अब यहां कुपोषित बच्चे नहीं मरते है, कुपोषित बच्चों की सूची पंचायतों में लगाई जाती है और समुदाय व पंचायत सदस्य उन्हें गोद ले लेते हैं। उनकी देखभाल होती है और उन्हें पोषण पुनर्वास केन्द्र पर भिजाया जाता है। स्थानीय अनाज का उपयोग कर अनाज किट बनाया गया है। प्रसव किट भी बनाया गया है और महिलायें उसका इस्तेमाल भी करती हैं। बालाघाट जिले में हो रहे इस अभिनव प्रयास से एक उम्मीद जगी है। जहां एक ओर तो सरकार अपनी सारी ऊर्जा इस बात को नकारने में लगा रही है कि कुपोषण ही नहीं है। वहीं बालाघाट जिले में ग्रामीण जन चुपचाप कुपोषण को समुदाय का सवाल बनाकर अब सरकार की जवाबदेहिता तय करने में लगे हैं। समुदाय ने जन प्रतिनिधियों को भी कुपोषण के प्रति अपने कर्तव्य का बखूबी भान कराया है। सवाल यह है कि बालाघाट जिले का यह गुपचुप प्रयास सरकार कब देखेगी और पूरे प्रदेश में इसको अपनाने की प्रक्रिया चलायेगी।
जहां पूरे मध्य प्रदेश में बच्चों के कुपोषण से मरने की खबरें सामने आ रही हैं, वहीं बालाघाट जिले की बैहर विकासखंड से 15 किलोमीटर दूर गोहरा पंचायत के बैगानटोला की सुकवारो बाई अपने चार बच्चों के पिछल (खत्म हो जाने) जाने के बाद पांचवीं बार उम्मीद से है। सुकवारों बाई, बैगा जनजाति की है, जो कि प्रदेश की अत्यंत पिछड़ी तीन जनजातियों बैगा, भारिया और सहरिया में से एक है। सुकवारो बाई को इस बार उम्मीद से होने पर उसे जब टीके लगाने के लिये आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने बुलाया तो वह जंगल भाग गई। उनके साथ लगातार बातचीत करने और समझाने पर सुकवारों बाई ने न केवल सारे टीके लगवाये बल्कि प्रसव भी शासकीय अस्पताल में जाकर कराया। उसने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। बच्चे को भी लगे हैं सारे टीके और मां और बेटा आज दोनों स्वस्थ हैं।
वहीं करवाही पंचायत के बैगाटोला में आज से चार वर्ष पूर्व टीकाकरण का प्रतिशत शून्य था। आज वहां 98 प्रतिशत टीकाकरण होता है। यह सुनने में अजीब लग सकता है लेकिन गांव के पंच बंसीलाल तिलगाम ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के साथ मिलकर गांव में अलख जगाई और यह कर दिखाया। आज बैगाटोला के सभी बच्चों को पूरे टीके लगे हैं और वे स्वस्थ हैं। ऐसे अकेले दो गांव नहीं हैं, बल्कि ऐसे कई गांव हैं, जहां पर लोगों ने स्वास्थ्य के महत्व को जाना है । जच्चा, बच्चा के साथ-साथ सामुदायिक स्वास्थ्य की ओर भी अब ध्यान देना शुरू किया है। गांव के लोगों ने सहभागी तरीके से स्वास्थ्य नियोजन करना शुरू किया है।
आज से चार वर्ष पूर्व बालाघाट जिले के चार विकासखंड़ों बैहर, लांजी, लालबर्रा व बालाघाट में स्थानीय स्तर पर काम करने वाली संस्था कम्यूनिटी डेव्हलपमेन्ट (सीडीसी) सेण्टर ने केयर के साथ मिलकर आईएनएचपी (इंटीग्रेटेड न्यूट्रीषन एंड हेल्थ प्रोजेक्ट) परियोजना पर काम शुरू किया। आईएनएचपी परियोजना का मुख्य उद्देश्य बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य में गुणात्मक परिवर्तन लाना है। कम्यूनिटी डेव्हलपमेन्ट सेण्टर के निदेशक अमीन चार्ल्स कहते हैं कि जबकि यह एक पिछड़ी जनताति वाला क्षेत्र था, इसलिये यहां काम करना बेहद चुनौतीपूर्ण था, फिर भी हमने यह बीड़ा उठाया और चुनौती को स्वीकार किया। चार्ल्स कहते हैं कि हमने परियोजना के शुरूआत में आंगनवाड़ियों कार्यकर्ताओं का ओरियेंटेशन कर उनकी क्षमतावृध्दि की। इसके साथ-साथ नुक्कड़ नाटकों, बैनर, पोस्टर के माध्यम से समुदाय में जागरूकता लाने का प्रयास किया।
चूंकि अभी तक महिला एवं बाल विकास विभाग व स्वास्थ्य विभाग में आपसी समन्वय नहीं था, इसलिये यह काम कठिन था। यदि कहीं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अपना काम बेहतरी से कर रहीं हैं तो फिर स्वास्थ्य कार्यकर्ता टीकाकरण व अन्य कामों को महत्व नहीं देती थीं तो समग्रता में महिला एवं बाल स्वास्थ्य पर काम करना कठिन हो रहा था। हमने सबसे पहले आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की सेक्टर मीटिंग में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की उपस्थिति सुनिश्चित करवाई और ऐसे ही स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मीटिंग में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की उपस्थिति सुनिश्चित करवाई। इन बैठको से जहां एक ओर तो दोनों विभागों के बीच तालमेल बना, वहीं गांव की स्वास्थ्य संबंधी समस्यायें व आवश्यकतायें निकल कर सामने आने लगीं।
सीडीसी में काम कर रहीं ममता बताती हैं कि उनके यहां पर कुपोषित बच्चे ज्यादा मिलते थे, जिसके कारण यहां पर शिशु व बाल मृत्यु दर के प्रकरण बहुत ज्यादा थे, अतएव हमने यहां पर आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ कुपोषित बच्चों के लिये विशेष प्रयासों को लेकर कार्यशालायें कीं। कार्यकर्ताओं ने भी ये बताया कि जो स्थानीय भोज्य पदार्थ हैं, उसमें ही प्रोटीन/आयरन और वसा की प्रचुरता है, बशर्ते उसका सही इस्तेमाल किया जाये। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के सामने यह समस्या आई कि गांव वालों को बेहतर प्रयोग करना कैसे सिखाया जाये। इसके लिये यहां पर तैयार किया गया पोषाहार किट। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता व गांव वाले इसे अनाज किट के नाम से भी जानते हैं। इस अनाज किट में चावल, मक्का, दालें (चना, उड़द व तुअर), चना, मूंगफली, मुरमुरा व गुड़ के साथ-साथ तेल भी रखा गया है। स्वास्थ्य कार्यकर्ता बताती हैं कि केवल कुपोषित बच्चे ही नहीं बल्कि गर्भवती माताओं की मृत्यु भी एक गंभीर समस्या के रूप में सामने आ रही थी। हमने गर्भवती माताओं को समझाना शुरू किया कि प्रसव घर में नहीं होना चाहिये। यदि घर में प्रसव कराना जरूरी भी हो जाये तो प्रशिक्षित दाई से ही कराया जाना चाहिये। इसके अलावा प्रसूति के समय प्रसूता के पास पांच चीजें धागा, साफ कपड़ा, साबुन, आयरन टेबलेट तथा नई ब्लेड होनी अनिवार्य ही हैं। इन पांच चीजों के प्रदर्शन के लिये कार्यकर्ताओं ने प्रसव किट बनाना शुरू किया। जब-जब आंगनवाड़ी में मंगल दिवस मनाया जाता है, तब गोद भराई के समय गर्भवती महिला को प्रसव किट बनाना सिखाया जाता है । इसी दिन महिला को यह शपथ दिलाई जाती है कि वह अपनी डिलेवरी अनिवार्य रूप से अस्पताल में ही करायेगी और यदि नहीं तो फिर प्रसव किट का उपयोग आवश्यक है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता विमला मेश्राम कहती हैं कि पहले हम आयरन फोलिक ऐसिड की गोलियां देते थे, तो वे फेंक देती थीं, परन्तु अब महिलाओं ने इन्हें न केवल खाना शुरू किया है बल्कि वे अब औरों को भी सलाह देती हैं। मध्य प्रदेश में शायद बालाघाट ही एकमात्र ऐसा जिला है जहां पर आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की यूनिफॉर्म है। यहां पर आंगनवाड़ी केन्द्र अब बाल अधिकार केन्द्र के रूप में विकसित हो रहे हैं।
परियोजना समन्वयक सतीश जैन बताते हैं कि नवाचारों का यह सिलसिला यहीं नहीं थमता है, हमने यह कोशिश की कि कुपोषित बच्चों का नाम पंचायत में चस्पा हो और कुपोषित बच्चों की जिम्मेदारी पंचायतें लें। शुरुआत में तो यह करना बहुत कठिन था। पंचायतों के साथ लगातार संवाद करके हमने यह कोशिष की कि यह संभव हो सके। धीरे-धीरे पंचायतों ने भी इस पर रुचि दिखाते हुये बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया शुरू की। पंचायत व पंचायतों के अन्य सदस्यों के साथ मातृ सहयोगिनी समितियों के साथ काम किया गया। अब पंचायतों में गांव के सभी कुपोषित बच्चों की सूची लगती है। बोदा जैसी पंचायतों के सरपंच सीमा मेश्राम ने अपने स्वयं के पैसों से बच्चों को दूध व अलग-अलग पोषाहार का वितरण करके बच्चों को गंभीर कुपोषण से बाहर लाकर सामान्य अवस्था में लाने का प्रयास किया। परियोजना के प्रभावों से बालाघाट जिले में कुपोषण में 6 प्रतिशत तक की कमी आई है। पोषाहार को समझा कर अतिगंभीर कुपोषित बच्चों को वे पोषण पुर्नवास केन्द्र में भी भिजाते हैं।
निर्मला उईके, जो कि छिन्दीटोला की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं, उनका कहना है कि पहले जरूर काम करने में दिक्कत आती थी, अभी हम लोग भी बेहतर तरीके से काम करने लगे हैं। हमने स्वास्थ्य विभाग के साथ समन्वय कर ज्यादा चीजों को बेहतर किया है, साथ ही हमारी अब एक पहचान भी है। महिलाओं में बच्चों को जन्म के समय व पूर्ण रूप से दूध पिलाने की प्रवृत्ति 60 प्रतिशत हो गई है, जो कि पूर्व में क्रमश: 40 व 23 प्रतिशत था।
एक ओर जहां मध्य प्रदेश में चारों और से कुपोषण से बच्चों के मरने की खबरें आ रही हैं, वहीं बालाघाट जिले में सीडीसी व केयर के संयुक्त प्रयासों से समुदाय भी जागरूक हुआ है, और पिछले दो वर्षों में कुपोषण 6 प्रतिशत तक कम हुआ है। लोगों ने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध भोजन को अपनाना शुरू किया है। इन प्रयासों से एक चीज तो सिध्द होती है कि जहां एक ओर तो सरकार अपनी सारी ऊर्जा इस बात को नकारने में लगा रही है कि कुपोषण ही नहीं हैं। वहीं बालाघाट जिले में ग्रामीण जन चुपचाप कुपोषण को समुदाय का सवाल बनाकर अब सरकार की जवाबदेहिता तय करने में लगे है। समुदाय ने जन प्रतिनिधियों को भी कुपोषण के प्रति अपने कर्तव्य का बखूबी भान कराया है। अब सवाल यह है कि बालाघाट जिले का यह गुपचुप प्रयास सरकार कब देखेगी और पूरे प्रदेश में इसको अपनाने की प्रक्रिया चलायेगी।
प्रशांत दुबे |