होशंगाबाद जिले के सोहागपुर विकासखण्ड के अजेरा गांव के देवी सिंह केवट की पत्नी हेमलता बाई का प्रसव जिला अस्पताल में एक कठिन ऑपरेशन से हुआ। गरीब परिवार की हेमलता पहले से ही कमजोर थी और ऑपरेशन के समय उसका हिमोग्लोबिन 9 था, जबकि सामान्य स्थिति में यह 14 होना चाहिए था। प्रसव के समय उसका रक्तचाप बढ़ा हुआ होने की वजह से उसे झटके आने लगे, तीन झटके के बाद हेमलता अपने होश खो बैठी। वह न तो ऑंखे खोल रही थी, न ही कुछ बोल रही थी। ऐसी हालत में जिला अस्पताल ने हेमलता को हमीदिया अस्पताल, भोपाल रैफर कर दिया। एक गरीब परिवार के लिए यह बहुत मुश्किल था। हेमलता के पास गरीबी रेखा का कार्ड तो था, पर नि:शुल्क इलाज के लिये दीनदयाल अन्त्योदय उपचार योजना का कार्ड नहीं था। आखिरकार इस गरीब को अपने इलाज में 16 हजार रुपये गंवाने पड़े और जिसके लिए उसके परिवार को गांव के एक साहूकार से 5 फीसदी मासिक की दर से कर्ज लेना पड़ा। निश्चय ही मुफ्त इलाज की इस पात्र महिला को प्रशासन की गलतियों का खामियाजा भुगतना पड़ा, क्योंकि यदि उसका समय पर कार्ड बन गया होता तो उसे गरीबी के दुश्चक्र में फंस जाने की संभावना नहीं थी।
गरीबी रेखा के नीचे आने वाले परिवार को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए 25 सितम्बर 2004 को प्रदेश सरकार ने दीनदयाल अन्त्योदय उपचार योजना शुरू की, योजना के अंतर्गत गरीबी रेखा के नीचे आने वाले परिवारों की नि:शुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की बात कही गई है। इसमें कहा गया है कि गरीबी रेखा के नीचे आने वाले परिवार के सदस्य को 1 वर्ष में 20 हजार रुपये तक के नि:शुल्क इलाज की सहायता सरकारी अस्पताल में भर्ती होने पर मिलेगी, इस योजना के अंतर्गत हर गरीबी रेखा के परिवार को एक दीनदयाल कार्ड दिया जाएगा और अस्पताल में भर्ती होने पर इलाज का विवरण उस कार्ड में दर्ज किया जायेगा। पर अफसोस की बात है कि प्रदेश के सभी गरीबों को इस योजना का कार्ड नहीं मिल पाया है।
वर्तमान में प्रदेश के 1332432 ऐसे परिवार हैं जिनके पास अभी भी दीनदयाल कार्ड नहीं है, जिसमें से हेमलता का परिवार भी शामिल है। प्रदेश में 181671 ऐसे भी परिवार हैं जिनके पास आज की स्थिति में कोई राशन कार्ड नहीं है, यानी आज भी 1514103 ऐसे परिवार हैं जो दीनदयाल अन्त्योदय योजना का लाभ लेने से वंचित हैं।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण -3 के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं में अधिक एनेमिया (खून की कमी) पाया गया है। इसका प्रतिशत आदिवासी और दलित महिलाओं में अधिक है। इसी सर्वेक्षण के अनुसार प्रदेश के 62.6 प्रतिशत लोग स्वस्थ्य सेवाओं का लाभ नहीं उठाते, इसका सबसे बड़ा कारण स्वास्थ्य सेवाओं का उपलब्ध न होना, समय पर सुविधाएँ न मिलना आदि हैं। भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2007-08 के अनुसार आज भी मध्यप्रदेश की जनता ग्रामीण इलाकों में 439.06 प्रति व्यक्ति माह के खर्च पर जीवनयापन कर रही है। देष के बीमारू राज्य कहे जाने वाले राज्यों में से मध्यप्रदेष एक है। वर्ष 2007 के मानव विकास प्रतिवेदन के अनुसार प्रदेश की हालत स्वास्थ्य सेवाओं के संदर्भ में बहुत खराब है।
यूं तो प्रदेश सरकार नित्य नई योजनाओं को शुरू करने के लिए प्रसिध्द है परन्तु योजनाओं की निगरानी और बेहतर क्रियान्वयन के लिए सरकार द्वारा कोई रणनीति नहीं बनायी जाती। योजना के तहत मार्च 2008 तक 4790668 परिवारों को गरीबी रेखा के कार्ड बांटे गये, जबकि राज्य में 61 लाख गरीब परिवार निवास करते हैं। योजना की हकीकत सिर्फ यहां ही सामने नहीं आती, बल्कि स्वास्थ्य विभाग के अनुसार अप्रैल 2007 से मार्च 2008 तक की स्थिति में केवल 11 प्रतिशत यानी कि 556625 परिवारों को ही योजना का लाभ मिल पाया है।
किसी भी योजना के सफल या असफल होने का कारण बजट की कमी भी है। प्रदेश सरकार ने दीनदयाल योजना के लिए वर्ष 2004-05 में महज 1.5 करोड़ रुपये बजट का प्रावधान की और वर्ष 05-06 में इसे बढ़ाकर कर दिया गया 17.42 करोड़ रुपये। प्रदेश सरकार के वर्ष 2004-05 और 2005-06 के गरीबी रेखा के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 53.79 लाख गरीबी परिवार थे एवं वर्ष 2005-2006 में यह संख्या 63.30 लाख हो गयी। इस योजना के हिसाब से वर्ष 2004-05 में प्रति परिवार वर्ष केवल 2 रुपये 70 पैसे का ही आवंटन किया गया, वहीं वर्ष 2005-06 के लिए यह राशि 26.67 रुपये थी। इसी तरह वर्ष 2006-07 के लिए 19.42 करोड़ एवं 07-08 के लिए यह राषि 39.50 करोड़ हो गयी। इसी प्रकार यदि इन वर्षों में प्रति परिवार आवंटन देखा जाये तो 5866571 गरीब परिवार के लिए यह राशि 33 रुपये और 67.33 रुपये कर दी गयी। वर्तमान में सरकार ने इस वर्ष 2008-09 में यह बजट बढ़ाकर 1060 लाख रुपये कर दी है जिसके अनुसार अभी भी 180 रुपये प्रति परिवार के आसपास आता है।
प्रदेश में गरीबी रेखा से सर्वे के आंकड़ों के अनुसार 968933 (11.93) परिवार गंभीर खाद्य असुरक्षा की स्थिति से ग्रसित हैं। इन्हें दिनभर में एक वक्त का खाना भी नसीब नही होता। यदि इस बजट को प्रति सदस्य के हिसाब से देखा जाये तो यह आंकड़ा नाम मात्र का रह जायेगा। अब प्रश्न यह है कि सरकार क्या हमेशा जनता से ऐसे ही वादा करती रहेगी या फिर योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के लिए प्रयास भी करेगी?
वर्ष 2004 में मध्यप्रदेश की बाल मृत्यु दर 79 थी, जबकि राष्ट्रीय औसत 58 था। यह देश के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा है। वर्ष 2000-2004 के बीच मेें बाल मृत्यु दर, राष्ट्रीय स्तर पर घटकर 68 से 58 हुई, वहीं प्रदेश में यह 87 से घटकर 79 ही हुई। जहां तक मातृ मृत्यु दर का सवाल है, यह राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण - 2 के आंकड़ों यानी 498 प्रति हजार से घटकर 2003 में जारी किये गए आंकड़ों के अनुसार 379 प्रति हजार ही हो पाई है जो कि राष्ट्रीय आंकड़ों 301 प्रति हजार से कहीं ज्यादा है, इसी वजह से प्रदेश में भूख से एवं कुपोषण से मौत के किस्से अभी अक्सर अखबार की सुर्खियाँ बनते नज़र आते हैं।
इस तरह से देखा जाये तो निश्चय ही नई योजनाओं की घोषणा बिना सोचे और बिना आंकलन किये की जा रही है। जरूरी यह नहीं है कि कितनी योजनाओं की घोषणा की जा रही है, जरूरी यह है कि घोषित योजनाओं के सही क्रियान्वयन और निगरानी की बेहतर व्यवस्था पर जोर दिया जाये। वर्तमान चुनावी घोषणा-पत्रों मेें स्वास्थ्य ही नहीं अन्य मुद्दों पर राजनीतिक दलों द्वारा किये गये वायदों पर हमें इसी नजर से विश्लेषण करने की जरूरत है।
रोली शिवहरे |