मध्यप्रदेश में एड्स एवं एच.आई.वी. पॉजिटिव मरीजों की बढ़ती संख्या एक चिंतनीय पहलू तो है ही, साथ ही प्रदेश में एड्स पीड़ित परिवारों की उपेक्षा भी चिंता का सबब बन चुका है। एड्स पीड़ित परिवारों की सामाजिक उपेक्षा की घटनाएं लगातार सुर्खियों में आती है पर प्रदेश में ऐसे परिवार प्रशासनिक उपेक्षा के भी शिकार हैं। सीहोर जिले के आष्टा विकासखंड के पगारियाचोर गांव में पिछले साल एड्स से पांच व्यक्तियों की मौत हो गई थी। घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग ने स्वास्थ्य शिविर लगाया था और प्रशासन ने जागरूकता लाने के लिए मध्यप्रदेश एड्स नियंत्रण समिति के सहयोग से प्रचार-प्रसार कर जागरूकता लाने की योजना बनाई थी। शुरुआत में तो ऐसा किया गया पर कुछ ही दिनों बाद यह न केवल यह क्षेत्र बल्कि भुक्तभोगी परिवार भी उपेक्षा के शिकार हो गए। हालत यह है कि इस एड्स के कारण इस गांव के चर्चा में आ जाने के कारण अन्य गांवों के लोग इस गांव में शादी-ब्याह करने से भी कतराते हैं।
एड्स पीड़ित परिवार के सदस्यों से बातचीत करने से पता चला कि उनके परिवार के कमाऊ सदस्य की मौत के बाद वे बदहाली में जीवनयापन कर रहे हैं। विधवा महिलाओं को विधवा पेंशन भी नहीं मिल रहा है। मजदूरी पर आश्रित इन परिवारों को ग्रामीणों का सहयोग तो है, पर सरकार की ओर से इन्हें कोई मदद नहीं मिली है। एड्स के कारण अपने पति को गवां चुकी दलित समुदाय की एक विधवा ने बताया कि उसके तीन बच्चे हैं और वह मजदूरी करके किसी तरह उनका पालन-पोषण करती है। वह सातवीं तक पढ़ी है। उसने आंगनवाड़ी सहायिका के लिए आवेदन दिया था पर उसे काम पर नहीं रखा गया। गांव के स्कूल में मध्यान्ह भोजन योजना में रसोइयां के लिए भी उसने आवेदन दिया था, पर यहां भी उसकी अनदेखी की गई। गांव की शाला में भोजन बनाने के लिए अन्य गांव की एक महिला आती है। उसके पास अंत्योदय उपचार योजना का कार्ड होने के बावजूद अस्पताल से उसे नि:शुल्क दवाइयां नहीं मिलती। उसे बाहर से दवाइयां खरीदनी पड़ती है। गांव के अन्य एड्स प्रभावितों परिवारों के भी कमोबेश यही हाल हैं।
ऐसे परिवारों को उपेक्षित छोड़ने के बजाय उन्हें मुख्यधारा में लाने के लगातार प्रयास करने, स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने और उनकी आजीविका के लिए स्थाई व्यवस्था करने की जरूरत है पर ऐसे मामले में अधिकांशत: बच्चे और महिलाओं के प्रभावित होने के बावजूद उन्हें उपेक्षित जीवनयापन करना पड़ रहा है। जन स्वास्थ्य अभियान के राज्य समन्वयक डॉ. अजय खरे का कहना है कि एड्स की रोकथाम के लिए किए जाने वाले उपायों को आमजन तक पहुंचाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की व्यवस्था करना है। एड्स पीड़ित परिवार के बच्चे एवं महिलाएं दूसरों की गलतियों का खामियाजा भुगत कर समाज से बहिष्कृत न होने पाए, इस पर ज्यादा जोर देने की जरूरत है।
उल्लेखनीय है कि जिन लोगों की मौत हुई थी, वे ट्रक ड्राइवर थे। लगभग दो हजार की आबादी वाले इस गांव में आज भी कई लोग ट्रक ड्राइवर हैं, इसलिए इस गांव में नियमित जांच शिविर की आवश्यकता थी, पर ऐसा नहीं किया जा रहा है। यद्यपि गांव के ही एक युवा ने बताया कि वह भी ट्रक चलाता है पर गांव में एड्स से हुई मौत के बाद लोगों में जागरूकता आई है और वे गलत कार्य नहीं करते। पिछले साल इस गांव में जब एड्स से लगातार मौत हुई थी तब स्वास्थ्य शिविर लगाया गया था और कई लोगों के रक्त के नमूनों की जांच की गई थी। ग्रामीणों का कहना है कि कुछ लोगों को उनकी जांच रिपोर्ट नहीं दी गई थी। यदि इस गांव में कोई व्यक्ति संक्रमित है, तो उसकी निगरानी किए जाने की जरूरत है पर ऐसा नहीं हो रहा है। प्रदेश में पिछले साल तक 2012 एड्स के मरीजों की पहचान की गई थी पर इस साल सितंबर तक ही एड्स के मरीजों की संख्या 2428 तक पहुंच गई है। कुल मरीजों में इस साल चिन्हित किए गए मरीजों की संख्या लगभग 17 प्रतिशत है। इसलिए ऐसे क्षेत्रों में लगातार शिविर लगाकर लोगों के रक्त नमूनों की जांच करते रहने की जरूरत है।
राजु कुमार |