PovertyMedia and Rights Food Security Livelihood Disability Women Rights Globalisation Health Social Exclusion Education Child Rights Environment Right to Information and Governance

 

     
 
| Print this Page
 
     
  YOU ARE HERE: Home > Health > Swasthya Ke Adhikar Ke Liye Aadivasiyon Ka Sangharsh  
     
 

स्वास्थ्य के अधिकार के लिये आदिवासियों का संघर्ष

 
     
 

बड़वानी जिले के पाटी विकासखण्ड के गुपाटीवाड़ी गांव के गुछिया आदिवासी के जीवन में 22 मई को सरकारी अस्पताल में आने का यह बिल्कुल अलग अनुभव था। वह पिछले 3 महीनों से अपने पेट दर्द की समस्या को लेकर यहां के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में इलाज के लिये आ रहा था। पर हर मर्तबा उसकी आधी बात सुनकर और बिना हाथ लगाये, बिना जांचे-परखे कागज पर दवा लिख कर दे दी जाती थी। इस सरकारी अस्पताल से गुछिया को कभी दवा नहीं मिली, हर बार बाजार से दवा खरीदने को कहा गया जिसमें उसके 1250 रूपये खर्च हुये पर इस बार इसी सरकारी अस्पताल में उसकी जांच हुई, दवा भी मिली और डॉक्टर ने यह भी बताया कि कब, कौन सी दवा कैसे उपयोग में लाना है। गुछिया कहता है कि ऐसा व्यवहार हमेषा हो तो कितना अच्छा होगा? पिछले तीन माह के पर्चों के विश्‍लेषण से पता चला कि गुछिया को पेट दर्द के बजाये कभी जोड़ों (हड्डी) के दर्द की दवा दी जाती रही, तो कभी स्केबीज की। ऐसे में उसका पेटदर्द कैसे ठीक होता? उनके इलाज में स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी करने के सामाजिक निर्णय ने अहम् भूमिका निभाई है। गुछिया केवल अकेला एक व्यक्ति नहीं है जो बीमारी के अलावा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के अमानवीय व्यवहार का दर्द भी भोग रहा है बल्कि पाटी विकासखण्ड में इस अस्पताल में आने वाला हर व्यक्ति इस पीड़ा का गवाह बना है। परन्तु 19 मई 2008 को इस इलाके के 1500 लोगों ने, जिनमें से ज्यादातर ग्राम स्वास्थ्य समितियों के सदस्य हैं, पाटी सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र को सीधे अपने निगरानी तंत्र के दायरे में ले लिया। अब हर रोज यहां लोग देखने आते हैं कि सब ठीक चल रहा है या नही?

जन दबाव अंतत: बदलाव लेकर आता है, यह सिध्द हो गया। चार दिनों के संघर्ष के बाद प्रषासन को समुदाय के साथ एक खुले समझौते पर हस्ताक्षर करना पड़े कि हर गांव में जननी एक्सप्रेस और एम्बुलेन्स जायेंगी; मरीजों को कोई भी जाँच बाहर से करवाने और दवायें भी बाहर से खरीदने को नहीं कहा जायेगा जरूरत पड़ने पर दवाओं की स्थानीय खरीदी होगी और स्टाफ़ बढ़ाया जायेगा। अपने किस्म का यह अनूठा समझौता दस्तावेज पाटी समुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में चस्पा है। यह समझौता सरकार न तोड़ने पाये इसके लिये हर रोज दो ग्रामीण, गरीबी के बावजूद नियमित रूप से सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र की स्वैच्छिक निगरानी करेंगे। कंडरा गांव के रमेश गंगाराम कहते हैं कि निजी चिकित्सक ग्लूकोज की एक बोतल के लिए ढाई सौ रूपये और इंजेक्शन के लिये 50 रूपये ले लेते हैं, यह हजारों के कर्ज का बड़ा कारण है। ऐसे में दो दिन बिना मजदूरी के निगरानीकर्ता बनना समाज के लिए ज्यादा बेहतर है। यूं तो निगरानी और सामुदायिक सहभागिता का मुहावरा सरकारी कार्यक्रमों में लगातार कहा और सुना जाता रहा है किन्तु पिछले एक वर्ष से पाटी में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत् सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को दुरूस्त करने एवं उपयोगी बनाने के लिये साथी सेहत  और जागृत दलित आदिवासी  संगठन ने 15 आदिवासी गांवों में 200 व्यक्तियों आशा और सामुदायिक समूहों के सदस्यों को लगातार प्रशिक्षण देकर तैयार करने का काम किया।

'जागृत दलित आदिवासी संगठन' की माधुरी कृष्णास्वामी कहती हैं कि यह कोई आदर्श नवाचार नहीं है बल्कि अब नयापन इस बात में है कि लोग केवल विरोध या बुराई नहीं कर रहे हैं बल्कि अपनी इच्छा को जाहिर भी कर रहे हैं। पाटी में संगठन और साथी सेहत 'जन स्वास्थ्य सूचना संदर्भ केन्द्र' भी चलाते हुये स्वास्थ्य सुविधाओं के अधिकार के हनन् के खिलाफ सूचनाओं को हथियार बनाकर लड़ रहे हैं।

इसके साथ ही सामुदायिक निगरानी समूह के लोग पाटी में प्रेक्टिस करने वाले निजी डॉक्टरों के पास भी संगठित रूप से गये। सामाजिक कार्यकर्ता संत कुमार महतो बताते हैं कि निजी चिकित्सक के पास जाने वाले हर मरीज को इंजेक्शन और ग्लूकोज़ की बोतल जरूर लगाई जाती है, फिर चाहे वह जरूरी हो या नहीं। इतना ही नहीं, ज्यादातर के पास तो एलौपैथी की दवायें लिखने के लिये आवश्‍यक डिग्री और अनुमति भी नहीं है। संगठन का दल स्थानीय आदिवासी भाषा में लगातार नारे लगाते रहे - ''सादी होवे बीमारी, नहीं लगे पिचकारी'' (इंजेक्शन) और ''सलाईन बाटली में काय छे, नून, शक्कर और पानी छे'' !!

सेहत (पुणे) के डॉक्टर अभय शुक्ला कहते हैं कि यह बदलाव के लिये चलाई गई बहुआयामी प्रक्रिया है। 25 से 30 लोगों का समूह 10 से ज्यादा निजी चिकित्सकों के पास गया और हर एक से उनकी डिग्री दिखाने का निवेदन किया। हर डॉक्टर इंजेक्शन और ग्लूकोज़ की बाटल सलाईन के पर्चे लिख रहा था पर इनमें से केवल एक डॉक्टर के पास आधुनिक दवायें देने की पात्रता थी। अन्य सभी डॉक्टरों में एक प्राकृतिक चिकित्सक, एक होम्योपैथी चिकित्सक, एक बिना डिग्री के दंत चिकित्सक, एक पूर्व कम्पाउण्डर और एक जनस्वास्थ्य रक्षक था। तब आदिवासी निरीक्षक कार्यकर्ताओं ने उन्हें समझाया कि भविष्‍य  में वे अनाधिकृत चिकित्सा कार्य न करें और तब हर तथाकथित डॉक्टर आदिवासियों के सामने गिड़गिड़ाता नजर आया।

इस सामुदायिक निगरानी व्यवस्था के परिणाम स्वरूप सरकारी स्वास्थ्य केन्द्र के कोने-कोने में व्याप्त अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के विभिन्न रूप सामने आये हैं। बमनाली गांव के निगरानी समूह के सहयोगी कुटवाल आदिवासी को प्रशिक्षण के बाद पता चला था कि एक सुई (सिरींज) से एक व्यक्ति को ही इंजेक्शन लगना चाहिये पर जब वे चुपचाप पहले दिन नर्स का काम देख रहे थे तो उन्हें पता चला कि उसने एक सुई से 10 लोगों को इंजेक्शन लगाया। तब उन्होंने विकासखण्ड चिकित्सा अधिकारी से बात की और संगठन ने भी अस्पताल को चेतावानी दी। रिकार्ड से पता चलता है कि पहले भी हर रोज 50 सिरींज का उपयोग होना दर्शाया जाता रहा है पर वास्तव में 1 या 2 सिरींज का उपयोग होता रहा।

विकासखण्ड चिकित्सा अधिकारी डॉ. ओ.पी. कदम आसानी से कहते हैं कि यह पाँच स्वीकृत पदों पर तीन ही डॉक्टर है, और हम भी विशेषज्ञ नहीं है इसलिये बीमारी के विश्लेषण (डायग्नोसिस) में हेरफेर हो सकता है। वे बताते हैं कि पहले 250 से 300 मरीज अस्पताल में आते थे पर पिछले तीन दिनों से 700 मरीज आने लगे हैं, ऐसे में हम हर एक को कितना समय दें? सही इलाज न मिलने के दावे के सम्बन्ध में उनका तर्क है कि हमें मांगने पर 10 डिब्बे दवा तो मिल जाती है पर उसमें से आधी हमारे काम की नहीं होती है; खासतौर पर ज्यादा शक्ति की एण्टी-बायोटिक और हायड्रो कार्डिसोन जैसी कई जरूरी दवायें (हृदय रोग की दवा) मिलती ही नहीं है। इस इलाके में बच्चें में निमोनिया और ब्रोन्काईटिस के सबसे ज्यादा प्रकरण सामने आते हैं। हर रोज 10 से 20 बच्चे ऐसे आते हैं पर उन्हें काम्बीनेशन सिरप नहीं मिलता; ऐसे में हमें ये मंहगी दवायें बाहर से खरीदने के लिये कहना पड़ता है। जन स्वास्थ्य अभियान के अध्ययन के मुताबिक पाटी के 74 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं पर फिर भी अब तक यहां पोषण पुनर्वास केन्द्र नहीं खोला गया है। यहां एक वर्ष से कम उम्र के 1708 बच्चों की मौत रिकार्ड में दर्ज है। साथी सेहत के संत कुमार के मुताबिक यह आंकड़ा वास्तव में इससे कहीं ज्यादा है।

समुदाय का यह समूह अस्पताल के प्रांगण में हर रोज सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक (जब मरीजो को देखा जाता है) मौजूद रहा और संगठन से जुड़े दो चिकित्सक यह जांचने में उनकी मदद कर रहे हैं मरीजों को अस्पताल में सही इलाज दिया जा रहा है या नहीं। लालू आदिवासी छह साल के अपने बच्चे को अस्पताल में दिखाने के बाद निगरानी समूह के चिकित्सक डा. नितिन जाधव के पास आये और तब पता चला कि उसके बच्चे को दस्त के बजाये खुजली की दवा दी गई है। इसके बाद निगरानी समूह के सदस्यों ने लालू के साथ जाकर इलाज ठीक करवाया इसी तरह रिनवाड़ा की समाबाई के पर्चे पर तीन दवायें लिखी गई जिनमें से 2 बाजार से खरीदने के लिये कहा गया; जबकि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के नियमों के अनुसार उसे हर दवा अस्पताल से ही मिलना चाहिये। इस निगरानी व्यवस्था को सक्रिय बनाने वाले जागृत आदिवासी दलित संगठन की माधुरी बहन बताती हैं कि इस अस्पताल का यह रोज का मामला है जब दवायें मरीज को निजी दुकानों से खरीदना पड़ती हैं और खून, बलगम एवं पेशाव की जांच के लिये भी उन्हें बाहर ही भेजा जाता है। अस्पताल प्रशासन में सफाई कर्मी से लेकर डॉक्टर तक का व्यवहार बहुत खराब होता है और सरकारी चिकित्सक मरीजों को निजी अस्पताल में जाने के लिये मजबूर करते हैं। वह बताती हैं कि आज सरकारी स्वास्थ्य केन्द्र का सही संचालन न होने के कारण पांच में से चार आदिवासी परिवार कर्ज के जाल में फंसे हैं क्योंकि उन्हें बीमारियों पर हर वर्ष पांच से पंद्रह हजार रूपये खर्च करना पड़ते है। रणनीतिक तौर-तरीकों से निजी स्वास्थ्य व्यापार को बढ़ावा देने के लिये सार्वजनिक स्वास्थ्य केन्द्रों में गंदगी फैलाई जाती है, दुर्व्‍यवहार किया जाता है तथा गलत दवायें दी जाती हैं। सरकार, दवाओं के व्यापारी और निजी चिकित्सक चाहते हैं कि लोग निजी अस्पताल में जायें। पाटी में ही तीन दवा विक्रेताओं के साथ सरकारी स्वास्थ्य प्रशासन की साठ-गांठ है। तभी आंवली गांव के भुकल्ले आदिवासी वहां पहुंचे। वह स्केबिज (खुजली) से पीड़ित थे परन्तु उन्हें खांसी की दवा दी गई और स्केबिज की दवा बाहर से खरीदने को कहा गया; संगठन ने फिर सवाल-जवाब किये तो भुकल्ले को दवा मिली। सावरियापानी के कालूसिंह आदिवासी को यहां आकर पता चला कि जननी एक्सप्रेस नाम की कोई सरकारी योजना भी है पर उसे गांव में अभी किसी ने देखा ही नहीं। विकासखण्ड चिकित्सा अधिकारी कहते हैं कि हमें कभी जरूरत नहीं पड़ी इसलिये एक्सप्रेस वाहन तैयार ही नहीं किया गया। बंडगांव की आषा कार्यकर्ता दुनाबाई कहती हैं कि गर्भवती महिलाओं के नाम पर सरकार ने खूब कागज और दीवारें रंगी हैं, नेताओं के फोटो छपे हैं पर पाटी अस्पताल में तो केवल कालिख ही छाई हुई है। यहां अमानवीयता की हदें पार होती दिखती हैं। सावरियापानी की झिंगली आदिवासी प्रसव के लिये जब अस्पताल आ रही थी तब पैदल आते हुये जंगल की पगडण्डी पर ही उसे बच्चे को जन्म देना पड़ा। इसके बाद उसे जब अस्पताल लाया गया तो झिंगली को भर्ती करने से यह कहकर मना कर दिया गया है कि तुम जननी सुरक्षा योजना के 1400 रूपये के लालच में आये हो, तुम्हारी डिलेवरी अस्पताल में नहीं हुई है इसलिये अब भर्ती नहीं किया जायेगा। झिंगली दर्द से कराह रही थी और जब विकासखण्ड चिकित्सा अधिकारी पर यह दबाव बनाया गया तो उसने एक शर्त पर भर्ती करने की बात की कि जाओ और आंवल (प्लेसेन्टा) लेकर आओ तभी हम मानेंगे कि प्रसव रास्ते में हुआ है। अस्पताल पहुंचने के आठ घंटे बाद उसे भर्ती कराया जा सका। निगरानी समूह के रोगी परामर्श केन्द्र पर स्वैच्छिक सेवाएं दे रहे डॉ. नितिन जाधव कहते हैं कि यहां तो स्टैथोस्कोप का उपयोग ही नहीं किया जाता, मलेरिया के मामलों में सामान्य एण्टीबायोटिक दवा दी जाती है और गर्भवती महिलाओं की प्रसव पूर्व जांच नहीं होती है। जब हमने जाँच करना शुरू किया तो पता चला कि अगस्त 2007 के बाद से दवायें नहीं मंगवाई गई हैं, यहां तक कि क्लोरोक्विन (मलेरिया की दवा) भी नहीं है, वजन मशीन एएनएम के घर रखी हुई थी और ब्लड प्रेशर यंत्र का उपयोग नहीं होता है। इन परिस्थितियों में यह पाया गया कि 80 फीसदी गर्भवती महिलाओं में हीमोग्लोबिन का स्तर 5 ग्राम के आस-पास है पर फिर भी उन्हें अस्पताल से आयरन-फोलिक ऐसिड (आईएफए) की गोलियाँ नहीं दी जाती हैं। निगरानी समिति के सदस्य वालसिंह बताते हैं कि 8 मई को अस्पताल के पीछे तीन बक्से दवायें जलाई गई और इसके उनके पास प्रमाण हैं। इसमें से एक बक्सा आईएफए गोलियों का था।

मसला कुछ मरीजों की केवल शिकायत का नहीं है बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं के तंत्र और ढांचे का भी है। 110 गांवों को स्वास्थ्य सेवा देने के लिये स्थापित इस केन्द्र में प्रसव टेबल नहीं है, लेबर कक्ष और स्त्री रोग विशेषज्ञ की तो कल्पना भी नहीं की जानी चाहिये। यहां फरवरी से मई 08 तक 7 प्रसव कराये गये हैं वह भी मेकिंग टेबल बिछाकर। भारत सरकार के प्रावधानों को यहां तार-तार होते हुये देखा जा सकता है। सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में 30 पलंग होने चाहिये पर यहां मात्र 6 पलंग हैं वह भी केन्द्र के बाहर आंगन में मौजूद हैं। 45 डिग्री के झुलसाते तापमान में कपड़े लटकाकर लू और धूप को गर्भवती महिलाओं तक आने से रोकने की कोशिश की जा रही है। इस अस्पताल में चार में से तीन विशेषज्ञों के पद खाली हैं। इतना ही नहीं इससे जुड़े रोशन प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र को कम्पाउण्डर, गेदाबल केन्द्र को नर्स और करवड़ केन्द्र का संचालन ड्रेसर करा रहे हैं। यहां कोई डॉक्टर नहीं है। स्वास्थ्य के अधिकार पर कार्यरत राष्ट्रीय संस्था सेहत (पुणे) के डॉ. अभय शुक्ला बताते हैं कि पाटी में टीकाकरण बेहद खराब हालत में है, पूर्ण टीकाकरण तो 10 फीसदी से भी कम है किन्तु सरकारी कागज कुछ और ही तस्वीर बयां कर रहे हैं। यहां 88 प्रतिशत बच्चों को खसरे की दवा दी गई, 123.6 प्रतिशत बच्चे आयरन की दवा ले चुके हैं, गर्भवती महिलाओं में यह उपलब्धि 129.4 प्रतिशत है जबकि सामाज की निगरानी समिति ने देखा है कि आयरन फोलिक एसिड की गोलियों के बक्सों को आग के हवाले किया जाता है। परन्तु अब लक्ष्य यह है कि लोगों को अस्पताल में दर्द के इलाज का विश्वास हो और वे मानें कि सरकारी स्वास्थ्य कर्मचारी उनके दर्द को बेच कर धन कमाने का काम नहीं करेंगे। माधुरी बहन कहती हैं कि हमारा मकसद सरकारी स्वास्थ्य सेवा आचार संहिता और राष्ट्रवादी ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के प्रावधानों को धरातल पर उतारना है, आदिवासी संगठन ऐसा कुछ नहीं कर रहा है जो नियमों के दायरे के बाहर हो। बहरहाल अनुभव यह बताता है कि सरकारी ढांचे को समाज की निगरानी बर्दाश्त नहीं हो रही है। अत: स्वाभाविक है कि इन नियमो के क्रियान्वयन के लिये हमें हर स्तर पर कठिन संघर्ष करते रहना हा्रेगा।

सचिन कुमार जैन

 
     
  Next Article  
  Health Main Page  
  Health Archives