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सिवनी जिले के दरगड़ा गांव में स्कूल में मध्याह्न भोजन बच्चों के जीवन में एक अधिकार का रूप ले रहा है। इस आदिवासी गांव में कोई भी बच्चा स्कूल से आज बाहर नहीं है। कई सारी विसंगतियों और भ्रष्टाचार के बीच सरकारी प्राथमिक स्कूल में इससे न केवल बच्चों को पेट भरने के अवसर मिले हैं बल्कि इसी बहाने समुदाय ने भी स्थानीय व्यवस्था में सहभागिता करना शुरू कर दी है। इस स्कूल के गुरूजी डी आर वर्मा कहते हैं कि ''ऐसा नहीं है कि हमेशा से ही दरगड़ा के स्कूल में दोपहर का भोजन योजना अच्छे से चलती रही हो। कई प्रयासों के बाद अगस्त 2006 से ही इसमें सकारात्मक बदलाव आया है।'' वास्वत में इस योजना में परिणाम से ज्यादा प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। पहले यहां 124 बच्चों की संख्या पर केवल एक ही शिक्षक थे, पहले केवल खिचड़ी ही पकाई जाती थी, पहले कभी-कभार ही खाना मिलता था तो स्कूल प्रशासन को शक की नजर से देखा जाता था, पहले गांव के लोग इसके बारे में कुछ नहीं सोचते थे और सबसे बड़ी बात पहले स्कूल में योजना का योजनाबध्द क्रियान्वयन नहीं होता था और अनाज मिलना भी एक दुरूह-दुश्कर कार्य था। इन स्थितियों में क्या यह सोचा जा सकता है कि स्कूल के बच्चे मध्यान्ह भोजन योजना से किसी भी रूप में पोषण और भरपेट भोजन का आनंद ले सकते थे? सवाल बहुत कठिन नहीं है क्योंकि सरकारी योजनाओं से लाभ मिलने की अब कोई उम्मीद नहीं करता है, फिर बच्चों की पुकार को कौन सुनता !! अगस्त 2006 से दरगड़ा में इस योजना का चेहरा बदला। इस चेहरे के बदलने का सबसे बड़ा परिणाम यह है कि अब नियमित रूप से यहां भोजन बच्चों को मिलता और पहले जहां स्कूल में उपस्थिति 80 से 85 बच्चों की होती थी अब वह बढ़कर 105 से 112 के बीच हो गई है। क्या शिक्षक के ऊपर बोझ है यह योजना? दरगड़ा स्कूल के शिक्षक का अनुभव है कि यदि बोझ मानेंगे तो बोझ है। अनाज तो एक बार आ ही जाता है और सब्जी के लिए सप्ताह में दो घंटे जरूरत होती है। वह भी पालक-शिक्षक संघ के सदस्य के साथ होता है। पकाने का काम महिला करती है और बच्चों को खाना खिलाने में 15 मिनट लगते हैं, हम भी अपना खाना उन्हीं के साथ बैठकर खाते हैं बहुत कुछ बदलाव तो आया है परन्तु संकट और चुनौतियां अब भी कम नहीं हैं। यहां की पंच अतरो बाई कहती हैं कि रसोई बनाने वाले के मानदेय और ईंधन के बारे में जो प्रावधान है वह अव्यावहारिक है। ईंधन के लिये प्रति बच्चे 20 पैसे का प्रावधान है जिसमें इंधन लाना वास्तव में संभव नहीं है और जब रसोई बनाने वाली महिला लकड़ी लेने जंगल जाती है तो वन निभाग उस पर कार्रवाई करता है। तब समुदाय को राशि इकटठा करनी पड़ती है। और 100 बच्चों का खाना पकाने पर 25 रूपये का मानदेय दिया जाना भी मानवीय नहीं है। यह एक मेहनत का काम है और न्यूनतम मजदूरी तो मिलना ही चाहिए।
पास ही एक गांव है भोंडकी। यहां के स्कूल की एक छोटी सी छात्रा शिवानी कहती है कि उसे स्कूल जाना अच्छा लगता है क्योंकि वहां खाना भी मिलता है। जब हम सब बच्चे एक साथ बैठकर खाना खाते हैं तो बड़ा मजा आता है। परन्तु वहां बीच में यह मिलना बंद हो गया था क्योंकि स्कूल में 40 बच्चे होने के कारण रसोइये को केवल 10 रूपये ही मिलते थे तब समुदाय ने अपनी तरफ से 6 रूपये का योगदान देना तय किया। यह एक आदिवासी मजदूरों का गांव है और पालक शिक्षक संघ के अध्यक्ष जगदीश कहते हैं कि अब बच्चों के लिये रोज घर में खाना छोड़कर जाने की चिंता नहीं रहती है, न ही उन्हें मजदूरी पर साथ ले जाते हैं। घर में तो नमक-रोटी ही मिलती थी परन्तु अब कम से कम बच्चों को दाल-सब्जी-मसाले का स्वाद तो पता चला। किसी भी बच्चे की थाली में आखिर में खाना बचता नहीं है।
1995 से शुरू हुई योजना के दस साल का विश्लेषण इसकी छवि को अच्छा नहीं बनाता है। इस योजना को लागू करने के कारण बहुत महत्वपूर्ण थे किन्तु राजनैतिक प्रतिबध्दता के अभाव में यह कभी भी आदर्श या औसत दर्जे के रूप में क्रियान्वित नहीं हो पाई। चूंकि कुपोषण, खाद्य असुरक्षा और गरीबी के आंकड़ों का दबाव सरकार पर बना, इसलिए एक किस्म से उसने ''दलिया वितरण योजना'' चलाना शुरू कर दिया जिसमें एक तरफ तो घोर अनियमितता रही तो दूसरी तरफ गैर-जवाबदेहिता। सरकार ने मध्यान्ह भोजन को आमतौर पर एकीकृत विकास के नजरिये से नहीं देखा। वास्तविकता यह थी कि गरीबी और रोटी के अभाव के कारण मध्यप्रदेश के 23 लाख बच्चे स्कूलों से बाहर थे और जो स्कूल जा रहे थे उनकी सीखने की क्षमता कुपोषण के कारण नकारात्मक रूप से प्रभावित हो रही थी इसीलिये पांच साल की शुरूआती स्कूली शिक्षा पूरी करने के पहले ही 100 में से 35 बच्चे स्कूल प्रांगण से बाहर आते रहे। एक तरह से गरीबी और कुपोषण शिक्षा के अधिकार से बच्चों को वंचित करते हैं। शिक्षा से वंचित होने पर वे सम्मान, समता और आजीविका के अधिकार से दूर होते हैं। आज की भी स्थिति यह है कि दस में से छह बच्चे ऐसे हैं जो कमजोर और कुपोषित हैं। इतना ही नहीं अस्सी फीसदी बच्चे खून की कमी के शिकार हैं। यदि स्थिति यह है तो यह कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि बच्चों का विकास सही ढंग से होगा और वे स्कूल में ज्ञानार्जन बौद्धिक प्रक्रिया में टिक पायेंगे जबकि उनका शरीर और दिमाग दोनों ही कमजोर हो रहे हैं। नेशनल न्यूट्रिशन मॉनिटरिंग ब्यूरों के सर्वेक्षण के अनुसार 74 फीसदी आदिवासी बच्चों में पोषण की कमी है। और इन परिस्थितियों में वर्ष 2000-2001 में 6 से 14 वर्ष की आयु के 1328 लाख बच्चे स्कूल से बाहर थे इनमें से 56 प्रतिशत लड़कियां हैं। 94 लाख बच्चे तो कभी स्कूल की सीमा में ही नहीं गये, न ही उनका नामांकन हुआ। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 388 लाख बच्चे पांचवी से पहले ही स्कूल से बाहर हो गये। मध्यान्ह भोजन योजना पर मध्यप्रदेश सरकार का दस्तावेज कहता है कि अनुभव यह सिद्ध करते हैं कि कमजोर स्वास्थ्य और निम्न पोषण स्तर, या परिवार की जरूरत को पूरा करने के लिये श्रम करने वाले बच्चे स्कूल से बाहर हैं या हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में वर्ष 2005 में मध्यप्रदेश सरकार ने बच्चों को बेस्वाद अधपके दलिये के अभिशाप से मुक्त कराने की पहल की। यह एक चलताऊ कार्यक्रम नहीं माना जा सकता है क्योंकि आज 111 क़रोड़ बच्चे मध्यप्रदेश में ही इसके हितग्राही हैं। समाज प्रगति सहयोग संस्था, मध्यप्रदेश का अध्ययन सिद्ध करता है कि मध्यान्ह भोजन योजना के लागू होने के बाद कक्षा-एक में बच्चों के नामांकन में 36 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। छचर्या गांव के सरकारी स्कूल में 525 बच्चे हैं। वहां सवर्ण और दलित दोनों ही वर्ग के रसोईये हैं और सभी बच्चे एक साथ बैठकर खाना खाते हैं। सामान्यत: मध्यान्ह भोजन योजना के खाने की गुणवत्ता की बहु-पक्षीय आलोचना होती रही है किन्तु हाल ही में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के शोधकर्ता निकोलन रॉबिन्सन का मध्यप्रदेश में किया गया अध्ययन सि करता है कि ''बच्चे और तालकों के अनुसार पिछले एक वर्ष में भोजन की गुणवत्ता में बहुत सुधार हुआ है। कई जगहों जैसे सिवनी में तो इसे घर के खाने से बेहतर बताया गया। परन्तु भोजन में जहां नांदी फाउण्डेशन के भोजन पकाकर केन्द्रीकृत आपूर्ति कर रहा है वहां रोटी अधपकी, दाल पतली और मसाले से विहीन होती है। इसमें निजी संस्थायें लाने से समानता और वंचित लोगों को रोजगार देने वाले लक्ष्य की मृत्यु हो जाती है। अत: भोजन तैयार करने का काम स्थानीय स्तर पर ही होना जरूरी है। एक समय में (वर्ष 1995 से 2001 तक) राज्य में सरकार ने औसतन 36 पैसे बच्चों के भोजन पर खर्च किये परन्तु 28 नवम्बर 2001 को सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्देश आने के बाद, कि सरकार को हर सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल में बच्चों को वर्ष में कम से कम 200 दिन पका हुआ भोजन देना ही हैं, और सूखाग्रस्त जिलों में तो गर्मी की छुट्टियों में भी बच्चों को भोजन मिलना चाहिये..., मध्यान्ह भोजन बच्चों का एक न्यायिक अधिकार बन गया। अब सरकार प्रति बच्चा 2.16 से 2.30 रूपये भोजन पर खर्च कर रही है। सरकार को यह स्वीकार कर लेना चाहिए यह खर्च कोई राहत या रियायत नहीं है बल्कि एक सार्थक निवेश है। बच्चों के स्वस्थ होने पर ही राज्य की विकास दर सच्ची और स्थायी हो पायेगी। बेहतर होती परिस्थितियों में पांच मुद्दे अब भी बदलाव की मांग करते हैं। पहला मुद्दा तो यह है कि भोजन की मात्रा को पर्याप्त किया जाये। ज्यादातर स्कूलों में ज्यादा संख्या में छात्र होने पर भी कम मात्रा में भोजन आवंटित होता है। दूसरा मुद्दा है गुणवत्ता का। भोजन पकाने की व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। तीसरा मुद्दा यह है कि बच्चों को स्कूल खुलने वाले हर दिन इस योजना का लाभ मिलना चाहिए। अजीब सी स्थिति हो जाती है जब माह में 8-10 दिन बच्चों को भोजन नहीं मिलता है। चौथा मुद्दा है इस योजना का विस्तार कम से कम हाई स्कूल स्तर तक करने का। किशोरावस्था (खासतौर पर लड़कियों को) में शारीरिक बदलाव अतिरिक्त पोषण की मांग करते हैं। यह देखना पांचवी जरूरत है कि रसोइयों का मानदेय पर्याप्त हो और खाना पकाने की व्यवस्था पृथक से हो। पिछले कुछ सालों में पोषण का अधिकार एक जनआंदोलन का मुद्दा बना है और सरकार को इस दिशा में कदम उठाने पड़े है। ऐसी स्थिति में यह देखना होगा कि क्रियान्चयन में समुदाय क्या भूमिका निभाता है?
सचिन कुमार जैन |
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