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  भूख से लड़ाई में जनहित याचिका की महत्ता
 
     
 

पिछले कुछ वर्षों से विकास के केन्द्र में कुपोषण एवं भूख के खिलाफ लड़ाई का मुद्दा छाया हुआ है। मध्यप्रदेष में यह मुद्दा बहुत ही अहम है। प्रदेष में कुपोषण का दर और भुखमरी की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में कहीं ज्यादा है। हाल के दिनों में प्रदेष के कई के कई शहर एवं गांव से कुपोषण की आवाज उठ रही है। इस मुद्दे को विकास के केन्द्र में लाने के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं एवं जन संगठनों की अहम भूमिका रही है। खासतौर से, भोजन के अधिकार अभियान के निरंतर संघर्ष और सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई जनहित याचिका के महत्वपूर्ण योगदान के कारण ही यह संभव हो पाया है।

देष में कुपोषण और भुखमरी की भयावह स्थिति को देखते हुए और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में भ्रष्टाचार, लापरवाही को देखते हुए 2001 में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पी.यू.सी.एल.), राजस्थान ने भोजन के अधिकार को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित चायिका दायर की। यह याचिका उस समय दायर की गई, जब एक ओर देष के सरकारी गोदामों में अनाज का भरपूर भंडार था, वहीं दूसरी ओर देष के विभिन्न हिस्सों में सूखे की स्थिति एवं भूख से मौत के मामले सामने आ रहे थे। इस केस को भोजन के अधिकार केस के नाम से जाना जाता है। भोजन के अधिकार को न्यायिक अधिकार बनाने के लिए देष के विभिन्न संस्थाएं, संगठन और ट्रेड यूनियन ने संघर्ष किया है। पी.यू.सी.एल. द्वारा दायर की गयी इस चायिका का आधार संविधान का अनुच्छेद 21 है जो व्यक्ति को जीने का अधिकार देता है। जीने का अर्थ गरिमापूर्ण जीवन से है और यह भूख और कुपोषण से जूझ रहे व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। यह एक मौलिक अधिकार है। सरकार का दायित्व है इसकी रक्षा करना। सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार जीने के अधिकार को परिभाषित किया है, इसमें इज्जत से जीवन जीने का अधिकार और रोटी के अधिकार आदि शामिल हैं।

इस न्यायालयीन हस्तक्षेप के बावजूद भी मध्यप्रदेष कुपोषण और भुखमरी में पहले स्थान पर है। सर्वेक्षण के अनुसार मध्यप्रदेष में कुपोषण 60 फीसदी है जो पूरे भारत में सबसे ज्यादा है, पर मध्यप्रदेष सरकार का बाल संजीवनी अभियान कुपोषण को मात्र 46.37 फीसदी बताता है। स्थिति को बेहतर बनाने के लिए सरकार द्वारा कुछ कार्यक्रम चलाये जा रहे है, जिन्हें 4 भागों में बांटा जा सकता है - बच्चों के भोजन का अधिकार (समेकित बाल विकास योजना, मध्यान्ह भोजन योजना), खाद्य सहायता कार्यक्रम (सार्वजनिक वितरण प्रणाली एवं अंत्योदय अन्न योजना), रोजगार कार्यक्रम (राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून, संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना, काम के बदले अनाज कार्यक्रम) एवं सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम (राष्ट्रीय मातृत्व सहायता योजना, जननी सुरक्षा योजना, राष्ट्रीय वृध्दावस्था पेंषन योजना और राष्ट्रीय परिवार सहायता कार्यक्रम)।

सभी कार्यक्रम व्यक्ति के पैदा होने से लेकर बुढ़ापे तक उसकी पोषण की जरूरत पूरा करने के लिए बनाये गये हैं। समेकित बाल विकास योजना - 0 से 6 वर्ष तक के बच्चों, गर्भवती, धात्री एवं किषोरी बालिकाओं के लिए, मध्यान्ह भोजन योजना प्राथमिक और माध्यमिक शाला के बच्चे के पोषण की जरूरत को सुनिष्चित करने के लिए, सार्वजनिक वितरण प्रणाली एवं अंत्योदय योजना गरीबी रेखा के नीचे आने वाले परिवारों को सस्ती दरों पर राषन उपलब्ध कराने के लिए, रोजगार गारंटी कानून 100 दिवस का रोजगार उपलब्ध कराने के लिए एवं सामाजिक सहायता कार्यक्रम सभी बुजुर्ग व्यक्तियों के लिए है जो सामाजिक सुरक्षा के दायरे से छूट गये हैं।

कई वर्षों तक ये कार्यक्रम तात्कालिक रूप से आपदा की स्थिति में बहुत सफल हुए हैं, परन्तु सतत् भुखमरी की स्थिति को आज भी मिटाने में ये नाकाम साबित हुए हैं। इसकी वजह न केवल क्रियान्वयन की इच्छाषक्ति में कमी है बल्कि लोगों के पास स्थायी आजीविका का संकट भी है।

पिछले कुछ सालों में ऐसे कई केस सामने आये हैं जिसमें कि आदिवासी और वंचित को उनकी जमीन एवं प्राकृतिक संसाधनों के बेदखल कर दिया है। बड़ी-बड़ी विकास परियोजना (बांध, कम्पनी) की वजह से लोगों विस्थापन, इसके साक्ष्य हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था में वैष्वीकरण का दबाव और 1990 के बाद आये उदारीकरण की वजह से लाखों लोगों का निर्धन होना भी एक प्रमुख कारण है। इसलिए भोजन के अधिकार केस को विस्तृत रूप में देखने की जरूरत है। इस याचिका के अंतर्गत करीब 400 शपथ-पत्र अभी तक दायर किये गये हैं और साथ ही 60 अंतरिम आवेदन लगाये जा चुके हैं। यह केस विष्व का पहला ऐसा केस है, जिसमें पिछले 8 वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय 65 से अधिक अंतरिम आदेष दे चुकी है।

28 नवम्बर 2001 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये अंतरिम आदेष में खाद्य सुरक्षा और रोजगार योजना कानूनी अधिकार में बदल गया है। इसी आदेष में सर्वोच्च न्यायालय ने भारत सरकार और राज्य सरकारों को यह निर्देषित किया है कि जब तक इस केस का अंतिम आदेष नहीं आ जाता, तब तक इन योजनाओं को न्यायालय के आदेष के बिना नहीं बदला जाएगा और न ही बंद किया जाएगा। अभियान का मानना है कि इस केस के माध्यम से भोजन के अधिकार की मौलिक अधिकारों में शामिल कर लिया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये आदेष के अंतर्गत समेकित बाल विकास योजना की सभी सेवाओं को सर्वव्यापीकरण की बात कहीं गयी है। इसके अंतर्गत सभी बच्चों को मध्यान्ह भोजन में पका हुआ भोजन देने की बात कही गयी है।

समेकित बाल विकस योजना को न्यायालय द्वारा यह कह कर परिभाषित किया है कि राज्य सरकार यह सुनिष्चित करे कि सभी आंगनबाड़ी केन्द्रों में 0 से 6 वर्ष के बच्चे गर्भवती, धात्री एवं किषोरी बालिकाओं को कुछ प्रमुख सेवायें दी जाएंगी, जिसमें हर 6 वर्ष तक के बच्चे को 300 कैलोरी और 8-10 ग्राम प्रोटीन दिया जाएगा, हर किषोरी बालिका को 500 कैलोरी और 20-25 ग्राम प्रोटीनयुक्त भोजन दिया जाएगा, हर गर्भवती एवं धात्री महिला को 500 कैलोरी और 20-25 ग्राम प्रोटीनयुक्त भोजन दिया जाएगा और हर कुपोषित बच्चे को 600 कैलोरी और 16-20 ग्राम प्रोटीनयुक्त भोजन दिया जाएगा एवं हर बसाहट में आंगनबाड़ी का होना सुनिष्चित किया जाएगा।

इसे लेकर केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने कोई जवाब नहीं दिया तो न्यायालय ने 7 अक्टूबर 2004 को आदेष पारित किया कि सरकार देष में 14 लाख आंगनबाड़ी केन्द्रों की स्थापना करें। समाज के वंचित वर्गों और गरीबों को इसका लाभ सीधे पहुंँचाने के लिए इस आदेष के अनुसार हर दलित, आदिवासी मोहल्ले एवं आबादी में जल्द से जल्द इसे खोला जाये। आंगनबाड़ी केन्द्र में पोषण आहार पहुंचाने के लिए ठेकेदार का उपयोग नहीं किया जायेगा और पोषण आहार की आपूर्ति केवल स्थानीय महिला समूह द्वारा की जाएगी। इसी तरह न्यायालय द्वारा योजना के लिए कई विस्तृत आदेष दिये गये हैं। न्यायालय के इस हस्तक्षेप की वजह से भोजन के अधिकार को इस मुद्दे को समाज की मुख्यधारा तक लाने में सफलता मिली है। निष्चय ही समाज के इस अहम प्रष्न पर न्यायालय की जो भूमिका है, वह बहुत सम्मनीय है पर देखना यह है कि न्यायालय के अंतरिम आदेषों और मंषाओं का सम्मान केन्द्र और राज्य सरकारें कब करती हैं।

रोली शिवहरे

 
     
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