प्रदेश में एक ओर दुनिया भर के निवेशकों को आमंत्रित कर औद्योगिक विकास के नए युग में प्रवेश की घोषणा की जा रही है, पर दूसरी ओर प्रदेश के दलित और आदिवासी समुदाय शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। हालत यह है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निर्वाचन क्षेत्र बुदनी के एक गांव भीमकोठी में 5 वर्ष उम्र तक के सभी बच्चे कुपोषित हैं, अधिकांश महिलाएं खून की कमी की शिकार हैं, गांव का कोई भी व्यक्ति साक्षर नहीं हैं, गांव तक पहुंच मार्ग नहीं है, और न ही पेयजल की व्यवस्था है, जबकि 17 साल पहले जब शिवराज सिंह विधायक थे, तब उन्होंने ग्रामीणों को उनकी समस्या का समाधान करने का आश्वासन दिया था। ग्रामीणों के लिए इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी कि अभी तक उनकी किसी ने सुध नहीं ली।
कुपोषित बच्चों में से कई बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार हैं। भीलाला आदिवासी वाले इस गांव के लोग पिछले 19 वर्षों से गांव में काबिज है पर अभी तक उन्हें पट्टा भी नहीं मिल सका है। मुख्यमंत्री विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के उद्धाटन के लिए कई दफा बुदनी जा चुके हैं। वे एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए ग्राम पंचायत खण्डावर भी गए थे, जहां उन्होंने विकास के लिए कई घोषणाएं की पर उसी ग्राम पंचायत का गांव भीमकोठी उपेक्षित रहा।
भोपाल से लगभग 60 किलोमीटर दूर पड़ता है वनग्राम कैरीचौका. वहां से 10-12 किलोमीटर अंदर जंगल में बसा है भीमकोठी। कागजों में वीरान गांव के रूप में दर्ज भीमकोठी पिछले 19 वर्षों से आबाद है पर गांव में शिक्षा एवं स्वास्थ्य की सुविधाएं होना तो दूर, अभी तक कोई पहुंच मार्ग भी नहीं है। ग्रामीणों को अन्य गांव-कस्बों से सम्पर्क के लिए पैदल आना-जाना ही एकमात्र जरिया होता है। भीलाला जनजाति के लगभग सौ लोगों की आबादी वाले इस गांव में 5 वर्ष तक के 25 एवं 6 से 14 साल तक के 32 बच्चे हैं। गांव में न आंगनवाड़ी है, न बालवाड़ी और न ही शाला। स्वास्थ्य केन्द्रों तक जाने के लिए पहुंच मार्ग नहीं होन से इलाज के लिए ग्रमीण तंत्र-मंत्र का सहारा लेते हैं। इसी परिस्थिति में कुछ दिन पूर्व एक सात वर्षीय बच्ची बाया ने इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया।
40 वर्षीय सुनीता बाई का कहना है, ''गांव में स्कूल होता, तो मोढ़ा-मोढ़ी (बालक-बालिकाएं) कुछ पढ़-लिख लेते. गए साल एक मास्टर पढ़ाने को आते थे पर अब नहीं आते।'' 35 वर्षीय तूफान सिंह ने बताया, ''जबसे हम लोग यहां आए, तबसे वन विभाग वाले हमें परेशान करते हैं वे नहीं चाहते कि हम यहां रहें। हमने शिवराज सिंह (वर्तमान मुख्यमंत्री) से सहायता की गुहार की थी, जब वे विधायक थे, आज वे मुख्यमंत्री हैं पर अभी तक उन्होंने हमारी सुध नहीं ली।'' 40 वर्षीय जुवान सिंह ने बताया, ''हमने कांतिलाल भूरिया (2002 में जब वे मध्यप्रदेश संसदीय प्रकोष्ठ के अध्यक्ष थे) को आवेदन दिया था, उन्होंने कलेक्टर को पट्टे आंबटित करने को लिखा था, इसके बावजूद कुछ नहीं हुआ।''
40 वर्षीय ओमकार सिंह कहते हैं, ''हम लोगों ने इस साल सांसद रामपाल सिंह से भी मुलाकात कर उन्हें अपनी समस्या से अवगत कराया था पर यहां कोई सुविधा देने की बात नहीं करता।'' 35 वर्षीय रीताबाई कहती हैं, ''गांव में स्कूल, आंगनबाड़ी और पानी की व्यवस्था हो जाती, तो अच्छा होता।'' सभी ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें वन विभाग के कर्मचारी परेशान करते हैं और वे चाहते हैं कि आदिवासियों को पट्टा नहीं मिले। उन्होंने बताया कि बुदनी के जंगल से सागौन की अवैध कटाई भी होती है पर उनके वहां होने से वन माफिया को परेशानी होती है, इसलिए वन विभाग के माध्यम से वन माफिया भी उन्हें हटाने का दबाव बनाते हैं।
भीमकोठी से भी 10 किलोमीटर अंदर जंगल में बसे यारनगर की आदिवासी महिला रेंदा बाई खण्डावर ग्राम पंचायत की सरपंच हैं। उन्होंने कहा, ''हम चाहते हैं कि भीमकोठी के लोगों को जल्द पट्टा मिल जाए और उन्हें स्कूल एवं आंगनबाड़ी की सुविधा मिले।''
इस क्षेत्र में कार्यरत एकता परिषद् के कार्यकर्ता राकेश ने बताया कि बुदनी, रायसेन जिले के लगभग सभी वन ग्रामों में सुविधाओं का अभाव है। आदिवासियों को झूठे केस में फंसा दिया गया है। उनके मामले वर्षों से लंबित हैं, पर फैसले आज तक नहीं हुए।
अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की राज्य सचिव संध्या शैली का कहना है, ''सरकार प्रदेश के विकास का दावा करती है पर जब मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र में ही इतनी भयावह स्थिति है, तो सरकार के दावों की असलियत खुल जाती है। अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून 2006 बन जाने के बाद भी राज्य सरकार ने जंगल में रहने वाले लोगों को पट्टे एवं अन्य अधिकार देने की कोई पहल नहीं की है। आज भी आदिवासियों को प्रताड़ित किया जा रहा है।''
Raju Kumar |