मध्यप्रदेश शिशु, बच्चों की मौत एक शर्मनाक स्थिति है। जननी सुरक्षायोजना के अंतर्गत मिलने वाले 1400 रूपये में से अधिकाश भ्रष्टाचारकी भेंटचढ़ जाते हैं। अस्पताल मे बिस्तरों के अभाव मे माताए बच्चो को बसो और इतने प्रचार के बावजूद एम्बुलेंस और खुलें। ऐसे वातावरण में गरीब आदमी निजी स्वास्थ्य सेवाओं की ओर भागता है और मैदानों मे जन्म दे रही है रधन के अभाव में जीवनभर की गुलामी लिखा लेता है।
अगले 5 सालों का खाका अब सामने आने लगा है। इस मर्तबा मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनावों मेंजिसढंगसे राजनै तक दलोंने अपने घोषणा पत्रो में स्वास्थ्य सेवाओं पर अपने वायदों को पेश किया है उससे पता चलता है कि स्वास्थ्य सेवाओं के अधिकार को मानव अधिकार नहीं माना जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने साफ कर दिया है कि राज्य में वह सस्ती (मुफ्त नहीं) स्वास्थ्य सुविधायें उपलब्ध कराने कीनीति अपनायेगी जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों और 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिये सेवायें मुफ्त रखने की घोषणा की है। भारतीय जनशक्ति पार्टी ने स्वास्थ्य के अधिकार पर कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की है पर उनके घोषणा पत्र मे कहा गया है कि हर परिवार का स्वास्थ्य चिकित्सा बीमा कराया जायेगा और राज्य एवं देश के स्वास्थ्य बजट को घाटे से निकालकर राजस्व बढ़ाने वाले उपक्रम में भी परिवर्तित कर देंगे मतलब यह है कि या तो स्वास्थ्य पर खर्च कम होगा या फिर निजीकरण को बढ़ावा दिया जायेगा।
मध्यप्रदेश में होने जा रहे आ गामी विधानसभा चुनावो मे ऐसे अनेक मुद्दे उठ रहे है जिन्हे व्यापक महत्व का कह कर प्रचारित किया जाएगा । परन्तु इन चुनावों के प्ररिप्रेक्ष्य में मूल भूतप्रश्न यह उठता है मतदाताओं को सर्वप्रथम विधानसभा में होने वाली कार्यवाही पर निगरानी रखनी चाहिए। हमें यह बात ध्यान में रखनी होगी कि यह चुनी हुई सर्वोच्च संस्था किस तरह से अपने कर्तव्यों को अंजाम दे रही है?
आज स्थिति यहां तक पंहुच गई है कि स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण और प्रत्येक नागरिक से सम्बन्धित मसले पर मध्यप्रदेश की विधानसभा में नहीं के बराबर बहस होती है। अगर बहस होती भी है तो वह बजाए किसी नीतिगत मसले के गैर जरूरी वाद-विवाद में समाप्त हो जाती है। यदा-कदा कुछ बहस होती है तो सेवाओं में भ्रष्टाचार पर अटक कर रह जाती है। किसी भी नीतिगत बहस का पिछले पांच वर्षों में सर्वथा अभाव ही दिखाई दिया।
यह आश्चर्यजनक है कि मध्यप्रदेश की अपनी कोई स्वास्थ्य नीति ही नहीं है। विगत 2002 में डेनमार्क सरकार के सहयोग से चलने वाली डेनिडा परियोजना ने स्वास्थ्य नीति का प्रारूप तैयार किया था। यह एक गंभीर विचारणीय स्थिति है कि किसी सार्व भौम राष्ट्र के एक राज्य की नीति कोई विदेशी संस्था बनाए। परन्तु यह नीति भी अभी प्रारूप के स्तर पर ही अटकी हुई है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसको बनाने और अंतिम रूप देने की कोई पहल नही की। इसके ठीक विपरीत राज्य सरकार नेद वाक्रय-नीतिकोतुरत-फुरत स्वीकृति प्रदान कर दी। इसका क्या अर्थ निकाला जाए? इस नीति को ध्यान से देखने पर पताचलता है कि इसका लक्ष्य बहुत ही योजनाबध्द तरीके से संसाधनों का दुरूपयोग ही है।
स्वास्थ्य सेवाओं के एक और पक्ष पर भी गौर करना आवश्यक है। राज्य की स्वास्थ्य अधोसंरचना बहुत ही खराब स्थिति में पहुंच चुकी है । सरकारी आंकड़ों के अनुसा 5 गांवों के बीच अस्पताल में मातृ एक बिस्तर उपलब्ध है। राज्य में प्रति वर्ष 18 लाख बच्चों का जन्म होता है। इनमें से 8.84 लाख बच्चे गरीब परिवारों में जन्म लेते हैं। इनमें से मात्र 3.5 लाख बच्चों को शासकीय मातृत्व सुविधाओं का लाभ मिल पाता है। जबकि सभी अध्ययन बताते हैं कि स्वास्थ्य सम्बन्धी व्यय ही ग्रामीण व आदिवासियों के व्यक्तिगत कर्ज का सबसे बड़ा कारण है।
इस धराशायी स्वास्थ्य प्रणाली में पिछले 4 वर्षों में औसतन 39 मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी के पद स्थायी रूप से न भरकर अस्थायी पद स्थापना के रूप से भरे गए जिससे कि वरिष्ठ अधिकारी उनका शोषण कर सकें। पूरे राज्य में स्त्री रोग विशेषज्ञ के मात्र 137 पद स्वीकृत है। जिनमें से 39 पद खाली हीपड़े हैं। लम्बी लड़ाई के बाद पिछले वर्ष सरकार ने स्त्री रोग विशेषज्ञ के 78 पदों और निश्चेतना विशेषज्ञों के 112 पदों की भर्ती की कार्यवाही प्रारम्भ की है।
बढ़ती जनसंख्या और मूल्य वृध्दि को मद्देनजर यह आवश्यक है कि स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले कि मध्यप्रदेश सरकार ने पिछले कुछ वर्षों के व्यय में वृध्दि की जाए। परन्तु यह दुखद है कि इस पर बजट का कुल 2.4 प्रतिशत व्यय स्थिर कर दिया है। इसका एक मात्र अर्थ यही लगाया जा सकता है कि सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना ही नही चाहती। आंकड़ों के विस्तार में जाएं तो हम पाएंगे कि मध्यप्रदेश की 6.5 करोड़ जनता के लिए कुल 900 करोड़ रूपये का स्वास्थ्य बजट है। अर्थात् यह प्रतिव्यक्ति प्रति वर्ष 138 रूपये बैठता है। इसमें 114 रूपये तो वेतन और अन्य ऊपरी खर्चों में ही निकल जाते हैं। इसके पश्चात बच रहे 24 रूपये यानि प्रतिमाह 2 रूपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से दवाईयों, जांच व अन्य सुविधाओं पर खर्च होते हैं।
एक ओर जहां राज्य में बड़ी संख्या में नए स्वास्थ्य संस्थान खोलने की आवश्यकता है, वहीं पिछले पांच वर्षों में एक भी नया प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तक नहीं खुला। जो पुराने हैं उनमें भी किसी भी तरह का कोई सुधार नहीं हुआ। चिकित्सकों के अधिकांश पद खाली पड़े है। जब एक चिकित्सक को शिक्षा पर 25 से 30 लाख रूपये खर्च करना पड़ रहे हों तो उनसे इतने कम वेतन पर कार्य करने की अपेक्षा भी नहींकी जा सकती। सरकार को चाहिए कि वह चिकित्सा सेवा पर सब्सिडी प्रदान करे।
स्वास्थ्य सेवाओं में भ्रष्टाचार एक ओर ऐसा मुद्दा है जिस पर विधान सभा में गंभीर बहस होना चाहिए। हाल ही में आयकर विभाग के छापों से यह सिध्द हो गया है कि स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों के मध्य व्यापक भ्रष्टाचार व्याप्त है। छापों के दौरान यह भी पता चला कि 200 करोड़ रूपये से अधिक का धन तो अफसरो और नेताओं की जेब में चला गया है महिला एवं बाल विकास विभाग का भ्रष्टाचार भी चौंकाने वाला है।
कोई भी राजनीतिक दल न तो विधानसभा के भीतर न बाहर सार्वजनिक तौर पर इस मसले पर बहस करना चाहता है। आज जब देश के नवजात व बच्चों के स्वास्थ्य सम्बन्धी नीतियें डी.एफ.आई.डी.मेडिसिन व यू.एस.एड. के विदेशी विशेषज्ञों द्वारा हम पर थोपी जा रही हैं ऐसे में हमें अपने भाग्य विधाताओ से यह आग्रह करना चाहिए कि नई विधान सभा में वे स्वास्थ्य के मसले पर गंभीरता से चर्चा कर एक स्वदेशी स्वास्थ्य नीति का निर्माण करें।
सचिन कुमार जैन |