सरकार का विश्वास इस सिध्दान्त में नहीं है कि बीमारी का इलाज करना बेहतर है या उसकी रोकथाम। वह महामारी फैलने के बाद दबाव पड़ने पर ही औपचारिक रूप से हरकत में आती है। शिवपुरी एक बार फिर इसी व्यवस्था के कारण खबरों में है। पिछले तीन महीने में मध्यप्रदेश में शिवपुरी, हरदा, भिण्ड, गुना और मुरैना जिलों में 129 बच्चों की खसरे के कारण मृत्यु हो चुकी है। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि महामारी के संकेत मिलने पर भी 5 मार्च से 15 मार्च के बीच कोई ठोस योजनाबध्द प्रयास सरकार के किसी भी हिस्से में नहीं किये गए। अभी की स्थिति में प्रशासन के अनुसार शिवपुरी के बदरवास (104), कोलारस (74), पोहरी (91), सतनवाड़ा (46) नरवर (220), करेरा (92), मनपुरा (210), धनियाधाना (99) और शिवपुरी शहर (50) में 985 बच्चे खसरे की चपेट में हैं। हालांकि जिलों में कार्यरत स्वैच्छिक संगठनों के मुताबिक छह हजार से ज्यादा बच्चे खसरे से ग्रस्त हैं। इसी तरह हरदा में 173, भिण्ड में 447, गुना में 144 और मुरैना में 90 बच्चे इसके शिकार हैं।
सबसे पहले जब 26 मार्च को सुजवानी में चार साल की पूनम, तीन साल की अंजना और 2 साल के जितेन्द्र की मृत्यु हुई तब स्वास्थ्य विभाग ने यह वक्तव्य दिया था कि समस्या केवल सुजवानी और मसूदा गांव में ही है, यह जिले भर का संकट नहीं है। परन्तु संकट बढ़ता गया और तीन दिनों में ही इन दो गांवों मे 29 बच्चे खसरे की चपेट में आ गये। इसके बाद तो जैसे मौत की आंधी चलती गईं जो भी कुपोषित बच्चा इस आंधी की चपेट में आता गया वह फिर कभी सांस नहीं ले पाया। सरकारी स्तर पर लगातार इस मानवीय त्रासदी को नजर अंदाज कर नकारने की रणनीति को अख्तियार किया गया और शिवपुरी मे यह आंकड़े जारी किये गये कि 21 मई 2003 से मार्च 2004 तक उन्हें 63857 टीके प्राप्त हुए जिनमें से 61250 टीकों का उपयोग कर लिया गया। जबकि जिले में सर्वेक्षण से स्पष्ट हुआ है कि अन्दरूनी गांवों और गांवों के बाहर बसी बस्तियों तक टीकाकरण का लाभ नहीं पहुंचा। परन्तु इस तथ्य को स्पष्ट नहीं किया गया कि जिन परिस्थितियों में, जिस तकनीक के साथ टीकों का उपयोग किया जाना चाहिए था उनका कितना पालन किया गया। बच्चों के स्वास्थ्य सम्बन्धी मामलों के विशेषज्ञ डा. विनोद जैन कहते है कि जिस तरह पोलियो की समाप्ति के लिये आंदोलन चला, ठीक उसी तरह खसरे से निपटने के लिये भी जन आंदोलन की जरूरत हैं क्योंकि यह एक सक्रंमित बीमारी है। वे यह मानते हैं कि कुपोषण से प्रभावित इलाकों में हर छह माह में खसरे का टीकाकरण कराये जाने की जरूरत हे और इस प्रक्रिया में जरूरी है कि टीकाकारण के नियमों का व्यापक स्तर पर पालन किया जाये। स्वाभाविक है कि सहरिया बच्चों में एक टीके से खसरे से बचाव सुनिश्चित नहीं किया जा सकता हैं।
प्रशासन ने टीकाकारण के बड़े आंकड़े उपलब्ध करवाये हैं और इसका अर्थ यह है कि टीकाकारण होने के बावजूद खसरे ने महामारी का रूप लिया है। टीकाकारण अभियान से जुड़े रहे एक निजी चिकित्सक बताते हैं कि सरकार का विश्वास आंकड़ों में रहा है। प्रशासने दबाव में सहभागिता सुनिश्चित करता है। ऐसे में निजी क्षेत्र, जो लोगों के हित में इस अभियान से जुड़ना चाहता है, लालाफीताशाही के व्यवहार के कारण आंकडो की खानापूर्ति करता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार खसरे के टीकों में उसी बैक्टीरिया का उपयोग किया जाता है और यह बैक्टीरिया .2 से 8 डिग्री के तापमान पर ही सक्रिय रह पाते हैं। यदि कुछ समय तक भी तापमान का यह स्तर प्रभावित होता है तो टीका अनुपयोगी हो जाता है और उसका कोई प्रभाव नहीं रहता है। स्वाभाविक रूप से जिन इलाकों में सरकारी टीकाकारण के भव्य आंकड़ों के बाद भी खसरे के कारण बच्चों की मौत के मामले सामने आ रहे है, उससे यह सिध्द हो रहा हैं कि जिला अस्पताल से निकलकर गांव में बच्चों तक टीके के पहुंचने की प्रक्रिया में इन निर्धारित मापदण्डों का उपयोग नहीं किया गया। पिछोर ब्लाक के एक चिकित्सक के अनुसार टीकाकारण करते समय टीके पर मौजूद सूचकों को नजरअंदाज किया गया है। तापमान में बदलाव के कारण यह टीका बेकार हो जाता है इस तरह उन्हें निष्प्रभावी टीके लगा दिये जाते हैं, ये रिकार्ड दर्ज हो जाता है कि टीकाकारण हो गया और बच्चों के पालक यही मानते हैं कि टीके लग जाने के बाद भी खसरा होता है और यह छोटी माता है जिसका कोई इलाज नहीं है।
खसरा होने का कारण
1. संक्रमण के जरिये।
2. कुपोषण का ऊंचा स्तर।
3. एक वर्ष की आयु तक टीका न लगना।
खसरे के लक्षण
1. 102 से 104 डिग्री बुखार।
2. बुखार के साथ तीन-चार दिन बाद शरीर पर सरसों जितने आकार के लाला दाने दिखना। यह दाने दिखते हैं पर शरीर की सतह पर उभरकर नहीं आते।
खसरे में हाने वाली तकलीफ
1. चिड़चिड़ापन।
2. आंख में दाने होने पर आंख आना।
3. नाक में दाने होने पर सर्दी-जुकाम होना।
4. आंतों में दाने होने पर दस्त लगना।
5. प्रतिरोधक क्षमता कम होने से दूसरी बीमारियों का आक्रमण।
6. विटामिन-ए की कमी होने पर अंधापन।
खसरा महामारी कैसे बनता है
1. बच्चों में कुपोषण होने के कारण।
2. जब यह पता चलता है कि किसी बच्चे को खसरा है, उससे 7 से 10 दिन पहले वह इसके वायरस फैलाना शुरू कर चुका होता है।
3. इसके बारे में अंधविश्वास होने के कारण तत्काल इलाज नहीं कराया जाना।
4. अस्वच्छता।
शिशुरोग विशेषज्ञों से चर्चा के आधार पर
खसरे से प्रभावित जिले |
जिला |
पीड़ित बच्चे |
मृत्यु |
शिवपुरी |
985 |
97 |
हरदा |
173 |
16 |
भिण्ड |
447 |
6 |
गुना |
144 |
7 |
मुरैना |
90 |
3 |
योग |
1839 |
129 |
अब यूनीसेफ के सहयोग से शिवपुरी में कुछ हद तक प्रयास शुरू हुए हैं। 4 जून को शिवपुरी में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, पर्यवेक्षकों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को खसरे पर प्रशिक्षण दिया गया और सघन कार्ययोजना के तहत 40 टीमें गांव-गांव में पहुंचनी शुरू हुई, परन्तु तब तक हानि तो हो चुकी थी। अब एक बड़ा सवाल यह है कि शिवपुरी में सहरिया बच्चों में कुपोषण का जितना ऊंचा स्तर है, उसे कम किये बिना किस तरह महामारी की संभावनाओं को समाप्त किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि पिछले 9 महीनों से पिछोर विकासखण्ड में आंगनबाड़ियों में बच्चों को पोषण आहार नहीं मिल रहा है। हालांकि भोजन का अधिकार अभियान का मुद्दा उठाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के आयुक्तों ने निरन्तर मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव और जिला कलेक्टर को कुपोशित श्बच्चों के हित में तत्काल पोषण आहार वितरित करने के निर्देश दिये। यह भी आश्चर्यजनक अनुभव है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को जिले में ताक पर रख दिया गया है और अब भी चार सौ से ज्यादा आंगनबाड़ियों में पोषण आहार नहीं पहुंच रहा है। सतही स्तर पर तो सघन प्रयास शुरू हो गये है पर आंशका अब भी यही है कि कुपोषण, अस्वच्छता, स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में मानसून के जोर पकड़ते ही डायरिया विकराल रूप ले लेगा और इस संभावना से निपटने के लिए कोई आंदोलन सरकार के स्तर पर शुरू नहीं है।
सचिन कुमार जैन
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