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पिछले अनुभवों को देखते हुए इंदौर में 26 एवं 27 अक्टूबर को आयोजित होने वाले ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट की तैयारियों में मध्यप्रदेश सरकार कोई कोताही नहीं दिखा रही है। इसकी तैयारी एक समग्र परिप्रेक्ष्य में किया जा रहा है। इसके पूर्व खजुराहो में 15 से 17 जनवरी को इसी वर्ष ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट का आयोजन किया गया था, जिसमें कुल 39334 करोड़ रुपए के इंवेस्टमेण्ट के करार हुए थे। उसमें 17 एमओयू (मेमोरेण्डम ऑफ अंडरस्टैडिंग) और 9 ईओआई (एक्सप्रेशन ऑफ इंट्रेस्ट) पर विभिन्न देशी-विदेशी कंपनियों ने राज्य सरकार के साथ हस्ताक्षर किए थे। पर दुखद बात यह रही कि जल्द ही प्रदेश में निवेश का आश्वासन देकर करार करने वाली कई कंपनियों ने विभिन्न कारणों से निवेश में रुचि नहीं दिखाई। करार सिर्फ करार ही रह गए। इस बात को लेकर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से विधान सभा के बजट सत्र में कहा था कि सिर्फ एमओयू पर हस्ताक्षर हो जाने से ही ठोस परिणाम नहीं निकलता। श्री सिंह ने कहा कि उन्होंने भी कई एमओयू पर हस्ताक्षर किये थे पर उसका कोई सार्थक परिणाम नहीं आया था इसलिए एमओयू पर पूरी तरह विश्वास करना उचित नहीं।
यही वजह है कि म.प्र. सरकार और फिकी द्वारा पुन: आयोजित हो रहे ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट के बारे में मुख्यमंत्री ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इंवेस्टर्स मीट के बहाने वे भीड़ नहीं जुटाना चाहते इसलिए जो कम्पनियाँ वास्तव में मध्यप्रदेश में निवेश करने के लिए इच्छुक हैं उन्हें ही आमंत्रित किया गया है। इस मीट में 301 निवेशकों के आने की स्वीकृति मिल चुकी है जिसमें 100 विदेशी निवेशक भी हैं। विदेशी निवेशकों में से 41 इंग्लैण्ड की, 37 अमेरिका की, 8 संयुक्त अरब अमीरात की, 5 चीन की, 5 फिनलैंड की, 2 स्वीट्ज़रलैंड की, 1 मलेशिया की, 1 मॉरीशस की एवं 1 सिंगापुर की कम्पनियाँ हैं। मुख्यमंत्री स्वयं इस कार्यक्रम की सतत् मॉनीटरिंग कर रहे हैं। हाल ही में उन्होंने अपने इन्दौर प्रवास में अधिकारियों की एक बैठक में अब तक की गई तैयारियों की समीक्षा की थी। यद्यपि विपक्ष इस इंवेस्टर्स मीट को भी हल्के से ले रहा है पर मुख्यमंत्री ने विपक्ष से यह आग्रह किया है कि विकास के मुद्दे पर राजनीति न की जाए तो बेहतर है। उन्होंने ने इस कार्यक्रम को प्रदेश के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बताया। उन्होंने यह आशा जताई है कि निवेश सिर्फ कागजों पर नहीं होगा बल्कि यह हकीकत में दिखेगा भी। कार्यक्रम के पूर्व ही विभिन्न कम्पनियों से राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में निवेश के लिए बातचीत की गई है जिसमें अलग-अलग कम्पनियों के साथ कार्यक्रम में 78 हजार करोड़ रूपये के निवेश प्रस्तावों पर हस्ताक्षर किया जायेगा। इन प्रस्तावों पर अधिकारियों एवं कम्पनियों के प्रतिनिधियों के बीच प्रारंभिक चर्चा हो चुकी है। सरकार ने इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए 1592 निवेशकों को निमंत्रण भेजा था जिसमें से 301 ने प्रदेश में निवेश के लिए अपनी रूचि दिखाते हुए कार्यक्रम में आने की स्वीकृति दे दी है।
सरकार का प्रदेश में बारह सेक्टरों में निवेश पर जोर है। इन सेक्टरो में निवेश की क्या संभावनाएं हैं और सरकार की ओर से उस सेक्टर में क्या सुविधाएं दी जा सकती हैं को लेकर प्रस्तुतिकरण तैयार किए गए हैं। इन्हें उद्योग एवं वाणिज्य विभाग के प्रमुख सचिव की देखरेख में तैयार किया गया है। ये 12 सेक्टर हैं - खनिज उत्खनन, पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन, गृह एवं नगरीय विकास, आटोमोबाइल्स को केन्द्रित कर विशेष आर्थिक क्षेत्र, कपड़ा उद्योग, तकनीकी एवं उच्च शिक्षा, मूलभूत सुविधाएं, सूचना प्रौद्योगिकी, कृषि एवं कृषि औषधीय उत्पाद, वेयरहाउसिंग, ऊर्जा, स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य पर्यटन।
सरकार इस बात को स्वीकार कर रही है कि राज्य ने औद्योगिक विकास के क्षेत्र में देर से शुरुआत की है पर सार्थक कदम उठाया है। औद्योगिक रूप से विकसित राज्यों की श्रेणी में शामिल होने के लिए सरकार इस मीट को बहुत ही महत्वपूर्ण मान रही है, यही वजह है कि इस आयोजन के बाद बेहतर परिणाम सामने आए, इसके लिए कई मूलभूत सुविधाओं में सुधार के लिए भी सरकार बार-बार आश्वासन दे रही है। खजुराहो मीट में सरकार ने निवेशकों को यह आश्वासन दिया था कि निवेशको के लिए प्रदेश में सिंगल विंडो प्रणाली लागू की जाएगी और निवेशकों की समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर सुलझाया जाएगा। उक्त प्रणाली का लाभ निवेशकों तत्काल कैसे मुहैया कराया जा सकता है, इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है, क्योंकि पिछले अनुभव यह बताते हैं कि उसका समुचित लाभ नहीं मिल पाने से ही कई निवेशकों ने निवेश के प्रति अरूचि दिखा दी। यह भी सही है कि पूर्व में जो करार हुए थे और जिस सेक्टर में उनसे निवेश की चर्चा हुई थी, उस पर पूरी तरह से काम नहीं किया गया था, जिसकी वजह से वे सिर्फ कागजी करार होकर रह गए।
इस बार की तैयारियों को देखकर लगता है कि सरकार वाकई प्रदेश के औद्योगिक विकास के लिए चिंतित है पर प्रदेश में बिजली एवं यातायात की व्यवस्था में बेहतर सुधार किए बिना तमाम दावों के बावजूद उद्योगपतियों को संशय से बाहर लाने में मुश्किलें होंगी। सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या सिर्फ निवेशकों की समस्याओं के प्रति ही गंभीरता दिखाई जानी चाहिए या फिर इन निवेशों का अधिक से अधिक लाभ प्रदेश की आम जनता को कैसे मिलें, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए। उद्योगों के लिए अधिग्रहित की जाने वाली भुमि का उचित मुआवजा, खेती में निवेष से सीमांत किसानों एवं मजदूरों की आजीविका पर पड़ने वाले विपरीत प्रभावों को रोकना, खुदरा व्यापारियों के अधिकारों की रक्षा जैसे कई सवाल है, जिसका समाधान भी करने की जरूरत है।
राजू कुमार
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