपात 900 से कम हैं4। यह जिले हैं भिण्ड़, मुरैना, ग्वालियर, दतिया, शिवपुरी, टीकमगढ़, छतरपुर, रीवा, दमोह, इंदौर। जबकि वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक यहां पर चार जिले ही ऐसे थे।
  • बहुत ही आ6चर्यजनक ढंग से रीवा जिले में बाल लिंगानुपात 35 पाईंट के साथ गिर गया हैं। अभी यह 907 है जो कि वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार 937 था। 
  • जहां 2001 की जनगणना में बालाघाट जिलें में ही लिंगानुपात बेहतर था (1022) वहीं अब यह 4 जिलों में हो गया है। अलीराजपुर (1009), डिण्डौरी (1004), मंडला (1005)  और बालाघाट (1021) लेकिन इसमें भी चिंताजनक बात यह है कि यह समस्त जिले बाललिंगानुपात में कमी प्रदशर्ित कर रहे हैं। 
    मध्यप्रदेश में शिशु मृत्यु दर 70 प्रति हजार है जो कि देश में सर्वाधिक है5। 
  • मप्र महिलाओं और बच्चों पर होने वाले अपराधों में अव्वल है6 । 
  • दलित और आदिवासी महिलाओं पर बलात्कार व अन्य तरह की प्रताड़नाओं में भी मध्यप्रदेश नंबर एक पर है। 
  • मध्यप्रदेश में मातृत्व मृत्यु दर 335 प्रति लाख है7 यानी अभी भी मध्यप्रदेश में प्रतिवर्ष औसतन 6100 महिलायें प्रसव के दौरान उत्पन्न जटिलताओं से असमय मौत का शिकार होती हैं।  

उपरोक्त समस्त आंकड़े मध्यप्रदेश की तस्वीर तो बयां करते ही हैं लेकिन यहां इन आंकड़ों को रखने का उद्दे6य यह बताना कतई नहीं है कि यह किस विभाग की विफलता या सफलता का लेखा जोखा है । बल्कि ये आंकड़े एक अंर्तसंबंध को समझाने की ओर भी ईशारा करते हैं । उपरोक्त समस्त आंकड़े प्रदेश इस अवस्था के पीछे की कहानी को भी हमारे सामने लाने की बात करते र्हैं। यह समस्त आंकड़े दरअसल में जिन कारकों का  प्रभाव हैं, उनमें से एक कारक का नाम भी  'बालविवाह' है। अब आप सोच रहे होंगे कि भला बालविवाह से कुपोषण का, मातृमृत्यु का या महिलाओं पर होने वाले अपराधों का क्या अंर्तसंबंध है !! कई बार यह अंर्तसंबंध बहुंत प्रत्यक्ष है तो कई बार बहुत अप्रत्यक्ष। लेकिन इस अंर्तसंबंध का खमियाजा भोगते हैं वे 1,25,000 शिशु प्रतिवर्ष असमय मौत के मुह में चले जाते हैं। वे 6100 मातायें जो प्रदेश में प्रतिवर्ष असमय मौत के मुह में चली जाती हैं। 

आईये जरा इसी अंर्तसंबंध को हम समझें । 

क्या है बाल विवाह ? 

कानून द्वारा परिभाषित उम्र जो कि बालकाें के लिये 21 वर्ष और बालिकाओं के लिये 18 वर्ष है, से कम उम्र में, किया गया विवाह, बालविवाह है। यह तो एक सामान्य तकनीकी परिभाषा है लेकिन इसकी व्यापकता और विकरालता को हम इस तरह से समझ सकते हैं कि बालविवाह, बच्चों के सभी बालअधिकारों का उल्लंघन करता है । यह बच्चे के शिक्षा, स्वास्थ्य, सर्वांगीण विकास, सहभागिता और जीवन के अधिकार को चुनौती देता है । 

यद्यपि बाल विवाह काफी सदियों से चली आ रही एक कुरीति है जिससे भारत देश वर्तमान में भी अछूता नहीं है। पौराणिक काल में तो बाल विवाह की प्रथा तब नहीं थी। पुराणों में स्वयंवर, गंधर्व विवाह, असुर विवाह आदि का भी उल्लेख तो मिलता है लेकिन बाल विवाह का उल्लेख कहीं भी नहीं मिलता है।  बाल विवाह तो देन है मध्ययुग की, जब कि बालिकाओं को आतताईयों की कुदृष्टि से बचाने के लिये अभिभावक उन्हें विकसित होने के पूर्व ही विवाह के बंधन में बांधने लगे। इस मध्ययुग में जब बाल विवाह प्रचलन में आया तब से अब तक कई विवाह बच्चों को गोद में लेकर, तो कई झूलों में ही व कुछ विवाह तो माता पिता द्वारा बच्चों का लिंग जाने बिना प्रत्याशा में गर्भावस्था में ही तय कर दिये जाने की जानकारी भी प्राप्त होती है। दरअसल में जितना यह सामाजिक सवाल है उससे ज्यादा कहीं राजनैतिक है। जब तक इस समस्या को राजनैतिक च6मे से नहीं देखा जायेगा तब तक इसके हल होने की संभावना नगण्य है। 

आखिर बालविवाह क्यों ?????

बालविवाह का सीधा संबंध बालक-बालिका पर असमय जिम्मेदारी लादने से शुरु होता है और बाद में स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों पर जा ठहरता है। बालविवाह बच्चों को उनके बचपन से भी वंचित कर देता हैं । आखिर क्यों किये जाते हैं बाल विवाह । बालविवाह के पक्षधर इस संबंध में तर्क देते हैं कि

  • बड़ी होने पर लड़की की सुरक्षा कौन करेगा ? बालिकाओें की सुरक्षा एक गंभीर मामला है। 
  • कम उम्र में चूंकि लड़का भी कम पढ़ा लिखा होगा तो वर पक्ष की दहेज संबंधी मांग भी कम रहेगी।
    छोटी उम्र में चयन के विकल्प (वर तथा परिवार) खुले होते हैं।
  • लड़की तो बोझ होती है जितनी जल्दी यह जिम्मेदारी खत्म हो सके उतना ही अच्छा है।
  • यदि बड़ी होकर लड़की ने कोई गलत कदम उठा लिया (स्वयं वर ढूंढ लिया) तो समाज को कौन समझायेगा ?
  • विवाह चाहे कम उम्र में करते हैं पर विदा तो लड़की को समझदार होने के बाद ही करेंगें। 
  • लड़की दूसरे घर में जल्दी सामंजस्यता बिठा लेती है। 

इन सब कारणों से बाल विवाह हमारे समाज में अभी तक किये जाते रहे हैं व इन तर्कों के आगे इन बच्चों का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक व शैक्षणिक विकास कहीं गौण हो जाता है। दरअसल में यह समस्या एक जटिल रुप धारण किये हुये हैं । गरीबी और अशिक्षा भी इसका एक प्रमुख कारण है। इस कुरीति के पीछे कई और कुरीतियां भी हैं जैसे दहेज प्रथा। दहेज प्रथा के कारण भी लोग जल्दी शादी कर देते हैं क्योंकि इस समय तक वर की अपनी इच्छायें सामने नहीं आती हैं और शादी सस्ते में निपट जाती है। 

बाल विवाह के दुष्परिणाम  

कम उम्र में शादी होने से बच्चे के न सिर्फ सुरक्षा के अधिकार का उल्लंघन होता है वरन् अच्छा स्वास्थ्य, पोषण व शिक्षा पाने का अधिकार का भी हनन होता है। इसके अलावा जो दिक्कतें उन्हें आती हैं उनमें प्रमुख है। बाल विवाह के कारण बालिकायें कम उम्र में असुरक्षित यौन चक्र में सम्मिलित हो जाती है क्योंकि यह तो सिर्फ शादी तक ही कहा जाता है कि शादी जल्दी कर देते हैं विदा बाद में करेंगें या करवायेंगें। परन्तु शादी के कुछ समय बाद ही लड़की के परिवार पर जोर दिया जाने लगता है कि लड़की की विदा जल्दी की जायें । अत: जिस तरह कच्ची मटकी में पानी ठहर नहीं पाता है व न ही मटकी ही साबुत रह पाती है । उसी तरह कम उम्र में यौन संबंधों के तात्पर्य है अपरिपक्व शरीर में बालिका द्वारा गर्भधारण करना। परिणामत: भ्रूण का पूर्ण रूप से विकसित न हो पाना न ही माता के शरीर का विकसित हो पाना। कुछ और परिणामों में गर्भपात, कम वजन के बच्चे का जन्म, बच्चों में कुपोषण, माता में कुपोषण, खून की कमी होना, मातृ मृत्यु, माता में प्रजनन मार्ग संक्रमणयौन संचरित बीमारियॉएचआईवी संक्रमण की संभावना में वृद्धि होना आदि। अध्ययनों से यह सिद्ध हो चुका है कि 15 वर्ष की उम्र में माँ बनने से मातृ मृत्यु की संभावना 20 वर्ष की उम्र में माँ बनने से पांच गुना अधिक होती है। 

बाल विवाह में कहां है प्रदेश ??

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के  तृतीय चक्र के आंकड़ों (2005-06) की मानें तो हम पाते हैं कि  भारत में 474 प्रतिशत महिलाओं का विवाह 18 साल के पूर्व हो गया था। प्रदेश के स्तर पर जायें तो बाल विवाका सर्वाधिक प्रचलन बिहार (690 प्रतिशत), राजस्थान (652 प्रतिशत) तथा झारखण्ड (632 प्रतिशत) में पाया गया। मध्यप्रदेश बालविवाह के संदर्भ में 573 प्रतिशत के साथ चौथे स्थान पर है। बालविवाह का सबसे कम प्रचलन गोवा (121 प्रतिशत) हिमाचल प्रदेश (123 प्रतिशत) व मणिपुर में (129 प्रतिशत) में पाया गया।

सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य और बालविवाह

सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य बाल विवाह के संबंध में अप्रत्यक्ष रुप से बात करते हैं।

1 भूख और गरीबी उन्मूलन - क्योंकि गरीबी बालविवाह को लेकर कारक और निष्कर्ष के रुप में सामने आते हैं ।

2 प्राथमिक शिक्षा की गारंटी - बालविवाह के चलते बालिकाओं को मजबूरन शाला छोड़ना पड़ता है। 

3 लैंगिक समानता को बढ़ावा - बालिकाओं को सांस्कृतिक और आर्थिक कारणों से स्कूल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ता है। 

4 बाल व शिशु मृत्यु दर में कमी - कम उम्र में शादी होने से और मां बनने पर बच्चे के बचने की संभावना कम होती है। 

5 मातृत्व स्वास्थ्य में सुधार

जिला स्तरीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2007-08) के हवाले से  प्रदेश को देखें तो ज्ञात होता है कि प्रदेश के 3 जिलो (बड़वानी, शाजापुर व श्योपुर) में आधी से अधिक महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की उम्र के पूर्व हो चुका था। यदि ग्रामीण परिवेश को देखें तो 6 जिलों में 50 प्रतिशत से अधिक व 8 जिलों में 40-50 प्रतिशत के मध्य महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की उम्र के पूर्व हो चुका था। जाहिर है कि यदि इतनी जल्दी लड़कियों का विवाह होगा तो बहुत कम उम्र में वे गर्भवती हो जाती हैं। ऑकड़े यह भी द6र्ााते हैं कि 11 जिलों में कुल जन्मे बच्चों में  से 15-25 प्रतिशत बच्चों के जन्म के समय माता की उम्र 15-19 वर्ष के मध्य थी।

बाल विवाह के पक्षधरों द्वारा एक तर्क यह भी दिया जाता  है कि भले ही विवाह कम उम्र में किया जाता है परन्तु पति पत्नी साथ साथ रहना तो बालिग होने के बाद शुरू करते हैं इसका खण्डन भी राष्ट्रीय सर्वेक्षण का तृतीय चक्र करता है। ऑंकड़े बताते हैं कि भारत में 15-19 वर्ष की महिलाओं में 16 प्रतिशत् या तो मॉ बन चुकी थी या पहली बार गर्भवती थी। इनमें सर्वाधिक भयावह स्थिति झारखण्ड, प6चिमी बंगाल व बिहार की है जहाँ क्रमश275, 25 व 25 प्रतिशत्  महिलाये 15-19 वर्ष के मध्य माँ बन चुकी थी या बनने जा रही थी। जबकि इससे विपरीत स्थिति हिमाचल प्रदेश (123 प्रतिशत) गोवा (121 प्रतिशत्)व जम्मू एवं क6मीर (42 प्रतिशत) पाई गई।

यह माना जाता है कि किसी भी कुरीति को दूर करने में शिक्षा का बहुत बड़ा योगदान होता है परन्तु ऑकड़ों का वि6लेषण करने से ज्ञात होता है कि केरल राज्य, जहॉ शिक्षा का स्तर सर्वोच्च है, में भी 18 वर्ष से कम उम्र में 154 प्रतिशत महिलाओं की शादी हो चुकी थी व 58 प्रतिशत महिलाये 15-19 वर्ष के मध्य या तो मॉ बन चुकी थी या वे मॉ बनने जा रही थी।

इसका सीधा तात्पर्य है कि यदि इस कुरीति को दूर करना है या बच्चों के सुरक्षा, पोषण, स्वास्थ्य व शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करना है । शिक्षा से अधिक जोर अभिभावकों को जागरूक बनाने पर देना होगा व कड़े कानून बनाकर उनका कड़ाई से पालन करवाना होगा।

भारत में बालविवाह की रोकथाम को लेकर किये गये प्रयत्न 

बालविवाह को रोकने के प्रयास काफी लंबे समय से किये जा रहे हैं। इस हेतु वर्ष 1929 में 'बाल विवाह अंकुश अधिनियम' भी बनाया गया जिसे शारदा एक्ट भी कहा जाता है। इस एक्ट में कई खामियां र्थी। इन कमियों को दूर करने के लिये भारत सरकार द्वारा बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, (पीसीएमए) 2006 को 1 जनवरी 2007 से अधिसूचित किया गया। इसका उद्दे6य, बाल विवाह प्रथा की प्रभावी रोकथाम के लिये पहले कानून की विफलता को दूर करना व बाल विवाह की रोकथाम के लिये एक समग्र व्यवस्था विकसित करना है। यह कानून 1 नवंबर 2007 से लागू किया गया है।

भारत द्वारा स्वीकृत  अंर्तराष्ट्रीय संधियों और राष्ट्रीय कानूनों में इस बात का उल्लेख किया गया है कि बच्चों को सुरक्षा प्रदान करना और अनके बुनियादी मानवाधिकारों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है। भारत सरकार ने कई अंर्तराष्ट्रीय संधियों पर हस्ताक्षर किये हैं जिसमें उन्हें शोषण से बचाने व उन्हें सम्मानजनक अधिकार दिलाने हेतु प्रावधान हैं। इन संधियों और कानूननों में से प्रमुख निम्न हैं ।

  • 1989 का संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौता (यूएनसीआरसी) जिसे भारत द्वारा 1992 में अंगीकृत किया । इसकी धारा  19,24,28 और 34 इस बात की मुखालफत करती है। 
  • इसी प्रकार 1979 का महिला विरोधी भेदभाव उन्मूलन समझौता (सीडॉ) जो कि भारत ने 1993 में अंगीकृत  किया है । इसकी धारा 16 बालविवाह के संदर्भ में बात करती है।
  • अनिवार्य विवाह पंजीयन अधिनियम, 2006
  • अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा का अधिनियम 2009
  • 11वीं पंचवर्षीय योजना 2007-12 में भी विवाह के अनिवार्य पंजीकरण व विवाह समय आयु की जांच करने पर जोर दिया गया है।
  • महिला एवं बाल विकास विभाग मंत्रालय के नेशनल प्लॉन ऑफ एक्शन फॉर चिल्ड्रन,2005 के अनुसार 2010 तक बालविवाह को पूरी तरह से खत्म करने का लक्ष्य किया गया है ।
  • अंर्तराष्ट्रीय आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक अधिकार प्रसविदा (ईएससीआर) प्रमुख है।

विभागों में आपसी तालमेल का अभाव

बालविवाह को लेकर विभागों के बीच में आपसी ताल-मेल का अभाव हर स्तर पर दिखता है।  बाल विवाह के मामलों को लेकर सूचना के अधिकार की कार्यकर्ता रोली शिवहरे ने आवेदन लगाया। जिसमें कि पिछले 10 वर्षों में मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों में बाल विवाह के दर्ज मामलो के बारे में जानकारी चाही गयी। यह आवेदन 4 विभागों (महिला बाल विकास विभाग, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग एवं पुलिस विभाग) में लगाया गया क्योकि बाल विवाह रोकने जिम्मेदार विभाग की भूमिका में है ।

इस आवेदन को शिक्षा विभाग ने यह कहते हुए लौटा दिया कि वो इस प्रकार की जानकारी नहीं रखते। महिला बाल विकास विभाग जो इस कानून में मुख्य भूमिका निभाता है उसने आवेदन पुलिस मुख्यालय को अंतरित कर दिया क्योंकि उनके पास बाल विवाह से संबंधित कोई आंकडे नहीं थे।  इस आवेदन के माध्यम से साफ निकलकर आता है कि क्योंकि बाल विवाह के सम्बन्ध में कानून बना है इसलिए इसके विषय में जानकारी रखना सिर्फ पुलिस का काम है । स्वास्थ्य विभाग ने हमेशा की तरह आवेदन का कोई जवाब नही दिया ।  पुलिस मुख्यालय ने जो आंकड़े दिये वो और भी चौंकाने वाले थे क्योंकि उसके अनुसार मध्यप्रदेश के 24 जिले ऐसे हैं जिसमें पिछले 10 साल में बाल विवाह के कोई भी मामले दर्ज नहीं हुए हैं जबकि जिला स्तरीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े कुछ और ही हकीकत बयां करते हैं। 

जिला DLHS-3 के अनुसार बाल विवाह (प्रतिषत में ) पुलिस विभाग द्वारा  प्रदान की गई जानकारी के अनुसार 
झाबुआ 75 0
रायसेन 68.8 0
धार 67.7 1
डिण्डोरी 62 0
होषंगाबाद 62.8 0
सिहोर 62.6 1
सूचना के अधिकार में मिली जानकारी के अनुसार 

परन्तु राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार इन जिलो में पिछले 10 वर्षों में 2 बाल विवाह के केस दर्ज हुये हैं जो कि संदेहास्पद है। ज्ञात हो कि इनमें से अधिकांश जिले आदिवासी जिले है।

जिंदा हैं सवाल 

विभागों के बीच तालमेल का अभाव भी इतने सारे प्रावधानों के बाद भी आज तक इस सवाल को बरकरार रखे हुये हैं। आखिर बाल विवाह थमते क्यों नहीं है ? हालांकि  इसका प्रतिशत कम हुआ हैं लेकिन यह कुप्रथा अभी खत्म नहीं हुई है। इसके पीछे एक कारक तो यह भी है कि इस  समस्या को राजनैतिक च6मे से नहीं देखा जा रहा है । अक्सर मंत्री विधायकों के सानिध्य में बालविवाह होते देखे जाते रहे हैं ? एक - दो बार मुख्यमंत्री की अगुआई में चल रही कन्यादान योजना मे ही बालविवाह हुये है तो क्या जनप्रतिनिधियों की कोई जवाबदेहिता तय नहीं की जानी चाहिये ? कई सवालों के बीच में एक सवाल यह भी है कि बालविवाह अधिनियम की धारा 13 के अंर्तगत् कितने संवोदनशील क्षेत्रों को आखातीज या वसंत पंचमी के पहले ''सघन  अनिवार्यता'' के क्षेत्र घोषित किया जाता है ? और यदि हां तो फिर वहां बालविवाह कैसे संपन्न हो जाते हैं ? राजस्थान की भंवरी देवी व मध्य प्रदेश की शकुंतला वर्मा जैसी घटनायें बाल विवाह रोकने का प्रयास करने वाले अधिकारियों को हतोत्साहित करती है। अत: आव6यक है कि इन अधिकारियों को सुरक्षा प्रदान की जाये। क्या सुरक्षा के पर्याप्त इंतजामात उपलब्ध कराती है सरकार ?

एक और महत्वपूर्ण चीज कि लोकतंत्र का प्रहरी होने का दंभ भरने वाला मीडिया भी इस मुद्दे को लेकर उतना गंभीर  क्यों नहीं है ? आधुनिक पत्रकारिता की भाषा में कहें तो शायद यह वर्ग उस अखबार का टीजी नहीं है ! अतएव हम सभी खबरनवीसों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, सरकारी विभागों के लोगों को साथ मिलकर अभियान छेड़ना होगा तभी हम बालविवाह की रोकथाम कर पायेंगे।

प्रशांत कुमार दुबे

1 राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के तृतीय चक्र के अनुसार
2 राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के तृतीय चक्र के अनुसार
3 जिला स्तरीय पारिवारिक सर्वेक्षण के तृतीय चक्र के अनुसार
4 जन गणना 201 प्रोवीजनल डाटा
5 एसआरएस 2008
6 राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो 2009
7 एसआरएस 2008

 
     
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