नवजात शिशु यानि वह मासूम जो अपने हक के लिए किसी से कुछ नहीं कह सकते। जिनके पास अपनी अभिव्यक्ति का रोने के सिवा कोई रास्ता नहीं है। वह समाज की अवैज्ञानिक सोच के चलते अपने सबसे मूल हक से ही वंचित हैं। अपनी जिंदगी के हक, मां के दूध से। जबकि मां के दूध से बेहतर उनके लिए कोई दूसरा पोषण नहीं है। लेकिन स्तनपान की जानकारियों के अभाव, सामाजिक परंपराओं, भ्रांतियों ने नवजात शिशुओं की राह में अनेक रोड़े खडे क़र दिए हैं। अब जबकि चिकित्सा विज्ञान यह बात पूरी तरह से साबित कर चुका है कि मां का दूध ही नवजात का पहला टीका है। उसमें रोगों से लड़ने की प्रबल प्रतिरोधक क्षमता है। स्तनपान जितना षिषु के लिए आवश्यक है, उतना ही माता के लिए भी। इसके बाद भी देश में हर साल होने वाली शिशु मृत्युदर में 22 प्रतिषत मौत का कारण पहले घंटे के अंदर शिुशुओं को मां का दूध नहीं मिलना ही है।
जहां एक ओर कुपोषण, खून की कमी से जूझ रही लाखों माताओं से नवजात शिशुओं को मां का पोषण नहीं मिल पाता है, वहीं दूसरी ओर शहरों में महिलाओं का कथित सौंदर्य बोध भी उनके लाड़ले/लाड़ली को स्तनपान से महरूम रखने में अहम भूमिका निभाता है। यही कारण है कि मां के अमृत से वंचित लाखों शहरी बच्चे एनिमिया, विकलांगता जैसे अनेक जानलेवा रोगों की चपेट में आ जाते है। स्पष्ट है कि स्तनपान के प्रति उदासीनता को केवल अशिक्षा की समस्या कहकर नहीं टाला जा सकता है। यह हमारे सामाजिक रिवाजों, जनश्रृतियों की देन है। इनके कारण ही देश में जन्म के पहले घंटे में स्तनपान नहीं पाने के कारण प्रतिवर्ष दस लाख शिशुओं की मौत हो रही है।
इसके साथ ही पहले घंटे में स्तनपान से तरसने के कारण बच्चों को जीवनरक्षक कोलस्ट्रम नहीं मिल पाता, जिसके चलते पांच साल की उम्र के भीतर ही प्रतिवर्ष 250000 से अधिक बच्चों के जीवन का अंत हो जाता है। तीसरे राष्ट्रीय हेल्थ सर्वे-3 एनएफएचएसध्द के विश्लेषण बेहद डरावने, सरकारी दावों की पोल खोलने वाले हैं। इसके अनुसार देश में जन्म के पहले घंटे में केवल 23.4 प्रतिशत नवजात शिशुओं को ही मां का दूध मिल पाता है। मप्र में तो यह आंकड़ा और भी चिंताजनक है। प्रदेश में 14.9 प्रतिशत बच्चों को ही जन्म के पहले घंटे में मां का दूध मिल पाता है। जाहिर है, बड़ी संख्या में बच्चे जीवन अमृत से वंचित हैं। इस तरह मप्र शिशुओं के स्तनपान के मामले में 29 राज्यों में 24 वें नंबर पर है। इससे ही उन तमाम सरकारी दावों की कलई खुरक्षित ले जाती है, जो लगातार यह साबित करने पर तुले रहते हैं कि हम सुमातृत्व की दिशा में लगातार सुधार कर रहे हैं।
मां का दधू सही समय पर नहीं मिलने के पीछे सैकड़ों वर्षों से चली आ रही ऐसी मान्यताएं भी हैं, जिनका कोई तार्किक आधार नहीं है। अपने बघेलखंड में नवजात शिशुओं को तीसरे दिन दूध पिलाने का रिवाज है। वह भी उसकी अपनी मां का नहीं बल्कि किसी ऐसी महिला का जो एक बच्चे की मां हो। इस प्रथा को स्थानीय भाषा में '' पेंउआं'' कहा जाता है। इसके अंतर्गत बच्चे को ही नहीं मां को भी भूखा रहना होता है, पूरे छह दिन तक। उसे पहले तीन दिन तक कुछ नहीं दिया जाता है। तीन दिन बाद भी केवल लड्डू, दूध देने का ही रिवाज है। भोजन तो छह दिन बाद ही नसीब होता है। इन सबके बीच नवजात को काजल से पोत दिया जाता है, जबकि डॉक्टरों की ओर से इसकी सख्त मनाही होती है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से बच्चों के स्वास्थ्य की नींव पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अब जबकि चिकित्सा सेवाओं का प्रचार-प्रसार गांव-गांव तक पहुंच रहा है, कुछ सीमा तक ऐसी कुप्रथाओं को रोका जा सका है, लेकिन अभी भी अनेक हिस्सों में बच्चों का जीवन ऐसे टोटकों के चलते संकट में है।
यही कारक हैं जो देश के दुर्बल बचपन के जिम्मेदार हैं। एनएफएचएस-3 के अनुसार देश में 6 से लेकर 35 माह तक के 82.6 प्रतिशत बच्चे एनिमिया से पीड़ित हैं। ऐसे बच्चों का इलाज अनेक स्थानों पर कहीं ओझा बाबा करते नजर आते हैं। तो कहीं पर गर्म चिमटे, कहीं धारदार हथियारों से बच्चों को ठीक करने के प्रपंच किए जाते हैं। अशिक्षा एवं वैज्ञानिक तथ्यों के प्रचार-प्रसार की कमी के कारण लाखों की संख्या में बच्चे अनायास ही जिंदगी और मौत के बीच झूलते रहते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि शिशुओं के जन्म के समय स्तनपान से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने के लिए बड़े पैमाने पर सामजिक जागरुकता अभियान चलाए जाएं। जिससे बच्चों के बचपन को स्वथ्य रखा सके और माताओं के जीवन को भी अनेक अनचाहे खतरों से बचाया जा सके।
दयाशंकर मिश्र
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