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मध्यप्रदेश में कुपोषण, शिशु मृत्यु दर, बाल मृत्यु दर एवं महिला मृत्यु दर की स्थिति बहुत ही गंभीर हैं। प्रदेश में न तो संसाधनों की कमी हैं और न ही प्रशासनिक अमले की, इसके बावजुद स्थिति का गंभीर होना चिंतनीय है। इस बात को महिला एवं बाल विकास विभाग के सचिव बी.आर. नायडू ने एक कार्यक्रम में स्वीकार किया। उन्होंने यह भी कहा कि जो प्रयास किए गए हैं वे नाकाफी हैं। यद्यपि प्रदेश में कुपोषण मिटाने, बाल एवं शिशु मृत्यु दर कम करने के लिए कई योजनाओं का संचालन किया जा रहा है, फिर भी क्रियान्वयन में संवेदनशीलता का अभाव लक्ष्य हासिल करने में एक बड़ी बाधा है।
उल्लेखनीय है कि 6 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या वाले मध्यप्रदेश में लगभग 20 प्रतिशत जनसंख्या आदिवासियों की हैं, आदिवासी बच्चों में कुपोषण की स्थिति ज्यादा भयावह है। कुपोषण की स्थिति में बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है और ठीक हो सकने वाली सामान्य बीमारियों की चपेट में आ जाने पर भी उनकी मृत्यु की संभावना बढ़ जाती है। प्रदेश में तीन वर्ष तक के कुपोषित बच्चों की संख्या 1998-99 में 53.5 प्रतिशत की तुलना में 2005-06 में 60.3 प्रतिशत हो गई है। प्रदेश में प्रति 5 मिनट पर एक शिशु की मृत्यु होती है (यूनीसेफ)। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के अनुसार विकासशील देशों में पांच वर्ष तक के प्रति हजार बच्चों में 100 की मृत्यु हो जाती है। प्रदेश में कुपोषण कम नहीं होने के पीछे कई कारण हैं- आदिवासी क्षेत्रों में आंगनवाड़ी का अभाव, नियमित टीकाकारण नहीं होना, नियमित पोषणाहार वितरित नहीं होना आदि। कुपोषण कम करने के लिए सबसे अहम कार्य लोगों को आजीविका उपलब्ध कराना है ताकि वे दोनों वक्त नियमित खाना खा सकें और कुपोषण की स्थिति में नहीं आए। आंगनवाड़ी केन्द्रों का सर्वव्यापीकरण करना, क्योंकि इसके माध्यम से न केवल महिला एवं बाल विकास विभाग के कार्यक्रम संचालित होते हैं बल्कि स्वास्थ्य विभाग के कार्यक्रम भी संचालित होते हैं। आंगनवाड़ी केन्द्र के माध्यम से टीकाकारण, पोषणाहार, शालापूर्व शिक्षा, एवं बच्चों की देखभाल एवं निगरानी की जाती है।
प्रदेश में न केवल कुपोषण एवं शिशु मृत्यु दर ही प्रमुख समस्या है, बल्कि बच्चों से जुड़ी हुई कई ऐसी समस्याएं हैं, जिस पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है। इन समस्याओं के कारण बाल अधिकारों का हनन होता है। संयुक्त राष्ट्र के तहत बाल अधिकार समझौता हुआ था, जिसमें भारत ने भी यह सहमति जाहिर की थी कि देश में बाल अधिकारों के हनन को रोका जाएगा और बच्चों के विकास के लिए बेहतर वातावरण मुहैया कराया जाएगा। बच्चों से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन एवं उनके हितों की निगरानी के लिए विश्व के कई देशों में बाल अधिकार पर्यवेक्षक मंच का गठन किया गया है। इस सिलसिले में मध्यप्रदेश में भी यूनीसेफ की पहल एवं सहयोग से बाल अधिकार पर्यवेक्षक मंच का गठन किया गया। यह विश्व का बीसवां एवं देश का पहला बाल अधिकार पर्यवेक्षक मंच है।
इस मंच के उद्धाटन कार्यक्रम में प्रदेश के राज्यपाल डॉ. बलराम जाखड़ ने कहा कि सरकारें इस मामले में क्या कर रही हैं? पैसा खर्च होता है और काम नहीं होता, जिसे लेकर उन्होंने अपने को आहत बताया। उनका कहना है कि सिर्फ दिखावे की बात न हो, करने की इच्छाशक्ति होनी चाहिए, अन्यथा बच्चे भूखे मरेंगे तो गलत रास्ते पर ही जाएंगे। महिला एवं बाल विकास विभाग के सचिव बी.आर. नायडू ने कहा कि मंच अपने शोध कार्यों के माध्यम से नीतियों में कमी, क्रियान्वयन में कमी, जरूरतें आदि के बारे में बताएं, तो उसमें सुधार लाया जाएगा। यूनीसेफ के राज्य प्रतिनिधि हामिद अल बशीर का कहना है कि यह मंच निश्चय ही बाल अधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। मंच की अध्यक्ष पूर्व मुख्य सचिव निर्मला बुच ने बताया कि मंच एक थिंक टैंक की भूमिका निभाएगा, जो बाल अधिकारो से जुड़े सभी पहलुओं पर निगरानी करने के साथ-साथ बच्चों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर डाटा बेस तैयार करेगा।
राजु कुमार |
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