मानव विकास के क्षेत्र में मध्यप्रदेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है तो वह है कारगर स्वास्थ्य सेवाओं की डिलेवरी। राष्ट्रीय स्तर के मूल्यांकनों ने उड़ीसा और मध्यप्रदेश को सबसे न्यूनतम संकेतकों वाले राज्यों की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। यह कथन प्रदेश के तीसरे मानव विकास प्रतिवेदन 2002 से उर्ध्दत किया गया है। अर्थात सरकार यह स्वीकारती है कि वह न्यूनतम संकेतकों की सूची में उच्च पायदान पर हैं फिर भी शासन निचले स्तर पर सार्थक प्रयासों की अपेक्षा नित नई योजनाओं की घोषणायें कर जनसामान्य को दिग्भ्रमित करने के प्रयास करता रहता है और लोगों का ध्यान मूल से हटाने की पुरजोर कोशिशें करता रहता है।
उदाहरणार्थ प्रदेश में मातृत्व एवं बाल मृत्यु के संदर्भ में शासन की नित नई घोषणायें हो रही हैं लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न है। प्रदेश से जब अंचल के स्तर पर हम उतरते हैं तो हम पाते हैं कि यह मुद्दा और गहराता जाता है और समस्या की गंभीरता अपने सही रूप में दिखाई देती है जो कि प्रदेश की स्थिति का अध्ययन करते समय समग्रता से देखते समय कहीं खो जाती है और परिलक्षित नहीं हो पाती है। चलिये बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को अंचलों के विशेष संदर्भ में विश्लेपषित करने का प्रयास करते हैं ।
सर्वप्रथम हम मालवा-निमाड़ अंचल के संदर्भ में देखेंगे कि यहाँ पर कुल जनसंख्या के कितने सामुदायिक, प्राथमिक तथा उप स्वास्थ्य केन्द्रों की उपलब्धता है तथा कितने केन्द्रों की वास्तव में आवश्यकता है ? आइये इसका विश्लेषण करने की कोशिष करते हैं। मालवा-निमाड जिले के दस जिलों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि इन आठ जिलों में सामु.,प्राथ. तथा उप स्वास्थ्य केन्द्रों की अपर्याप्तता क्रमश: 99,277 तथा 1829 है। इस विश्लेषण में स्वास्थ्य संरचनाओं की वर्तमान स्थिति, संस्थागत व घरेलू प्रसव की स्थिति तथा मातृ एवं शिशु मृत्यु की स्थिति व उसका विश्लेषण, ग्रामीण स्तर पर पेयजल की उपलब्धता तथा ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क की स्थिति का विश्लेषण भी समाहित किया गया र्है।
शासकीय संरचनाओं की स्थिति
जिला |
जनसंख्या |
सामु. स्वास्थ्य केन्द्र |
आव. |
प्राथमिक स्वा. केन्द्र |
आव. |
उप स्वा.केन्द्र |
आव. |
बड़वानी |
1081039 |
5 |
13 |
31 |
36 |
240 |
360 |
देवास |
1306617 |
4 |
10 |
23 |
43 |
192 |
261 |
धार |
1740577 |
12 |
21 |
48 |
87 |
400 |
580 |
पूर्वी निमाड़ (खंड़वा) |
1708170 |
06 |
21 |
30 |
85 |
176 |
569 |
इंदौर |
2585321 |
03 |
21 |
26 |
86 |
111 |
517 |
झाबुआ |
1396677 |
10 |
17 |
32 |
69 |
346 |
465 |
मंदसौर |
1183369 |
2 |
9 |
44 |
39 |
153 |
236 |
रतलाम |
1214536 |
4 |
10 |
25 |
40 |
166 |
242 |
उज्जैन |
1709885 |
2 |
14 |
21 |
57 |
170 |
341 |
पष्चिमी निमाड़ (खरगौन) |
1529954 |
8 |
19 |
51 |
76 |
297 |
509 |
कुल |
56 |
331 |
120 |
618 |
2251 |
4080 |
तालिका क्र.1 - शासकीय संरचनाओं की स्थिति, स्त्रोत् - परिवार एवं स्वास्थ्य कल्याण विभाग, बेबसाइट दि.19 मई 2006
जिला |
सामु. स्वा. के. की कमी |
प्राथ. स्वा. के. की कमी |
उप. स्वा. के. की कमी |
बड़वानी |
8 |
5 |
120 |
देवास |
6 |
20 |
69 |
धार |
9 |
29 |
180 |
पूर्वी निमाड़ (खंड़वा) |
15 |
55 |
393 |
इंदौर |
18 |
60 |
406 |
झाबुआ |
7 |
37 |
119 |
मंदसौर |
7 |
- 5 |
83 |
रतलाम |
6 |
15 |
76 |
उज्जैन |
12 |
36 |
171 |
पष्चिमी निमाड़(खरगौन) |
11 |
25 |
212 |
कुल - |
99 |
277 |
1829 |
संरचनाओं में कमी की स्थिति
तालिका क्र. 2 - शासकीय संरचनाओं में कमी की स्थिति
सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र
चार्ट क्र. 1 - शासकीय संस्थाओं की स्थिति (कमी का विश्लेषण)
सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र के संदर्भ में शासन का मापदंड है कि प्रति 1,20,00 की जनसंख्या सामान्य क्षेत्रों के लिये तथा आदिवासी व पहाड़ी क्षेत्रों में प्रति 80,000 की जनसंख्या पर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द होना चाहिये। इसी मापदण्डड़ को आधार मानते हुये तालिका क्र. 1 का विश्लेषण करने पर हम पायेंगे कि पूरे अंचल में बड़वानी, खंडवा, खरगौन तथा झाबुआ आदिवासी क्षेत्र हैं तथा बाकी 6 जिले सामान्य हैं, अतएव इनका विश्लेषण करने पर हम देखते हैं कि अंचल के स्तर पर वर्तमान की अपेक्षा 99 सामु. स्वा. केन्द्रों की आवश्यकता है और यदि जिलेवार विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि सर्वाधिक कमी इंदौर, खडवा तथा उज्जैन में क्रमश: 18, 15 तथा 11 है और इसी प्रकार सबसे कम आवश्यकता देवास तथा रतलाम में 6 सामु. केन्द्र की है। थोड़ा और विश्लेषित करने पर हम पाते हैं कि यदि पूरे अंचल के स्तर पर 99 सामु. स्वा. केन्द्रों की कमी है तो हम पाते हैं कि पूरे अंचल एक बड़ी जनसंख्या को आज भी सामु. केन्द्रों द्वारा उपलब्ध सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। (देखें चार्ट क्र. 1, तालिका क्र. 1 व 2)
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र
चार्ट क्र. 2 - प्राथमिक स्वास्थ्य केन्दों की कमी का विश्लेषण
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के संदर्भ में शासन का मापदंड है कि प्रति 30,000 की जनसंख्या सामान्य क्षेत्रों के लिये तथा आदिवासी व पहाड़ी क्षेत्रों में प्रति 20,000 की जनसंख्या पर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द होना चाहिये। इसी मापदण्डे को आधार मानते हुये तालिका क्र. 1 का विश्लेषण करने पर हम पायेंगे कि पूरे अंचल में बड़वानी, खंडवा, खरगौन तथा झाबुआ आदिवासी क्षेत्र हैं तथा बाकी 6 जिले सामान्य हैं, अतएव इनका विश्लेषण करने पर हम देखते हैं कि अंचल के स्तर पर वर्तमान की अपेक्षा 277 प्राथ. स्वा. केन्द्रों की आवश्यकता है और यदि जिलेवार विश्लेमषण करें तो हम पाते हैं कि सर्वाधिक कमी इंदौर, खंड़वा तथा धार में क्रमश: 60,39 तथा 39 है और यहाँ पर मंदसौर अपवाद स्वरूप है क्योंकि यहाँ पर वर्तमान जनसंख्या के आधार पर वहाँ पर 5 स्वास्थ्य केन्द्र ज्यादा हैं। थोड़ा और विश्लेषित करने पर हम पाते हैं कि यदि पूरे अंचल के स्तर पर 277 सामु. स्वा. केन्द्रों की कमी है तो हम पाते हैं कि पूरे अंचल एक बड़ी जनसंख्या को आज भी सामु. केन्द्रों द्वारा उपलब्ध सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। (देखें चार्ट क्र. 2, तालिका क्र. 1 व 2)
उप स्वास्थ्य केन्द्र
चार्ट क्र. 3 - उप स्वास्थ्य केन्दों की कमी का विश्लेषण
उप स्वास्थ्य केन्द्र के संदर्भ में शासन का मापदंड़ है कि प्रति 5,000 की जनसंख्या सामान्य क्षेत्रों के लिये तथा आदिवासी व पहाड़ी क्षेत्रों में प्रति 3,000 की जनसंख्या पर उप स्वास्थ्य केन्द होना चाहिये। इसी मापदण्ड़ को आधार मानते हुये तालिका क्र. 1 का विश्लेषण करने पर हम पायेंगे कि पूरे अंचल में बड़वानी, खंडवा, खरगौन तथा झाबुआ आदिवासी क्षेत्र हैं तथा बाकी 6 जिले सामान्य हैं, अतएव इनका विश्लेषण करने पर हम देखते हैं कि अंचल के स्तर पर वर्तमान की अपेक्षा 1829 उप स्वा. केन्द्रों की आवश्यकता है और यदि जिलेवार विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि सर्वाधिक कमी इंदौर, खंड़वा तथा खरगौन में क्रमश: 406, 393 तथा 212 है और यहाँ पर सबसे कम आवश्यकता देवास (69) को है। थोड़ा और विश्लेषित करने पर हम पाते हैं कि यदि पूरे अंचल के स्तर पर यदि 1829 उप स्वा. केन्द्रों की कमी है तो हम पाते हैं कि पूरे अंचल की 1,22,40,000 जनसंख्या को आज भी उप. स्वास्थ्य केन्द्रों द्वारा उपलब्ध सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। (देखें चार्ट क्र. 3, तालिका क्र. 1 व 2 )
जिला |
संस्थागत प्रसव |
कुल प्रसव |
संस्थागत् प्रसव |
मातृ मृत्यु |
शिशु मृत्यु |
बड़वानी |
6381 |
29324 |
21.8 |
27 |
761 |
देवास |
15544 |
32953 |
47.2 |
2 |
418 |
धार |
12866 |
47520 |
27.1 |
30 |
233 |
पूर्वी निमाड़ (खंड़वा) |
11650 |
33703 |
34.6 |
6 |
127 |
इंदौर |
65669 |
79687 |
82.4 |
44 |
401 |
झाबुआ |
14928 |
46408 |
32.2 |
43 |
370 |
मंदसौर |
10631 |
32015 |
33.2 |
18 |
698 |
रतलाम |
12936 |
30290 |
42.7 |
30 |
485 |
उज्जैन |
21616 |
45839 |
47.2 |
35 |
971 |
पश्चिमी निमाड़ (खरगौन) |
10818 |
39411 |
27.4 |
15 |
756 |
कुल |
183039 |
4,17,150 |
43.87 |
250 |
5220 |
वास्तविता |
|
2077 |
32954 |
संस्थागत् प्रसव की स्थिति
तालिका क्र. 3, संस्थागत् प्रसव की स्थिति, स्त्रोत् - परिवार एवं स्वास्थ्य कल्याण विभाग, बेबसाइट दि. 19 मई 2006
घरेलू प्रसव की स्थिति
जिला |
कुल प्रसव |
संस्थागत प्रसव |
प्रतिशत् घरेलू प्रसव |
मातृ मृत्यु दर प्रति लाख
(फेमिली वेलफेयर प्रोग्राम इवेलयूशन सर्वे 03) |
दर के अनु .मातृ मृत्यु |
बड़वानी |
29324 |
6381 |
78.2 |
866 |
253 |
देवास |
32953 |
15544 |
52.8 |
535 |
176 |
धार |
47520 |
12866 |
72.9 |
576 |
273 |
पूर्वी निमाड़ (खंड़वा) |
33703 |
11650 |
65.4 |
822 |
277 |
इंदौर |
79687 |
65669 |
17.6 |
493 |
392 |
झाबुआ |
46408 |
14928 |
67.8 |
493 |
228 |
मंदसौर |
32015 |
10631 |
66.8 |
648 |
207 |
रतलाम |
30290 |
12936 |
57.3 |
647 |
195 |
उज्जैन |
45839 |
21616 |
52.8 |
514 |
235 |
पश्चिमी निमाड़ (खरगौन) |
39411 |
10818 |
72.6 |
640 |
252 |
कुल |
4,17,150 |
183039 |
56.13 |
|
2488 |
तालिका क्र 4 - संस्थागत् प्रसव की स्थिति,
घरेलू एवं संस्थागत् प्रसव की स्थिति
चार्ट क्र.4, घरेलू एवं संस्थागत प्रसव की स्थिति
संस्थागत् प्रसव -
संस्थागत् प्रसव में विगत् वर्ष (05-06) के आंकड़ें देखते हैं तो सर्वाधिक संस्थागत् प्रसव 82 प्रतिशत् इंदौर में दर्ज किये गये हैं, उसके बाद उज्जैन तथा सबसे कम 21 प्रतिशत् संस्थागत् प्रसव बड़वानी में दर्ज किया गया। ज्ञात हो कि इंदौर में में वर्तमान जनसंख्या के अनुपात में सामु., प्राथ. तथा उप स्वास्थ्य केन्द्रों की कमी क्रमश: 16, 60 तथा 406 है जब संस्थानों की इतनी कमी है तो फिर संस्थागत् प्रसवों का ज्यादा होना चिंता जताता है।
यह एक सवाल है इसी के साथ देखें तो उज्जैन तथा देवास के ऑंकडे भ्रमक नजर आते हैं क्योंकि उज्जैन में सर्वाधिक शिशुओं (971) की मौत दर्ज की गई है तथा यहाँ पर मातृ मृत्यु केवल 35 ही दर्शाई गई है तो यहाँ पर यह प्रतीत होता है कि प्रकरण पंजीकृत नहीं किये गये हैं। इसी के साथ देवास में माताओं की मृत्यु केवल 2 दिखाई गई है तथा शिशुओं की मौत 418 दिखाई गई है, जो कि संदेहास्पद है। क्योंकि यदि दर के अनुसार विश्लेषण करते हैं तो हम पाते हैं कि देवास में माताओं की मृत्यु 176 हुई है।
ऑंकड़ों की तोड़मरोड़ -
ऑंकड़ों की तोड़मरोड़ में माहिर प्रदेश सरकार का एक कारनामा महाकौशल अंचल के विश्लेषण के दौरान भी सामने आया। शासन की अधिकारिक वेबसाईट के अनुसार अंचल में विगत् वर्ष कुल जमा 4,17,150 प्रसव हुये और उनमें से कुल 43.87 प्रतिशत् संस्थाओं में हुये और शासन के अनुसार यहाँ पर कुल 5220 शिशुओं तथा 250 माताओं की मृत्यु हुई है। अब यदि भारत सरकार द्वारा जारी दर देखें तो हम पायेंगे कि प्रदेश में 79 बच्चे प्रति 100 जन्म पर मरते हैं तो इस आधार पर वर्ष 05-06 में 32954 शिशुओं की मौतें हुई अर्थात् 27734 शिशुओं की मौत पर सरकार लीपापोती कर रही है।
इसी प्रकार भारत सरकार की मातृत्व मृत्यु के संदर्भ में दर 498 महिलायें प्रति लाख के जन्म पर मरती हैं तो हम पाते हैं कि विगत् वर्ष में 2077 माताओं की मृत्यु हुई हैं जबकि सरकार कहती हैं कि कुल 250 मौतें हुई हैं यानि कि 1827 मौतों पर सरकार पर्दा ड़ालने का प्रयास कर रही है।
इससे भी बढ़कर यदि वर्ष 2003 में कराये गये फेमिली वेलफेयर प्रोग्राम इवेलयूशन सर्वेक्षण को आधार मानें तो हम देखते हैं कि वर्ष 05-06 में 2488 माताओं की मृत्यू दुई अर्थात् 2238 मौतों को सरकार दबाने का प्रयास कर रही है।
इससे बढ़कर प्रदेश में देखते हैं तो हम पाते हैं कि प्रदेश में विगत् वर्ष कुल जन्म 1,71,6355 हुये तो सरकार के अनुसार शिशु मृत्यु दर 30157 है तो सरकार के अनुसार जारी दर (79 प्रति हजार) के अनुसार 1,35,591 मृत्यु होती है। इसी प्रकार स्वास्थ्य विभाग कहता है कि 1408 मौतें कुल हुई हैं जबकि भारत सरकार की दर (498 प्रति लाख) के अनुसार ये मौतें 8500 होती हैं, तो फिर यहाँ सवाल हैं कि प्रदेश सरकार सही बोलती है कि भारत सरकार ?
पेयजल की उपलब्धता
जिला |
कुल गाँव |
पूर्णत: सुविधा प्राप्त गाँव |
प्रतिशत् |
आंशिक सुविधा प्राप्त गाँव |
अछूते गाँव |
दोनों का
योग |
शुध्द पेयजल प्राप्त गांव का प्रति. |
बड़वानी |
3932 |
3329 |
84.7 |
282 |
152 |
434 |
100.00 |
देवास |
1240 |
944 |
76.1 |
296 |
0 |
296 |
100.00 |
धार |
6438 |
6278 |
97.5 |
85 |
75 |
160 |
100.00 |
खंड़वा |
2252 |
2055 |
91.3 |
188 |
9 |
197 |
100.00 |
इंदौर |
898 |
858 |
95.5 |
40 |
0 |
40 |
100.00 |
झाबुआ |
9927 |
9757 |
98.3 |
18 |
152 |
170 |
100.00 |
मंदसौर |
1187 |
805 |
67.8 |
380 |
2 |
382 |
51.33 |
रतलाम |
1355 |
1126 |
83.1 |
229 |
0 |
229 |
100.00 |
उज्जैन |
1166 |
1036 |
88.9 |
130 |
0 |
130 |
100.00 |
खरगौन |
2716 |
2407 |
88.6 |
297 |
12 |
409 |
100.00 |
कुल गाँव |
31111 |
|
अछूते आंशिक सुविधा युक्त गांव |
2447 ; 7.8 :ध्द |
|
तालिका क्र. 5, पेयजल की उपलब्धता
विश्लेषण
संविधान की धारा 47 के अंर्तगत् यह स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है कि सरकारें लोगों के पोषण स्तर में वृध्दि करे, जीविकोपार्जन के विकल्पों को बढ़ाये तथा जनस्वास्थ्य को प्राथमिकता दे। समग्रता में देखें तो यह परिभाषा अपने आप में व्यापक है लेकिन और गहराई में जायें तो हम पाते हैं कि लोगों की मूलभूत आवश्ख्यकताओं की पूर्ति भी सुनिष्चित की जाये तभी हम यह कह सकेंगे कि लोगों को स्वास्थ्य सुविधायें की सुनिश्चिति की जा रही है परन्तु जब हम तालिका क्र. 5 को देखते हैं कि तो हम पाते हैं कि अंचल के कुल 31111 गाँवों में से 2447 गांवों में पेयजल की कोई भी सुविधा नहीं है और जिन गाँवों में पेयजल की सुविधा सरकार बता भी रही हैं उनमें से भी मंदसौर के आधे से कम गाँवों में ही पेयजल की सुविधा उपलब्ध है, अतएव मूलभूत सुविधाओं की कमी के चलते बेहतर स्वास्थ्य की बात करना बेमानी है।
प्रशान्त कुमार दुबे
|