PovertyMedia and Rights Food Security Livelihood Disability Women Rights Globalisation Health Social Exclusion Education Child Rights Environment Right to Information and Governance

 

     
 
| Print this Page
 
     
  YOU ARE HERE: Home > Health > Pradesh Mein AIDS Rogiyon Ki Barhti Sankhya  
     
  प्रदेश में एड्स रोगियों की बढ़ती संख्या  
     
 

मध्यप्रदेश में बहुत ही तेजी से एडृस एवं एच.आइ.वी. पॉजिटिव मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। यह बहुत ही चिंतनीय पहलु है। पिछले साल 2012 की तुलना में इस साल सितंबर तक ही 2428 एड्स के मरीजों की पहचान की गई है। यह अब तक का सबसे बड़ी बढ़तोरी है। 1988 में प्रदेश में एक मरीज की पहचान की गई थी, उसके बाद 1991 में 3, 2001 में 797 और अब सितंबर 2007 तक 2428 मरीज। कुल मरीजों में इस साल चिन्हित किए गए मरीजों की संख्या लगभग 17 प्रतिशत है। यद्यपि भारत में अभी भी मध्यप्रदेश एड्स से अत्याधिक प्रभावित राज्यों में नहीं आता। अति प्रभावित राज्यों में पहले स्थान पर तमिलनाडु है, जहां 52,036 मरीज हैं, उसके बाद महाराष्ट्र, आंधप्रदेश एवं गुजरात का स्थान है। पर जिस गति से प्रदेश में मरीजों की बढ़ोत्‍तरी हो रही है उससे लगता है कि प्रदेश भी अति प्रभावित राज्यों की श्रेणी में जल्दी ही आ जाएगा।

देश में कुल 1,11,608 मरीज हैं, जिसमें 79,041 पुरुष और 32,506 महिला एड्स से पीड़ित हैं। मध्यप्रदेश में 72 प्रतिशत पुरुष और 28 प्रतिशत महिला मरीज हैं। एडृस प्रभावितों में 21-30 वर्ष के 39 प्रतिशत एवं 31-40 वर्ष के भी 39 प्रतिशत व्यक्ति प्रभावित हैं। यानी एड्स की चपेट में सबसे ज्यादा युवा ही हैं। प्रदेश में एड्स से सबसे ज्यादा संक्रमण होने का जरिया सेक्स हैं, जो कि राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। पुरे देश में इसका प्रतिशत 85.96 है, तो मध्यप्रदेश में 94 प्रतिशत है। यह एक गंभीर मुद्दा है कि प्रदेश में युवाओं मे ही एड्स ज्यादा है और वह भी यौन कारणों से।

प्रदेश में एड्स पीड़ितों की बढ़ती संख्या का सबसे ज्यादा खामियाजा महिलाओं एवं बच्चों को भुगतना पड़ता है। विगत 3 अप्रैल को इंदौर के एम.वाय. अस्पताल में एक बच्चे को जन्म देने के बाद एक 30 वर्षीय महिला ने दम तोड़ दिया था। बुरहानपुर जिले के गंभीरपुरा गांव की इस महिला को 31 मार्च को नेहरू अस्पताल बहुरहानपुर से इन्दौर रेफर किया गया था। एम.वाय. अस्पताल में प्रारंभिक जांच के बाद भर्ती की प्रक्रिया पूरी हुई थी कि डॉक्टरों ने मरीज के पूर्व रिपोर्टों के अध्ययन के बाद पाया कि वह एच.आई.वी. पॉजिटिव है और उन्होंने मरीज को टरका दिया। लाख गुहार के बावजूद डॉक्टरों ने उसे भर्ती करने से साफ-साफ इंकार कर दिया और असहनीय प्रसव पीड़ा से जूझती महिला को उसके परिजन कुछ सोच पाते उसके पहले ही अस्पताल के बाहर पानी टंकी के पास महिला ने बच्ची को जन्म दे दिया। अस्पताल से उपेक्षित इस महिला की हालत लगातार खराब होने लगी और पुन: 2 अप्रैल को उसे अस्पताल पहुंचाया गया पर काफी देर हो चुकी थी और 3 अप्रैल को रात में उस महिला की मौत हो गई। घटना बहुत ही साधारण दिखती है क्योंकि प्रदेश मे मातृत्व मृत्यु की घटनाएं होती रहती है। लेकिन इस महिला को अपनी जान इसलिए गंवानी पड़ी क्योंकि वह एच.आई.वी. पॉजिटिव थी। जिस बीमारी को लेकर डॉक्टरों में इतना उपेक्षा का भाव है, उसको लेकर आमजन में क्या धारणाएं हो सकती है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। यही हाल एड्स प्रभावित परिवार के बच्चों के साथ भी होता है, जब लोगों को मालुम होता है कि कोई बच्चा एड्स प्रभावित परिवार का है (भले ही वह एच.आई.वी. पॉजिटिव न हो) तो उसका स्कूल में दाखिला नहीं होता, मोहल्ले के बच्चे उससे दूर रहते हैं।

सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों में एच.आई.वी./एड्स, मलेरिया एवं अन्य घातक बीमारियों से लड़ने का आह्वान किया गया है और यह विश्वास व्यक्त किया गया है कि 2015 तक इन रोगों से पीड़ितों की संख्या में गिरावट लाने में हम सक्षम हो जायेंगे। पर म.प्र के संदर्भ में देखें, तो तथ्यों के विश्लेषण के आधार पर हम कह सकते हैं कि सहस्रत्राब्दि विकास लक्ष्यों में यह एक ऐसा लक्ष्य है, जिसे हासिल कर पाना मुश्किल लगता है। प्रदेश में मध्यप्रदेश राज्य एड्स नियंत्रण सोसायटी के माध्यम से बड़ी ही सघनता से एड्स के खिलाफ जागरूकता का कार्यक्रम चलाया जा रहा है पर दु:खद बात यह है कि इतने प्रयासों के बावजूद प्रति वर्ष एड्स पीड़ितों की संख्या बढ़ती जा रही है। यह कहा जाता है कि एच.आई.वी. संक्रमण सिर्फ यौन सम्बन्धों के कारण नहीं होता है, बल्कि रक्तदान, एड्स पीड़ित मां से बच्चों में, संक्रमित सुई से या अन्य कारणों से भी होता है पर यौन सम्बन्ध एक ऐसा कारण है, जो 90 फीसदी से भी ज्यादा एड्स मामलों के लिए जिम्मेदार है।

एड्स की रोकथाम के लिए इस वर्ष से एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम उठाया गया था, जिसमें स्कूली पाठयक्रमों में किशोर शिक्षा को शामिल किया गया, पर दुर्भाग्य की बात है कि सरकार ने बिना विचार किए इस पर रोक लगा दी। यह रोक इस आधार पर लगायी गयी कि किशोर शिक्षा देने से किशोरों में यौन भावनाएं तेज होगी। पर दूसरी ओर तथ्य यह संकेत दे रहे हैं कि यौनिक अज्ञानता के कारण ही युवा वर्ग एच.आई.वी./एड्स या अन्य यौन जनित बीमारियों से ग्रसित हो रहा हैं। एच.आई.वी. पीड़ितों में बड़ी संख्या युवाओं की है। यौनिक स्वास्थ्य की अज्ञानता के कारण किशोरों को भ्रामक एवं गलत जानकारियाँ मिलती है।

दूसरी ओर इस बात को स्वीकार करना भी मुश्किल है कि किशोर एवं किशोरियों को स्कूल में किशोर शिक्षा नही मिलेगी तो एक निश्चित उम्र तक वे यौनिक नियंत्रण में रहेंगे क्योंकि सूचना क्रांति के वर्तमान दौर मे इंटरनेट एक ऐसा जरिया है जहां कोई भी जानकारी हासिल की जा सकती है। तात्पर्य यह है कि यदि उन्हें वैज्ञानिक पद्वति से किशोर शिक्षा से नहीं जोड़ा गया, तो वे यौनिक जानकारी के लिए कई अवैज्ञानिक स्रोतों के पास जा सकते हैं, फिर एच.आई.वी./एड्स पर नियंत्रण कितना सम्भव होगा आसानी से समझा जा सकता है।

राजू कुमार

 
     
  Next Article  
  Health Main Page  
  Health Archives