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  सरकारी दायरों से बाहर की दुनिया  
     
 

राष्ट्री य परिवार स्वायस्य्ि सर्वेक्षण; एन.एफ.एच.एस.-3) एक बार फिर हाजिर है। वैसे तो सरकारी आंकड़ों की विश्ववसनीयता हमेशा ही संदिग्ध रहती है, लेकिन उसके बाद भी जो आंकड़े सामने आए हैं, वह बेहद भयावह ,सामाजिक भेदभाव, विषमता और शहरी-ग्रामीण भारत की कड़वी सच्चाई को बयान करने वाले हैं। तस्वीर एकदम साफ है, महिलाएं, बच्चे। विशेषकर गांव सरकारी चिंताओं के दायरे में नहीं हैं। पहले तो सरकार ने खुद से ही स्वास्थ्य सेवाओं को इतना बेजार हो जाने दिया कि जनता शिकवा करें, निजीकरण की मागा मिले और स्वास्थ्य सेवाओं को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अनुकूल बनाया जा सके, आंशिक रूप से ऐसा किया जा चुका है, अब जबकि आंसे सर्वे बहुत हद तक अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। चूंकि सरकार अपने सिवा किसी और कि रिपोर्ट को महत्व नहीं देती है। ऐसे में यह रिपोर्ट सिर्फ एक उपकरण का ही काम कर सकती है जो यह बता रहा है कि जनता की सेहत से किस तरह खिलवाड़ किया जा रहा है।

एनएफएचएस- तीन के अनुसार मप्र, उप्र, बिहार और उड़ीसा की 79 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से ग्रस्त हैं। तो दूसरी ओर नवजात बच्चों की दशा भी अत्यंत बदतर है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में प्रतिहजार बच्चों पर 70 नवजातों की मौत हो रही है। जबकि देसत के अनुसार मप्र, उड़ीसा में नवजात बच्चों की मृत्यु दर 57 है। जाहिर है, बड़ी संख्या में महिलाओं को आंगनबाड़ी जैसे सामुदायिक केंद्रों की सुविधा नहीं मिल पा रही है। सर्वेक्षण कहता है पर्याप्त पोषण की कमी के साथ ही महिलाओं को कम देखभाल, पारिवारिक उपेक्षा और घरेलू हिंसा का भी सामना करना पड़ रहा है। 40 प्रतिशत महिलाएं घरों में हिंसा झेलने को विवश हैं। इनमें से बमुश्किल 4 प्रतिशत ही अपनी बात को कानून तक ले जा पाती हैं। 1998 में हुए एनएफएचएस-2 में मप्र में एनीमिया से ग्रस्त महिलाओं की संख्या 72 प्रतिशत थी। जो कि अब बढ़कर 79 प्रतिशत हो गई है। जबकि प्रदेश सरकार गली- मोहल्लों को अपनी स्वास्थ्य सुविधाओं के बखान से रंगने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। गनीमत है कि स्वास्थ्य न तो जनता के लिए और न ही विपक्षियों के लिए चुनावी मुद्दा है, जिसके कारण सरकार ऐसे सर्वेक्षणों को भाव नहीं देती। वैसे कुछ समय पूर्व ही मप्र सरकार ने सदन में यह स्वीकार किया था कि प्रदेश में 38 हजार से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं। बच्चों, महिलाओं के स्वास्थ्य में गिरावट, कुपोषण के कारणों में सरकारी नीतियों से उपजे विस्थापन के साथ ही सामाजिक भेदभाव, भ्रष्टाचार और जातिगत कारण भी बराबरी के जिम्मेदार हैं।

वैसे मप्र कुपोषण, महिला स्वास्थ्य की बदरंग तस्वीर वाला अकेला राज्य नहीं है, कमोबेश पूरे देश की यही हालत है। देश में 44 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं को ही प्रसव पूर्व देखभाल सुलभ हो पाती है, तो दूसरी ओर 39 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं का ही प्रसव प्रशिक्षित स्वास्थकर्मियों के माध्यम से होता है। यह तथ्य इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं कि गांव अभी भी सुविधाओं से बाहर हैं। सरकार अख़बारों और टीवी में निरंतर कंडोम का जाप-जपने के बाद भी अभी तक बड़ी संख्या में महिलाओं को यह नहीं बता सकी कि एड्स को कैसे रोका जा सकता है।

सर्वेक्षण का एक और चिंताजनक पहलू है, तीन साल से कम उम्र के बच्चों का वजन कम होना, देश में दो लाख से अधिक व्यस्क, किशोर बच्चे एनीमिया से जूझनां। जो बताता है कि हमारी स्वास्थ्य सेवाएं के बारे में एकदम अभिनव प्रयासों की आवश्यकता है। क्योंकि आज भी मप्र के रीवा, सीधी, झाबुआ, मंडला और बैतूल, धार, देवास जैसे जिले बेहद स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर केवल अस्पतालों, प्राथमिक केंद्रों की तख्तियां ही डाले हुए हैं। यहां ओझाओं, गर्म सलाखों, चाकुओं से इलाज करने वालों की मौज है। इसलिए सरकार को अब एनएफएचएस-3 में पाए गए कुपोषण, एनीमिया, असुविधा से लड़ने के लिए मैदानी स्तर पर प्रयास करने के साथ ही बुनियादी ढांचे में बदलाव की भी दरकार है।

हर बार सुधार हो रहा है, के नारे और आंकड़ों को अपनी सुविधा के अनुसार संवार लेने से जनता का भला होने वाला नहीं है। कुछ समय पहले ही मप्र में एक योगी अफसर अपनी योगमाया से नौकरशाहों के साथ ही सरकार के दामन में दाग होने को भी उजागर कर चुका है। यह सब ऐसे कारक हैं, जो प्रदेश में 79 प्रतिशत महिलाओं को कमजोर, अस्वस्थ्य बनाते हैं। इसके साथ ही भावी डाक्टरों से लिया जाने वाला लाखों रुपयों का दान भी सेवाओं में भ्रष्टाचार की एक मुख्य वजह है। इसलिए अवाम की सेहत की तंदुरुती के लिए, प्रदेश के मानव विकास मानकों में बेहतरी के लिए, गांव-गांव तक चिकित्सा पहुंचाने के लिए सरकार को खामियों की जड़ में जाकर सुधार करने की आवश्यकता है। ताकि ऐसे सर्वेक्षणों का मकसद पूरा हो सके।

दयाशंकर मिश्र

 
     
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