कटनी जिले की प्रसूताओं के लिये खुशखबरी बनी 'प्यारी माँ'ने वैसे तो अपना पहला जन्मदिन ही फरवरी 2006 में मनाया और इस अवसर का केक भी स्वास्थ्य मंत्री और तत्कालीन जिलाधीश की अध्यक्षता में काटा गया। परन्तु संसाधनों के अभाव ने दो माह बाद ही इस योजना की साँसें उखाड़ फेंकीं। वर्तमान में यह योजना कर्ज की ड़ायलिसिस पर जीवित है और लगभग अंतिम साँसें गिन रही है। मातृ एवं बाल मृत्यु पर नियंत्रण की कथित् पुरजोर कोशिशों में लगे राज्य की संवेदनशीलता इस बात से ही जाहिर होती है कि बाल मृत्यु पर नियंत्रण के लिये ही सरकार द्वारा चलाई जा रही इस योजना की ही स्वयं बालमृत्यु होने जा रही है। रचनात्मकता को प्रयोग की गुंजाईश दी जा सकती है परन्तु उस प्रयोग को सूक्ष्म रूप से पढ़ने, निरंतरता प्रदान करने और प्राप्त निश्कर्शो को आत्मसात करने की राजनैतिक इच्छाशक्ति भी उतनी ही प्रबल होनी चाहिये और जिसका कि अभाव हरेक स्तर पर दिखता है। क्योंकि महज़ योजनाओं की घोषणा कर देने से योजनायें तो कागज् पर बखूबी चलती रहेंगी और नित, बचाई जा सकने वाली माँओं की मौतें होती रहेंगी।
आज के युग में प्रसिध्दि कौन नहीं पाना चाहता ? और इसके लिये अनूठे प्रपंच रचने में भी किसी को कोई कोताही नहीं। मीड़िया की बढ़ती सक्रियता ने लोगों के इन ख्वाबों को सुनहरा रंग देना भी शुरू कर दिया है। उदाहरणस्वरूप पिछले दिनों किसी ने भोपाल में भिखारियों का फुटबॉल मैच कराकर भिखारियों के साथ भद्दा मजाक किया, अलबत्ता वह प्रसिध्दि भी पा गया। यह सब व्यक्ति विशेष तक सीमित हो तो स्वीकार्य होता है, लेकिन जब सरकारें जनकल्याण के नाम पर इस तरह की ओछी प्रसिध्दि पाने की नई-नई तकनीकें बनाम योजनायें जुगाड़ने लगती है तो फिर यहाँ जनकल्याण को सुपरिभाषित किये जाने की आवश्यकता है? जनकल्याण के नाम पर प्रसिध्दि पाने के इस सरकारी खेल के लिये आपको कटनी जिला ले चलते हैं।
संस्थागत् प्रसव को बढ़ावा देने के उद्देश्य से जिलाधीश के विशेष संरक्षण में शुरू की गई इस योजना का नाम है प्यारी माँ। वैसे तो अपना पहला जन्मदिन ही फरवरी 2006 में मनाया और इस अवसर का केक भी स्वास्थ्य मंत्री और तत्कालीन जिलाधीश की अध्यक्षता में काटा गया। परन्तु संसाधनों के अभाव ने दो माह बाद ही इस योजना की साँसें उखाड़ फेंकीं। 'प्यारी माँ' योजना का विस्तार यह है कि इस योजना में प्रतिमाह संस्थागत् प्रसवों में से प्रत्येक प्रसूता का नाम इस योजना के लिये रखा जाता है तथा माह के अंत में एक ड्रा निकालकर प्रोत्साहन पुरस्कारों की घोषणा की जाती थी। प्रोत्साहन पुरस्कार भी एक से लेकर आठ तक क्रमष: टेबिल फेन, स्टील टंकी, प्रेशर कुकर, लेड़ीज घड़ी, चाँदी की पायल, साड़ी, टॉर्च तथा चाँदी की बिछिया आदि रहे। नि:संदेह किसी भी योजना की तरह ही इस योजना की मंशा पर तो सवालिया निशान नहीं लगाया जा सकता है, परन्तु बात तो आकर क्रियान्वयन पर ही ठहरती है । रचनात्मकता को प्रयोग की गुंजाईश दी जा सकती है परन्तु उस प्रयोग को सूक्ष्म रूप से पढ़ने, निरंतरता प्रदान करने और प्राप्त निश्कर्षो को आत्मसात करने की राजनैतिक इच्छाशक्ति भी उतनी ही प्रबल होनी चाहिये और जिसका कि अभाव हरेक स्तर पर दिखता है।
जिले के छ: विकासखंड़ों में 26 संस्थाओं के बलबूते चल रही इस योजना ने शुरूआत में तो निश्चित रूप से अपनी सफलता के परचम लहराये और प्रथम दो माह में ही संस्थागत प्रसवों की संख्या बढ़ी भी। जहाँ फरवरी में संस्थागत् प्रसवों की संख्या 465 थी वहीं मार्च में यह बढ़कर 716 हो गई। अप्रैल से मई में यह उछाल रूकी और दक्षिणोत्तर क्रम में प्रसवों की संख्या क्रमश: 674 व 551 हो गई। इसका कारण यह रहा कि योजना के नवयौवना काल में इसे राज्य सूचना शिक्षा संचार ब्यूरो का सहयोग मिला और तब आठ पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई तथा प्रथम दो माह में ताबड़तोड़ तरीके से छ: ब्लॉक की 224 महिलाओं को प्रोत्साहित कर दिया गया। लेकिन नवीन वित्त वर्ष में ही इस योजना के हाथ-पैर फूल गये और संसाधनों की कमी रोड़ा बनकर सामने आ गई। इस प्रकार प्रथम दो माह में ही बोझ बन गई 'प्यारी माँ' !
नवीन वित्त वर्ष (2006-07) में सवाल यह नहीं था 'प्यारी माँ' योजना के तहत् किन्हें प्रोत्साहित किया जाना है ? बल्कि सवाल यह था कि कैसे प्रोत्साहित किया जाना है क्योंकि इस योजना के लिये बजट की कमी सामने आ गई ? जैसे-तैसे, मान-मनुहार कर डी.एफ.आर्इ.डी. समर्थित आर.सी.एच. परियोजना से इस योजना के लिये 33,000 रूपये की राषि कर्ज के रूप में ली गई है। वर्तमान में यह योजना कर्ज की ड़ायलिसिस पर जीवित है और लगभग अंतिम साँसें गिन रही है। मातृ एवं बाल मृत्यु पर नियंत्रण की कथित् पुरजोर कोशिशों में लगे राज्य की संवेदनशीलता इस बात से ही जाहिर होती है कि बालमृत्यु पर नियंत्रण के लिये ही सरकार द्वारा चलाई जा रही इस योजना की स्वयं बाल मृत्यु होने जा रही है। क्योंकि इस योजना को कर्ज के रूप में तीन माह का सहारा तो मिल गया परन्तु इस योजना का भविष्य तो अंधकारमय ही है?
योजनाओं की ही बात करें तो वैसे तो सरकार अतिगरीब परिवारों के लिये बहुप्रचारित योजना दीनदयाल अन्त्योदय उपचार योजना के तहत् 20,000 तक के नि:शुल्क ईलाज करने के दावे ठोंक रही है परन्तु योजना की वास्तविकता यही है कि विगत् वर्ष सरकार ने इस योजना के लिये महज 1.50 करोड़ रूपये का बजट रखा और जबकि मध्ये प्रदेश में 47 लाख गरीब परिवार हैं तो फिर वह प्रति परिवार लगभग 3.19 रूपये का बजट आता है। इस वर्ष यह बजट बढ़ाकर 17.84 करोड़ कर दिया गया है जो कि प्रति परिवार लगभग 37.95 रूपये के आस-पास आता है। तो फिर कहाँ है प्रति परिवार 20,000 का नि:शुल्क ईलाज ? और कटनी के संदर्भ मंग देखें तो शासन की वेबसाईट पर उपलब्ध नवीनतम जानकारी के अनुसार अभी भी कटनी के 65.89 पात्र हितग्राहियों के पास इस योजना का कार्ड वितरित नहीं किया गया है।
मध्यप्रदेश |
संस्थायें |
वर्तमान संख्या |
जरूरत |
कमी |
संख्या
2001 |
जरूरत
2002 |
कमी |
CHC
PHC
SHC
DHC |
04
19
162
01 |
07
29
176
..... |
03
10
14
....... |
8835
1194
229
36 |
10524
1691
428
45 |
1689
497
199
9 |
संस्थागत् प्रसव को बढ़ावा देने संबंधी नित नई योजनाओं की घोषणा कर सरकार अपनी प्रतिबध्दता की दुहाई देती रहती है परन्तु वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है क्योंकि केवल संस्थाओं में प्रसव कराने का प्रचार/विचार करने या योजनाओं की घोषणा कर देने मात्र से ही से ही बालमृत्यु एवं मातृमृत्यु पर नियंत्रण पा लिया होता तो क्या नहीं था? परन्तु अधोसंरचनात्मक विकास की बातें सरकार विस्मृत कर देना चाहती है। कटनी के संदर्भ में ही देखें तो हम पायेंगे कि जनसंख्या के वास्तविक अनुपात के आधार पर कितनी संस्थाओं की कमी है (तालिका क्र.1) । और सन् 2002 के मानव विकास प्रतिवेदन, म.प्र. को आधार मानें तो कटनी में 30 प्रतिशत् मुख्य चिकित्सा स्वास्थ्य अधिकारियों का टोटा है तथा 68.2 प्रतिशत गाँव पहुँच विहीन हैं। ऐसे में 'प्यारी मॉं जैसी अनगिनत् योजनायें भी बाल व मातृ मृत्यु पर नियंत्रण नहीं कर सकतीं।
ऑंकड़ों के खेल में माहिर प्रदेश सरकार की एक ओर बानगी देखिये कि स्वास्थ्य विभाग की आधिकारिक वेबसाईट कहती हैं कि कटनी जिले में कुल प्रसवों की संख्या 3666 है और जिसमें से 35.3 प्रतिशत् प्रसव संस्थागत् प्रसव हैं। लेकिन दूसरे ही पन्ने पर इसी समयावधि में शासन की वेबसाईट कहती है कि कटनी जिले में 3066 कुल प्रसव हुये हैं और जिसमें से 42.2 प्रतिशत् संस्थागत हैं। अत: प्रशासन के अपने ही ऑंकड़ों में 600 प्रसवों का सीधा अन्तर है और कम प्रसवों पर सरकार 7 प्रतिशत् ज्यादा संस्थागत् प्रसव दर्शा रही है। ज्ञात हो कि ये भ्रामक ऑंकड़े 'प्यारी माँ'योजना के लागू होने के बाद के ऑंकड़े हैं अतएव ये पूरी योजना की प्रामाणिकता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाते हैं ? साथ ही प्रशासन के नापाक मंसूबों की ओर इशारा भी करते हैं। इससे यह भी सिध्द होता है कि सरकार फर्जी ऑंकड़ों में ही योजनायें चलाना चाहती हैं।
'प्यारी माँ' की सफलता से उत्साहित राज्य सरकार इस योजना के अन्य जिलों में अनुसरण की कवायद करने में जुटी हैं, योजना के विश्लेषण के बाद समझ यह नहीं आता कि राज्य सरकार किस चीज का अनुकरण करने की बात करना चाहती है योजना के अंर्तगत् दिये जा रहे भ्रामक ऑंकडों का ? या फिर योजना के बीच में बोझ बन जाने का ? या फिर नित नई योजनाओं की घोषणा करने और मुद्दे को ताक पर रखकर झूठी प्रसिध्दि पाने का ? सरकार को चाहिये कि वह संस्थागत् प्रसव की योजनाओं को लागू करने से पूर्व उन संस्थाओं की व्यवस्था भी सुनिश्चित करे जिनमें वह प्रसव करवाना चाहती है। क्योंकि महज़ योजनाओं की घोषणा कर देने से योजनायें तो कागज् पर चलती रहेंगी और रोज, बचाई जा सकने वाली माँओं की मौतें होती रहेंगी।
प्रशांत कुमार दुबे
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