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  बच्चे और राजनैतिकता  
     
 

हमारी सरकार के पास बच्चों के लिये धन की कमी है। पर वर्ष 2008-09 के बजट में इसी सरकार ने कम्पनियों-खास तबके के लोगों के लिये 4,14,099 करोड़ रूपये की छूट दी, जो वर्ष 2009-10 में बढ़कर 5,02,229  करोड़ रूपये हो गई। ये सार्वजनिक संसाधन किसे और कितने मिले्रंगे, यह राजनीति से ही तय होता है और जिन मसलों पर राजनीति समझौता करके चुप्पी साध लेती है, उन मसलों पर अफसरशाही सिर रखकर सोती है। कानूनी हक लिख लिये जाने का मतलब यह नही कि वह मिल ही जायेंगे। हक मिलेंगे या नही या किस हद तक मिलेंगे यह भी राजनीति से ही तय होता है। तुम शिकायत कर सकते हो पर उस पर कार्यवाही होगी या नही यह राजनीति तय करती है। सरकार अस्पताल और आंगनबाड़ी केन्द्र खोल सकती है पर वह खुलेंगे या नही यह राजनीति पर निर्भर करता है।

मध्यप्रदेश के सतना जिले के तीन गांवों में एक सप्ताह के भीतर 9 बच्चों की मौत हो गई। किसी को पता चला तो मामला बाहर लाया गया। स्वास्थ्य विभाग ने रिपोर्ट जारी की कि ये मौतें कुपोषण के कारण हुई हैं और महिला एवं बाल विकास विभाग ने यह वक्तव्य देकर खण्डन कर दिया कि बच्चे बीमारी के कारण मरे हैं। कोई जिम्मेदार अफसर वहां नहीं पहुंचा और फिर रिकार्ड में फेरबदल करके सरकार ने कह दिया कि बच्चों की उम्र 6 से ज्यादा हो चुकी थी, मतलब वे सरकार की जिम्मेदारी के बाहर हो चुके थे। बच्चे एक जीवित जीव के रूप में समग्रता में नहीं बल्कि उम्र, विभाग और समस्याओं के टुकड़ों में काट-काटकर देखे जाते हैं। मसला केवल सतना का ही नही है, राज्य के 24000 आंगनबाड़ी केन्द्रों में पिछले 3 माह से पोषण आहार नही बंटा, और ऐसा अक्सर ही होता रहता है। बच्चों की मौते होती रही हैं पर उनमें इतनी धार नहीं रही कि वे राजनीति की चट्टान में बहस की इमारत उकेर सकें। यह उनके राजनीतिक प्राथमिकताओं से बाहर होने का प्रमाण भी है। अब संपन्न वर्ग के लिये किंडरगार्डन बेहद महत्वपूर्ण हो गये हैं और आंगनवाड़ी केन्द नेस्तनाबूत किये जा रहे हैं, क्योंकि बाजार इस धंधे में सरकार की कोई भूमिका नही देखना चाहता है।

बच्चों के कुपोषण का मतलब है कि सरकार की बच्चों की जरूरत और अधिकारों के प्रति राजनैतिक उदासीनता, भ्रष्टाचार गैर जवाबदेहिता और विकास की वर्तमान प्राथमिकताओं के कारण पैदा हो रही भुखमरी। बेहद महत्वपूण्र् ा तथ्य है कि प्रदेश की कुल जनसंख्या में से 16 प्रतिशत हिस्सा 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का है यानी लगभग 110 क़रोड़ की आबादी इस आयु वर्ग में आती है परन्तु इन बच्चों के लिये देश में केवल एक योजना का संचालन सरकार करती है। एकीकृत बाल विकास योजना। और इन पर सरकार अपने कुल व्यय का केवल 09 प्रतिशत व्यय करती है। अगर हम इस मुद्दे को बेकार मानते हैं तो जरा यह और जान लें कि भारत में कुपोषण के कारण विकास की दर में 3 से 4 फीसदी कमी आती है क्योंकि कुपोषण के कारण देश की आधी आबादी विकास और उन्नति में पूरी क्षमता के साथ योगदान नहीं दे पाती है।

हमारी राजनीति कुपोषण और इसके शिकार बच्चों के प्रति कितनी अमानवीय और भावनात्मक रूप से हिंसक है उसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना (वर्ष 2007-12) में आईसीडीएस (आंगनबाड़ी कार्यक्रम) के लिये जो कार्यक्रम है, एक साल (2007-08) गुजर जाने के बाद भी उसका क्रियान्वयन तो दूर भूमिका भी नहीं बन पाई है। और वर्ष 2008-09 के बजट में भी उसके संकेत नहीं दिखे, क्योंकि केंद्रीय मंत्री की मजअनुरूप पोषण आहार का काम निजी कम्पनियों को सौंपने का निर्णय नही हो सका। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 13 दिसम्बर 2006 के आदेश में आंगनबाड़ी कार्यक्रम का लोकव्यापीकरण करने के निर्देश दिये हैं। अब तक भारत के करोड़ बच्चों को ही इस कार्यक्रम का लाभ मिल रहा था और 14 लाख बस्तियों, गांवों, बसाहटों में से 8 लाख में आंगनबाड़ी केन्द्र ही नहीं थे, तब न्यायालय ने निर्देश दिये कि देश के हर बच्चे, हर गर्भवती, धात्री महिलऔर किशोरी बालिका की आंगनबाड़ी केन्द्र में आमद होना चाहिये। उन्हे पोषण आहार, स्वास्थ्य जांच, स्कूल पूर्व शिक्षा, टीकाकरण सहित सभी सात सेवायें मिलना चाहिये, यदि आंगनबाड़ी का लोकव्यापीकरण है और यह काम दिसम्बर 2008 तक पूरा हो जाना चाहिये। परन्तु आज भी इस मिशन के मामले में कोई राजनैतिक हलचल नजर नहीं आती है। मध्यप्रदेश का ही उदाहरण लें, राज्य में केवल 78000 आंगनबाड़ी केन्द्र संचालित हो रहे हैं। अब भी 48 हजार केन्द्रों की कमी है और लगभग 50 लाख बच्चे आंगनबाड़ी केन्द्र विकास सेवाओं से वंचित हैं परन्तु नये केन्द्रों की शुरूआत के मामले में अब भी राजनैतिक नज़रिया लापरवाही ही नजर आता है।

हमने उन निर्देशों को देखा है जिनमें सरकार के मंत्रियों और अफसरों के लिये क्षेत्र भ्रमण के दौरान देखी जाने वाली योजनाओं और विषयों का विवरण होता हे। मसला केवल निर्देशों का ही नहीं है बल्कि वास्तविक जमीनी अनुभवों का भी है और अनुभव यह बताते हैं कि मुख्यमंत्री और अफसर यह देखने की कोशिश नहीं करते है। कि वहां नौनिहालों के क्या हाल हैं?  योजना के मूल प्रावधानों में कहा गया है कि हर बच्चे, गर्भवती-धात्री महिला और किशोरी बालिका को बिना किसी भेदभाव या पात्रता मापदण्डों के साल भर में 300 दिन, पोषण आहार और अन्य सेवायें मिलना चाहिये पर मध्यप्रदेश में तो बजट का आवंटन ही 130 दिनों के लिये होता है और इसमें से भी 64 दिनों का हिस्सा भ्रष्टाचार लील जाता है। नियंत्रक महालेखाकार की जांच रिपोर्ट भी यह उल्लेख करती है कि मध्यप्रदेश में इस योजना में न केवल भ्रष्टाचार है बल्कि बच्चों को पूरा 300 कैलॉरी और 8 से 12 ग्राम प्रोटीन युक्त पोषण आहार नहीं मिलता है और 59 फीसदी बच्चे इससे वंचित हैं। न जाने क्यों भारत में सरकारी योजनाओं या सेवाओं का रूप ऐसा बना दिया जाता है कि उससे आम व्यक्ति कोई उम्मीद ही न रखे। सरकारी अस्पताल की बात करेंगे तो गंदी, बदबूदार, थुकी-बसी व्यवस्था और गंदे व्यवहार वाला केन्द्र और आंगनबाड़ी केन्द्र की बात करेंगे तो एक 8 गुणा 10 फिट का कमरा, जिसमें 80 बच्चों, 20 गर्भवती महिलाओं और 20 किशोरी बालिकाओं के बैठने की उम्मीद की जाती है। पोषण आहार बंटने पर असमानता और भिखमंगेपन का अहसास कराया जाता है ताकि अगली बार कोई भी हितग्राही अधिकार सम्पन्न होने की भावना न पाल सके।

बदकिस्मती की बात ही यह है कि शेयर बाजार और सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर को विकास का पैमाना मानने वाले विचारक यह मानते हैं कि कुपोषण और आंगनबाड़ी कार्यक्रम सरकार को चलाने ही नहीं चाहिये। यह संसाधनोकी बर्बादी है क्योंकि इससे समुदाय में बैठे-बैठे खाने और सरकार से उम्मीदें पालने की आदत पड़ जाती है। उन्हें मेहनत करना सिखाया जाना चाहिय। परन्तु वे भूल जाते हैं कि बचपन में कुपोषण का आक्रमण बच्चों के  फीसदी शारीरिक और मानसिक विकास को अवरूद्ध कर देता है। दूसरे मायनों में कुपोषण का शिकार, बच्चे स्कूल में सीखने की क्षमता भी कमजोर हो जाती है और भविष्य में वह रचनात्मक भूमिका भी नहीं निभा सकता है। ऐसे में विकास के विचारकों को बच्चों के कुपोषण को तो अपना लक्षित मुद्दा बनाना ही पड़ेगा पर चिंता इस बात की है कि तब तक कहीं देर न हो जाये। मध्यप्रदेश को तमिलनाडु की तरह के क़ामराज और एम ज़ी रामचंद्रन जैसे राजनीतिज्ञ नही मिल पाये, जो बच्चों के पोषण को मानव विकास का आधार मानते थे, और आज तमिलनाडु में यह एक सफल कार्यक्रम है. हमें यह स्वीकार कर लेना जरूरी है कि हम एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में रहते हैं जहाँ व्यवस्था में बदलाव राजनैतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ही आता है किन्तु अब यह अमानवीयता की हद तक सहनशील होता नजर आ रहा है. लगातार हो रही बच्चों की भुखमरी पर यह लोकतान्त्रिक व्यवस्था राजनैतिक सन्दर्भों में पूरी तरह से मौन है. हिंसक वारदातें नजर आती हैं परन्तु वह घटनाएँ बेहद व्यक्तिगत हैं जहाँ किसी ताकतवर परिवार में बच्चों की मौतें हो जाती हैं तो कुछ हलचल अस्पताल के प्रांगण में नजर आती हैं; इसके आगे बदलाव की कोई मांग नजर नहीं आती है. पिछला साल यूं ही खाली नहीं गया, बल्कि मध्यप्रदेश सरकार के मुताबिक 30 हजार बच्चों को पहला जन्मदिन मनाने से पहले मौत की नींद सो जाना पड़ा. पांच साल से कम उम्र के 164000 बच्चों की मौत हुई पर किसी राजनितिक दल ने जन मंच पर आकार एक व्यक्तव्य भी नहीं दिया, विकास के दावों के बीच मध्यप्रदेश में कुपोषण 54 प्रतिशत से बढ़कर 60 प्रतिशत पंहुच गया पर कोई राजनैतिक सवाल नहीं हुआ कि आखिर बच्चों के प्रति हमारे राजनैतिक दायित्व क्या हैं!!

क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि हर साल मध्यप्रदेश में दो लाख बच्चे 6 वर्ष से कम उम्र में मर जाते है। जिनमें से 120 लाख की मौत का कारण कुपोषण भी होता है ऐसे में हममें से किसी ने भी चुनावों के समय प्रदेश की 16 प्रतिशत आबादी के लिये कभी भी कोई चुनावी वायदा नहीं किया जाता कि सत्ता में आने के बाद इन बच्चों का पालनहार बनने की कोशिश राजनैतिक दल और सरकारें भी करेंगेी। राजनैतिक प्रतिबद्धताओं और प्राथमिकताओं के मामले में यह बेहर निराशाजनक चित्र है परन्तु इसे बदलने की जद्दोजहद में हमें जुटाना पड़ेगा। राज्य में 106 क़रोड़ बच्चों, 40 लाख गर्भवती, धात्री महिलाओं और किशोरी बालिकाओं को पोषण-स्वास्थ्य का अधिकार दिलाने के लिए आंगनबाड़ी केन्द्रों का रूप, रंग और चरित्र बदलने की जरूरत है ताकि हर हितग्राही उसे अपना दूसरा घर माने और यहां से मिलने वाली सेवायें न केवल उनके तन को बल्कि मन को भी स्वस्थ बनाये। बहरहाल सांस्कृतिक रूप से सम्पन्न हमारे समाज की विडम्बना यही है कि बच्चे और औंरतें कभी भी समानता का दर्जा नहीं पा सके हैं। यही वह वर्ग भी है जो अपनी जरूरतों और हकों की आवाज खुद बुलंद नहीं कर पाया;  इनकी ठेकेदारी भी पितृसत्तात्मक समाज के पास हैं इस ठेकेदारी की व्यवस्था को बदलने की नहीं तोड़ने की जरूरत है।

मंहगाई और गरीबी के बदलते चेहरों ने राशन की दुकान और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को तो राजनैतिक मुद्दा बना दिया है क्योंकि अब थाली का एक तिहाई हिस्सा भरने के लिए सस्ता राशन बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। अब तीन साल पहले केवल गरीबी की रेखा के ऊपर रहने वाले परिवार रोशन की दुकान जाकर अपने कोटे के राशन ले लेते थे क्यों कि तब सरकारी और खुले बाजार के राशन के दामों के लगभग समानता होती थी किन्तु पिछले दो सालों में यह मांग भी बनी है क्योंकि गेहूं पर 5 रूपये का अंतर आ गया है परन्तु, सरकार तो मानों धीरे जहर का काम कर रही है। मांग बढ़ने के बावजूद उसने राशन की दुकानों का आंवेटन नहीं बढ़ाया। आज यह एक राजनीतिक मुद्दा है क्योंकि इससे वयस्क समाज की भूख जुड़ी हुई है।

कुपोषण और बच्चों की खाद्य सुरक्षा का मुद्दा एक तकनीकी विषय हो सकता है किन्तु सामाजिक संदर्भों में यह बच्चों के मानव अधिकारों के हनन् का मामला बनता है जिसे हमारी राजनीति नज़र अंदाज करती है। आंगनबाड़ी तक पोषण आहार न पहुंचने का मुद्दा विधायकों और सांसदों के लिए तवज्जो का विषय नहीं होता है क्योंकि उन्हें लगता है कि बच्चों की बात करने पर तो अखबार वाले भी खबर नहीं छापते है। इसलिये उस पर बात करना निरर्थक है। फिर मसला यह भी है कि कुपोषित बच्चे तो सड़क पर उतर कर नारेबाजी भी नहीं कर सकते हैं; वे तो केवल उनकी तरफ देखते हैं जो जवाबदेहिता के जरिये बदलाव ला सकते हैं और बच्चों को भी पूरा इंसान मानें।

बाल पोषण के मुद्दे को सामाजिक ढांचे में एक दोयम दर्जे की जरूरत माना जाता है। इसमें भी बच्चों, महिलाओं और लड़कियों की जरूरतें पूरी करने की जिम्मेदारी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के रूप में एक महिला को दी गई है। उससे अपेक्षायें खूब सारी हैं पर उसे अपने भारी कौशलपूर्ण-शारीरिक श्रम  के एवज में न्यूनतम मजदूरी से भी कम मानदेय दिया जाता है। और पूरा सरकारी विभाग बच्चों के अधिकार के हनन् का बोझ उस आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के ऊपर डाल देता है, जिसके पक्ष में कोई कानूनी और सामाजिक व्यवस्था नहीं है। वह बेहद सामाजिक-राजनीतिक रूप से जटिल वातावरण में काम करती है। 

यह एक अहम् मसला है कि राजनीति न केवल बच्चों के प्रति उदासीन है बल्कि सरकार के गलत कदमों पर प्रतिक्रिया भी व्यक्त नहीं करती है। मध्यप्रदेश में वर्ष 2002 में स्वयं सहायता समूहों के जरिये पोषण आहार की आपूतिकी नीति बनाई गई थी। एक साल तक यह लागू नहीं हो पाई और वर्ष 2004 में इसे ठेकेदारों को सौंपने के लिऐ टेण्डर जारी कर दिये गये। यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन था। वर्ष 2006 में फिर एक नई योजना बनी जिसमें स्थानीय स्वयं सहायता समूहों को शामिल करने का विचार आया और वर्ष 2007 में राज्य मंत्रीमंडल ने मातृ सहयोगिनी समिति को पोषण आहार बनाने का निर्णय लिया गया। इसके बाद विभाग के मंत्री ने ही मंत्रीमण्डल के निर्णय को किनारे रखते हुये यह व्यवस्था खत्म कर दी। पिछले 6 वर्षों में 6 तरह की व्यवस्थायें बनीं इनमें से एक भी ठीक से लागू नहीं हो पाई और इन्हें बदला जाता रहा। इससे न तो बच्चों को नियमित रूप से पोषण आहार मिल पाया न ही स्वयं सहायता समूह और महिला मण्डल ही सक्रिय हो पाये, ये दोनों लुड़क रहे हैं गैर जवाबदेय व्यवस्था के मैदान में। यहां न तो मंत्रीमण्डल के निर्णयों का सम्मान है न ही सर्वोच्च न्यायालय कनिर्देशों का। इसका खामियाजा बच्चे भुगत रहे है। यही कारण है कि राज्य में कुपोषण बढ़ रहा है।

बच्चों के स्कूल में होने का मामला केवल शिक्षा के अधिकार का मामला नहीं है। जो बच्चे स्कूल से बाहर हैं उन्हें यथार्थ रूप में स्कूल में लाने की राजनीतिक जद्दोजहद दिखाई दे यह जरूरी है। सरकार कहती है कि केवल 71 हजार बच्चे स्कूल से बाहर हैं परन्तु वहीं दूसरी ओर सड़कों पर पन्नी बीनने और रेलगाड़ियों में अपने कपड़े उतारकर सफाई करके एक रूपया नहीं मांगते हैं बल्कि उनकी हर याचना के साथ जीवन के अधिकार की अपेक्षा होती है। जाने-अनजाने बच्चे भी जानते हैं कि ट्रेन में सफर करने वाले मध्यमवर्गीय समाज को संविधान के करीब ले जाने की जरूरूत है। जब हम उन्हें एक रूपये देते हैं या दुत्कार देते हैं तब दोनों ही परिस्थितियों में हम बाल अधिकारों का उल्लंघन कर रहे होते हैं। एक या दो ही नहीं बल्कि ऐसे बच्चों की संख्या लाखों में है जिनके नाम सरकार की पंजीयन सूची में शामिल हैं और आंकड़ों के हिसाब से जिन्हें स्कूल में होना चाहिये, वे वास्तव में वे स्कूल की कक्षाआें से बाहर हैं। इससे आगे बढ़ते हैं तो पता चलता है कि अब मध्यान्ह भोजन योजना के कारण बच्चों की फर्जी उपस्थिति दिखाते रहना अब भ्रष्टाचार में संलिप्त व्यवस्था के लिये आर्थिक रूप से फायदे का सौदा भी है। परिणामस्वरूप अब बच्चों के अधिकार का दोहरा-तिहरा नहीं बल्कि बहुपक्षीय उल्लंघन होता है।

इसके आगे जो बच्चे स्कूल की कक्षाओं में हिचकते-झिझकते प्रवेश कर भी गये हैं उन्हें हम सकारात्मक नजरिये से देखते रहे हैं किन्तु इसका एक नकारात्म्क पक्ष भी है और वह पक्ष यह है कि स्कूल की कक्षाओं में भी हमारी शिक्षा व्यवस्था में भेदभाव और शोषण के शुरूआती पाठ पढ़ाये जाते हैं।

कक्षाओं में टाट-पट्टियों और कुर्सी-मेजों की कतारें भी राजनीतिक ही होती हैं। आगे की पंक्ति में ताकतवर और सबके करीब रहने वाले बच्चे बिठाये जाते हैं। पीछे बैठने वालों में जाति और लिंग आधारित भेदभाव भी नजर आता है। पिछले दस वर्षों में दलित-आदिवासी बच्चों की शिक्षा में उभार नजर आता है पर यह उभार भी राजनीतिक है। सरकार ने शिक्षा गारण्टी शालायें गांव-गांव में स्थापित की हैं जहां न तो प्रशिक्षित शिक्षक हैं न ही सिखाई-पढ़ाई में गुणवत्ता। वहां स्कूल न भी खुले तो कोई आवाज नहीं उठती क्योंकि उन स्कूलों में मध्यम वर्ग के बच्चे नहीं ही पढ़ते हैं। वहां तो गरीब बच्चे पढ़ते हैं और गरीब बच्चों के परिवार रोटी चिंता करें कि बच्चों की शिक्षा पर आवाज बुलंद करें, इसमें से विकल्प चुनना उनके लिए बहुत ही कठिन है।

इतना ही नहीं इन स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली किताबें शुरू से ही ऐसे गीत सिखाती है जिसमें लड़की को सुबह जल्दी उठकर घर में झाडू लगाने की जिम्मेदारी दी जाती है और लड़का बस्ता उठाकर स्कूल जाते हुये दिखाया जाता है। यहीं पर यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या यह शिक्षा समानता का नजरिया रखते हुये बच्चों को विकास का अधिकार उपलब्ध करा पायेगा। अधिकारों के हनन् की स्थितियाँ अदृ6य स्थितियाँ नहीं हैं, ये साफ तौर पर सामने नजर आती हैं। समाज सेवकों और जनप्रतिनिधियों के सामने बच्चे श्रम कर रहे होते हैं क्योंकि वे केवल खुद की चिंता नहीं करते हैं वे बच्चे होकर भी परिवार के जीवनयापन की चिंता करते हैं।

विडम्बना यह भी है कि शिक्षा, समानता, कुपोषण और बाल मृत्यु के मुद्दे कुछ वातानुकूलित मंचों पर जरूर नजर आ जाते हैं, कुछ विचारक और शोधकर्ता काम कर रहे हैं पर कोई राजनैतिक जमावड़ा आज तक सड़कों पर नजर नहीं आया। बिना मुद्दों की राजनीति के व्यवस्था में बदलाव नही लाया जा सकता है क्योंकि राजनीति ही सरकार की प्राथमिकतायें तय करती है और यदि समाज बच्चों के मुद्दों के प्रति उदासीन है, तो राजनीति की भूमिका ज्यादा अहम हो जाती है। निसंदेह यह संकटकाल है, क्योंकि राजनीतिज्ञ केवल उन मुद्दों पर बयानबाजी करते है जो मीडिया तय करता है। अब बदलाव के सूत्र राजनीति के हाथ से फिसलते नज़र आ रहे हैं।

मुद्दों को आधार बनाकर बदलाव की पहल करने के लिये राजनीतिज्ञ होना जरूरी नहीं है बल्कि जरूरत है राजनीतिक समझ की। हमें यह जरूर जानना होगा कि व्यवस्था और समाज में बदलाव केवल व्यक्तिगत संवेदनशीलता से नहीं आ सकता है। इसके लिये तार्किक रूप से अधिकारों की बहस को खड़ा करने और बहस को आगे बढ़ाने की जरूरत है। मुद्दों और बदलाव के लिये अपनी कार्य6ौली को राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में ढालकर ही हम नीतियों और कानूनों में परिवर्तन की मांग कर सकते हैं। यदि कानून बन भी जाते हैं तो फिर उनके क्रियान्वयन के लिये जिस दबाव और सक्रियता की जरूरत है, उसके लिये भी संगठन को अपनी राजनीतिक ताकत को बार-बार सिद्ध करते रहना होगा। स्कूलाआंगनबाड़ियों और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की संख्या बढ़ाई जा सकती है, इमारतें भी नई बनेंगी पर अस्पताल और स्कूल में बच्चों के अधिकारों का संरक्षण वास्तव में हो रहा है या नहीं यह देखने के लिये हमें अधिकार आधारित नजरिये की महती आव6यकता है। जिस दिन संस्थायें और समुदाय अस्पताल और स्कूल को अपने लोकतांत्रिक मानव अधिकार संस्थाओं के रूप में पहचान लेगा उस दिन वह उसकी निगरानी ठीक अपने घर और खेत की तरह करने लगेगा; अन्यथा वे सेवा प्रदाता संस्थायें बनी रहेंगी जिनकी जवाबदेहिता समाज के प्रति नहीं होती है।

सरकार किसी जन मुद्दे के संदर्भ में अपनी नीतिगत प्राथमिकताओं का निर्धारण बजट आवंटन करके स्पष्ट करती है। बच्चों के स्वास्थ्य के संदर्भ में सेंटर फॉर बजट गर्वनेंस एण्ड अकाउण्टेबिलिटी ने बजट का वि6लेषण करके सरकार की बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति उपेक्षा को बहुत स्पष्टता से उजागर किया है। उनका अध्ययन बताता है कि मध्यप्रदेश सरकार राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का केवल 01 प्रतिशत हिस्सा बच्चों के स्वास्थ्य पर खर्च करती है और इतना कम बजट आवंटन राज्य की नीतिगत मंशाओं पर सवाल खड़े करता है। राज्य में वर्ष 2006-07 के बजट अनुमानों के मुताबिक बच्चों के लिये आवंटित होने वाले कुल बजट में से 797 फ़ीसदी शिक्षा पर व्यय होता है और मात्र 2 प्रतिशत बच्चों के स्वास्थ्य के लिये आवंटित हुआ। राज्य के आयोजना व्यय के तहत 1977-98 में बच्चों के स्वास्थ्य के लिये 383 क़रोड़ रूपये का आवंटन हुआ था जो बढ़ने के बजाये वर्ष 2006-07 के बजट अनुमानों में महज 381 क़रोड़ रूपये था। इसमें आदिवासी वर्गों के लिये आयोजना व्यय तो शून्य ही रहा है। यही कारण है कि आदिवासी समूहों में शिशु मृत्यु दर और बाल मृत्यु दर राज्य के औसत से डेढ़ गुना ज्यादा है। समग्रता में देखा जाये तो वर्ष 2005-06 के वित्तीय वर्ष में राज्य और केन्द्र सरकारों ने मिलकर देश के 248 क़रोड़ (राज्य कुल जनसंख्या का 44 फ़ीसद) बच्चों के स्वास्थ्य के लिए कुल 1568 क़रोड़ रूपये का आवंटन किया यानी एक बच्चे के स्वास्थ्य के लिये वर्ष भर में 633 रूपये का आवंटन। बात स्पष्ट है कि बच्चों के स्वास्थ्य का मुद्दा सरकारी प्राथमिकता में नहीं है। बच्चों पर हुये कुल आवंटन 46477 क़रोड़ रूपये में से महज 34 प्रतिशत यानी सबसे कम आवंटन बच्चों के स्वास्थ्य के लिए हुआ।

फिलहाल नीतिगत स्तर पर चिकित्सा के क्षेत्र को सेवा क्षेत्र में लाने और बीमा उद्योग के साथ जोड़ने की कोशिशेँ चल रही हैं। अब सत्ता में आरूढ़ कांग्रेस ने भी अपने चुनावी घोषणा पत्र में सबको स्वास्थ्य बीमा की योजना के छाते के नीचे लाने की वकालत की थी, परन्तु सवाल यह है कि बीमित परिवार को (खासतौर पर जब वह गरीब और वंचित हों) निजी अस्पतालों में प्रवेश भी मिल पाता है क्या!! अब तक के अनुभव बताते हैं कि उसे इलाज नहीं बल्कि अपमान और दुत्कार मिलती है। बीमा क्षेत्र जब एक लाभ का व्यापार क्षेत्र है जबकि स्वास्थ्य का क्षेत्र लाभ की मंशा से मुक्ति की मांग करता है। हां, स्वास्थ्य बीमा थोड़ा सफल हो सकता है यदि राष्ट्रीयकृत बीमा क्षेत्र स्वास्थ्य बीमा की जिम्मेदारी उठाने को तैयार हो तो और सरकार उसका भारवहन करे। निजी स्वास्थ्य बाजार और निजी बीमा क्षेत्र के पाट मिलकर हमारे उन 82 करोड़ परिवारों को पीसकर रख देंगे, जो अर्जुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट के मुताबिक 20 रूपये प्रतिदिन से भी कम खर्च करके जिन्दगी जीने का कर्तव्य पूरा करते हैं।

बच्चों के प्रति राज्य के बेहद असंवेदनशील होने का प्रमाण है और यह साफ नजर आता है कि बच्चों की जरूरतों और उनके जीवन के अधिकार को हमारी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था मन से महसूस कर ही नहीं पाई है।

 
     
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