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मध्यप्रदेश की पहचान का एक बड़ा सूचक उच्च स्तर का बाल-कुपोषण भी रहा है। विकास के क्षेत्र में एक मुहावरा बड़ा प्रचलित हो चला है कि मध्यप्रदेश एक बीमारू राज्य है। यह मुहावरा राज्य की सरकार और विकास के क्षेत्र में सक्रिय समूहों को लगातार विचलित करता रहा है। यही कारण है कि गरीबी और भुखमरी की गंभीर परिस्थितियों को समाप्त करने के लिये सरकार बड़ी विकास परियोजनायें लागू करती रही। सोच यह थी कि सड़क बनने, उद्योगों की स्थापना होने और पानी के खूब सारे तालाब बनने से विकास होगा। शायद इन सूचकों के आधार पर विकास हुआ भी, परन्तु 17 हजार किलोमीटर लम्बी सड़कें बनने, 1.70 लाख जल संरचनायें बनने और पचास हजार करोड़ रूपये के उद्योगों की स्थापना के निवेश प्रस्ताव आने के बावजूद राज्य में खाद्य असुरक्षा की स्थिति में बुनियादी बदलाव नहीं आया। इसका कारण अब स्पष्ट रूप से नजर आने लगा है, राज्य की आधी जनसंख्या इतने निम्न स्तर के पोषण के साथ जीवनयापन कर रही है कि उससे विकास की इस प्रक्रिया में बहुत उत्पादक सहभागिता की अपेक्षा करना बेमानी सा लगने लगा। मूल बात यह है कि खाली पेट लोग समाज और प्रदेश के विकास का सार्थक बोझ उठा पाने की स्थिति में नहीं हैं। कुपोषण की स्थिति यह रही है कि पचास फीसदी से ज्यादा बच्चों के कुपोषित होने के बावजूद राज्य में एकीकृत बाल विकास सेवाओं को हर दौर-हर कदम पर उपेक्षा का सामना करना पड़ा। यहां 1.26 लाख आंगनबाड़ियों की जरूरत के विरूध्द केवल 50 हजार आंगनबाड़ियां रही हैं और मौजूदा आंगनबाड़ियों का संचालन भी गरीब भूखे-वंचित बच्चों के केन्द्र के रूप में पूरी उपेक्षा के साथ हुआ। राज्य सरकार इस सेवा के संचालन के लिये जरूरी बजट से एक चौथाई राशि का ही प्रावधान कर रही थी। मसला केवल इतना ही नहीं है। मध्यप्रदेश शिशु मृत्युदर (79 प्रति हजार) और बाल मृत्युदर में भी देश के प्रदेशों की सूची में सबसे आगे रहा है परन्तु फिर भी मुख्य धारा के मीडिया में पोषण का सवाल सुर्खियों में नहीं आया। मध्यप्रदेश में वर्ष 2001 में जब भोजन के अधिकार के लिये संघर्ष शुरू हुआ था तब शुरूआती विश्लेषणों से यह स्पष्ट रूप से पता चला था कि खाद्य और पोषण की असुरक्षा का सबसे बड़ा संकट बच्चों के सामने है। संकट को एक सामान्य रूप से नहीं देखा जा सकता था वास्तव में बच्चों के जीवन को समाप्त करने में कुपोषण सबसे बड़ी भूमिका निभा रहा था। सामान्य संक्रमण और डायरिया - खांसी जैसी बीमारियों से लड़ पाने की प्रतिरोधक क्षमता भी बच्चे खो चुके थे। इस विश्लेषण का दुखद पहलू यह है पोषण के अधिकार की बहस में मीडिया कोई भूमिका नहीं निभा रहा था। मध्यप्रदेश में जनमुद्दो पर काम करने वाला समूह मानता था कि राज्य के उदासीन रवैये को बदलने में मीडिया का दबाव एक उपयोगी अस्त्र साबित होगा और तब तय किया गया कि मीडिया से कुपोषण के विषय में संवाद किया जाये। भूख से मौतें हमेशा एक राजनैतिक मुद्दा होता है जिसे सरकार महसूस करते हुये भी स्वीकार नहीं करती है। यही कारण है कि कुपोषण और भूख से मौतों के मामले बहस-विवाद के जाल में फंसकर दम तोड़ देते हैं और व्यवस्था में सार्थक बदलाव नहीं हो पाता है। यह सिध्दान्त राजनीति में बहु-प्रचारित था कि कुपोषण से बच्चों की मौतें नहीं होती है। और यही सिध्दान्त सरकार ने मीडिया को भी सिखाया था जिसे बदलना मीडिया एडवोकेसी का सबसे अहम् लक्ष्य था। उन्हें कभी वास्तविक परिभाषा से अवगत कराया ही नहीं गया। हम मानते हैं कि केवल आयोजन की खबर छपवाने से ज्यादा जरूरी है उनके साथ सतत् संवाद कायम करना। यह संवाद सरकार कायम रखती है। मध्यप्रदेश में वर्ष 2001-2002 में बच्चों के पोषण और एकीकृत बाल विकास सेवाओं के मुद्दों पर कुल जमा दो लेख और 270 खबरें प्रकाशित हुई थीं इनमें से ज्यादातर प्रचारात्मक सामग्री थी यानी नीतिगत बदलाव के लिये मीडिया की बहुत ठोस भूमिका नहीं थी। तब विकास संवाद ने मीडिया की जरूरत के अनुरूप सबसे पहले स्थानीय पत्रकारों के शिक्षण-प्रशिक्षण की प्रक्रिया शुरू की। इस प्रक्रिया में कुपोषण के आरोपों पर नहीं बल्कि कुपोषण के विज्ञान और उसके सामाजिक पहलुओं पर चर्चा शुरू की गई। मीडिया को एक व्यापक संरचना के रूप में लक्ष्य बनाने के बजायें सामाजिक मुद्दों के प्रति संवेदनशील पत्रकारों की पहचान करके ही यह संवाद शुरू किया गया। भोजन का अधिकार के एक कार्यकर्ता संगठन के रूप में कार्य करते हुये हमने राजनैतिक वक्तव्य जारी करने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह समझा कि हम कुपोषण और आईसीडीएस का विश्लेषण करके ऐसे सूचना-पत्रक (Information Packs) तैयार करके जो मीडिया को प्रभावित करने के साथ-साथ उनकी सूचना सम्बन्धी जरूरतों को भी पूरा कर सके। मीडिया की अपनी कुछ खास सूचना सम्बन्धी जरूरतें होती है उन्हें वह जानकारी चाहिये होती है जो समाचार बन सके। हर जानकारी ठोस और प्रमाणिक होनी चाहिये आखिर यह विश्वसनीयता का सवाल है। अक्सर भुखमरी या कुपोषण के सवाल विवाद के विषय बना दिये जाते हैं, जिन पर आरोप-प्रत्यारोप होते हैं पर सार्थक बहस नहीं होती है। ऐसी स्थिति में मीडिया ने जनप्रतिनिधियों और विधायिका में उनकी भूमिका का भी विश्लेषण किया है। वर्ष 2004 से वर्ष 2005 के बीच बार-बार यह अध्ययन मीडिया में आया कि विधानसभा के सत्र में बच्चों और महिलाओं के मुद्दे से जुड़े कितने सवाल सदन में उठाये गये। इसके बाद जनप्रतिनिधियों ने भी स्वैच्छिक समूहों को इन मुद्दों के संदर्भ में महत्व देना शुरू किया। वास्तव में आवाज को केवल तेज बनाने में नहीं बल्कि दमदार बनाने में मीडिया ने अहम् भूमिका निभाई।
वर्ष 2004 में शिवपुरी जिले में सहरिया आदिवासी समुदाय के बच्चों में कुपोषण की गंभीर स्थिति पर एक अध्ययन रिपोर्ट जारी की गई। बाद में श्योपुर जिले के पातालगढ़ गांव में 13 बच्चों की कुपोषण के कारण हुई मौतों का सघन विश्लेषण किया गया। इसके उपरान्त अप्रैल-मई 2005 में विदिशा जिले की गंजबासौदा तहसील में भी इसी तरह के प्रकरण सामने आने के बाद विकास संवाद ने एक सुनियोजित पहल की। सबसे पहले भोजन का अधिकार अभियान के अन्तर्गत पांच स्वैच्छिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने तथ्यान्वेषण कर एक विस्तृत प्रतिवेदन तैयार किया। तब विकल्प यह था कि यह समूह भोपाल (मध्यप्रदेश की राजधानी) में एक पत्रकार वार्ता आयोजित कर रिपोर्ट को जारी कर देता परन्तु ऐसा नहीं किया गया। विकास संवाद ने देश और प्रदेश के एक सम्मानित समाचार-पत्र के साथ इस रिपोर्ट पर चर्चा की। चूंकि मसला गंभीर और राज्य सरकार के लिये संकट खड़े करने वाला था इसलिये अखबार ने सोच-विचार के लिये लगभग एक सप्ताह का समय लिया। और एक सप्ताह बाद यह तय हुआ कि दैनिक जागरण गंजबासौदा के प्रकरण को तो प्रकाशित करेगा किन्तु एक श्रृंखलाबध्द ढंग से प्रदेश के दूसरे इलाकों में कुपोषण और आईसीडीएस की स्थिति पर सामग्री प्रकाशित करेगा जिसके लिये विकास संवाद को भी तैयारी करना होगी। इसके बाद लगातार एक माह तक दैनिक जागरण ने ''जागरण अभियान'' के शीर्षक के साथ पोषण और सरकार की भूमिका पर सामग्री प्रकाशित करना शुरू की। इस अभियान में केवल गांवों में बच्चों के कुपोषण और मृत्यु की जानकारी ही नहीं थी बल्कि बजट का विश्लेषण भी था और योजना की रूपरेखा का मुद्दा भी। प्रकाशित सामग्री में केवल समाचार ही नहीं थे बल्कि लेख भी थे, सम्पादकीय और समाचार विश्लेषण थी। इस पूरे प्रकरण को स्वतंत्र जाँच दल के प्रतिवेदन व प्रभावितजनों के शपथपत्रों के साथ माननीय उच्चतम न्यायालय भेजा गया और न्यायालय ने भी त्वरित कार्यवाही करते हुये राज्य प्रशासन से जवाब तलब किया। परिणामस्वरूप विदिशा कलेक्टर ने माननीय उच्चतम न्यायालय को भी गलत प्रतिवेदन सौंपे जो फिर अखबारों की सुर्खियाँ बने। इस समय तक भी प्रशासन द्वारा नकारने की प्रवृत्ति जारी रही । एक तरफ माननीय उच्चतम न्यायालय के साथ संवाद चल रहा था, अखबारों में निरंतर आलेख व खबरें प्रकाशित हो रहीं थीं और दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों ने इस प्रकरण व इससे जुड़े मुद्दों पर विधानसभा में बहस कराई। जिस पर व्यापक प्रतिक्रिया दर्ज हुई।अब तक इस मुद्दे पर विधायिका, न्यायपालिका व मीडिया ने अपना स्पष्ट रूख कर दिया था।
अब तक यह मुद्दा मुख्यधारा का मुद्दा बन चुका था तथा कैबिनेट तक इसकी गूँज सुनाई देने लगी थी। इसी दौरान 11 अगस्त 2005 को भारत सरकार ने गंजबासौदा के 6 प्रभावित गॉंवों को कुपोषण के संदर्भ में विशेष प्रभावित क्षेत्र घोषित कर दिया। चहुँओर से बढ़ते दवाब के कारण 13 अगस्त 2005 को आयुक्त महिला एवं बाल विकास विभाग ने उन्हीं गांवों का दौरा किया और जिला मुख्यालय, विदिशा में प्रेस वार्ता में स्वीकार किया कि कुपोषण की स्थिति गंभीर है और मृत्यु की घटनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। अब उन छह गांवों में बच्चों के लिये झूलाघर खुलेंगे जहाँ उन्हें पोषण आहार, स्वच्छता और स्वास्थ्य की सुविधायें मिलेंगी। हमारी अगली लड़ाई यहीं से शुरू हुई कि केवल 6 गाँवों को विशेष क्षेत्र घोषित करने से क्या लाभ होगा? जबकि पूरे प्रदेश में हालात लगभग समान हैं और लगभग हर दूसरा बच्चा कुपोषण का षिकार हैं। अत: इस संदर्भ में 18 अगस्त 2005 को भोपाल में एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया जिसमें भोजन का अधिकार अभियान सचिवालय के साथियों के अलावा मध्यप्रदेश के अन्य क्षेत्रों में कार्यरत साथी भी सम्मिलत हुये। इस प्रेस वार्ता में प्रदेश भर में कुपोषण की गंभीर स्थितियों के अलावा खंडवा जिले के खालवा ब्लॉक में ऑंगनवाड़ी केन्द्रों से बाँटे जा रहे फफँद लगे व सड़े दलिये को भी सामने रखा गया। इस वार्ता के लिये राज्य की वर्तमान स्थिति व प्रयासों पर एक स्थिति प्रतिवेदन भी तैयार किया गया। वार्ता के बाद मीडिया ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुये खबरें, आलेख स्थिति प्रतिवेदन प्रकाशित किये। इसी समाचार वार्ता में स्थितियों से रूबरू होने के बाद 'आजतक' न्यूज चैनल ने अभियान के साथियों के साथ संबंधित गाँवों का दौरा किया तथा इस समाचार को प्रमुखता से स्थान दिया। जब एक अखबार पूरी तैयारी से मुद्दे को पूरी शिद्दत के साथ उठा रहा था तो मीडिया के अन्य समूहों को भी इस विषय पर बहस में शामिल होने के लिये मजबूर होना पड़ा। मीडिया में लगातार कुपोषण का मुद्दा आने के कारण विधानसभा सत्र भी इसे नजर अंदाज नहीं कर पाया और विधानसभा में गंजबसौदा के मुद्दे पर इन समाचारों के आधार पर खूब बहस हुई। सवाल केवल मीडिया की बेरूखी का ही नहीं था वास्तव में सामाजिक संस्थायें भी इसे बहुत अहम् मुद्दा नहीं मानती रही हैं पर मीडिया इस मुद्दे को समझने के लिये पाठशाला बना। यही वह समय था जब महिला एवं बाल विकास विभाग सरकार का एक प्राथमिक विभाग बना पहली मर्तबा विभाग ने कुपोषण के मुद्दे को सरकारी नजरिये से बाहर निकलकर देखने की कोशिश की और बजट बढ़ाने के साथ-साथ निगरानी-मूल्यांकन से जुड़े पक्षों पर भी ध्यान देना शुरू किया गया। वर्ष 2004 से 2006 के बीच बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण के लिये सबसे ज्यादा (सात) योजनायें लागू हुई। गंजबासौदा प्रकरण में मीडिया की सक्रियता के बाद पहली बार सरकार के आयुक्त ने यह माना कि वहां कुपोषण से मौतें हुई हैं। इसी दौरान स्टार न्यूज ने राज्य में शिशु मृत्युदर की गंभीर स्थिति पर खोजपरक खबर प्रसारित करके विषय को राष्ट्रीय आयाम् दे दिया था। पुन: पातालगढ़ (श्योपुर) में गंभीर कुपोषण के मामले सामने आये। इस मर्तबा मीडिया के सामने राज्य की जवाबदेहिता और जिम्मेदारी (Accountability and Reasponsibility) के पक्ष को उभारा गया क्योंकि फरवरी 2005 में कुपोषण के कारण हुई 13 बच्चों की मृत्यु के प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय के आयुक्तों के निर्देशों के बाद भी वहां आईसीडीएस की उपयुक्त व्यवस्था नहीं की गई थी जिससे बच्चों की मृत्यु के मामले फिर सामने आये। अब सवाल यह था कि सरकार जवाबदेय क्यों नहीं है? यहां मीडिया से जुड़ा अनुभव एक नये रूप में सामने आया। पातालगढ़ (वर्ष 2006) की रिपोर्ट को मध्यप्रदेश के स्थानीय मीडिया से सबसे पहले बांटा गया पर किसी ने उसे स्थान नहीं दिया। तब एनडीटीवी ने इस मुद्दे को उठाया, इसके बाद हिन्दुस्तान टाईम्स, द हिन्दू, स्टेट्समैन, पायोनियर जैसे राष्ट्रीय अंग्रेजी अखबारों को इस रिपोर्ट से जोड़ा गया। जब स्थानीय अखबारों ने पाया कि मुद्दा अब व्यापक हो चुका है तो फिर उन्हें यह विषय पकड़ना ही पड़ा। फिर चाहे यह उनकी व्यावसायिक मजबूरी ही क्यों न रही हो। मध्यप्रदेश में जब भी कुपोषण से मृत्यु से जुड़े सूक्ष्म प्रकरणों की बात की गई तब भी यह ख्याल रखा गया कि हम व्यापक नीतिगत, बजट और संरचना से जुड़े तथ्यों का उपयोग करें। और जब नीति का सवाल उठाया गया तब पातालगढ़ या साहबा जैसे गांवों की स्थिति से यह सिध्द करने की कोशिश की गई कि यह मुद्दा केवल सैध्दान्तिक नहीं है। आज मध्यप्रदेश के समूहों को मीडिया से यह बहस नहीं करना पड़ती है कि कुपोषण से मृत्यु होती है और जब सरकार कोई प्रयास करती है तो उसका मीडिया विश्लेषण भी होता है। इन प्रयासों के बाद वर्ष 2005-06 में ऐसा कोई दिन नहीं बीता जब मीडिया में बच्चों की खाद्य असुरक्षा, पोषण-कुपोषण या सरकार की नीति से जुड़ा विषय न उठा हो। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि कुल प्रकाशित सामग्री की संख्या तो 1771 से ज्यादा है परन्तु महत्वपूर्ण यह है कि अब मीडिया केवल आंकड़े नहीं उभारता है वह उनका विश्लेषण भी कर रहा है। मध्यप्रदेश में सरकार के पक्ष में खड़ा मीडिया भी है और राजनैतिक विचारधाराओं से प्रभावित मीडिया भी। ऐसे में अनुभव यह कहता है कि मुद्दे की बहस को इतना ठोस और व्यापक बनाया जाये कि किसी भी पक्ष का मीडिया उसे नजर अंदाज न कर सके। इस पूरी प्रक्रिया में हमने केवल यह प्रयास किया कि मीडिया को यह बताया जाये कि हर 1000 जीवित जन्म पर 79 बच्चों की मृत्यु के मायने क्या हैं? यदि वर्ष 2005-06 में राज्य में कुल 17 लाख बच्चों का जन्म हुआ तो इसका मतलब है कि एक वर्ष से कम आयु के 1.32 लाख बच्चे जीवित नहीं रहे और 2.40 लाख बच्चे कुल पांच जन्मदिन ही मना पाते हैं। और सवाल पूछते हैं कि क्या स्थिति गंभीर नहीं है। मीडिया संवाद की यह प्रक्रिया चलाये रखने के लिये सूचनाओं, जानकारियों और तथ्यों के अलग-अलग विश्वसनीय स्रोत खोजे गये। आमतौर पर स्वैच्छिक संस्थायें स्वयं के तथ्य पैदा करती हैं किन्तु आईसीडीएस और बच्चों की खाद्य सुरक्षा के मामले में मध्यप्रदेश के समूह ने सरकार और अधिकृत एजेंसियों के सूत्रों का उपयोग किया। मध्यप्रदेश सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग, स्वास्थ्य विभाग, स्कूल शिक्षा विभाग और वित्ता विभाग की वेबसाईट का सूक्ष्म अध्ययन किया गया। इन्हीं विभागों के मूल्यांकन और वार्षिक प्रतिवेदनों से भी सीखें हासिल की। महत्वपूर्ण यह भी है कि नियंत्रक महालेखाकार की वार्षिक रिपोर्ट में मौजूद आंकड़े और विश्लेषण पूरी एडवोकेसी की प्रक्रिया को विश्वसनीय बनाते रहे। बहरहाल यह भी सही है कि राज्य में भोजन के अधिकार के मुद्दे पर कार्य कर रही संस्थाओं ने व्यापक जमीनी अध्ययन करके वास्तविक स्थिति को सामने लाने में सार्थक पहल की। ये वे स्रोत थे जो हमेशा से उपलब्ध हैं किन्तु मीडिया की नजरों से छिपे रहे है। सूचना का अधिकार भी मीडिया के लिये जानकारियां हासिल करने का अहम् जरिया बना है। बाजारवाद के दौर में मीडिया की प्राथमिकतायें बदल गई हैं पर सामाजिक प्रतिबध्दता खत्म नहीं हुई है। हम कोशिश कर रहे हैं कि जो कुछ भी हमें उपलब्ध है उसका उपयोग करें।
सचिन कुमार |
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