यह असंवेदनशीलता का चरम है कि 43 बच्चों की असामयिक मृत्यु के बावजूद राज्य सरकार की ओर से पिछले तीन महीनों में कोई ठोस कार्यवाही नहीं की गई। केन्द्रीय महिला व बाल विकास मंत्री भी खानापूर्ति करके वापस चली गई हैं। गांवों और शहरों में कुपोषण बढ़ता ही जा रहा है और दूसरी ओर सरकार शराब के कारखाने लगाने के मसले पर आपस में उलझ रही है।
म. प्र. के झाबुआ जिले के मेघनगर विकासखंड में केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ ने कुपोषण से बच्चों की मौत की खबरों के बीच आकस्मिक दौरा किया। मंत्री जी का झाबुआ दौरा पूर्व नियोजित था लेकिन कल्लीपुरा का दौरा मंत्री जी ने इन गांवों के लिए निकलने के आधे घंटे पहले कुछ स्थानीय स्वंयसेवी समूहों और पत्रकारों से सलाह-मशविरा कर तय किया था। इसके बाद बेतार पर बातें हुईं और सरकारी गाड़ियां दौड़ीं। मंत्री जी से पहले पहुंचने की होड़ लगी, क्योंकि मामला थोड़ा 'सैटल' करना था। तभी सुना कि तहसीलदार साहब प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर पदस्थ किसी कर्मचारी से फोन पर कह रहे हैं कि जल्दी आओ और अपना केन्द्र खोलो, मंत्री जी आ रही हैं। अब तो आप सब कुछ समझ गये होंगे?
अंतत: वे वहां पहुंच ही गईं, आंगनवाड़ी भी लगभग खुल ही गई थी। 10 मिनिट में 10 बच्चे ढूंढ़-ढांढ़ कर लाये गये। इन्हें हाथ-मुंह धुला कर तैयार किया गया था। पोषणाहार भर तैयार नहीं हो पाया था। कल्लीपुरा की यह आंगनवाड़ी विगत् 6 माह से बंद पड़ी थी। मंत्री जी द्वारा पोषणाहार के संबंध में बात करने पर किसी के पास कोई जवाब नहीं। महिला एवं बाल विकास विभाग की प्रमुख सचिव लवलीन कक्कड़ ने सांझा चूल्हा योजना का जिक्र करते हुये बताया कि वह तो स्कूल से आता है। जैसे तैसे यहां तो बचे। अब काफिला, भगोरगांव की ओर जाता है। वहां पर अंधेरे से एक कमरे में आंगनवाड़ी है। लेकिन तब तक यहां पर खिचड़ी बन चुकी होती है। यहां पर खिचड़ी बनी देखने पर प्रमुख सचिव यह कहती हुई खुश हो जाती हैं कि बांट दो और यहां वे यह बताना भूल जाती हैं कि यह सांझा चूल्हा से नहीं आया, मंत्री जी के आने पर बनाया गया है। खैर काफिला मदरानी और अगासिया गांव जाता है। यहां पर आंगनवाड़ी की पुताई हो चुकी है, नये खिलौने आ चुके हैं, रजिस्टर मेन्टेन किये जा चुके हैं यानी सब 'मैनेज' हो चुका है। लेकिन प्रशासन यहां भी गांव वालों को साध नहीं पाया और उन्होंने शिकायत कर दी। अंतत: मंत्री जी यह जान गईं कि कुपोषण तो यहां है ही।
ज्ञात हो कि झाबुआ के मदरानी और अगासिया गांव में पिछले 3 माह में 43 बच्चों की कुपोषण से मौत हो गई थी। इसे लेकर स्वास्थ्य विभाग व महिला एवं बाल विकास विभाग एक दूसरे पर दोषारोपण करते रहे है। गौरतलब है कि इन मरने वालों में अधिकांश बच्चे आदिवासी हैं। उपरोक्त घटनाएं बताती हैं कि प्रशासन की गैरजवाबदेहिता है, जो हर समय उजागर होती रहती है। कल्लीपुरा गांव में आंगनवाड़ी विगत 6 माह से नहीं खुल रही थी लेकिन प्रशासन ने कभी वहां जाना भी उचित नहीं समझा, भगोर में भी कमोबेश यही स्थिति है। वैसे जहां-जहां बच्चों की मौतें होती हैं, उन गांवों में तो प्रषासन अपनी पूरी ताकत इसे नकारने में झोंक देता है।
यह गैरजवाबदेहिता केवल झाबुआ की नहीं बल्कि प्रदेश स्तर पर ही जारी है। रीवा जिले में 30 सितंबर 09 को जवा विकासखंड़ के 22 गांवों के 36 कोल आदिवासी समुदाय के बच्चों को जवा के पोषण पुर्नवास केन्द्र (पो.पु.के.) में भर्ती करने के लिये लाया गया। लेकिन केवल 10 बच्चों को ही पो.पु.के. में भर्ती कराया गया बाकी 26 बच्चों को वापस भिजा दिया गया। अब ये बच्चे मरें या बचें इसकी जिम्मेदारी सरकार ने नहीं ली। प्रशासन ने यह भी उचित नहीं समझा कि इन्हें कहीं और रैफर कर दिया जाये। सरकार की पूरी व्यवस्था ही यही है कि जहां बच्चे मरें वहीं पर थेगड़े लगाओ। इसे प्रबंधन की भाषा में 'क्राईसिस मैनेजमेंट' कहते है।
झाबुआ मामले में भी प्रशासन ने 43 मौतों के बाद भी कोई ठोस प्रयास नहीं किये। भोजन का अधिकार प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के आयुक्तों के राज्य सलाहकार सचिन जैन द्वारा जिलाधीश से जवाब-तलब किये जाने के बाद जिलाधीश ने इन गांवों की सुध ली। मामले ने तूल तब पकड़ा जबकि एशियन ह्यूमन राईट्स कमीशन ने संज्ञान लेते हुये भारत व मध्यप्रदेश सरकार से संपर्क किया। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र की अंतर्राष्ट्रीय परिषद में भी कुपोषण से हुई मौतों का मामला उठाया गया। इसके बाद भी प्रशासन नहीं चेता और उसने केवल मदरानी और अगासिया गांवों में ही आंगनवाड़ी को पुतवाने में अपनी ऊर्जा लगाई। कल्लीपुरा और भगोर जैसे सैकड़ों गांवों में प्रशासन ने झांका तक नहीं।
केन्द्रीय मंत्री ने भी बहुत ही राजनीतिक ढंग से राज्य सरकार को बच्चों की मौत के लिये जिम्मेदार ठहराया और कहा कि हमारे द्वारा पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने के बाद भी सरकार ने बच्चों का ध्यान नहीं रखा। चूंकि केन्द्रीय मंत्री आकर गईं लेकिन राज्य सरकार की ओर से कोई भी नहीं गया, तो अब महिला एवं बाल विकास मंत्री तथा मुख्यमंत्री भी वहां जा रहे हैं। लेकिन कमोबेश प्रदेश के 52,000 गांवों में यही स्थिति है।
सरकार बच्चों को लेकर किसी भी स्तर पर संवेदनशील नहीं दिखती है। मध्यप्रदेश में प्रतिवर्ष प्रति बच्चे के स्वास्थ्य पर केवल 15 रुपये ही खर्च किये जाते हैं जबकि उड़ीसा और उत्तरप्रदेश जैसे अन्य बीमारु राज्यों में भी यह खर्च क्रमश: 70 और 60 रुपये है। यह तब है जबकि प्रदेश, विगत् पांच वर्षों में 6 लाख शिशुओं की मौत की गवाही दे रहा है। प्रदेश शिशु मृत्यु दर के मामले में पूरे देश में अव्वल है। प्रदेश सबसे ज्यादा कुपोषण (60 प्रतिशत) के मामले में भी देश में अव्वल है। बाल मृत्यु दर के मामले में प्रदेश (94 प्रति 1000) के साथ दूसरे नंबर पर है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के तृतीय चक्र के मुताबिक प्रदेश में गंभीर कुपोषित बच्चों की संख्या 13 लाख के आसपास है और जिनके समुचित इलाज के लिये सरकार के पास कुल 202 पोषण पुर्नवास केन्द्र ही हैं, इनमें से भी कई आंशिक संचालित हैं। यदि सरकार पूरी ताकत झोंक भी दे तो भी वर्तमान संरचना में तो कुपोषण से निपटने में 30 साल लगेंगें। इसके बावजूद अभी तक ना तो पोषण नीति नहीं बनाई है और ना ही इसके विभिन्न आयामों को देखते हुये समग्रता में इससे निपटने के प्रयास किये जा रहे हैं।
विधानसभा में कांग्रेस विधायक महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा के सवाल पर स्वास्थ्य मंत्री अनूप मिश्रा ने 8 मार्च को प्रदेश में कुपोषण 60 प्रतिशत बताया था। 11 मार्च को इन्हीं विधायक के सवाल पर महिला एवं बाल विकास मंत्री रंजना बघेल ने प्रदेश में 43 फीसदी कुपोषण होना स्वीकारा। केवल तीन दिन में 17 फीसदी कुपोषण का घटना अपने आप में चमत्कार है। सवाल यह है कि सही कौन कह रहा है? बच्चों से संबंधित दोनों विभागों की इसी आपसी खींचतान में बच्चे प्रभावित हो रहे हैं। बच्चों को पो.पु.के. तक लाने की जिम्मेदारी महिला एवं बाल विकास विभाग की है और इसके संचालन की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग की। यदि ज्यादा बच्चे भर्ती हुए तो यह सिध्द हो जायेगा कि कुपोषण है। इसलिये बेहतर रणनीति यही है कि बच्चों को पो.पु.के. ही ना लाया जाए और मरने के लिये छोड़ दिया जाए। दरअसल में यह नजरिये और मंशा का कुपोषण है।
सरकार की मंशा इस बात से भी साफ झलकती है कि इतने गंभीर स्वास्थ्य संकेतांकों के बाद भी प्रदेश की अपनी कोई स्वास्थ्य नीति नहीं है। कुल मिलाकर 37 गांड़ियों के काफिले के साथ चल रहीं मंत्री के आने से एक रिपोर्ट बनेगी और सिरे से नकार दिया जायेगा कि यहां पर कुपोषण है। किसी की भी कोई जवाबदेहिता सुनिश्चित नहीं होगी। कुछेक परिवारों को मनरेगा की रुकी हुई मजदूरी का भुगतान हो जायेगा। लेकिन तंत्र के छेद भरने की कवायद सतत चलती रहेगी।
प्रशांत कुमार दुबे |