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  एक राष्ट्रीय मानव की दु:खद त्रासदी  
     
 

इसे तकनीक और पारंपरिक ज्ञान की जंग भी कहा जा सकता है कि गांव की अनपढ़ भल्लोबाई के हाथों आज तक एक भी मौत नहीं हुई और उसी की बहू शासकीय चिकित्सालय में मर गई। पूरा पड़रिया गाँव अभी तक सकते में है और सभी के मन में एक ही चीज है और वह यह कि जचगी करायेंगे तो घर में ही क्योंकि शासकीय चिकित्सालयों में देखभाल नहीं होती, दुत्कारे जाते हैं और मार ड़ाले जाते हैं । अनिता दो दिन तड़पती रही, चिकित्सक एक झटके के लिये आये ओर आंग्ल भाषा के चिर-परिचित जुमले 'आइ एम सॉरी' कहकर अनिता की आंखें भींच दी। सवाल यहाँ केवल अनिता के मरने का नहीं है बल्कि यहाँ पर आदिम जनजातियों के महिला विकास का एक अध्याय समाप्त हो गया, क्योंकि यदि अनिता जीवित रहती तो वह ना केवल अपने घर के चिरागों को रोशन करती बल्कि स्वसमाज के लिये मिसाल बनकर अन्य महिलाओं के लिये संभावनाओं के द्वार खोलती। परन्तु यह चिराग बुझा दिया गया। यह बहुत ही सीधे अर्थों में राष्ट्रीय मानव की प्रायोजित मौत है और यह दु:खद त्रासदी है कि जिस जाति के अस्तित्व को बचाने के लिये सरकार विशेश प्राधिकरण बनाकर प्रयास कर रही है वहीं अनिता की इतनी आसान मौत स्वीकारी जा रही है।

इस समय पूरे देश में कुल जमा 7 आदिम जनजातियाँ हैं ओर उनमें से प्रदेश में 3 आदिम जनजातियाँ निवासरत हैं बैगा, भारिया तथा सहरिया । प्रदेश में रहने वाली बैगा जनजाति को राष्ट्रीय मानव का दर्जा भी दिया गया है। सरकार इनके हितों को विशेश रूप से संरक्षित करने का प्रयास कर रही है तथा यह चाहती है कि ये जातियाँ भी समाज की मुख्यधारा से जुड़ें। मुख्यधारा क्या है? यह एक चिंतन का विषय है किन्तु गाहे-बगाहे प्रयास जारी हैं। बैगा जनजाति महाकौशल क्षेत्र में निवास करती हैं और अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने की साक्षी है। बैगा जाति में निरक्षरता आज भी 90-95 प्रतिशत् है। ऐसे में अनिता का नवीं तक पढ़ना और कुछ बनने का सपना उस समय चूर हो गया, जबकि वह प्रसव के दौरान होने वाली मौत का शिकार हो गई।

हाल ही में मंड़ला जिले की फूलसागर पंचायत के पड़रिया ग्राम के सुझोरू टोला की अनिता भारती जो कि कक्षा नवीं तक पढ़ी थीं,, ने शासकीय तंत्र की लापरवाही का खामियाजा भुगता। अनिता को अभी डेढ़ वर्ष पूर्व ही घुघरी से ब्याहकर लाया गया था। आप समझ सकते हैं कि जिन जातियों में पढ़ाई - लिखाई के कोई मायने ना हों वहाँ अनिता के नवीं पास होने के मायने क्या रहे होंगे ? पति संतोष भी बारहवीं तक पढ़ा था, परन्तु तब तक वह मजदूरी करता था, अभी तीन माह पूर्व ही वह संविदा शिक्षक के पद पर चयनित हुआ था। परिवार में अनिता की हर बात मानी जाती थी। अनिता जब पेट से र्हुई तो दादीसास, दल्लोबाई के ग्रामदाई (अप्रशिक्षित) होने के बावजूद अनिता ने सुरक्षा व शासकीय योजनाओं के कथित लाभ की दृष्टि से शासकीय चिकित्सालय में ही प्रसव कराना उचित समझा। आमतौर पर मिलने वाली पति की सहमति के अलावा घरवालों की सहमति मिली और दि. 19 अगस्त को अनिता को मंड़ला के जिला चिकित्सालय में भर्ती करा दिया गया।

शारीरिक रूव से स्वस्थ, सामान्य वजन, बढ़िया कद-काठी, सांवले वर्ण की अनिता को जिला चिकित्सालय में भर्ती कराने के लिये उसके मायके से निजी वाहन (1500 रूपये) किया गया और तब तक वह सामान्य थी किन्तु जिला चिकित्सालय में भर्ती करने के उपरांत से ही अनिता की हालत बिगड़ने लगी। उसे हरदम झटके पड़ने लगे। भर्ती होने के बाद केवल एक बार ही डॉक्टर अनिता को देखकर गई थीं और उसके बाद तो नर्स ही काम चलातीं रहीं। हालत बिगड़ने पर संतोष व परिजनों ने चिकित्सक से संपर्क करना चाहा परन्तु चिकित्सक अस्पताले में होते तो मिलते। उस दिन शनिवार का दिन था और श्निवार के दिन हॉफ डे के नाम पर चिकित्सक नर्सों के हवाले मजमा छोड़कर किनारे हो लेते हैं। चिकित्सक नहीं आईं और झटकों के सटीक ईलाज के नाम पर महज़ नमक-पानी का घोल यानि बोतल चढ़ती रहीं। डयूटी नर्स ने एक ऐसा इंजेक्शन लिख कर दिया जो कि पूरे मंड़ला में कहीं भी नहीं मिला, इसके बाद विकल्प पर कोई भी विचार नहीं किया गया। कई बार मान-मनुहार करने पर भी जब चिकित्सक नहीं आये तो मरता क्या ना करता, संतोष ने उनके घर की राह पकड़ी परन्तु लगता है संवेदनायें पानी बन कर कह रही थीं और कोई उनमें बांध लगाने वाला न था। संतोष थक-हार कर वापस आ गया और डॉक्टर नहीं आईं।

जागते-सोते रात बीती और अनिता के झटके एक बार भी बंद नहीं हुये, एक बार निजी चिकित्सालय की ओर जाने के बारे में भी सोचा गया किन्तु मजबूरी अपना दामन नहीं छोड़ती और आर्थिक तंगी ने उन्हें वहीं रोके रखा। रविवार सुबह बेहोषी और झटके की हालत में अनिता ने एक मृत शिशु को जन्म दिया और पूरे परिवार की खुशियाँ तो काफूर हो गईं थीं किन्तु अनिता के बिगड़ते हाल ने सभी को चौकस किया। परिजनों ने पुन: मनौती शुरू की, किन्तु एक पुरूष चिकित्सक के अलावा कोई भी सामने ना आया। परिजन कहते हैं साहब ! उन्होंने भी आते ही नर्सों से अंग्रेजी में बात करना शुरू कर दिया और अनजानी सी सांत्वना देकर चले गये। हालत फिर खराब हुई और इस बार जब परिजन चिकित्सक को लाये तो चिकित्सयक ने अनिता के आंखें मींचने का काम कर दिया और पुन: आंग्ल भाषा के चिर-परिचित जुमले का इस्तेमाल किया 'आई एम सॉरी'। असंवेदनशीलता का परचम यहाँ तक लहरा कि अनिता का पोस्टपार्टम करना भी उचित नहीं समझा गया और खानापूर्ति कर मुत्यु प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया जिसमें मुत्यु का कारण एक्लेम्पसिया बताया गया। अनिता के मरने के बाद उसे शव वाहन भी नहीं मिला और परिवार जनों ने 1600 रूपये में गाड़ी कर अनिता को घर लाया। इस पूरे प्रकरण में परिवार को योजनाओं का लाभ मिला 1700 रूपये और उसके परिवार के खर्च हो गये 3000 रूपये यानि नतीजा ठन-ठन गोपाल और अनिता की जान की कीमत लगाना, उसका मखौल उड़ाना है।

गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले इस परिवार में पाने 5 एकड़ जमीन में 8 जन हैं। इस साल पानी भी कम गिरा है तो अभी से ही पेज़ शुरू हो गया है । रोशन दुकान गांव से 5 किलोमीटर दूर ग्वारी गांव में है जो कि माह में 2-3 दिवस ही खुलती है और पीला कार्ड़ होने पर भी आज तक इस परिवार को कभी पैंतीस किलो राशन ना मिला। गाँव में लगभग 70 परिवार है और जिनमें से 45 परिवार किसान (गोंड) तथा 30 परिवार बैगाओं के अलावा अन्य जातियाँ भी हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर गाँव से 3 कि.मीटर दूर फूलसागर का उपस्वास्थ्य केन्द्र ही है और जिसमें भी नर्स ही है और ज्यादा कुछ हो तो 16 कि.मीटर दूर मंड़ला जाओ। जबसे बरगी बांध बना है तब से चार महीने ठेल का पानी भी भरा रहता है और जिससे आने-जाने का रास्ता भी बंद रहता है तथा ज्यादा पानी गिर जाये तो एकमात्र विकल्प नदी उतरने का इंतजार करो। आंगनवाड़ी सिझौरू टोला से आधा कि.मी. दूर पड़रिया टोला में है और कार्यकर्ता आती हैं फूलसागर से। मायने साफ हैं कि वह कब खुलती होगी और उससे क्या-क्या मिलता होगा ? हाँ, लेकिन अनिता ने पोषाहार भी लिया और उसे दो टीके भी लगे थे।

गाँव की दाई भल्लोबाई यानि अनिताबाई की दादीसास की कसक अब जिन्दगी भर के लिये हो गई है कि उन्होंने गांव की हर महिला की जचगी कराई, सभी को बचाया किन्तु अपनी बहू को ना बचा पाई। वे अपने पारंपरिक ज्ञान का बखान करते हुये कहती हैं कि हम जानते हैं कि जब झटके पड़ते हैं तब क्या किया जाना चाहिये ? चेहरे पर उभरी सिलवटें तब और जीवंत हो जाती हैं जब वे कहती हैं कि हम तो हाथ ड़ालकर फूल भी बाहर निकाल लेते हैं। यह एक कला है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजी जाती है, पोसी जाती है और हस्तांतरित की जाती है। उसे मलाल है कि वह अपनी बहू को नहीं बचा पाई, उनका कहना है कि बदलते समय के साथ अब हम हंसिया छोड़ कर ब्लेड़ से ही नाल काटते हैं तथा साफ धागा भी बांधते हैं। भल्लोबाई बड़े ही नाराजी के साथ कहती हैं कि पढ़ाओ-लिखाओ तो यही होता हे कि अपनी चीज भी हाथ से जाती है और कुछ मिलता भी नहीं। विजयाराजे योजना के पचास हजार रूपयों पर वह नाराजी से कहतीं हैं कि क्या वे रूपये हमें हमारी अनिता वापस कर देगें?

योजनाओं के इस प्रदेश में जहाँ जन्म के पूर्व से लेकर मृत्युपर्यन्त योजनाओं का अंबार है, एक राष्ट्रीय मानव की दु:खद त्रासदी यह संकेत देती हैं कि षासन की मंशा और क्रियान्वयन में स्पष्ट अंतर है। अनिता के परिवार के पास दीनदयाल अन्त्यादेय उपचार योजना का कार्ड होना और उसके बाद भी उन्हें सामान्य दवायें भी बाजार से ले कर आना, योजनाओं पर प्रष्नचिन्ह की काली छाया देती है। वैसे भी योजनाओं की मृगमरीचिका अभी भी लोगों के पल्ले नहीं पड़ पाई हैं। शासन की इस अतिमहत्वाकांक्षी योजना को मंड़ला जिले के संदर्भ में देखें तो हम पाते हैं कि मंड़ला में 82044 परिवार पात्र हैं और अभी तक 76000 परिवारों को ही कार्ड वितरित हुये हैं, इसके मायने आज भी 6044 परिवार तो योजना में शामिल ही नहीं हो पाये है, जबकि योजना दो वर्ष पूर्व से संचालित है। और विगत् वर्ष (05-06) का बजट था 56,35,571 रूपये यानि प्रति परिवार 68.70 रूपया। और यही बजट घट कर चालू वित्त वर्ष (06-07) में 36,78,000 रूपये यानि प्रति परिवार 44.82 रूपया कर दिया गया तो सवाल यह है कि कहाँ हैं प्रति परिवार के 20,000 रूपये? और उसमें से भी खर्च हुआ महज् 21 प्रतिशत् यानि मंड़ला के गरीब परिवार महज़ 12,28,468 रूपयों में ही स्वस्थ हो गये। विगत् वर्ष की तुलना में इस वर्ष 65 प्रतिशत तक बजट में कटौती की गई। मंड़ला में स्त्री एवं षिषु रोग विशेषज्ञों के क्रमश: 100 तथा 75 प्रतिशत् पद रिक्त पड़े हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि जिले में कुल जमा 466 बिस्तर हैं अर्थात् 2111 व्यक्तियों पर एक बिस्तर है। मंड़ला की मातृत्व मृत्यु दर (926 प्रति लाख) के हिसाब से यहाँ प्रतिवर्ष 250 महिलाओं की मौत हो जाती ह्रै जबकि प्रशासन इसे 60 मौतें करार देता है, इसी प्रकार वर्ष भर में यहाँ पर 2100 शिशु काल के गाल में समा जाते हैं।

पूरा पड़रिया गाँव अभी तक सकते में है और सभी के मन में एक ही चीज है और वह यह कि जचगी करायेंगे तो घर में ही क्योंकि शासकीय चिकित्सालयों में देखभाल नहीं होती, दुत्कारे जाते हैं और मार ड़ाले जाते हैं । अब यह सरकार को तय करना है कि वह किस तरह से और किन प्रयासों को गति देना चाहती है ? जिस तरह से अनिता की मौत हुई, वह शासकीय प्रयासों की कलईे तो खोलती है ओर आदिम जनजातियों के लिये चलाये जा रहे विशेश अभियानों की एक तस्वीर भी हमारे समक्ष रखती है। यह बहुत ही सीधे अर्थों में राष्ट्रीय मानव की प्रायोजित मौत है और यदि यही सिलसिला चलता रहा तो फिर ना ही अनिता जैसी बैगा महिलायें पढ़ेंगी और ना ही शासकीय संस्थानों में प्रसव कराने की जिद ही करेंगी। सवाल यह भी है कि एक के बाद एक धड़ल्ले से जारी की जा रही योजनाओं के बीच सरकार अपने तंत्र को संवदनशील बनाने के लिये क्या प्रयास कर रही है ?

प्रशांत कुमार दुबे

 
     
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