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  YOU ARE HERE: Home > Infopack > Bachchon Kee Khadya (A)Suraksha: Bhookh Aur Garibi Ka Yah Ek Bada Maamla Hai  
     
  बच्चों की खाद्य (अ)सुरक्षा: भूख और गरीबी का यह एक बड़ा मामला है!!  
     
 

अभी भी बच्चों के जीवन का सवाल केवल कुपोषण और टीकाकरण के दायरे में ही सीमित करके रहा गया है. बच्चों की खाद्य असुरक्षा और उसके व्यापक अर्थों को केंद्र में रखते हुए विकास संवाद द्वारा यह दस्तवेज तैयार किया गया है!

राजनैतिक व्यवस्था का चरित्र है कमज़ोर और अनुपयोगी की उपेक्षा करना (बच्चे न तो सरकारें बनाते हैं ना बिगाढ़ते हैं और जो वोट देकर यह ताकत रखते हैं उनकी नज़र में बच्चे पूरी इंसानी इकाई नहीं हैं, बल्कि अधूरी इकाई हैं) और मौजूदा अर्थव्यवस्था का मतलब है हर उस व्यक्ति की उपेक्षा करना जिसे अनुत्पादकता की श्रेणी में धकेल दिया जा रहा है. हमारी अर्थनीति अभी भी मानती है कि बच्चों पर खर्चा क्यों किया जाए, उनसे वृद्धि दर थोड़े बढ़ेगी, इससे अच्छा है कि सार्वजनिक संसाधन से जंगल, जमीन, पहाड़, पानी का बाज़ार सजा दो, इससे व्यापार होते दिखेगा और लगेगा कि हमारे पास खूब पैसा आ रहा है. अब जो थोडा बहुत हो रहा है उसमे भी यह वाक्य जरूर कहा जाता है - बच्चो के बारे में हमें प्रयास करने हैं, क्यूंकि वे देश के भविष्य हैं, क्यूंकि वे कल के नागरिक हैं........सवाल यह है कि क्या क्या वे वर्तमान नहीं हैं, क्या वे आज नागरिक नहीं हैं. हमारे यहाँ राजनैतिक सन्दर्भ में नागरिक की परिभाषा है वोट दे और आर्थिक नज़रिए से इसका मतलब है जो मजदूरी, नौकरी या व्यापार करे वह नागरिक है. बस यहीं बच्चे नीतियों के पटल से मिटा दिए जाते हैं. राजनीति और आर्थिक व्यवस्था का यह चरित्र बच्चों को समाज में हाशिये पर धकेलता रहा है.

सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य के मुताबिक हमने (हमारे राज्य और समाज ने) यह तय किया है कि वर्ष २०१५ तक हमें गरीबी को आधा करना है और भुखमरी को मिटाना है, पर राज्य जब गरीबी और भुखमरी की परिभाषाएं तय करता है तब बच्चों की भूख और गरीबी को थोडा पीछे धकेल कर आगे बढ़ने की कोशिश होती है. प्रोफ़ेसर उत्सा पटनायक के मुताबिक ७६ फीसबी लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिलता है, अर्जुन सेन गुप्ता का कहना है कि ७७ फीसदी लोग २० रूपए या इससे भी कम पर जीवन जीते हैं. महत्वपूर्ण यह है कि गरीबी और भूख के इस विश्लेषण में बच्चे कहाँ हैं? दुनिया के राज्य प्रवर्तित दो सबसे बड़े खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम आंगनवाडी और मध्यान्ह भोजन योजना का भारत में ही क्रियान्वयन हो रहा है, पर गैर जवाबदेहिता, भ्रष्टाचार, लापरवाही, सामाजिक बहिष्कार, और बच्चो के सवाल को दोयम दर्जे का मुद्दा मानने की प्रवर्ति के कारण देश में बच्चों की खाद्य असुरक्षा का संकट गहराता गया है.

हम बच्चों के सवालों को यदि नज़र अंदाज़ कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि हम सामाजिक बदलाव की संभावना को भी कमज़ोर और गति को धीमा कर रहे हैं. यदि आज उनके विकास, विचार और जीवन के संरक्षण को हम उस नज़रिए से दिशा दे पाए, जैसा कि हम समाज बनाना चाहते हैं, तो कम से कम बच्चे समाज में पसरे हुए शोषण, भेदभाव और टकराव की राजनीति को चुनौती देकर मानवीय मूल्यों और अधिकारों की पुनर्स्थापना कर सकते हैं.

लेकिन माजूदा भुखमरी का माहौल और परिथितियाँ उन्हें इतना कमज़ोर और लाचार बना रही हैं, कि ना तो वे स्वस्थ्य इंसान बन पायेंगे, ना ही एक आत्मनिर्भर नागरिक, राजनीति और आर्थिक व्यवस्था में उन्हें हमेशा गरीबी और उपेक्षा के साथ जीने के लिए मजबूर किया जाता रहेगा. वे कभी उस शिक्षा व्यवस्था और पाठ्यक्रम पर सवाल नहीं कर पायेंगे जो कई स्तरों पर अवैज्ञानिक, साम्प्रदायिक, जातिवादी और वर्गवादी व्यवस्था की जड़ों को मज़बूत करता है. मजदूरी या निर्माण कार्यों में जो लक्ष्य उनके लिए तय किये जायेंगे, उन्हें पूरा करने की क्षमता उनमे नहीं होगी और हमेशा उन्हें आधी मजदूरी मिलेगी.

वास्तव में आज हमारे सामने बच्चों को जिन्दा रखने की चुनौती है. देश की आधी महिलायें खून की कमी की शिकार हैं और उन्हें गरीबी और भेदभाव के कारण पोषण का हक नहीं मिल रहा है, महिलायों की यह स्थिति उनके अपने जीवन के लिए संकट तो है ही साथ ही उनके गर्भ में पनप रहे जीवन के लिए भी उतना ही बड़ा संकट होता है. पोषण और स्वास्थ्य के अधिकार के अभाव में उनके जीवन पर अनिश्चितता के घने बादल छाए रहते हैं. यह एक पीढ़ा देने वाल तात्या है कि हर साल देश में 77 हज़ार महिलाओं की प्रसव या उससे जुड़े कारणों से मृत्यु हो जाती है. इस मसले पर किये गए एक अध्ययन से पता चला कि मातृत्व मृत्यु की स्थिति में 80 फ़ीसदी नवजात बच्चो या शिशुओं की भी मृत्यु हो जाती है. कुपोषण का मतलब है उर्जाविहीन जीवन.

पोषण का सवाल इस बात से सीधे जुडा हुआ है कि बच्चा जन्म ले पायेगा या नहीं, और यदि वह जन्म ले लेता है तो उसे स्वस्थ्य और सामान जनक जीवन का अधिकार मिलेगा या नहीं. यूँ तो बच्चों के परिभाषा के तहत समाज का वह तबका आता है जिसकी उम्र 18 वर्ष से कम है परन्तु इस आयु वर्ग में होने वाली कुल मौतों में से 85-90 फ़ीसदी 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के होती हैं. जिनका सबसे बड़ा कारण पोषण की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित होना, सामाजिक-व्यवस्थागत भेदभाव के फलस्वरूप पनपने वाली बीमारियाँ (डायरिया, मलेरिया, खसरा, निमोनिया, और कुछ ख़ास संक्रमण) है. यह बच्चों के जीवन के अधिकार का सबसे बुनियादी सवाल है, जिसके लिए वे समाज और राज्य पर निर्भर हैं. यदि वे जिन्दा रह पाए तो ही स्कूल जा पायेंगे? फिर दूसरा सवाल है कि उनका जीवन सम्मानजनक और गरिमामय होगा या नहीं? शारीरिक-मानसिक विकलांगता हमेशा से बच्चों के जीवन लिए चुनौती बनते रहे हैं.

हम सरकार के भीतर बच्चों के जीवन के अधिकार के लिए परस्पर समन्वय और व्यापक नज़रिए के लिए वकालत करते रहे हैं, परन्तु क्या मौजूदा विकास की बहसों या संघर्षों में बच्चों के पोषण और खाद्य सुरक्षा के साथ जोड़ कर देख पायें हैं? विस्थापन की शिकार आबादी में 44 फ़ीसदी की उम्र 18 वर्ष से कम और १६ फ़ीसदी की उम्र ६ वर्ष से कम होती है. विस्थापन के कारण होने वाले अधिकारों के हनन की मार सबसे पहले बच्चों पर पढ़ती है, वे तो अपने ऊपर हुए भावनात्मक आघात को व्यक्त भी नहीं कर पाते हैं. यह विस्थापन उनसे अपनी सांस्कृतिक पहचान तो छीन ही ले रहा है, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित जीवनशैली से भी वंचित कर दे रहा है. अब वे अपने जंगल, पहाड़, कंदमूल, औषधियों और पर्यावरण के बारे में नहीं जान पाते हैं. विस्थापन से प्रभावित बच्चों में कुपोषण और मृत्यु दर भी तुलनात्मक रूप से बढ़ी हुई पायी जाती है. अब तक यह माना जाता है की देश में विस्थापित होने वाले कुल व्यक्तियों की संख्या 6 करोड़ से ज्यादा है, इसका मतलब यह है की इनमे से लगभद 1 करोड़ की उम्र 6 वर्ष से कम और ढाई करोड़ की उम्र 18 वर्ष से कम रही है. इन बच्चों की कुछ ख़ास जरूरतें होती हैं विकास के लिए, सवाल यह की क्या उनकी जरूरतों का ख्याल रखा गया? बदहाली के कारण बढ़ रहा पलायन उनके जीवन में चुनाव का कोई विकल्प ही नहीं छोड़ रहा है. अब बदहाली इतनी ज्यादा है कि परिवार 2-3 माह के बच्चों के लेकर पलायन पर निकलने को मजबूर हैं, जहाँ न तो कोई संरक्षण है, न स्वास्थ्य की कोई सेवा और खाद्य सुरक्षा तो जैसे उन ठेकेदारों पर निर्भर है, जो महिला मजदूरों को अपने बच्चो को दूध पिलाने के काम को समय की बर्बादी मान कर उन्हें बैठने नहीं देते हैं. वँही, पत्थरों और कांक्रीट के बीच यह भूखा बचपन पनपता है.

शहरीकरण को विकास का सबसे केन्द्रीय मापदंड माना जाने लगा है, पर हमारे बड़े शहरों में 40 फ़ीसदी से ज्यादा आबादी झुग्गी बस्तियों या अब उन एक छोटे से कोठरी नुमा कमरे से में रहती है जिनका निर्माण शहरी नवीनीकरण योजना के तहत किया जा रहा है. इनमे अब भी अद्धी से ज्यादा बस्तियों के अवैध मान कर मौलिक सुविधाओं से वंचित किया जाता है, वहाँ ना तो आंगनवाडी केन्द्रों का सही संचालन होता है, ना ही पानी और स्वच्छता के साधन उपलब्ध कराये जाते हैं. इन बस्तियों के आधे से ज्यादा बच्चे कुपोषण के शिकार है और बीमार रहते हैं. इन्ही परिस्थितयों में उन्हें पेट भरने के लिए पानी बीनने, निर्माण मजदूरी करने या फिर ढाबों-होटलों-घरों में काम करना पड़ता है.

आदिवासी और गैर-आदिवासी समाज के बच्चों में अब कुपोषण के स्तर में 18-25 प्रतिशत का अंतर है, यानी आदिवासियों में ज्यादा कुपोषण पाया जा रहा है. जो कभी सबसे सुरक्षित रहे, अब वे भूख के साथ जी रहे हैं क्यूंकि उनसे जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर से अधिकार छीन लिए गए हैं. मतलब साफ़ है कि यदि आदिवासी बच्चों के कुपोषण और भुखमरी के जाल से बाहर लाना है तो उनके वन अधिकार को वास्तविक मान्यता देना होगी, वहाँ से विस्थापन बंद करना होगा, और इन संसाधनों को तहस नहस करने वाले विकास को रोकना होगा, तभी उन्हें पोषण की सुरक्षा मिल पाएगी.

बच्चों की खाद्य सुरक्षा का सवाल इसलिए महत्त्वपूर्ण है ताकि उनकी माओं को जीवन के सबसे पहले सबक के रूप में बच्चों को भूख के साथ जीने की तकनीकें ना सिखाना पड़ें. बच्चों की भुखमरी समाज में एक ऐसा वर्ग खड़ा करती है, जो कमज़ोर और अनुत्पादक माना जाकर मुख्य धारा से बाहर कर दिया जाता है. उसके विकास की जरूरत को नकार दिया जाता है, और यह माना जाने लगता है कि इन्हें तो केवल सेवा या समर्थक की भूमिका ही तो निभाना है, जिसके लिए आधे पेट खाना ही मिलना चाहिए.

इसी तरह जन्म के समय कम वजन जीवन भर की अस्वस्थता का बड़ा कारण होता है। गर्भावस्था के समय उचित आहार न मिलने और घरेलू हिंसा की शिकार होने के कारण महिलाओं के साथ-साथ बच्चों की स्थिति भी खराब हो रही है। स्त्री के प्रति घरेलू हिंसा के कारण बच्चों में स्नायु तंत्र से सम्बन्धित रोगों को प्रतिशत बढ़ा है। राष्ट्रीय पोषण संस्थान की एक रपट के अनुसार वे सभी बच्चे जिनका जन्म के समय वजन कम था, अधिकांश गरीब परिवारों से आते थे। एक तिहाई बच्चों की मौत जन्म के समय कम वजन के कारण ही होती है। इसी तरह कमजोरी के कारण बच्चों पर तपेदिक (टीबी) जैसे संक्रामक रोगों के बढ़ते प्रभाव को भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

गरीबी की बहस उसकी परिभाषा के विवाद से ही बाहर नहीं निकल पा रही है. यूँ तो शिशु मृत्यु, जीवन की उम्र और शिक्षा को अब मानव विकास का सूचक माना जाने लगा है, परन्तु अब भी इन्हें गरीबी के सूचक के रूप में व्यावहारिक मान्यता नहीं मिली है. साढ़े चार करोड़ बच्चे श्रम करने में जुटे हुए हैं, 9 करोड़ बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, हर साल 14 लाख बच्चों की एक साल से कम उम्र में मौत हो जाती है, 25 करोड़ महिलायें खून की कमी की शिकार हैं, पर फिर भी सवा 8 करोड़ परिवार ही गरीबी की रेखा के नीचे माने जाते हैं, गरीबी को बच्चों के नज़रिए से क्यों नहीं मापा जाता है, यह एक बेकार सा सवाल है!! वर्ष 2007 में विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ और विश्व खाद्य कार्यक्रम ने गंभीर कुपोषण पर एक संयुक्त वक्तव्य जारी करते हुये कहा कि ''गंभीर कुपोषण बच्चों की मृत्यु का प्रत्यक्ष कारण है और गंभीर कुपोषित बच्चों में मृत्यु जोखिम सामान्य बच्चों की तुलना में 5 से 20 गुना ज्यादा होता है।'' इसी संदर्भ में विश्व में स्वास्थ्य के क्षेत्र में सबसे ख्यातनाम इग्लैण्ड की शोध पत्रिका द लांसेट ने जनवरी 2008 में छह श्रृंखलाबध्द शोध पत्रों को प्रकाशित करते हुये बताया कि डायरिया के कारण एक स्वस्थ-पोषित बच्चे की मृत्यु की संभावना अगर 5 प्रतिशत होती है तो उसकी तुलना में एक गंभीर कुपोषित बच्चे की मृत्यु होने की संभावना 16.5 गुना ज्यादा होती है। इतना ही नहीं यदि किसी गंभीर कुपोषित बच्चे को निमोनिया हो जाये तो एक पोषित बच्चे की तुलना में वह साढ़े 10 गुना ज्यादा तेज गति से मृत्यु की दिशा में बढ़ रहा होता है। इसी तरह तमाम संक्रमणों और बीमारियों की स्थिति में इन बच्चों के मृत्यु की संभावना 18 गुना ज्यादा होती है। पर फिर भी यह गरीबी का सूचक नहीं है.

विश्व बैंक ने अपने एक दस्तावेज की शुरुआत एक सवाल से की है - क्या आप जानते हैं कि दुनिया की सबसे गंभीर स्वास्थ्य समस्या कुपोषण है? कुपोषण के कारण सबसे ज्यादा बच्चों की मौतें होती है। विश्व बैंक की पोषण् विशेषज्ञ मीरा शेखर कहती हैं कि जिन 60 फीसदी बच्चों की मौतें मलेरिया, डायरिया, निमोनिया के कारण होती है, उन्हें बचाया जा सकता था, यदि वे कुपोषित नहीं होते तो!!

कुपोषण केवल शारीरिक मृत्यु का कारण नही बनता है, बल्कि इससे व्यक्ति की सामाजिक स्थिति भी प्रभावित होती है। विकास की परिभाषा का मूल उद्देश्य समाज को एक समतामूलक बेहतर स्थिति प्रदान करना है। ऐसे में व्यापक सैद्धांतिक योजना बनाते समय सबसे पहले सरकार को यह स्वीकार करना होगा कि पोषण की कमी से एक व्यक्ति का मानसिक और शारीरिक विकास बाधित होता है। भारत में 25 - 30 प्रतिशत बच्चों का जन्म के समय ही वजन ढाई किलो से कम होता है और यदि उन्हें जरूरी पोषण (स्तनपान से शुरू होकर) न मिलने के कारण उनकी दिमागीय संरचना का विकास नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है। इसी कारण उसके सीखने (बचपन से) और समझने की ताकत नहीं बढ़ पाती है। ऐसे में जब हम इन बच्चों की शिक्षा की बात करते हैं तो वास्तव में पोषण की कमी के फलस्वरूप शिक्षा से विकास की सोच बेमानी हो जाती है। और जब षिक्षा की स्थिति का विश्लेषण होता है तब बीच में ही स्कूल छोड़ने की प्रवर्ति के बारे में भांति-भांति के तर्क दिये जाते हैं। स्पष्ट रूप से पोषण की कमी से सीखने की क्षमता बहुत कम होती है जिससे बच्चे मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था में टिक नहीं पाते हैं और जब वे शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो जाते हैं तो उन्हें सीखने के अवसर भी नहीं मिलते हैं। जिससे उन्हें भविष्य में रोजगार और आजीविका की असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। यह असुरक्षा उन्हें और ज्यादा गंभीर कुपोषण की दिशा में बढ़ाती है। एक तरह से यहीं से कुपोषण एक दुष्चक्र का रूप ले लेता है। और राज्य की प्रतिबद्धता का आलम यह है कि देश की कुल आबादी के 16 प्रतिशत हिस्से यानी 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए कुल जमा एक मात्र एकीकृत बाल विकास परियोजना नाम का कार्यक्रम चल रहा है और इन पर देश के बजट का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा खर्च किया जाता है. ज्यादातर जोर ऐसी व्यवस्था पर है जिसमे बीमार पढने या कुपोषित होने पर इलाज़ करने के नीति है, बच्चे बीमार न पड़े और कुपोषित ना हों, यह सोच अभी भी नीति बनाने वालों की दृष्टि से बाहर है.

 
     
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