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लोकतंत्र का खतरनाक चेहरा

 
     
 

आज लोकतंत्र को नई भूमण्डलीकृत चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जब सरकार ने अन्य पिछड़े वर्गों को निजी क्षेत्र और उच्च तकनीकी शिक्षा में आरक्षण देने की नीति बनाने की मंशा जाहिर की तो दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के सौ-डेढ़ सौ डॉक्टरों और छात्रों ने विरोधा में धरना दिया। लोकतंत्र का हर स्तंभ इस छोटे से समूह की कदमताल से थरथरा गया और आरक्षण का मुद्दा अटक गया। वही हुआ जो ये लोग चाह रहे थे। इसके दूसरी तरफ मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में बड़े बांधों के कारण उजाडे ज़ा रहे पांच हजार आदिवासी जुलाई के बरसते आसमान के नीचे दस दिन बैठे रहे पर सरकार ने उनकी बात पर अमल करना तक उचित संवाद करना तक जरूरी नहीं समझा। इन हजारों आदिवासियों के गगनभेदी नारे और डूबती जिंदगियों के गीतों का व्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ा। बहरहाल खाकी वर्दी और सरकारी हथियारों की सीमा रेखा के बीच इस समूह को कैद कर दिया गया। और जब संवाद शुरू हुआ तो सबसे पहले जन संघर्ष के चरित्र और मंशा पर ही सवाल खड़ा किया गया। अंतत लोग एक औपचारिक सा निर्णय लेकर धरने से उठ गये, 38 दिन का अनशन भी सरकार को झझोड़ न पाया। मुद्दा यह है कि लोकतंत्र में जन और जन अधिकारों की रक्षा की अपेक्षा किससे की जायेगी। यह प्रश्न जरूर पूछा जाना चाहिये कि इण्डिया के नये चमकते हुये चेहरे की प्रतीक पांच प्रतिशत उद्योगतियों और उद्यमियों की छींक से सरकार हिलने लगती है किन्तु 95 फीसदी भारत के छोटे किसानों की आत्महत्या और डूबते परिवारों की आवाज क्यों नहीं सुनाई देती? ऐसे में स्वाभाविक रूप से समाज मेें शांति और सुरक्षा की संभावनायें कम होती जायेंगी। रोटी, आजीविका, संसाधन और सम्मान जीवन के वे हिस्से हैं जिनका न तो दान किया जा सकता है न ही बलिदान। यदि इन्हें छीना जायेगा तो प्रभावित समूह निश्चित रूप से प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा। यह कतई नहीं मानना चाहिये कि लुटने वाले आदिवासी तो घने-गहरे जंगलों में रहते हैं और वे सत्ताा की मुख्यधारा में आकर अपनी उपस्थिति नहीं दर्ज कर सकेंगे। यह सोचना भ्रम है। 

वर्तमान समय में अति गरीब और सामाजिक बहिष्कार का सामना कर रहे परिवारों के जीवन का अधिकार भी संकट में है। सरकारी योजनाओं का लाभ केवल उन्हीं को मिलता है जो गरीबी की रेखा  की सरकारी परीक्षा में उत्ताीण्र्_ा होते हैं। दिक्कत यह है कि सरकार यह पहले से ही तय करके रखे हुये है कि हमें तो केवल 26 फीसदी को ही गरीब मानना है। परिणामत: 18 फीसदी गरीब परिवार लोकतांत्रिक सरकार के संरक्षण के अधिकार से वंचित हो जाते हैं। जब ये वंचित अपनी पहचान की मांग करते हैं तो उन्हें उपेक्षा और दुत्कार मिलती है। बहरहाल सरकार चाहती है कि भुखमरी के शिकार होकर भी ये लोग मौन रहें और अपनी चियति में विश्वास करें। कई कोशिशों के बाद भी मध्यप्रदेश में लाखों परिवार गरीबी की रेखा की सूची से बाहर हैं और जब देवास में 300 दलितों ने सूची में बदलाव की मांग की तो सरकार ने लाठियां भांज कर उन पर प्रकरण दर्ज करा दिये। अब लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर सरकार पर कैसे और क्यों विश्वास करें?

विकास की विचारधारा में संसाधनों (जल, जंगल और जमीन) को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। यही कारण है कि बाजार की ताकतवर शक्तियाँ आज इसी जद्दोजहद में हैं कि किस तरह गांवों और शहरों में मौजूद इन संसाधनों पर एकाधिकार जमाया जा सके। लोकतंत्र में जनता सरकार को यह अधिकार देती है कि वह विकास और व्यवस्था के संरक्षण के लिए कानून और नीतियाँ बनायेगी। फिर समाज उनका पालन करेगा परन्तु अब हमारे सामने केवल समाज और सरकार दो ही पक्ष नहीं हैं बल्कि नये परिदृष्य में समाज-सरकार और बाजार एक त्रिकोण में खड़े हो गये हैं। इस समीकरण में सरकार और बाजार एकजुट होकर समाज का शोषण कर रहे हैं। यह माना जाता है कि हर कानून के प्रति समाज की सहमति होती है इसलिये सरकार हर काम कानून के जरिये ही करती है। ब्रिटिश सरकार ने 1894 में भूमि अधिग्रहण  कानून बनाया था जिसमें सरकार अपने प्रयोजनों के लिये कहीं भी किसी भी रूप में लोगों (या कहें कि आम व्यक्तियों और किसान) की जमीन को अपने कब्जे में ले सकती है। 1984 में इस कानून में संशोधन कर दिया गया जिसके अनुसार अब केवल सरकार अपने हितों के नाम पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को फायदा पहुंचाने के लिए भी आदिवासियों-किसानों को जमीन से कानूनन बेदखल कर सकती है। एक अहम् बात यह है कि बड़े बांधों के कारण मध्यप्रदेश में 44 हजार परिवारों के लिये संकट पैदा करना, पश्चिम बंगाल में सिंगुर और नंदीग्राम में जमीने छीनने के लिये सरकारी दमन, उड़ीसा के कलिंगनगर में सरकारी हिंसा, ये सब घटनायें कानूनी रूप से सही हो सकती हैं किन्तु इंसानियत और लोकतंत्र के नजरिये से इन्हें कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता है। यदि भोपाल के सार्वजनिक स्थान पर संगठित और अहिंसक रूप से आदिवासी  किसान अपने अधिकारों की परिभाषा दोहराते हुये सरकार से संरक्षण की मांग करते हैं परन्तु यदि उन्हें नहीं सुना जाता है तो क्या इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार स्वयं अधिकारों के हनन की प्रक्रिया में एक हिस्सेदार है। लोग भूखे और गरीब हो सकते हैं परन्तु इससे उनका सम्मान कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। लोकतंत्र में लोक का ही सबसे ज्यादा अपमान हो रहा है। कोई और करे न करे, इस देश का आम आदमी लोकतंत्र में विश्वास करता है और इसीलिये वह खुलकर लोकतंत्र के सिध्दान्तों का सहारा लेता है। आज के उद्योगपति और बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ (जिनके लिये फोरलेन सड़कें बन रही हैं, और बिजली का निर्माण हो रहा है) बड़े ही सुनियोजित ढंग से लोकतंत्र को नजर अंदाज कर रही हैं। यह इतना नियोजित है कि कभी यह लगता ही नहीं है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ हिंसा कर रही है। इनके लिये तो सरकार ख्रुद ही ही हिंसा करती है। नंदीग्राम में सलीम समूह के लिये आदिवासियों से जमीन छीनने के लिये सरकार ने हत्यायें की, यही कलिंगनगर में भी हुआ और फुटकर व्यापार को बढ़ावा देने के लिये देश भर में रिलांयस की दुकानों की सुरक्षा सरकारी तंत्र ने की। गुजरात में तो राज्य सरकार का चेहरा इतना भयानक हो चुका है कि वहां समुदाय मौन रहकर विकास के हिंसक रूप को स्वीकार करने के लिये बाध्य है। आज अधिकारों के संरक्षण की बहस में संगठित और असंगठित वर्गों की परिभाषा बार-बार केन्द्र में आती है। व्यापक स्तर पर यह माना जाने लगा है कि जब तक संगठित नहीं हुआ जायेगा तब तक जीवन सरल नहीं होगा और इसी आधार पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ कहने लगी हैं कि हम असंगठित फुटकर बाजार को संगठित कर रहे हैं। विडम्बना यह है कि नीतिगत रूप से सरकार भी इस बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आर्थिक लाभ के लिये संगठन की बात कर रही हैं। वास्तव में जबकि समाज की जरूरत है कि वह अधिकारों और मूल्यों के लिये संगठित हो। इस विभेद को नजर अंदाज नहीं किया जाना चाहिये पर जो अधिकारों के लिये संगठित होने की विचारधारा का समर्थन करते हैं उन्हें राज्य विरोधी की संज्ञा दी जाती है। सरकार का नजरिया इस तथ्य से भी स्पष्ट हो जाता है कि कृषि से जुड़ी हुई 66 प्रतिशत जनसंख्या को आर्थिक संरक्षण देने के लिये वह नीतिगत रूप से सहमत नहीं है। जिस औद्योगिक क्षेत्र में 16 प्रतिशत लोगों का जीवन चलता है उससे देश की विकास दर को मापा जाता है और इस विकास दर को सरकार 10 प्रतिशत तक ले जाना चाहती है जबकि कृषि की विकास दर को 2 प्रतिशत के आस-पास रखकर ही संतुष्ट है। बार-बार बहुमत के लोकतंत्र का तर्क दिया जाता है किन्तु बहुमत के जीवन की शांति और सुरक्षा की कीमत पर ही राजनीति के अध्याय भी लिेय जा रहे हैं विडम्बना यह है कि संविधान की शपथ लेकर कार्य संचालन करने वाली सरकारें स्वविवेक के बजाये राजनैतिक संगठनों के हाथ कानून व्यवस्था सौंपती जा रही हैं।  छत्ताीसगढ़ की राजधानी में ईसाई समुदाय के शिक्षक ने जब गरीब परिवारों के बच्चों को मुफ्त शैक्षिक सहायता दी तो धर्मान्तरण के नाम पर धार्म सेना के बेलगाम युवकों ने दो घंटे तक सरेराह उसकी पिटाई की। ये प्रकरण एक या दो नहीं बल्कि मध्यप्रदेश में ही 37 ऐसे मामलों को सूचीबध्द किया जा चुका है। अब राज्यों मेें लोकतांत्रिक समूह नहीं बल्कि कट्टरपंथी संगठन शासन करते हैं।

कई स्तरों पर कानून या तो प्रत्यक्ष रूप से जनविरोधी हैं या फिर कानूनों के बीच परस्पर विरोधाभास है। संविधान के तिहत्तरवें और चौहत्तरवें संविधान संशोधनों के मद्देनजर  संविधान के अनुच्छेद 243 के आधार पर ग्रामसभा और वार्ड स्तर पर स्थानीय निकायों को सक्षम बनाने के लिये वित्ता आयोग की स्थापना की जाना थी पर सरकार की इसमें रूचि ही नहीं रही। सरकार जानती है कि स्थानीय निकायों को ज्यादा अधिकार मिलने का मतलब कोका कोला और पेप्सी की लूट पर लोगों का नियंत्रण होना है।  भारत ने बाल अधिकार, महिला अधिकार, मानवाधिकार, खाद्य सुरक्षा समेत 12 से ज्यादा अर्न्तराष्ट्रीय घोषणाओं पर हस्ताक्षर किये हैं किन्तु ज्यादातर के बारे में सच यह है कि इन घोषणाओं का उपयोग क्रियान्वयन में ही नहीं किया जाता है। यूनेस्कों के सबके लिये शिक्षा के अभियान का भारत भी एक हिस्सा है और यूनेस्को की मान्यता है कि शिक्षा केवल व्यक्ति के विकास के नजरिये से महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि इससे समानता की स्थिति पैदा होगी और तभी लोकतंत्र भी मजबूत होगा। सैध्दान्तिक तौर पर यह माना जाता है कि शिक्षा के स्वरूप का निर्धारण स्थानीय, सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में किया जाना चाहिये ताकि स्थानीय समाज का अस्तित्व और पहचान बनी रहे। इसके विपरीत सरकारें (बाजारवाद के समर्थन में) शिक्षा का स्वरूप इसलिये बदल रही है ताकि वे अपने कट्टरपंथ और राजनैतिक स्वार्थों के एजेण्डे आगे बढ़ा सकें। इतना ही नहीं अब अमीरों की शिक्षा और गरीबों की शिक्षा के बीच बढ़ते अंतर को भी स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकता है। इस भेदभाव के कारण सामाजिक असमानता भी नये आयाम स्थापित कर रही है। शिक्षा के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का निवेश अकारण ही नहीं है, उन्हें जल्दी से जल्दी अपनी सेना के लिये ऐसे सैनिक चाहिये जो समानता की नहीं बल्कि निजी हितों की बात करें।
 
इसी तरह व्यापार की नई नीतियां भी सामाजिक शांति के लिये नई चुनौतियां खड़ी कर रही हैं। भारत और भारत के बाहर की 16 बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को फुटकर बाजार में पैर रखने की अनुमति सरकार ने दे दी। यह एक नीतिगत सुविधा है जिसके अनुसार बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत के छोटे-बड़े शहरों या कस्बों में अपने आलीशान सब्जी-किराना के शोरूम खोल सकती है। उन्हें दाल, चावल के साथ-साथ पकोड़े-समोसे बेचने की भी खुली अनुमति है। भारत में हर 8 गांव पर एक हाट-बाजार और एक हजार की जनसंख्या पर 11 फुटकर की दुकान होती है चाट-पकोड़े के ठेले लगाकर जीवनयापन करने वालों की गिनती तो अभी भी मुश्किल है। यदि हम आंकड़ों पर नजर डालें तो सवा चार करोड़ लोग इस तरह के छोटे-छोटे फुटकर व्यापार में लगे हुऐ हैं, परन्तु अब रिलायंस, मित्ताल, वालमार्ट जैसी 10 कम्पनियों ने फुटकर व्यापार भी शुरू कर दिया है। बाजार का नियम है कि वहां उसी का अस्तित्व बचा रह सकता है जिसके पास पूंजी होती है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से पूंजी के मामले में कौन सा फुटकर व्यापारी टक्क्र ले पाने की स्थिति में है। ऐसे वह अंतत: पत्थर उठाकर सरकारी दफ्तर और फुटकर शोरूम पर फेंकने का ही काम करेगा और सरकार कानूनन तो उद्योगपति का ही संरक्षण करेगी। अपनी पीड़ा का प्रदर्शन करने के लिये फेंके गये पत्थर के ऐवज में उन ठेले वाले को पुलिस की गोली सीने में धंसती हुई महसूस होगी, वह भी कानूनन। आखिर यह सोचना जरूरी है कि लोकतंत्र में एक विस्थापित, एक किसान, एक मजदूर, एक फुटकर व्यापारी, एक बच्चे और एक आम भारतीय की स्थिति क्या है?

सचिन कुमार जैन

 
     
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