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  सहरिया आदिवासियों की व्यथा कथा
दो गांव नहीं, एक दर्दनाक हकीकत
 
     
 

कराहल (जिला श्योपुर) 27 अक्टूबर। भोपाल में मध्यप्रदेश के प्रशासनिक मुख्यालय में अब से छह माह पहले स्वास्थ्य विभाग ने यह घोषणा की थी कि राज्य में अब प्रसव से जुड़ी जटिलताओं के कारण होने वाली मौतों को पूरी तरह से रोकना सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है। तभी यह भी घोषणा की गई थी गरीबी अब महिलाओं की मौत का कारण नहीं बनेगी और सरकार इन महिलाओं को प्राकृतिक संरक्षक की भूमिका निभायेगी। नीति बनाने का मानना रहा है कि संस्थागत प्रसव से राज्य में हर रोज होने वाली 45 मातृत्व मृत्यु को न्यूनतम स्तर पर लाया जा सकता है। इसके लिये गर्भवती महिला को सात सौ रूपये और गर्भवती महिला को अस्पताल में प्रसव कराने के लिये प्रेरित करने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अथवा स्वास्थ्य कार्यकर्ता को प्रोत्साहन राषि और गांव से अस्पताल तक पहुंचने के लिये परिवहन की व्यवस्था के उद्देष्य से छह सौ रूपये का प्रावधान किया गया है। मकसद बहुत स्पष्ट है और योजना बेहद महत्वाकांक्षी। फिर मध्यप्रदेश सरकार ने हाल ही में भोपाल की एक आलीशान होटल में जष्न मनाया। यह जश्न इसलिये मनाया गया क्योंकि सुरक्षित मातृत्व के संदर्भ में किये गये प्रयासों के लिये दस में से दस अंक मिले हैं परन्तु इस जश्न की रौशनी के बाहर सहरिया आदिवासियों के जीवन में गहरी कालिमा छाई हुई है।

राज्य के श्योपुर जिले के सहरिया आदिवासी बहुल गांवों में सरकार के सुरक्षित मातृत्व के मकसद और योजना का चेहरा बदरंग ही नजर आ रहा है। जिला मुख्यालय से साठ किलोमीटर दूर रानीपुरा गांव के शिवलाल की पत्नी भभूति जब गर्भवती हुई तो उसे प्रसव की पीड़ा के साथ-साथ सरकारी व्यवस्था के अमानवीय व्यवहार के कारण होने वाली पीड़ा का अंदाजा नहीं था। भभूति ने अपने सामने ही गांव की छह महिलाओं को बच्चों के जन्म से समय दम तोड़ते देखा था। इसलिये उसे प्रसव के गंभीरतम् परिणामों के बारे में यही पता था कि संभवत: प्रसव के बाद उसके योनिद्वार से रक्त का इतना बहाव होगा कि फिर कभी कोई पीड़ा भोगने के लिये वह जीवित न रहेगी। परन्तु शिवलाल को स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने बार-बार यही बताया कि भभूति अपना बच्चा कराहल के अस्पताल में ही जनेगी। वहां उसे जीवन का अधिकार मिलेगा। प्रसव का समय आने पर गांव के लोग वाहन की व्यवस्थ करके कराहल के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र ले गये, जहां पहुंचने पर उसके शरीर से तेज गति से रक्त स्त्राव हो रहा था किन्तु वहां किसी डॉक्टर को शिवलाल खोज नहीं पाया और चार घंटे बाद चिकित्सक तक वे पहुंचे तो भभूति की हाल को बिना जांचे ही उसे जिला चिकित्सालय की ओर रेफर कर दिया गया। अब शिवलाल की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा था क्योंकि वह अपनी जमापूंजी खर्च करके ही गांव से कराहल तक पहुंचा था। अब जिले तक जाना उसके लिये बिना किसी जवाब का सवाल था। तब एक स्थानीय व्यक्ति को तत्काल अपनी जमीन गिरवी रखकर उसने सात सौ रूपये की व्यवस्था की। अब वह यह नहीं चाहता था कि अपने घर से दूर कहीं भभूति की मौत न हो जाये क्योंकि उसके अंतिम संस्कार के लिय वह उसे वापस नहीं लेकर जा पायेगा। जब वे जिला अस्पताल पहुंचे तो उनसे दीनदयाल अन्त्योदय कार्ड की मांग की गई, जो कि शिवलाल को मिला ही नहीं था। भभूति के बच्चे के जन्म के साथ शिवलाल को ढाई हजार रूपये के कर्ज का अभिशाप मिला।

रानीपुरा के पास ही गोठरा कपूरा गांव की ममता ने सरकार की इस योजना का दूसरा ही रूप देखा। जननी सुरक्षा योजना की मूल भावना यह है कि गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाली महिलाओं को सुरक्षित मातृत्व के साथ-साथ जरूरी पोषण का अधिकार मिले, इसके लिये उसे सात सौ रूप्ये की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। ताकि बच्चे के जन्‍म के बाद आर्थिक संकट के कारण उन्हें तत्काल एक-दो दिन के नवजात शिशु को लेकर भारी शारीरिक श्रम की मजदूरी करने न जाना पड़े और उसे भरपेट खाना मिल सके। ममता जब प्रसव के लिये अस्पताल पहुंची तो उसका स्वागत तू-तड़ाक के शब्दों के साथ हुआ और जब उसने अपनी बात कहनी चाही तो नर्स बहनजी ने कहा कि ''तू ही तो अकेली जनने वाली नहीं है।'' बहुत देर बाद उससे पहली नर्स ने तीन सौ रूपये की मांग की क्योंकि इसके बाद ही उसे भर्ती किया जाने वाला था। ममता ने तो यही पूछा कि ''हमें तो सरकार पैसा देगी न।'' नर्स ने तब कहा था कि ''हां, तुम जनो और सरकार पैसा देगी। वह सब बाद में मिलेगा।'' पांच सौ रूपये अस्पताल तक पहुंचने के लिये खर्च करने के बाद तीन सौ रूपये नर्स, तीन सौ रूपये फिर चिकित्सक को देने के बाद डेढ़ सौ रूपये सफाई करने वाली बाई ने लिये। अस्पताल में तो उसे एक दवा भी नहीं मिली और 330 रूपये की दवाई बाजार से खरीदकर ममता के पति फूल सिंह को लाना पड़ी। ममता ने सरकारी योजना का यह अनुभव श्योपुर जिले में हो रही कुपोषण मृत्यु की जांच की प्रक्रिया के दौरान सुनाया था। तब वहां मौजूद जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी ऐ. के. दीक्षित ने ममता से पूछा कि ''यह सब पैसा तो तुमने बच्चे के जन्म की खुशी में बांटा होगा, तुमसे किसी ने छीना तो नहीं था।'' वास्तव में सरकार की जननी सुरक्षा योजना को जमीनी स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों ने निहायत ही अमानवीय ढंग से परिभाषित कर लिया है। परिभाषा यह है कि सरकारी सहायता का उपयोग रिष्वत बांटने में किया जाये। गोठरा कपूरा की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बिलासी कहती हैं कि ''मंशा तो अब भी पवित्र नहीं है। सुरक्षित मातृत्व के लिये इस योजना का लाभ गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाली गर्भवती महिलाओं को ही मिलेगा किन्तु गांव में 14 परिवारों के खाने के लाले पड़े हैं पर वे गरीब नहीं माने जाते है। इस महिलाओं को न तो जननी सुरक्षा योजना का लाभ मिलेगा न ही दीनदयाल उपाध्याय अन्त्योदय उपचार योजना का।'' जबकि हर सहरिया परिवार गरीबी की रेखा के नीचे और अति- गरीब माना गया है फिर भी राज्य में हजारों सहरिया परिवारा गरीबी की सरकारी पहचान से वंचित है।

राज्य में असुरक्षित मातृत्व का जिन्न अब चूंकि चिराग से बाहर निकल आया है इसलिये राज्य सरकार के ऊपर सघन कोशिशें करने का जबरदस्त दबाव भलि-भांति महसूस किया जा सकता है। विगत एक वर्ष में सरकार नें प्रसव हेतु परिवहन योजना, विजयराजे सिंधिया अन्त्योदय बीमा योजना, जननी सुरक्षा योजना जैसी पांच नीतिगत ताबड़तोड़ घोषणायें कर डाली परन्तु इन व्यवस्थाओं को स्थापित करने के प्रयास लगभग शून्य ही रहे हैं। पूरी कोशिश संस्थागत प्रसव की अधिकतम लक्ष्य हासिल करने की है परन्तु संकट यह है कि कोई सी योजना नर्स और चिकित्सकों को संवेदनशील नहीं बना सकती है और सुरक्षित मातृत्व के सम्बन्ध में हो रहे प्रयासों से यही पता चल रहा है कि भ्रष्टाचार और स्वास्थ्य केन्द्र के कर्मचारियों का दुर्व्यसवहार अभी एक बड़ी चुनौती है। इसके साथ ही जब राज्य स्तर पर नीतियों का सवाल आता है तब यह विश्लेषण महत्वपूर्ण हो जाता है कि सरकार ने अब तक श्योपुर जैसे वंचित इलाके और सहरिया जैसी पिछड़ी हुई आदिम जनजातियों के लिये ठोस कार्य योजना नहीं बनाई है। आज भी चलित चिकित्सालय और धनवंतरी योजना का क्रियान्वयन श्योपुर के केवल एक ही विकासखण्ड में हो रहा है। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि सरकार प्रसव मौतों की रोकथाम के लिये लोकव्यापी योजनायें बनाये न कि पांच जिलों और 50 ब्लाक के हितग्राहियों के लिए। इतना ही नहीं योजनाओं का लाभ पाने के लिये पात्रता के जो मापदण्ड तय किये गये हैं उन पर भी व्यापक पुनर्विचार की जरूरत है। आज भी कई वास्तविक गरीबों के नाम बीपीएल सूची में नहीं हैं और उन्हें न तो उपचार मिल पा रहा है न ही दवायें। एक सुरक्षा के लिए गर्भवती महिलाओं को पांच योजनाओं का चक्रव्यूह तोड़ना पड़ता है। गांव में स्वास्थ्य जांच के लिये सामान्य चिकित्सा व्यवस्था का प्रावधान है जो ग्रामीणों ने कभी देखी नहीं है।

आमतौर पर यह माना जाता है कि गांवो में नीम-हकीम या पंजीकृत स्वास्थ्य कार्यकर्ता लोगों का इलाज करते हैं किन्‍तु रानीपुरा और गोठरा में गरीबी का संकट इतना गहरा है कि वहां कोई अनाधिकृत डॉक्टर भी फर्जी काम नहीं करना चाहता है क्योंकि वह खुद भी भुखमरी का शिकार हो जायेगा। इसके बाद जब प्रसव का वक्त आता है तो प्रसव हेतु परिवहन योजना के अन्तर्गत महिला को अस्पताल ले जाने का प्रावधान है। इसमें हर गांव में एक वाहन अनुबंधित किया गया है जिसे स्वास्थ्य प्रशासन भुगतान करता है परन्तु किसी सहरिया को यह नहीं पता है और वे स्वयं परिवहन के लिए पांच सौ से पन्द्रह सौ रूपये खर्च कर रहे हैं। इसके साथ ही भारत सरकार के सहयोग से जननी सुरक्षा योजना चल रही है जिसमें गर्भवती महिला को सात सौ रूपये की सहायता दी जाती है। अस्पताल में प्रसव होने पर यदि महिला जीवित रहती है तो उसे एक हजार रूपये की सहायता मिलती है और मृत्यु हो जाती है तो उसके परिवार को पचास हजार रूपये की बीमा राशि मिलती है। अब तक की सच्चाई यह है कि पूरे प्रदेश में हर ब्लाक में लक्ष्य कर दिये गये हैं कि केवल 50 से 100 महिलाओं को ही जननी सुरक्षा योजना का लाभ मिलेगा। चूंकि बजट का प्रावधान इतना कम रखा गया था कि वह छह माह में ही समाप्त हो गया है। क्या यह संभव नहीं है कि सरकार एक समग्र नीति और सुरक्षित मातृत्व योजना बनाये ताकि गरीब परिवार सरकारी कागजी कार्रवाई से मुक्त होकर महिला और शिशु की देखभाल कर सके।

अभी प्रजनन स्वास्थ्य कार्यक्रम जैसे प्रयासों में सरकार का पूरा ध्यान केवल उपकरणों की खरीदी तक ही सीमित है जिसमें व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार के अवसर मौजूद हैं। वास्तविकता यह है कि स्वास्थ्य के बुनियादी अधिकार की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये न केवल अस्पतालों की इमारतों की जरूरत है बल्कि उनमें संवेदनशील चिकित्सक, उपयोगी दवाओं, जांच की सुविधायें और आम आदमी (जिसमें मरीज और उसके परिजन दोनों शामिल हैं) के लिये सहज वातावरण की भी जरूरत होगी; किन्तु यह दुर्भाग्य ही है कि अभी मध्यप्रदेश में अभी न तो अधोसंरचनात्मक स्थिति में बहुत बदलाव हुआ है न ही मानवीय व्यववहार में संवेदनशीलता परिलक्षित हो रही है

सचिन कुमार जैन, रोली, उमा और नरेन्द्र

 
     
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