कोविड19: 6 महीनों में क्यों मर सकते हैं 2.99 लाख बच्चे और 14388 महिलाएं ?

सचिन कुमार जैन

कोविड19 काल में भारत के सबसे वंचित 100 करोड़ लोगों (जिन्हें सरकार सस्ते अनाज का हकदार मान चुकी है) पर गहरा संकट छाया हुआ है, वे हैं 5 साल से कम उम्र के 19 करोड़ बच्चे बच्चे और 3 करोड़ गर्भवती-धात्री महिलाएं. तालाबंदी के 60 दिन गुज़र जाने के बाद यह साबित हो गया है कि सरकारें इनके प्रति असंवेदनशील ही हैं. इन्हें अहसास ही नहीं है कि बेरोजगार, खाद्य असुरक्षा, कुपोषण और बीमारी का बच्चों और गर्भवती-धात्री महिलाओं पर बहुत गंभीर असर पड़ता है.

द लांसेट में 12 मई 2020 को प्रकाशित अध्ययन के अनुसार कोविड का मातृत्व मृत्यु और बाल मृत्यु पर गहरा प्रभाव पड़ेगा. जान हापकिंस ब्लूमबर्ग स्कूल आफ पब्लिक हेल्थ (अमेरिका) द्वारा किए इस अध्ययन के मुताबिक़ कोविड19 के कारण जिस तरह से मातृत्व और बाल स्वास्थ्य-पोषण सेवाओं में रुकावट आई है, उससे वैश्विक स्तर पर छह महीनों में 11.57 लाख बच्चों और 56700 मातृत्व मृत्यु होने की आशंका है. इस अध्ययन में विश्व के 118 देशों में कोविड19 के दौरान मातृत्व और बाल स्वास्थ्य से जुडी 48 सेवाओं के क्रियान्वयन की स्थिति का विश्लेषण किया गया है.

अध्ययन के अनुसार भारत में छह महीनों में 3 लाख बच्चों की कुपोषण और बीमारियों के कारण और 14388 महिलाओं की मातृत्व मृत्यु हो सकती है. 13 मई 2020 से पांच दिन तक देश की वित्तमंत्री ने 20.97 लाख करोड़ रूपये का आत्मनिर्भर पैकेज जारी करती रही पर उन्होंने एक रुपये का भी आवंटन कुपोषण और मातृत्व हक़ के लिए नहीं किया.

अध्ययन बताता है कि गंभीर स्थितियों में (गंभीरता के तीसरे स्तर पर) वैश्विक स्तर पर परिवार नियोजन की सेवाओं में 39.3%, गर्भावस्था देखरेख सेवाओं में 51.9%, बच्चे के जन्म से समय की सेवाओं में 49.4%, प्रसव पश्चात देखरेख सेवाओं में 51.9%, बच्चों के टीकाकरण में 51.9%, प्रारंभिक बाल सुरक्षा/प्रेवेंटिव सेवाओं में 42.3% और बच्चों की प्रारंभिक स्वास्थ्य निरोधक/प्रिवेंटिव सेवाओं में 49.4% की कमी आ सकती है. इसके कारण दुनिया भर में छह महीनों में 11.57 लाख और एक साल में 23.13 लाख बच्चों की मृत्यु हो सकती है.

भारत की सेवाओं का अध्ययन करते हुए इस शोध पर्चे में कहा गया है कि भारत में गर्भावस्था के दौरान आयरन-फोलिक एसिड की गोलियों की महिलाओं तक पहुँच 38.8% से आधी हो कर 18.7%, टिटनेस टीकाकरण 90% से घट कर 43.3%, नवजात शिशु के तापमान में स्थिरता बनाए रखने की व्यवस्था 78% से घट कर 39.5%, गर्भनाल की सफाई 78% से घटकर 39.5%स्वच्छ प्रसव वातावरण 64.7% से घट कर 32.8% रहना संभावित है. इससे हर महीने मौजूदा संख्या से 2398 ज्यादा मातृत्व मृत्यु होने की आशंका है.

जन्म के बाद नवजात शिशु के गीले शरीर को तुरंत सुखाने और शरीर को सक्रिय करने के लिए उकसाव 72.3% से घट कर 36.6% रहना संभावित है. मातृत्व स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए अपनाई जाने वाली तकनीकों के उपयोग में भी बहुत कमी आई है. समय-पूर्व एम्नियाटिक थैली के फटने का एंटीबायोटिक उपचार 59.1% से घट कर 29.9%, इंजेक्शन या ड्रिप के द्वारा ऐंठन निरोधी दवाओं का उपयोग 70.5% से घट कर 35.5%, इंजेक्शन या ड्रिप के द्वारा एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग 59.1% से घट कर 29.9% तक आना संभावित है. नवजात शिशुओं के जीवन को सेप्सिस से बचाने एंटीबायोटिक इंजेक्शन का उपयोग 78.9% से घट कर 37.9% रह सकता है. 

बाल मृत्यु दर को कम करने में टीकाकरण महत्वपूर्ण है. इस संदर्भ में बीसीजी की टीकाकरण 92% से 44.2%, पोलियो का 89% से कम होकर 42.8%, डीपीटी 89% से घट कर 42.8%और हेपेटाईटिस का 89% से गिर कर 42.8% पर आ सकता है.  विश्व के कुपोषित बच्चों की संख्या में 21 प्रतिशत बच्चे भारत के हैं, जो बढ़ कर 31.5 प्रतिशत हो सकते हैं.

भारत में हर माह 49850 बच्चों की मृत्यु हो सकती है. यानी छह महीनों में कोविड के कारण अप्रत्यक्ष रूप से भारत में लगभग 2.99 लाख बच्चों की मृत्यु होने की आशंका है. 

 

जरूरी उपचार और सेवाएँ

बेस लाइन कवरेज % में

एंड लाइन कवरेज % में

सुरक्षित गर्भपात सेवाएँ

35.1

21.3

टिटनेस टीकाकरण

90

43.3

सिफलिस (संक्रामक यौन रोग की पहचान और उपचार

19.7

9.5

गर्भावस्था के दौरान लौह तत्व-आईऍफ़ए पूरकता  

38.8

18.7

उच्च रक्तचाप विकार की स्थिति का प्रबंधन

12.2

5.9

मधुमेह प्रकरण का प्रबंधन

9.5

4.6

मलेरिया प्रकरण का प्रबंधन

39.3

18.9

गर्भाक्षेप/प्री-एक्लेम्पसिया में मैग्नीशियम सल्फेट प्रबंधन

24.1

11.6

थर्मल संरक्षण

78

39.5

गर्भनाल स्वच्छता प्रबंधन 

75.3

38.1

स्वच्छ प्रसव वातावरण

64.7

32.8

प्रसव के बाद तत्काल सुखाना और सक्रियता के लिए अतिरिक्त उकसाव

72.3

36.6

नवजात पुनर्जीवन

43.4

22

प्रसव पूर्व/समय से पहले झिल्लियों के फटने पर एंटीबायोटिक उपचार 

59.1

29.9

इंजेक्शन या ड्रिप के द्वारा ऐंठन निरोधी उपचार

56.4

28.6

इंजेक्शन या ड्रिप के द्वारा गर्भाशय के लचीलेपन की दवा दी जाना

70.5

35.7

इंजेक्शन या ड्रिप के द्वारा एन्टीबायोटिक दवायें दी जाना

59.1

29.9

उपकरणों (जैसे फोर्सेप) की मदद से यौनिक प्रसव

20

10.1

हाथ से नाल/प्लेसेंटा अलग करना

29.5

14.9

अल्प शल्य चिकित्सा के द्वारा गर्भाशय में से शेष बचे हुए ऊतक अलग करना

26.2

13.3

सिजेरियन प्रसव

6.9

3.5

रक्त चढ़ाना

9.9

5

41 सप्ताह से ज्यादा की गर्भावस्था में प्रसव के लिए गर्भाशय की सिकुड़न प्रेरित करना

1.4

0.7

ऊपरी आहार - केवल शिक्षा

22

12.7

ऊपरी आहार - पूरक पोषण आहार एवं  शिक्षा

22

12.7

विटामिन-ए दिया जाना

71

41

स्वच्छता व्यवस्था - शौचालय का उपयोग

59.5

59.5

पानी के उन्नत/बेहतर स्रोत

92.7

92.7

घर में पानी का स्रोत/नल

40.5

40.5

साबुन से हाथ धोया जाना

67.6

67.6

बच्चों के मल का उचित निपटान

26

26

नवजात सेप्सिस में एंटी बायोटिक इंजेक्शन

78.9

37.9

ओ आर एस

50.6

25.6

पेचिश उपचार के लिए एंटी बायोटिक

21.8

11

डायरिया के उपचार के लिए जिंक

20.3

10.3

निमोनिया के उपचार के लिए खाने वाली एंटीबायोटिक

78.1

39.5

खसरे के उपचार के लिए विटामिन ए

71

35.9

आर्टेमिसिनिन से मलेरिया का उपचार

1.6

0.8

बीसीजी का टीका

92

44.2

पोलियो का टीका

89

42.8

डीपीटी का टीका

89

42.8

एच1 का टीका

89

74.2

हेपेटाईटिस-बी का टीका

89

42.8

न्यूमोकोकल का टीका

6

5

रोटावायरस का टीका

35

29.6

खसरे का टीका

90

43.3

वैश्विक वास्टिंग/अपक्षय कुपोषण की दर (<2एसडी)

21

31.5

गर्भनिरोध उपयोग दर

56.65

34.4

 

भारत की मैदानी स्थिति -  भारत में जमीनी स्थितियां अध्ययन के निष्कर्षों से ज्यादा गंभीर हैं. मार्च से भारत में एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम के तहत पूरक पोषण आहार को छोड़कर संचालित सेवाओं को निलंबित कर दिया है. राजस्थान में 26 लाख बच्चों के लिए चना या मूंग या मोठ, गेहूं का दलिया, चावल, स्किम्ड दूध पाउडर, आदि सूखे राशन का 3750 ग्राम का पैकेट 25 दिन के लिए दिया जा रहा है. जबकि गर्भवती और धात्री महिलाओं के लिए 6 किलो का मिश्रित सूखा राशन दिया जा रहा है. अति गंभीर कुपोषित बच्चों को 250 ग्राम स्किम्ड दूध पाउडर और आधा किलो चीनी अलग से दी जा रही है.

मध्यप्रदेश में भुने गेहूं-चना दाल-शकर के सत्तू या लड्डू चूरे का प्रावधान किया गया. बच्चों के लिए 200 ग्राम प्रतिदिन और गर्भवती-धात्री महिलाओं के लिए 250 ग्राम प्रतिदिन (हफ्ते में 6 दिन) का प्रावधान किया गया. दोनों ही राज्यों ने महिला समूहों या आंगनवाडी मातृ-बाल विकास समिति की भूमिका को आखिरकार महत्वपूर्ण माना, केंद्रीयकृत व्यवस्था आपूर्ति में नाकाम हो गयी.  टीकाकरण और ग्राम स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता दिवस के आयोजन बंद हो गए हैं. वृद्धि निगरानी का काम भी रुक गया. इससे यह पता चल पाना असंभव हो गया कि बच्चों की वृद्धि पर कोई गहरा असर तो नहीं पड़ रहा है.

वक्त की जरूरत है सम्पूर्ण पोषण आहार कार्यक्रम –

कोविड से जूझने के लिए प्रतिरोधक क्षमता मज़बूत होना जरूरी है, किन्तु पोषण से क्षमता मज़बूत होती है. अपेक्षा थी कि सरकारें इन बच्चों और गर्भवती-धात्री महिलाओं को महत्व देंगी, किन्तु ऐसा हुआ नहीं. बच्चों और महिलाओं को बचाने के लिए “पूरक पोषण आहार कार्यक्रम” को “सम्पूर्ण पोषण आहार कार्यक्रम” में बदले जाने की जरूरत थी. किन्तु सरकार ने यह महसूस ही नहीं किया कि कुपोषण का स्तर बीस साल पुराने स्तर तक पहुँच सकता है.

बेरोज़गारी और भूख -

सीएमआईई के मुताबिक़ फ़रवरी’20 में बेरोजगारी दर 7.76 से बढ़कर अप्रैल’20 में 23.52 प्रतिशत हो गयी. शहरी बेरोज़गारी 8.05 से बढ़कर 24.95 प्रतिशत और ग्रामीण बेरोज़गारी 7.34 से बढ़कर 22.89 प्रतिशत हो गयी. मई में भी बढना जारी है. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के हवाले से दर्ज जानकारी के मुताबिक वर्ष 2019 में भारत में 49.43 करोड़ श्रमशील या कामकाजी लोग थे. इसका मतलब यह है कि मई 2020 की स्थिति में भारत में 11.62 करोड़ लोग बेरोजगार हैं.

बेरोज़गारी परिवार में खाद्य असुरक्षा की स्थिति लाती है. अतः समग्र पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करना जनकल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी है.

सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत दर्ज लोगों को तीन माह का अतिरिक्त अनाज दिए जाने और फिर निःशुल्क अनाज दिए जाने की घोषणा की. लेकिन 5 किलो गेहूं और चावल से कुपोषण को बढ़ने से नहीं रोका जा सकेगा, यह बात भी नज़रंदाज़ की गयी. यह अध्ययन प्रमाण दे रहा है कि भारत की महिलायें और बच्चे संकट में हैं?

सरकार ने 20.97 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक पैकेज जारी किया. पैकेज के ये बिंदु बताएँगे कि वास्तव में वंचित परिवारों को प्रत्यक्ष रूप से क्या हासिल हो सकता है –

  • 80 करोड़ लोगों को 5 किलो अनाज तीन महीने तक. इसके लिए लगभग 24 हज़ार करोड़ रुपये खर्च करेगे.
  • 80 करोड़ लोगों को 1 किलो दाल तीन महीने तक. इसके लिए 12000 करोड़ रुपये खर्च करेगी.
  • 8 करोड़ प्रवासी मजदूरों को दो महीने अनाज और दाल मिलेगी. इसके लिए 3500 करोड़ रुपये का प्रावधान है.
  • 7 करोड़ किसानों को 2000 रुपये की किसान निधि दी गयी. इसके लिए पहले से योजना में रखे हुए 17400 करोड़ दिए.
  • 20 करोड़ महिलाओं के जनधन खाते में तीन महीने तक 500 रुपये की जमा. इसके लिए 30000 करोड़ रुपये का प्रावधान.
  • 8 करोड़ परिवारों को तीन माह तक निःशुल्क गैस सिलेंडर. आज की स्थिति में भारत सरकार पर गैस सब्सिडी का कोई बोझ नहीं है. इस प्रावधान में लगभग 14664 करोड़ रुपये खर्च करेगी.
  • मनरेगा में दर्ज 13.82 करोड़ मजदूरों के लिए कुल 1.015 लाख करोड़ रूपये का प्रावधान. पहले से वर्ष 2020-21 के लिए प्रावधान था 61.5 हज़ार करोड़ रूपये का और आत्मनिर्भर भारत में जोड़े गए 40 हज़ार करोड़ रूपये. कुल आवंटन में से लगभग 40 प्रतिशत भाग सामग्री और प्रशासन का होता है. इस मान से 1.015 लाख करोड़ रुपये में से मजदूरी के लिए 61 हज़ार करोड़ रूपये ही उपलब्ध होंगे. कुल 300 करोड़ मानव दिवस रोज़गार सृजित करेंगे, जबकि वर्ष 2019-20 में 265 करोड़ मानव दिवस रोज़गार सृजित किया गया था. इस मान से एक जाबकार्ड धारी परिवार को औसतन 22 दिन का रोज़गार और 4444 रूपये की मजदूरी हासिल होगी. यदि मान लिया जाए कि इस बार सरकार 80 प्रतिशत राशि मजदूरी पर व्यय करेगी, तब भी एक परिवार को 29 दिन का काम और 5788 रूपये रूपये की मजदूरी हासिल हो पाएगी.
  • 3 करोड़ गरीब नागरिकों, विधवा महिलाओं और दिव्यान्गों के लिए 1000 रूपये की एकमुश्त सहायता यानी 3000 करोड़ रूपये की प्रत्यक्ष सहायता.
  • लोक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए 15000 करोड़ रूपये.

15 करोड़ परिवारों के सामने रोज़गार, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा की समस्या से निपटने के लिए 20.97 लाख करोड़ रूपये की आत्मनिर्भर पैकेज में 1.60 लाख करोड़ रूपये का नया आवंटन दिखाई देता है. यानी एक परिवार को 10666 रूपये की प्रत्यक्ष सहायता हासिल हुई है. 

असंगठित क्षेत्र में कार्यरत और गृह प्रबंधन में जुटी हुई महिलाओं को मातृत्व हक़ नहीं मिलता है. इस वर्ष प्रधानमन्त्री मातृत्व वंदना योजना के तहत 2.4 करोड़ महिलाओं के लिए केवल 2500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था, 60 लाख महिलाओं को लाभ दिया गया और बाकी को शर्तों के माध्यम से वंचित कर दिया गया. इन 60 दिनों में भारत में लगभग 39 लाख बच्चों का जन्म हुआ है, यानी कुल 78 लाख नागरिक जरूरतमंद रहे हैं. इस विशाल आर्थिक पैकेज में न तो 2.5 करोड़ गर्भवती-धात्री महिलाओं के लिए एक रुपये का आवंटन हुआ, न ही आंगनवाडी जा रहे 10 करोड़ बच्चों के लिए पोषण आहार का.

क्या सरकार बच्चों और महिलाओं को भूखे-कमज़ोर रखकर भारत को आत्मनिर्भर बना सकती है?   

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