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  संस्थागत प्रसव की मुश्किलें
 
     
 

बच्चे को जन्म देते समय अधिकांश महिलाएं केवल इसलिए काल कवलित हो जाती हैं क्योंकि उन्हें समय पर सही इलाज नहीं मिल पाया। सरकार यूं तो संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के लिए जननी सुरक्षा योजना अंतर्गत आर्थिक सहायता देकर प्रोत्साहित करती है लेकिन प्रसव के लिए संस्थाओं तक सुरक्षित परिवहन की सुविधाओं के अभाव में सुरक्षित प्रसव आज भी चुनौती ही बने हुए हैं। हालात यह है कि दूरदराज के गांवों में आज भी स्थितियां विषम होने पर लोग टैक्टर अथवा सार्वजनिक परिवहन की बसों में सफर तय करते हैं इससे प्रसूता को बेहद विषम स्थिति का सामना करना पड़ता है। इससे बचने के लिए प्रसव परिवहन योजना लागू की गई है लेकिन बेहतर संचालन के अभाव में यह भी सभी की पहुंच में नहीं है। तमाम बाधाओं को पार करते हुए यदि अस्पताल पहुंच भी जाएं तो उचित इलाज मिलने में तमाम मुश्किलें सामने आती हैं। प्रदेश के अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 31 फीसदी पद खाली पड़े हैं। सरकार जनस्वास्थ्य पर कुल मिलाकर 150 रूपए प्रति व्यक्ति ही खर्च कर रही है। इस स्थिति में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल पाना बेमानी ही लगता है।

मप्र की सड़कें अपनी व्यवस्था को लेकर बदहाल हैं। हाईवे और नेशनल हाईवे की हालत इतनी ज्यादा खराब है कि बीस किमी के सपफर को भी घंटों में तय करना पड़ता है। इसी से दूरदराज की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसका असर सबसे ज्यादा आपातकाल में करना पड़ता है। अमूमन संकट की स्थिति में दूरदराज के गांवों से संकट के समय किसी प्रसूता महिला को निकटस्थ स्वास्थ्य केन्द्र तक लाने में कई तरह की मुष्किलों का सामना करना पड़ता है। इसमें कई बार महिला को रास्ते में बेहद असुरक्षित परिस्थितियों में प्रसव पीड़ा झेलनी पड़ती है। इटारसी सामुदायिक अस्पताल में वीरग्वारी गांव की सविता जोठे की मौत प्रसव के बाद हो गई। सविता के परिजनों का आरोप था कि लगभग पचास किमी दूर सुखतवा के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में डॉक्टर की अनुपस्थिति में नर्स ने जचकी कराई थी, इससे हालत और बिगड़ गई और उसे समय पर रेफर नहीं किया गया। होशंगाबाद जिले के पिपरिया शहर में इसी स्थिति में एक महिला ने सड़क पर बच्चे को जन्म दे दिया। वहीं गुना जिले में भी एक महिला ने टेक्टर ट्राली में ही दम तोड़ दिया। यहीं के जिला अस्पताल में उर्मिला साहू की मौत भी प्रसव के दौरान हो गई। इस पर परिजनों ने डॉक्टरों पर समय पर उचित इलाज नहीं करना बताया। इस मौत की जांच के लिए संयुक्त कलेक्टर यू परमार, और एसडीएम अरूण परमार ने जांच भी की।

संस्थागत प्रसव कराने में डॉक्टर, स्टाफ नर्स और दाईयों द्वारा रूपए मांगे जाते हैं। यदि बेटा हुआ हो तो मांग और भी बढ़ जाती है। पिपरई स्वास्थ्य केन्द्र में थिगली गांव निवासी कश्णपाल सिंह की पत्नी शशिबाई को भर्ती कराया गया था। इस दौरान उसके इलाज के लिए नर्स निर्मला बैस ने तीन सौ रूपए ले लिए। इस घटना पर बाद में लोगों ने हंगामा कर दिया। बात बढ़ी तो सभी के सामने नर्स को पैसे वापस देने पड़े। लिधौरा गांव के निवासी सुखचंद लोधी से भी प्रसव कराने के बदले चार सौ रूपए लिए। इस घटना पर अस्पताल के चिकित्सा अधिकारी डा वाय एस तोमर का बयान और भी दिलचस्प है। उनके मुताबिक लोगों की शिकायत के आधार पर उन्होंने आला अधिकारियों को कार्रवाई के लिए लिखा लेकिन उसके बाद से अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। डा तोमर का तबादला अलबत्ता हो गया।

इस स्थिति से बचने के लिए स्वास्थ्य महकमे में प्रसव परिवहन योजना चलाई है। इसके लिए प्रसव परिवहन के लिए संबंधित व्यक्ति को सहायता मुहैया कराई है। लेकिन प्रसव से जुड़ी तमाम योजनाओं में से लगभग छह सौ रूपए भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं। संस्थागत प्रसव के लिए दी जाने वाली 14 सौ रूपए की राशि में से भी दौ सौ रूपए चेक के नाम से वसूल कर लिए जाते हैं। होना यह चाहिए कि सभी अस्पतालों के पास प्रसूताओं के लिए दी जाने वाली राशि एडवांस होनी चाहिए, जिससे उन्हें तुरंत सहायता दी जा सके और उसका उपयोग वह तब कर सकें जबकि उन्हें उसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। दो-चार महीने बाद यह रकम मिलने के बाद इसका उपयोग अन्यत्र होने की संभावना ज्यादा रहती है।

प्रसूताओं को अस्पताल तक लाने के लिए जननी एक्सप्रेस तैनात की गई हैं। लेकिन इनका फायदा भी नहीं मिल पा रहा है। हालांकि गुना जिले में इसके लिए अच्छा प्रयोग किया गया है और वहां जननी एक्सप्रेस के हर ड्राइवर को मोबाइल फोन दिए गए हैं, इससे वह हर समय संपर्क में रहते हैं और किसी भी अप्रिय स्थिति में तुरंत पहुंच सकते हैं।

 
     
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