अक्टूबर के पहले सप्ताह में श्योपुर जिले में कुपोषण के कारण बच्चों की मौतों के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित जांच आयोग ने रानीपुरा गांव में चार बच्चों, बंसी, सोनू, सुखलाल और किरन को गंभीर रूप से कुपोषित पाया। प्रशासन को इन बच्चों के इलाज और पोषण की व्यवस्था करने के निर्देश गांव में ही दे दिये गये परन्तु एक माह बाद पता चला कि उन बच्चों की ओर पलटकर किसी ने देखा और चारों नौनिहाल दुनिया से चल बसे। और यह संयोग तो कतई ही नहीं है कि इसके ठीक एक माह बाद मध्यप्रदेश पर सबसे कुपोषित राज्य होने का दाग गहरा हो गया है।
सवाल केवल आंकड़ों का नहीं है बल्कि उस कड़वी सच्चाई का है जो यह बताती है कि चमकदार विकास की मैराथन दौड़ में छोटे बच्चों को कुचलते हुये हम आगे बढ़ रहे हैं। विडम्बना यह है कि यह सच्चाई मध्यप्रदेश के लिये सबसे ज्यादा कड़वी है क्योंकि जिस निरन्तरता से इस राज्य को प्रगति और उन्नति के लिये पुरस्कार-सम्मानों से नवाजा जा रहा है, उसी दौड़ में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-तीन (एन.एफ.एच.एस-तीन) से पता चला कि पिछले आठ वर्षों में (यानी एनएफएचएस के दूसरे और तीसरे सर्वेक्षण के बीच की अवधि) में मध्यप्रदेश में कुपोषित बच्चों की संख्या में पांच फीसदी का गंभीर इजाफा हुआ है। राज्य में पोषण आहार की कमी स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव और पारिवारिक खाद्य असुरक्षा के कारण भुखमरी के शिकार होते बच्चों की संख्या 54 फीसदी से बढ़कर 60.3 प्रतिषत पर पहुंच गई है।
जो लोग मानते हैं कि कुपोषण का व्यापक समाज से कोई सम्बन्ध नहीं है उन्हें अब यह भलि-भांति समझ लेना होगा कि शारीरिक और मानसिक क्षमताओं का विकास न हो पाने की स्थिति में न तो औद्योगिकीकरण फलदायी होगा न ही आठ और दस फीसदी की विकास दर के सपने को सच ही किया जा सकेगा। सबसे दु:खद बात यह भी है कि दुनिया के सबसे गंभीर कुपोषण ग्रस्त इलाके और समुदाय भी मध्यप्रदेश में ही है। वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र में कुपोषण 10 फीसदी, राजस्थान में 7 फीसदी, छत्तीसगढ़ में 9 फीसदी और उत्तरप्रदेश में 5 फीसदी कम हुआ है।
ऐसा नहीं है कि पहले कुपोषण का संकट इतना गंभीर नहीं था, सच यह है कि बाल अधिकारों के अन्य पक्षों की तरह ही इसे भी लगातार नजरअंदाज ही किया गया क्योंकि बच्चे न तो वोट बैंक होते हैं और न ही वे विधानसभा के सामने धरने पर बैठकर अपने पोषण के अधिकारों की लड़ाई लड़ सकते हैं। बहरहाल विकास की असमान नीतियों ने उन्हें एक लगातार जारी रहने वाली भूख हड़ताल पर जरूर बिठा रखा है। उम्मीद यह जरूर की जाती रही है कि शायद जनप्रतिनिधि लोकतंत्र के सदनों (विधानसभा और लोकसभा) में ऐसी में ऐसी नीतियों के निर्माण की पहल करेंगे जिनसे बच्चों को पोषण का बुनियादी अधिकार सम्मनजनक तरीके से मिल सके किन्तु अफसोस की इस विषय को पिछले पांच वर्षों में केवल 0.3 प्रतिशत समय ही मिला और कई हजारों में से 77 सवाल ही पटल पर आ सके। बच्चों की कुपोषण से मुक्ति के लिये तो एक मर्तबा भी हंगामा इन सदनों में नहीं बरपा। अब इस सवाल पर विश्लेषण होना लाजिमी हो जाता है कि जब बार-बार यह कहा जा रहा है कि हर तरफ विकास हो रहा है तो फिर दूसरी तरफ कुपोषण में इतनी गंभीर वृध्दि की वजहें क्या है? गांव और शहर की बस्तियों में बिना पूर्वाग्रह बिताये गये कुछ दिन आपको इस सवाल का जवाब दे देंगे। सबसे अहम् जवाब तो यही है कि बच्चों की खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दे को मुख्यधारा के विकास का केन्द्रीय विषय माना ही नहीं गया है। इसके लिये एकीकृत बाल विकास परियोजना चला कर सरकार ने अपने काम को पूरा मान लिया। इस योजना का सच भी कुछ कम कड़वा नहीं है। वर्ष 2001 से 2005 तक की अविध में महिला एवं बाल विकास विभाग को कुल 1685.64 करोड़ रूपये का बजट आवंटित किया गया जिसमें से कुल खर्च हो पाया। 1210.34 करोड़ रूपये की राशि यानी 475.30 करोड़ रूपये तो उपयोग में ही नहीं आ पाये। एक तरह से पांच में से दो वर्ष का बजट ही खर्च नहीं हो पाया। विश्लेषण से पता चलता है कि प्रदेश के 1.06 करोड़ बच्चों को पोषण और स्कूल पूर्व शिक्षा का अधिकार उपलब्ध कराने हेतु 6500 करोड़ रूपये पोषण आहार के लिये, आंगनबाड़ियों के रखरखाव के लिये 125 करोड़ रूपये और नई आंगनबाड़ियों के रखरखाव के लिए 650 करोड़ रूपये की जरूरत है। दूसरे अर्थों में सरकार को यदि वास्तव में बच्चों के प्रति संवेदनशीलता दर्शानी है तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को मुफ्त जमीन बांटने के बजाये इस क्षेत्र में प्रावधान को चार गुना बढ़ाना होगा।
पीड़ा देने वाली बात तो यही है कि अभी प्रदेश में कुल 23 फीसदी बच्चे ही आंगनबाड़ियों में दर्ज हैं यानि सामान्य बच्चों तक पहुंचने की बात तो दूर हम अब तक कुपोषित बच्चों तक भी नहीं पहुंच पाये हैं। मध्यप्रदेश के संदर्भ में महालेखाकार की रिपोर्ट सच्चाई को यह कहकर और कड़वा बना देती है कि यह कार्यक्रम 52 से 62 फीसदी बच्चों और 46 से 59 फीसदी गर्भवती-धात्री महिलाओं तक अंशमात्र भी नहीं पहुंचता है।
निगरानी व्यवस्था तो जैसे चरमरा गई है। कुपोषण और बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े प्रयासों के प्रति राजनैतिक प्रतिबध्दता का अभाव भी साफ तौर पर देखा जा सकता है। जब न तो समुदाय स्वयं कोई सवाल-जवाब करने को तैयार नहीं है और बच्चें को भूख से लिपटकर सोते देखते हुये भी यदि आम आदमी का खून न खौलता हो तो ऐसे में कुपोषण के बढ़ते दायरे के लिये केवल सरकार को दोशी नहीं ठहराया जा सकता है। एनएफएचएस के दूसरे सर्वेक्षण के बाद वर्ष 2001 में सरकार ने कुपोषित बच्चों की पहचान के लिये बाल संजीवनी अभियान शुरू किया था पर यह अभियान भी बच्चों को केवल तराजू में बिठाकर बच्चों का वजन मापने की गतिविधि तक सीमित रह गया। आज भी 50 हजार से ज्यादा बस्तियां, बसाहट और गांव आंगनबाड़ी विहीन है जहां तक न तो नियमित रूप से पोषण आहार पहुंचता है न ही बच्चों के विकास के लिये कोई शैक्षिक गतिविधियां आयोजित होती है। यह सही है कि इस मुद्दे पर अब राज्य और केन्द्र सरकारें टकराव की मुद्रा में आमने-सामने हैं क्योंकि राज्य सरकार बाल संजीवनी अभियान के दस्तावेजों के आधार पर कहती है कि मध्यप्रदेश में कुपोषण घटकर 49 प्रतिशत के स्तर पर आ गया है। और दावा यह है कि सरकार ने सत्तार लाख बच्चों की जांच की है परन्तु सच यह भी है कि उन 70 लाख बच्चों तक पोषण आहार और स्वास्थ्य सेवायें नहीं पहुंची हैं तो स्वाभाविक रूप से कुपोषण में कमी के दावे पर सवाल उठता ही है। राज्य सरकार को अब यह कोशिश करना चाहिये कि वह कुपोषण के मुद्दे को विवादास्पद न बनाये। आमतौर पर जो सरकार के पक्ष में होता है सरकार खूब वाहवाही वाले परिणामों को तो स्वीकार कर लेती है पर जब परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने की बात आती है तो परिणामों को नकार देती है। अब से अक्टूबर में जब भारत सरकार ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में 365 मातृ मृत्यु का सर्वेक्षण कर कहा था कि मध्यप्रदेश में मातृ मृत्यु दर 498 प्रति लाख से घटकर 379 हो गई है तो तमाम मौकों पर राज्य सरकार ने खुद की पीठ थपथपाई थी पर अब जबक 9152 व्यक्तियों के अध्ययन से पता चला कि कुपोषण के मामले में सरकार की उपलब्धियां नकारात्मक हैं तो उस परिणाम को नकार दिया गया।
राजनैतिक प्रतिबध्दता का कितना गंभीर अभाव है इस बात का प्रमाण इन अनुभवों से मिल जाता है कि आंगनबाड़ी केन्द्रों को संचालित करने में ग्रामसभा और पंचायतों को सुझाव देने का अधिकार है परन्तु उन सुझावों को स्वीकार-अस्वीकार करने का हक अफसरों के पास ही है। जब पोषण आहार आंगनबाड़ी केन्द्र पर पहुंचेगा तो पंचायतों को यह देखना है पोषण आहार बंटे परन्तु इस सच्चाई से उनका कोई वास्ता नहीं होगा कि गांव में साल भर में 9 महीने पोषण आहार पहुंचता ही नहीं है। इसी तरह मध्यप्रदेश में सबसे गंभीर और सबसे अधिक कुपोषित जिले सीधी में कुपोषण दूर कैसे होगा जबकि वहां की 187 आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को 16 से 28 महीने तक का मानदेय नहीं मिला है और बच्चों के लिये आंवंटित तेल, कंघी, दवाओं और खिलौनों की राषि भ्रष्ठाचार की भेंट चढ़ रही हो?
मसला केवल आंगनबाड़ियों की संख्या और पोषण आहार तक ही सीमित नहीं है। कुपोषण वस्तुत: एक स्तर के बाद स्वास्थ्य का मुद्दा बन जाता है किन्तु मध्यप्रदेश में कुपोषण के संदर्भ में स्वास्थ्य विभाग की भूमिका आपको चिराग लेकर ढूंढने पर भी नजर नहीं आयेगी। एएनएम (गांव का भ्रमण करने वाली नर्स बहनजी) से लेकर राज्य स्तर पर नीतियां बनाने वाले तक इस संकट की घड़ी में बच्चों के साथ खड़े होने के लिये तैयार नहीं हैं। और फिर जब बच्चों की कुपोषण के कारण मृत्यु हो जाती है तो वे किसी बीमारी का नाम दर्ज करके मृत्यु प्रमाणपत्र जरूर जारी कर देते हैं।
इस विश्लेषण को पोषण आहार की सरकारी योजना से इतर देखने की भी जरूरत है। मध्यप्रदेश में प्रतिव्यक्ति औसत खाद्य उत्पादन लगभग राष्ट्रीय औसत से ज्यादा रहा है। इसके बावजूद मसला यह है कि गरीब और वंचित समुदायों का यह अनाज पहुंच ही नहीं पा रहा है। इतना ही नहीं राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंण्टी योजना (जो अभी 18 जिलों में है) के पहले लोगों को एक वर्ष में केवल 3 से 5 दिन का रोजगार ही मिल पा रहा था। राशन की दुकानों से भी प्रति कार्ड केवल 48 किलो राशन वर्ष भर में गरीब परिवारों को मिल पाया। कुपोषण का मुद्दा मूलत: परिवार की खाद्य सुरक्षा से सीधा सम्बन्ध रखता है। यदि परिवार को जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ और सुरक्षित आजीविका का अधिकार नहीं मिलता है तो स्वाभाविक है कि कुपोषण की समस्या को समाप्त नहीं किया जा सकेगा। अब जबकि यह पता चल ही गया है कि मध्यप्रदेश में कुपोषण घटने के बजाये बढ़ रहा है तो इसका मतलब यह है कि सरकार को यह मान लेना होगा कि वह जनकल्याणकारी योजनाओं और रोजगार-आजीविका के क्षेत्र में जनोन्मुखी पहल नहीं कर पाई है। हम सरकार केवल उन्हें न माने जो सत्ता में हैं, बल्कि वे भी इसमें भागीदार है जो चुने हुये जनप्रतिनिधि हैं और किसी न किसी रूप में नीतियां बनाने, निगरानी करने का काम करते हैं। इन परिवारों की जिम्मेदारी समाज को भी उतनी ही गंभीरता से स्वीकार करना होगी क्योंकि समाज का मौन संकट को विकराल बना रहा है।
Sachin Kumar Jain |