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बच्चों पर कुपोषण का साया

 
     
 

आदिवासी बच्चों के जीवन के लिए संकट बढता जायेगा। इस समुदाय को भारत की सबसे विपन्न परिस्थितियों में रहने वाली जनजाति के रूप में स्वीकार किया जाने लगा है। मध्यप्रदेश के आठ जिलों में रहने वाले पांच लाख सहरिया आदिवासियों में एक भी बच्चा, युवा या परिवार पहचानना नामुमकिन है जो कुपोषण या खून की कमी (एनीमिया) की समस्या से ग्रस्त न हो। 'रीजनल मेडिकल रिसर्च सेन्टर फॉर ट्राइबल' द्वारा इस जनजाति पर किये गये एक स्वास्थ्य सम्बन्धी अध्ययन ने साबित किया है कि 93 प्रतिशत सहरिया बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और 15 फीसदी तो बिल्कुल मौत की कगार पर खड़े होने की हद तक कुपोषित हैं जबकि सेहत ने बड़वानी में अध्ययन के बाद यह तथ्य देकर सरकार को चौंका दिया था कि वहां 80 प्रतिशत भील आदिवासी बच्चे कुपोषण के चंगुल मे हैं और उनके लिए कोई प्रयास नहीं हो रहा है। इस अध्ययन के तथ्यों को सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्वीकार किया है। पिछले दो महीनों में शिवपुरी में खसरे के कारण हुई आठ बच्चों की मौतों ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि कुपोषण के शिकार बच्चे संक्रामक (किन्तु बचाव योग्य) बीमारियों के चंगुल में आसानी से फंसते जा रहे हैं। यह एक ऐसा मसला है जिस पर सरकारी उपलब्धियों के नित नये दावे किये जाते रहे हैं।

सहरियाओं की सामाजिक गाथा, एक दु:ख भरी गाथा है। लगातार शोषण, उपेक्षा से भरपूर उदासीन जीवन जीने वाले सहरिया कभी उग्र प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते हैं। सब कुछ स्वीकारते जाना उनकी प्रवृत्ति है। ऐसी परिस्थिति में लगातार कमजोर होती सबसे नई पीढ़ी यानि बच्चों के कुपोषण को वे बड़े ही निराकार भाव से देखते हैं। लम्बा अरसा हो चुका है जब सरकार ने कुपोषण की गंभीरता को स्वीकार नहीं किया तब भूख और कुपोषण जन्य बीमारियों के शिकार सहरिया जीवन की लड़ाई हारने लगे। इसके बावजूद इस संकट को औपचारिकता पूरी करने के नजरिये से देखा गया। चिकित्सा विज्ञान यह कहता है कि जन्म के समय ढाई किलो से कम वजन होने पर बच्चे के कम उम्र में ही मर जाने की संभावना तीन गुना बढ़ जाती है और जब बच्चों को सामान्य से दो गुना अतिरिक्त पोषहार के साथ-साथ स्वास्थ्य सुविधायें नहीं मिलती हैं तो पांच वर्ष तक पहुंचते-पहुंचते मृत्यु की संभावना बीस गुना बढ़ जाती है। मध्यप्रदेश में जहां भी सहरिया समुदाय निवास करता है वहां बच्चों के दस्त और खसरे से मरने के मामले सबसे ज्यादा समाने आये हैं क्योंकि कुपोषण का स्तर बढ़ने पर खसरे और दस्त से होने वाली मौतों की दर सामान्य से चार सौ गुना बढ़ जाती है। मध्यप्रदेश के शिवपुरी और श्योपुर जिलों में अब कुपोषण का प्रकोप अपना असर दिखाने की स्थिति में आ गया है। वहां समुदाय के साथ सहभागी रूप से चर्चा करने पर पता चलता है कि जहां हम प्रदेश में लोगों की औसत आयु 60 वर्ष से ज्यादा होने का दावा करते हैं वहीं चालीस की उम्र पार करते-करते व्यक्ति हद से ज्यादा वृध्द नजर आने लगता है। कारण स्पष्ट है कि उसके जीवन की सीमायें जन्म से ही सीमित होना शुरू हो जाती है। पारम्परिक रूप से जीवनयापन के मामले में ये जंगल की सम्पदा पर निर्भर रहे हैं। परन्तु जंगलों के विनाश ने उन पर नकारात्मक प्रभाव डाला और उन्हें वैकल्पिक संसाधन उपलब्ध नहीं हो सके। 1960 के बाद सहरियाओं में कुपोषण और एनीमिया का स्तर बढ़ना शुरू हुआ और यही कारण है कि आज यह स्तर सौ फीसदी के आंकड़े को छूने की तैयारी कर रहा है। यह उदाहरण इस बात का भी है कि सरकार जनकल्याणकारी नीतियां सामाजिक व्यवस्था और समुदाय की जरूरत को ध्यान में रखकर नहीं बनाती हैं। जब यह स्थापित हो चुका है कि सामान्य की अपेक्षा एक समुदाय विशेष कुपोषण की समस्या से ज्यादा जूझ रहा है तब भी कोई विशेष नीतिगत अभियान मध्यप्रदेश में इन बच्चों के जीवन को बचाने के लिये नहीं चलाया गया।

सहरिया बहुल किसी भी जिले के किसी भी एक गांव में एक भी ऐसा बच्‍चा देख पाना कठिन है जो फूले हुये पेट, कीचड़ से भरी आंखें, कमजोर हाथ-पैर और गंदगी से लिपटा हुआ न हो और यही उसकी कमजोरी के सबसे बडे वैज्ञानिक संकेत भी हैं। यह एक चेतावनी है कि जैसे-जैसे ग्रीष्म ऋतु अपने चरम पर पहुंचती जायेगी वैसे-वैसे दस्त के मामले इन बच्चों में तेजी से बढ़ते जायेंगें। वैसे तो दस्त एक सामान्य बीमारी है, परन्तु यह सामान्य बीमारी उनके जीवन के लिए एक चुनौती बन जाती है। जिसके बारे में यह माना जाता है कि पानी में गंदगी के कारण यह बीमारी फैलती है और 233 सहरिया बहुल गांव ऐसे पहचाने गये है। जहां के रहवासियों को अस्वच्छ जल स्रोतों से अपनी जरूरत पूरी करना पड़ती है। प्रशासन जिस स्तर पर इन बीमारियों के इलाज की सुविधा उपलब्ध करवाता है वहां परीक्षण तो हो जाता है परन्तु लोगों के पास वहां तक पहुंचने के लिये न तो यात्रा व्यय होता है न ही बाजार से दवायें खरीदने के लिये खींसे मे दाम। ऐसे में वे अपनी झोंपड़ी में किस्मत की आस लेकर बैठ जाते हैं।

यह समस्या अपने आप में सहरियाओं में असमय और समय से पूर्व होने वाली मौतों का सबसे बडा कारण है फिर भी इसे अब तक पंचायतों और सामुदायिक संगठनों के अधिकारों के साथ व्यावहारिक रूप से नहीं जोड़ा गया है। यह अक्सर देखा जाता है कि एएनएम और बहुउद्देश्यीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता पर गांव में लोगों और बच्चों के स्वास्थ्य पर निगरानी रखने की जिम्मेदारी है परन्तु विदिशा के गंजबासोदा और श्योपुर के कराहल विकासखण्ड में किये गये एक आंकलन से पता चला कि 18 गांवों में ए.एन.एम. एक माह में एक बार जाती हैं और वहां औसतन 90 से 120 मिनट का समय व्यतीत करती है। स्वाभाविक है कि इतने कम समय में कम से कम 75 महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य की जांच कर उन्हें उपचार दे पाना किसी भी नजरिये से संभव नहीं होगा।

एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम सरकार का सबसे बड़ा ऐसा कार्यक्रम है जो छह वर्ष तक के बच्चों में पोषण की कमी दूर करने के उद्देश्य से चलाया जा रहा हैं परन्तु यह कार्यक्रम अमानवीय भ्रष्टाचार का सबसे बडा केन्द्र बना हुआ है। जिस इलाके में सहरिया रहते हैं वहां यदि पूरे विकासखण्ड में आंगनबाड़ियों में पोषण आहार ही तीन माह तक न उपलब्ध हो तो इसे हम चरम स्तर की उदासीनता मानेंगे। पिछोर में 118 आंगनबाड़ियां हैं और वहां ऐसा हुआ है। इसका कारण हमारे वैचारिक तंत्र को झकझोर देगा। पिछोर में एक स्वयं सहायता समूह पोषण आहार की आपूर्ति कर रहा था। परन्तु कुछ ठेकेदार शक्तियों के दखल के कारण उनके बिलों का भुगतान रोक दिया गया और समूह को आपूर्ति बंद करना पड़ी। परिणाम यह हुआ कि तीन माह से बच्चों को वहां पोषण आहार नहीं मिल रहा है। दूसरा सवाल पोषण आहार की गुणवत्ता का है जब हम मानते हैं कि बच्चों को अतिरिक्त पोषण की जरूरत तो है ही, साथ में चिकित्सा सुविधा की भी दरकार है। तब धरातल पर हम पाते है कि 80 फीसदी आंगनबाड़ियों में नियमित रूप से बच्चों के वजन लेने और जांच का काम ही नहीं हो रहा है, जब ए.एन.एम. स्वास्थ्य-आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की संकटग्रस्त बच्चों की पहचान ही नहीं कर रहे हैं तो सरकारी आंकडों में तो कुपोषित बच्चों की संख्या शून्य आना तय ही है।

एक मसला यह भी है कि क्या एक कटोरी दलिया उबालकर खिला देने से उन बच्चों को स्वस्थ किया जा सकेगा जिनके घर गिनकर अन्न के दाने पकाये जाते हैं या फिर जरूरत इस बात की है कि ऐसे समुदाय के बच्चों के पालक की भूमिका सरकार निभाये और जो प्रावधान कागजों में है उन्हें पूरी प्रतिबध्दता के साथ क्रियान्वित करें। अभी स्थिति यह है कि वर्ष भर में अवकाश और आपूर्ति के अभाव के दिनों का यदि विश्लेषण किया जाये तो आदिवासी जिलों में वर्ष में अधिकतम 110 दिन पोषण आहार का वितरण हो रहा है। मायने साफ हैं कि इस तरह बच्चों की बदहाल होती स्थिति को सुधारा नहीं जा सकेगा। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश हैं कि एकीकृत बाल विकास योजना के अन्तर्गत नियमित रूप से छह वर्ष तक के बच्चों को 300 कैलोरी और 8 से 10 ग्राम प्रोटीन युक्त भोजन मिलना चाहिये और यदि मामला कुपोषित बच्चों का है तो उन्हें इससे दुगनी मात्रा मिलना चाहिए। धरातल की स्थिति यह है कि सहरिया बहुल क्षेत्रों में इस समस्या को ही नकारा जाता है इसलिये वहां आंगनबाड़ियों में दुगना पोषण आहार पहुंचना ही संभव नहीं हैं। यह एक बड़ा कारण है जिससे समस्या गंभीर होती जा रही है। यह तय है कि यदि सरकार गंभीरता को स्वीकार करेगी तो उसे सघन रूप से पहल करना पड़ेगी और यदि वह पहल करती है तो उसे स्वीकार करना पड़ेगा कि स्थिति गंभीर है। यह स्वीकार्यता प्रशासन और विभाग को लोगों के बीच जाकर काम करने के लिये मजबूर करेगी जो कि वे करना नहीं चाहते हैं और वे संकट को नकार कर काम करने की समस्या से निजात पा लेते हैं।

अब दुविधा का सवाल यह है कि एक ओर तो यूनीसेफ जैसी प्रतिष्ठित संस्था 55 प्रतिशत बच्चों की कुपोषित होने की बात करती है और आर.एम.आर.सी.टी. 93 फीसदी सहरियाओं के कुपोषित होने का दावा करता है जबकि जनकल्याणकारी राज्य की सरकार की व्यावहारिक प्राथमिकता में कुपोषण को मिटाने के लिए जन आंदोलन का कोई स्थान नहीं है। ऐसे में हमे किसका पक्ष लेना चाहिए? स्वाभाविक है कि सरकार अपने आंकड़े तो दे सकती है पर उसकी प्रक्रिया से ज्यादा उसकी मंशा संदिग्धता के दायरे में आती है। कुपोषण ठीक उसी तरह का मुद्दा है जैसे कि सौन्दर्य को देखना और महसूसना। सौन्दर्य, देखने वाले की नजर में होता है। आशय स्पष्ट है कि कुपोषण को यदि हम ईमानदारी से देखना चाहते हैं तो वह नजर आता है, अन्यथा बच्चे मरते रहते हैं और व्यवस्था उसकी मृत्यु के तर्क ढूंढ कर उसे न्यायोचित ठहराती है।

Sachin Kumar Jain

 
     
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