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विसंगतिपूर्ण आंकड़े बच्चों के कुपोषण के लिए सबसे बड़ी चुनौती

 
     
 

एक अरसे के विश्लेषण के बाद बच्चों के कुपोषण से निपटने के लिए सबसे बड़ी चुनौती के बारे में अगर पूछा जाये तो संभवत: उत्तार होगा - सरकारी जानकारियों और आंकड़ों की विसंगतियां। जमीनी स्तर पर झाबुआ जिले की कालीघाटी आंगनबाड़ी के अन्तर्गत एक महिला पिछले चार वर्ष से लगातार गर्भवती है और कागजों में दो गुना पोषण आहार ले रही है। सतना जिले की बड़ेरा पंचायत की आंगनबाड़ी में 83 में से 21 बच्चे बागी अनुसूचित जनजाति हैं जो वर्ष में 10 माह गांव से बाहर रहकर भिक्षावृत्ति करके जीवनयापन करते हैं, फिर भी उन बच्चों की सेवा की कथा आंगनबाड़ी में वर्ष भर दर्ज होती है। बहरहाल कुपोषित बच्चों के सम्बन्ध में दिये जा रहे आंकड़ों को अब भी विश्‍सनीय नहीं माना जा सकता है क्योंकि जानकारियों के संकलन की प्रक्रिया बहुत ही विसंगतिपूर्ण है। नेशनल न्यूट्रीशनल मानीटरिंग ब्यूरों के अनुसार मध्यप्रदेश में 2001 में 14.7 प्रतिशत बच्चे सबसे खराब पोषण स्तर पर थे जबकि राज्य सरकार उस वक्त ऐसे बच्चों की संख्या 5.49 प्रतिशत बता रही थी। उपलब्ध अधिकृत आंकड़ों से पता चलता है कि कुपोषण के पहले और दूसरे ग्रेड में 53.08 प्रतिशत और तीसरे और चौथे ग्रेड यानी बच्चों की सबसे कमजोर अवस्था में 1.27 प्रतिशत बच्चे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि तकनीकी रूप से यदि शुरूआती स्थिति में 55 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे हैं तो तीसरे और चौथे ग्रेड में 13 प्रतिशत होंगे ही।

हाल के महीनों में कुपोषण के कारण बच्चों की मौतों के कई मामले सामने आने के बाद भी राज्य ने ऐसे कोई कदम नहीं उठाये हैं जिनसे इस समस्या के मूल को समझा और निराकृत किया जा सके। आधुनिक विकास की परिभाषा में अंधविश्वास लाने वाली वर्तमान सरकार जन-कल्याणकारी व्यवस्था में सरकारी निवेश को अनुपायोगी मानती है परन्तु वह यह नहीं समझ पा रही है कि बच्चों की पौध अगर कमजोर होगी तो भूमण्डलीय विकास का वृक्ष मजबूत नहीं बल्कि खोखला और आभाहीन होगा।

अब तक के अनुभव यह स्पष्ट रूप से सिध्द करते हैं कि मध्यप्रदेश के स्तर पर ही यदि छह वर्ष तक के दो तहाई बच्चे कुपोषण के शिकार हैं तो इसका एक बड़ा कारण राजनैतिक और प्रशासनिक नजरंदाजी है। कुपोषण के कारण जन्म के तुरन्त बाद शुरूआती दो वर्षों में बच्चे का होने वाला विकास अवरूध्द हो जाता है परन्तु 1994 में जब पहली बार बाल कल्याण नीति में इस मुद्दे को डाला गया था तब सरकार के पास इससे सम्बधिंत कोई आंकड़ा ही नहीं था कि वास्तव में कितने बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। इसके बाद वर्ष 2001 से जब बाल संजीवनी कुपोषण निवारण अभियान शुरू हुआ, तभी पहली बार कुछ हद तक जिला स्तर के आंकड़ें सरकार के पास आये।

जमीनी सच्चाई यह है कि आंगनबाड़ियों से आंकड़े एकत्र कर जिला स्तर पर समन्वित किये जाते हैं और 49700 में से ज्यादातर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता निरक्षर या किंचित मात्र ही साक्षर हैं, वे 50 रूपये प्रतिमाह की दर पर गांव के गुरूजी या पढ़े-लिखे व्यक्ति से विभाग के प्रारूप में जानकारी भरवाती हैं; जिसमें कोई समस्या है नहीं परन्तु समस्या तब आई जब उन्हें निर्देशित किया गया कि उन्हें पहले और दूसरे ग्रेड के बच्चों पर ध्यान नहीं देना है और तीसरे-चौथे ग्रेड के बच्चों की जानकारी दस्तावेज में या रिपोर्ट में लिखकर नहीं भेजना है। महीने भर की यह जानकारी अक्सर एक दिन में ही बैठकर भरी जाती है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बहुत ही विपरीत परिस्थितियों में अपने दायित्व निभा रही हैं। एक ओर तो उन्हें स्थानीय राजनीति और जातिवादी भेदभाव से जूझना पड़ता है तो वहीं दूसरी ओर उन पर वास्तविक स्थिति को छिपाने का दबाव रहता है। वास्तव में यदि विभाग गंभीर कुपोषण के आंकड़ों को सही रूप में प्रस्तुत करेगा तो उसे ज्यादा जवाबदेह होना पड़ेगा, सरकार को ज्यादा बजट आवंटित करना पड़ेगा परन्तु इस नजरअंदाजी का खामियाजा अति गरीबी में जी रहे परिवारों के बच्चों को भोगना पड़ा। मापदण्ड के अनुसार 80 बच्चों पर एक आंगनबाड़ी स्थापित होना चाहिये, परन्तु अभी कुल 49786 आंगनबाड़ियां ही हैं यानि जरूरत की एक तिहाई।

कभी भी आंगनबाड़ियों की कमी का मुद्दा राजनैतिक पटल पर या विधायिका में उठा ही नहीं क्योंकि आंकड़ें स्थिति को सामान्य बता रहे थे। यह रणनीति भी ध्यान देने योग्य है कि आंगनबाड़ी के स्तर पर सिवनी जिले की सभी 1420 आंगनबाड़ियों में निर्धारित प्रारूप में जानकारियां पेंसिल से भरे जाने के निर्देश हैं, तर्क तो यह है कि गलती न हों परन्तु सच्चाई यह है कि जानकारियों में पर्यवेक्षक, बाल परियोजना अधिकारी और जिला अधिकारी के स्तर पर हेर-फेर किया जा सके। जब हम जिला कार्यालय में कुपोषित बच्चों की जानकारियां लेने जाते हैं तो वहीं पर बैठे-बैठे पुरानी जानकारियों में बिना किसी तकनीकी आधार पर फेदबदल करके (कुपोषण को कम करके) नई आद्यतन जानकारी उपलब्ध करा दी जाती है। विसंगतियों की पुष्टि तो अप्रैल 2004 में मध्यप्रदेश प्रशासन अकादमी द्वारा किये गये बाल संजीवनी अभियान के मूल्यांकन से भी होती है जो यह स्पष्ट रूप से कहता है कि जिस दर से अभियान के फलस्वरूप कुपोषण कम हो रहा है, उससे पोषण नीति के लक्ष्यों को हासिल करने में दस साल लग जायेंगे। इतना ही नहीं कुपोषण निवारण का अभियान चलाते समय कहीं भी 'विटामिन-ए' की खुराक बच्चों को नहीं दी गई जबकि यह बुनियादी वैज्ञानिक जरूरत है। आश्‍चर्य है कि राज्य सरकार इसकी सप्लाई ही नहीं कर रही है।

इससे भी ज्यादा चौंकाने वाला एक निष्‍कर्श यह है कि जब अभियान चल रहा था जब आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के साथ गांव में स्वास्थ्य विभग का कोई कर्मचारी ही उपस्थित नहीं था। रिपोर्ट में साफ उल्लेख है कि इस समले पर महिला एवं बाल विकास विभाग का स्वास्थ्य विभाग के साथ कोई समन्वय नहीं है। इन बुनियादी विसंगतियों के बावजूद सरकार कुपोषण कम होने के आंकड़े पेश कर रही है। शिवपुरी के पिछोर विकासखण्ड में नवम्बर 2003 से आंगनबाड़ियों में पोषण आहार का वितरण बंद हो गया था। कारण था स्वयं सहायता समूह के बिलों का भुगतान न किया जाना। इस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय के आयुक्त एन.सी. सक्सेना ने तीन मर्तबा चेतावनी भरे पत्र राज्य सरकार को लिखे । इसका भी बहुत असर नहीं हुआ। फिर एक प्रश्न के जवाब में विधानसभा में 6 दिसम्बर 2004 को महिला एवं बाल विकास मंत्री ने कहा कि इसकी जांच कलेक्टर और संभागायुक्त ने की है। जिससे पता चला कि शिकायत निराधार है। वास्तव में ऐसी कोई जांच हुई ही नहीं है; इसके बाद 12 दिसम्बर 2004 को पिछोर विकासखण्ड के 16 गांवों के सहरिया आदिवासियों ने सर्वोच्च न्यायालय के आयुक्त को शपथपत्र देकर कहा कि आंगनबाड़ियों में अब भी पोषण आहार नहीं है और बीते वर्ष में केवल जुलाई एवं नवम्बर में 15-15 दिन पोषण आहार बंटा। अब जब विधानसभा के स्तर पर झूठी जानकारियां दी और स्वीकार की जाती हैं तो विश्वसनीयता का तो कहीं सवाल ही नहीं है।

जिस वर्तमान स्वरूप में महिला एवं बाल विकास विभाग ने कुपोषित बच्चों की जिला स्तर पर जानकारियाँ संग्रहित कर रखी हैं, उसके हिसाब से गांव के स्तर पर उसका पुनरीक्षण या परीक्षण तो किया ही नहीं जा सकता है। यदि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अपनी समस्याओं के बारे में बात करती है तो उसे प्रताड़ित किया जाता है। एक नजरिये से सरकार एक समस्या को महामारी के रूप में बदलने का जतन कर रही है।

यह बहुत जरूरी है कि अब भी कुपोषण के संकट पर गंभीर रूख अख्तियार किया जाये। इसके लिये राज्य स्तर पर कुपोषण और गरीबी की गंभीरता के आधार पर मानचित्रकरण (मेपिंग) करने की प्रक्रिया शुरू करना होगी ताकि सघनता, गरीबी, उपेक्षित समुदायों की मौजूदगी, रोजगार के कम अवसर जैसी स्थितियों के आधार पर इलाकों की पहचान की जा सके। अस्पृश्यता और भेदभाव से मुक्त नहीं है आंगनबाड़ियां; पर इस जानकारी को कहीं दर्ज नहीं किया जाता। सामाजिक सवालों को छिपाकर या जानकारियों में फेदबदल करके बच्चों और वंचित समुदायों के सामने खड़े संकटों को हल नहीं किया जा सकेगा।

सचिन कुमार जैन

 
     
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