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सामान्य रूप से सांस्कृतिक और सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के सिध्दान्तों के आधार पर यही माना जाता है कि महिलायें उन्नति और जीवनयापन की प्रक्रिया में कोई उत्पादक भूमिका नहीं निभाती हैं। परन्तु वहीं दूसरी ओर इस तर्क का जवाब इन आंकड़ों से दिया जा सकता है कि खेतों में होने वाले कमरतोड़ काम का 75 फीसदी हिस्सा महिलाओं द्वारा किया जाता है। घरेलू कामों का जब उत्पादक के रूप में आर्थिक विश्लेषण होता है तो पता चलता है कि यदि महिलायें वह मेहनतभरी भूमिका निभाना बंद कर दें तो पूरी सामाजिक व्यवस्था तहस-नहस हो जायेगी, न केवल आर्थिक रूप से बल्कि सामाजिक रूप से भी। इसके बावजूद हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति के आधार पर यह साफ है कि उनके साथ खानपान के मामले में भेदभाव किया जाता है। परिवार की एक आदर्श महिला वही होती है, जो सभी को खिलाने के बाद सबसे अंत में भोजन ग्रहण करे। ऐसे परिवारों में जहां पहले ही खाने की कमी होती है, वहां लड़के को लड़कियों से पहले खाना परोसा जाता है। घर में जो भी प्रमुख कमाने वाला होता है, वही सबके लिए भोजन बंटवारा करता है। लड़कियों को खानपान के मामले में हमेशा त्याग करने की सीख दी जाती है। जिन परिवारों में महिलायें कमाती हैं, वहां भी महिलाओं की कमाई पुरूष सदस्यों के ही हाथ में रखे जाने की परम्परा है। इसके अलावा घर में महिलाओं पर कामकाज का इस कदर दबाव होता है कि उन्हें भोजन करने के लिए भी पर्याप्त समय बमुश्किल से मिल पाता है। शोध के दौरान कई बार यह भी पाया गया कि महिलाएं सप्ताह में कई दिनों तक उपवास करती हैं, लेकिन इन उपवासों का कारण धार्मिक पर्व या अनुष्ठान नहीं, बल्कि भोजन की कमी होती है। वैसे धार्मिक रूप से भी महिलाओं के खानपान में कई तरह के निशेध बताए गये हैं। मिसाल के लिए विधवा महिलाओं को गरिष्ठ भोजन या प्याज, लहसुन और मांसाहार ग्रहण करने के लिए मना किया गया है। इसके पीछे सोच यही है कि जब पति ही नहीं रहे तो वह इन तामसिक वस्तुओं को भोजन में ग्रहण कर क्या करेगी? उसे तो धार्मिक रूप से सादा जीवन व्यतीत करना चाहिए। माना जाता है कि यदि महिलाएं तामसिक भोजन ग्रहण करें तो उनमें कामेच्छा जाग सकती है। आमतौर पर मासिक धर्म शुरू होने से पहले ही महिलाओं को अच्छा भोजन ग्रहण करने दिया जाता है, उसके बाद नहीं।
गर्भावस्था के दौरान कई समुदायों में महिलाओं को खान-पान में कमी करने की हिदायत दी जाती है, क्योंकि ऐसी धारणा है कि भरपेट भोजन करने से गर्भ में पल रहे भ्रूण को हिलने-डुलने की जगह नहीं मिल पायेगी। एक और कारण यह भी है कि भरपेट भोजन से शरीर में मोटापे की समस्या पैदा हो जायेगी। और इसके कारण वह घर और खेतों में काम नहीं कर सकेगी। इसके अलावा गर्भावस्था के सातवें महीने में महिला के लिए विभिन्न प्रकार के आयोजनों की प्रथा भी तकरीबन सभी प्रांतों में कायम है। इसके तहत गर्भवती महिला के लिए आटा, मैदा, घी और ग्वारफली के बीज मिलाकर खास तरह की मिठाइयाँ बनाई जाती हैं। इस दौरान प्रसव के पूर्व तक महिला को यह सभी चीजें नियमित रूप से खानी पड़ती है। गर्भावस्था के समय महिला को दूध व इससे बनी वस्तुएं, मूंगफली तथा कोई भी चिपचिपा या सफेद पदार्थ, जैसे केला आदि खाने की मनाही रहती है, क्योंकि दाइयों का मानना है कि इन चीजों से कोख में बच्चे के ऊपर एक कवर आ जाएगा, जिससे प्रसव में देरी होगी। बाजरा और पपीते जैसी चीजें भी गर्म मानकर महिला को नहीं दी जातीं। गुजरात में दही जैसी चीजें भी गर्भवती महिला को खाने में नहीं दी जाती। आयुर्वेद में भी इन चीजों से परहेज की सलाह दी गई है। वैसे गर्भवती महिला को ग्वारफली, गोंद के लड्डू, पान पराग, अजवाइन आदि चीजें आमतौर पर खाने को दी जाती है। माना जाता है कि इनमें ताकत मिलती है और यह स्तनों में दूध बढ़ाने वाली भी होती है।
त्योहार और उत्सवों के दौरान भारतीय परिवारों में विशेष पकवान बनाए जाने की परम्परा है। लेकिन कभी-कभी ये महिलाओं के लिए हानिकारक भी होते हैं। मिसाल के लिए गुजरात में जुलाई-अगस्त में व्रत रखे जाने की परम्परा है, क्योंकि आयुर्वेद में इस दौरान व्रत रखे जाने की सलाह दी जाती है। लेकिन ऐसे समय, जबकि कृषि कार्य चरम पर हो, भूखे पेट दिन भर कड़ी मेहनत करना महिलाओं के लिए हानिकारक होता है।
यह कहना या सिध्द करना बहुत जरूरी नहीं है कि किस तरह औरत न केवल प्रत्यक्ष बल्कि अदृष्य भूख का जीवन इस सामाजिक व्यवस्था में जीती है। बल्कि मकसद यह है कि हम उस व्यवस्था को जान सकें जिसमें किसी को भूखा रखना वास्तव में सत्ता पर नियंत्रण करने के लिये जरूरी माना जाता है। अर्थव्यवस्था कमजोर नहीं है कि खाना खरीदा न जा सके न ही जमीन बंजर है कि पैदा न किया जा सके। परन्तु सवाल सत्ता का है यदि भरपेट भोजन मिल जायेगा तो संभव है कि मन और मस्तिष्क स्वस्थ्य होकर अपनी सामाजिक स्थिति पर कुछ विचार करने लग जायेंगे। समानता की बात होगी, समता की बात होगी और होगी क्षमता की बात। नि:संदेह यह मेरे समाज को मंजूर न होगा।
फिर भी हर दौर और कालखण्ड में कभी-कभी ऐसा लगता मानों ठहरे हुये पानी में किसी ने पत्थर फेंका हो, जिससे कुछ हलचल होती है व्यवस्था में बदलाव की उम्मीद जागती है पर फिर वैसा ही कुछ चलने लगता है। समाज बदलाव की बेला में केवल बदलाव लाने वालों के दण्डित नहीं करता है बल्कि वह बदलाव चाहने वालों की भी खबर लेता है। अब केवल महिलायें ही दण्डित नहीं होती हैं बल्कि उनके साथ खड़े पुरूष भी सत्ता की इस व्यवस्था में दण्ड के अधिकारी बनने लगे हैं।
सचिन कुमार जैन |
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